वामन महा पुराण
शुक्र द्वारा सज्जीवनी विद्या का प्रयोग, नन्दी के साथ दानवों का युद्ध, शिव द्वारा शुक का अपने जठर में स्थापन, शुकटप्त हर स्तुति, शुक्र द्वारा शिव के उदर में विश्व-दर्शन, हर के जठर से शुक का निष्कमण, प्रमर्थों तथा देवो का दानवों से युद्ध, हर का नृत्य एव दानवों का पराजय, हर के वेष में अम्धक का पार्वती के समीप गमन, भयवश पार्वती का श्वेतार्ककुसुम के तुल्य में तिरोमान प्रमथों एव अमरो का दानवो से युद्ध, अग्नि द्वारा इन्द्र को शक्ति-प्रदान जन्म एव शक का युद्ध, मातलि की उत्पत्ति, मातलि का इन्द्र सारथी होना इन्द्र द्वारा दैत्यों का विघात एव जम्भ-कुजम्भ का वध
पुलस्त्य उवाच ।
ततः स्वसैन्यमालक्ष्य निहतं प्रमथैरथ ।
अन्धकोऽभ्येत्य शुक्रं तु इदं वचनमब्रवीत् ॥ १
भगवंस्त्वां समाश्रित्य वयं वाधाम देवताः ।
अथान्यानपि विप्रचे गन्धर्चसुरकिन्नरान् ॥ २ .
सदियं पश्य भगवन् मया गुमा वरूथिनी ।
अनाथेव यथा नारी प्रमथैरपि काल्यते ॥ ३
कुजम्भाधाश्च निहता भ्रातरो मम भार्गव ।
अक्षयाः प्रमथाश्चामी कुरुक्षेत्रफलं यथा ।। ४
तस्मात् कुरुप्प श्रेयो नो न जीयेम यथा परैः।
जयेम च परान् युद्धे तथा त्वं कर्तुमर्हसि ॥ ५
शुक्रोऽन्धकवचः श्रुत्वा सान्त्ययन् परमातम् ।
वचनं प्राह देव ब्रह्मर्पिर्दानवेश्वरम् ।
त्व द्धितार्थ यतिष्यामि करिष्यामि तव प्रियम् ॥ ६
इत्येवमुक्त्वा वचनं विद्यां संजीवनी कविः।
आवर्तयामास तदा विधानेन शुचित्रतः ॥७
दिशाओं में भाग गया एवं घुमार सेना का मर्दन करने (६५)
हे महर्षि ! उन रुद्र-पुत्रों एवं गणों द्वारा मारी जा रही यह दानवी सेना दुसी एवं भय से विद्वल होकर शुक्र की शरण मे गई। (६६)
श्रीवामनपुराण में बयालिसवाँ अध्याय समाप्त II
४३
पुलस्त्य ने कहा-तदनन्तर प्रमथों द्वारा अपनी सेना को मारी गयी देखकर अन्धक ने शुक्राचार्य के पास जाकर यह बात कही-
हे भगवन् ! हे विप्र! हम आपही का आश्रय लेकर देवता, गन्धर्व, असुर, किनर एव अन्यों को बाधित करो (२)
हे भगवन् ! आप यह देखें कि मेरे द्वारा रक्षित यह सेना अनाथ नारी के सदृश प्रमथों द्वारा विनष्ट की जा रही है। (३)
हे भार्गव ! फुजम्भ आदि मेरे भाई मारे गये पर ये प्रमथ कुरुक्षेत्र तीर्थ के फल समान अक्षय हैं। (४)
अतः आप हमलोगों का कल्याण करें जिससे शत्रुओं के द्वारा हमलोग न जीते जॉय तथा आप ऐसा उपाय करें जिससे हमलोग दूसरों को युद्ध में जीत सकें। (५)
हे देवर्षे ! ब्रह्मर्पि शुक्राचार्य ने अग्धक की बात सुनकर दानवेश्वर को सान्त्वना देते हुए उससे कहा- मैं मैं तुम्हारे हितार्थ यत्न करूँगा और तुम्हारा प्रिय करूँगा। (६)
ऐसा कहकर शुचि व्रतों वाले शुक्राचार्य ने विधानानुसार संजीवनी विद्या को प्रकट किया। (७)
तस्यामाचर्यमानायां विद्यापामसुरेवराः ।
ये हताः प्रथमं युद्धे दानवास्ते समुत्थिताः ॥ ८
कुजम्भादिपु दैत्येषु भूय एवोत्यितेष्वय ।
पुद्धायाम्यागतेष्वेव नन्दी शंकरमप्रवीत् ॥ ९
महादेव वचो मह्यं शृणु त्वं परमाद्भवम् ।
अविचिन्त्यमसह्यं च मृतानां जीयनं पुनः ॥१०
ये हताः प्रमथैदे त्या यथाशक्त्या रणाजिरे ।
ते समुजीविता भूयो भार्गवेणाथ विद्यया ।। ११
तदिदं तैर्महादेव महत्कर्म कृतं रणे ।
संजातं स्वल्पमेवेश शुक्रविद्यारलाश्रयात् ॥ १२
इत्येवमुक्त वचने नन्दिना कुलनन्दिना ।
प्रत्युवाच प्रभुः प्रीत्या स्वार्थमाधनमुत्तमम् ॥ १३
गर शुक्र गणपते ममान्तिकम् पानय ।
अहं तं संयमिप्यामि यथायोग समेत्य हि ॥ १४
इत्येयमुक्तो रुदेण नन्दी गणपतिस्ततः ।
समाजगाम दैत्यानां चमं शुक्रजिघृधया ।। १५
तं ददर्शासुरश्रेष्ठो पलवान् हयगन्धरः।
संरुरोध तदा मार्ग सिंहस्येव पशुर्वने ॥१६
समुपेत्याहननन्दी वण शतपर्वणा।
स पपाताय निमंशो ययौ नन्दी ततस्त्वरन् ॥ १७
वतः कुजम्भो जम्मच घलो त्रस्त्वयःशिराः।
पञ्च दानवशार्दूला नन्दिनं समुपाद्रवन् ॥ १८
तथाऽन्ये दानवश्रेष्ठा मयहादपुरोगमाः ।
नानाप्रहरणा युद्धे गणनाथमभिद्रयन् ।। १९
वतो गणानामधिपं कुटयमानं महायलः ।
समपश्यन्त दयास्त पितामहपुरोगमाः ।। २०
तं दृष्ट्वा भगवान् ब्रह्मा प्राह शकपुरोगमान् ।
साहाय्यं क्रियतां शंभोरेतदन्तरमुत्तमम् ॥ २१
पितामहोक्तं वचनं श्रुत्वा देवाः सयासयाः ।
समापतन्त वैगेन शिवसैन्यमयाम्परात् ।। २२
उस विद्या के प्रस्ट होने पर युद्ध में पहले मारे गये असुरेश्वर एवं दाना जीवित हो गये। (८)
वदनन्तर पुभम्भ आदि दैत्यों के पुनः उठ सड़े होने तथा युद्ध परने के लिए आने पर नन्दी ने हार से । कहा-
हे महादेय! आप मेरा परम अद्भुत वचन सुनिये । मरे हुए लोगों का पुन जीवित हो जाना अपनीय तथा असहा है। (१०)
प्रमयों ने युद्ध में पराक्रमपूर्वक जिन दैत्यों को मारा थाह भार्गव ने विद्या द्वारा फिर जोषित कर दिया । (११)
अतः हे महादेय ६ इंश उन सभी ने युद्ध में जो महान को किया था यह शुक की यिा के बल से आप हो गया। (१२)
पुन्न को आनन्द देनयाले नन्दी के ऐसा करने पर महादेव ने प्रेमपूर्वक स्वार्थ साधक उपम पचन (१३)
हे गमपति! तुम जाओ और शुक को मेरे पास साओ। मैं उन्हें पार एपयुक्त योग आप कर संयत में करूंगा। (११)
रुद्र के ऐसा पहने पर गणपति नन्दी मापाय को पदलाने की इच्छा से दैत्यों की सेना में गये। (३५)
हयाधर नामक बलवान् श्रेष्ठ असुर ने उन्हें देखा और जिस प्रसर यन में सिंह का मार्ग पशु रोता है, उसी प्रकार उनके मार्ग को रोय। (१६)
नन्दी ने समीप जार शतपर्व (पस) के द्वारा उसे मारा पद अचेत होर गिर पड़ा। तदनन्तर नन्दी शीत यहाँ से चले गये।
तदनन्दर कुजम्म, जम्म, पद, पत्र, एवं अय शिरा नामा पाँच भेष्ट दानर नन्दी यो अर दो। (१८)
इसी प्रयर युद्ध में अनेक प्रसर के अम्रसोको पारण करने पाने मय एवं गाद आदि दानयोष्ट भी नन्दी थी और दीदे (१६)
तदननर पितामहादि देयों ने महापलगन (दानयों) द्वारा पूटं जा रहे गणाधिप यो सा। (20)
उसे देय कर भगवान् माझा ने इन्द्र आदि देताओं से कहा-इस उत्तम अपमर पर आप स्टेग शगु की सदायठा परें। (२१)
पितामह के कहे पपन ग्रे मुनार दादि देवता माया से वेगपूर्य शिव की सेना में मारे। (२२)
तेपामापतवां वेगः प्रमथानां चले बभौ ।
आपगाना महावेग पतन्तीना महार्णवे ।। २३
ततो हलहलाशब्द. समजायत चोभयोः ।
पलयो|रसंकाशो सुरप्रमथयोरथ ।। २४
तमन्तरमुपागम्य नन्दी सगृह्य वेगवान् ।
रथाद् भार्गवमानामत् सिंहः क्षुद्रमृग यथा ॥ २५
तमादाय हराभ्याशमागमद् गणनायकः ।
निपात्य रक्षिणः सर्वानथ शुक्रं न्यवेदयत् ।। २६
तमानीत कपि शर्यः प्राक्षिपद् वदने प्रभुः ।
भार्गवं त्वावृततर्नु जठरे स न्यवेशयत् ॥ २७
स शंभुना कविश्रेष्ठो ग्रस्तो जठरमास्थितः ।
तुष्टाव भगवन्तं तं मुनिर्वाग्भिरथादरात् ।। २८
शुक्र उवाच ।
यरदाय नमस्तुभ्यं हराय गुणशालिने ।
शंकराय महेशाय त्र्यम्मकाय नमो नमः ॥ २९
जीवनाय नमस्तुभ्यं लोकनाथ पाकपे ।
मदनाग्ने कालशत्रो वामदेवाय ते नमः ॥ ३०
स्थाणवे विश्वरूपाय वामनाय सदागते ।
महादेवाय शर्याय ईश्वराय नमो नमः ॥३१
त्रिनयन हर भव शकर उमापते जीमूतकेतो
गुहागृह श्मशाननिरत भूतिविलेपन शूलपाणे
पशुपते गोपते तत्पुस्पसत्तम नमो नमस्ते ।
इत्यं स्तुतः कनिवरेण हरोऽथ भक्त्या
प्रीतो परं वरय दमि तवेत्युवाच ।
स प्राह देववर देहि वरं ममाघ
यद्वै तव जठरात् प्रतिनिर्गमोऽस्तु ॥ ३२
ततो हरोऽक्षीणि तदा निरुभ्य
प्राह द्विजेन्द्राद्य विनिर्गमस्य ।
इत्युक्तमात्रो विभुना चचार
देवोदरे भार्गवपुंगवस्तु ।। ३३
परिभ्रमन् ददर्शाथ शंभोरेवोदरे कयिः ।
भुवनार्णयपातालान् वृतान् स्थावरजङ्गमैः ॥ ३४
समुद्र में जाती हुई नदियों के महावेग के समान प्रमथों की सेना मे (आकाश से) आते हुए देवताओं का (२३)
उसके अनन्तर प्रमथों और असुरों दोनों पक्षों के सैन्यों मे भयर हलहला शब्द उत्पन्न हुआ। (२४)
उसी समय अवसर पाकर चेगवान् नन्दी जैसे सिह क्षुद्रमृग को पकडता है उसी प्रकार रथ से भार्गव को लेकर भागे। (२५)
गणनायक उन्हें लेकर सभी पक्षकों को मारते हुए शङ्कर के समीप पहुँचे एव उनके पास शुनाचार्य को निवेदित (२६)
प्रभु शकर ने लाये गये उन शुक्र को अपने मुख में फेंका और आवृत शरीर भार्गव को अपने उदर मे सन्निविष्ट कर लिया। (२७)
शम्भु से प्रस्त होकर उनके उदर में स्थित हुए वे मुनि श्रेष्ठ शुक्र आदरपूर्वक टन भगवान की स्तुति करने (२८)
शुक्र ने कहा-आप गुणशाली हर घरदाता को नमस्कार है। शकर, महेश त्र्यम्बक को बार-बार नमस्कार है। (२९)
हे लोकनाथ । हे वृषामपि। आप जीवनस्वरूप को नमस्कार है। हे कामदेव के लिये अग्निस्वरूप । हे कालशन। आप वामदेव को नमस्कार है। (३०)
स्थाणु, विश्वरूप, वामन, सदागति, महादेव, शर्य और ईश्वर आपको बार बार नमस्कार है। (३१)
हे त्रिनयन । हे हर हे भव । हे शङ्कर । हे उमापति! हे जीमूतकेतु । हे गुहागृह । हे श्मशाननिरत । हे भूति- विलेपन । हे शूलपाणि । हे पशुपति । हे गोपति । हे तत्पुरुप- सत्तम । आपको बार बार नमस्कार है। इस प्रकार करियर के भक्ति से स्तुति करने पर शङ्कर ने कहा-मैं तुम से प्रमन्न हूँ। तुम वर माँगो मैं तुम्हें दूंगा। उन्होंने कहा-हे देववर । इस समय मुझ यही वर दीजिये कि मैं पुन आपक जठर से बाहर निकलू। (३२)
तदनन्तर शङ्कर ने नेत्रों को बन्द कर कहा-हे द्विजेन्द्र । अब तुम निकल आओ।विभु के एसा क्हन पर व भार्गय श्रेष्ठ महादेव के उदर में विचरण करने लगे। (३३)
शुक्राचार्य ने परिभ्रमग करते हुए शकर के ही उदर में स्थावर एव जगम प्राणियों से आवृत भुवन, समुद्र, एव पातालों को देखा।
मादिरपान पमयो महान् विपान गांगया।
पपात किरपापादान गभांप्परमा गणान् ॥ ३५
सुनीन् मनु बनाप्पांय पशुकोटपिपीनिवान् ।
पपगुन्मान गिरीन पन्न्यः पनमूनोपानि च ।। ३६
ग्यतम्या जनम्यांमानिमिपाणिमिपानपि।
पतुपतान महिपान ग्वारगन जनमाननि ॥ ३७
अपनीष पनप गगुनारगुमानपि ।
ग त्या पौरापिष्टः परिरमाम मार्गवः ।
गणागती मार्गरम्य दियः गारमा गाः ॥३८
न मानमरमर प्रणाथानोमन् परिः ।
मथान साक्ष्य गामानं नारमपि ।
भनिनी मा मग्नं ममुपागमन ।। ३.
तुम पाग। रिमाप विस्तार ।
गातार माध्यम रमन.॥१.
स नमाने मंकर प्रगा
गलवारमिदंगा
एयर मगंन सपनांगर
पाना मरन्त शरम प्रान्नः॥४
इस्पेरास्ते पनने मारमा
सन: पार हो ।
निर्ग पुरोऽमि ममाना सं
मिनेन मो मार्गशत ॥१२
नाम्ना तु सुति गराराम
तोप्पन्ति नैराध रिगारमन्यन् ।
इत्परसरमा मगरान मांग
गिनिन म निगाम ॥ ४३
पिनिगा भागवत
तुकरमापक महानुभारः।
प्रणम्य ग जगाम न
नागना सुगमोडाः ।। ४४
भागव नगा दाना मस्तिगान ।
पुनदार दिए गद गोः ॥१५
गपेपराम्नानगरान गरामरगनरम।
पुपरः गा पर मां पर गिरः ॥ १६
गुरगनाना नागपुमा ।
द्वन्द्वयुद्धं समभवद् घोररूपं तपोधन ॥ ४७
अन्धको नन्दिन युद्धे शङकर्ण स्वय.शिराः ।
कुम्भध्वजं बलिधीमान् नन्दिपेणं विरोचनः ॥ ४८
अश्वग्रीवो विशाखं च शाखो वृत्रमयोधयत् ।
याणस्तथा नैगमेयं पल राक्षसपुंगवः ॥ ४९
विनायको महावीर्यः परश्वधधरो रणे ।
संक्रुद्धो राक्षसभेष्ठं तुहुण्डं समयोधयत् ।
दुर्योधनश्च पलिनं घण्टाकर्णमयोधयत् ।। ५०
हस्ती च कुण्डजठरं हादो वीरं घटोदरम् ।
एते हि बलिना श्रेष्ठा दानवाः प्रमथास्तथा ।
संयोधयन्ति देवर्षे दिव्याब्दानां शतानि षट् ॥ ५१
शतक्रतुमथायान्त वज्रपाणिमभिस्थितम् ।
धारयामास बलपान् जम्मो नाम महासुरः॥ ५२
शम्भुनामाऽसुरपतिः स ब्रह्माणमयोधयत् ।
महौजसं कुजम्भश्च विष्णु देत्यान्तकारिणम् ॥ ५३
विवस्वन्तं रणे शाल्यो वरुणं त्रिशिरास्तथा ।
द्विमूर्धा परनं सोमं राहुमित्रं विरूपधृक् ।। ५४
अष्टौ ये वसवः रयाता घराधास्ते महासुरान् ।
अष्टावेन महेष्वासान् वारयामासुराहवे ॥ ५५
सरभः शलभः पाकः पुरोऽय विश्थुः पृथुः ।
वातापी चेल्वलचैव नानाशस्त्रास्त्रयोधिनः ॥ ५६
विश्वेदेवगणान् सर्वान् विप्वक्सेनपुरोगमान् ।
एक एव रणे रौद्रः कालनेमिर्महासुरः ॥ ५७
एकादशैर ये रुद्रास्तानेकोऽपि रणोत्क्टः ।
योधयामास तेजस्वी विद्युन्माली महासुरः ॥ ५८
द्वावश्विनौ च नरको भास्करानेव शम्बरः ।
साध्यान् मरुद्गणाचैव निवातकवचादयः ॥ ५९
एव द्वन्द्वसहस्राणि प्रमथामरदानः ।
कृतानि च सुराब्दानां दशतीः पट महामुने । ६०
यदा न शकिता योई दैवतैरमरारयः ।
में भयङ्कर द्वन्द्व युद्ध हुभा।
अन्धक नन्दी के साथ, अय शिरा शर्ण के साथ, बुद्धिमान् बलि कुम्भध्वज के साथ एय विरोचन नन्दिपेण के साथ युद्ध करने लगा। (४८)
अश्वनीय विशाख के साथ और शाख पुत्र के साथ, बाण नैगमेय के साथ एवं राक्षसपुगव बल के साथ लड़ने लगा। (४९)
महावीर्यवान् परशुधारी विनायक युद्ध मे क्रुद्ध होकर राक्षसश्रेष्ठ तुहुण्ड के साथ रडने लगे पर दुर्योधन बलवान घण्टाकर्ण के साथ युद्ध करने लगा। (५-)
हस्ती कुण्डजठर के साथ एव हाद वीर घटोदर से लडने लगा। हे देवपि । बलवानों मे श्रेष्ठ ये सभी दानव एष प्रमाण परस्पर छ सौ दिव्य वर्षों तक युद्ध करते रहे। (५१)
जन्म नामक बलवान् महान असुर ने आ रहे पत्रपाणि इन्द्र को रोका। (५२)
शम्भु नामक असुरराज ब्रह्मा से सडने लगा एय कुम्भ महान ओनस्वी दैत्यान्तकारी विष्णु से युद्ध करने (५३)
शाल्व सूर्य से, त्रिशिरा वरुण से, द्विमूर्धा पवन से, राहु सोम से एक विरूपधृक् मित्र से युद्ध करने (५४)
धरादि नाम से प्रसिद्ध आठ वसुओं ने सरभ, शलभ, पाक पुर, विपृथ, पृथु, वातापी एव इल्वल इन आठ महान धनुर्धर असुरों का युद्ध मे सामना किया। ये असुर अनेक प्रकार के शस्त्रास्त्र लेकर लडने लगे। कालनेमि नामक भयङ्कर महासुर युद्ध में एकाकी ही विष्वक्सेनादि विश्वेदेव गणों से युद्ध करने लगा। (५५-५७)
रणोत्कट तेजस्वी विगु-माली नामरु महासुर अकेले ही एकादश रद्रो का सामना किया।
नरक ने दोनों अश्विनीकुमारों से, शम्बर ने (द्वादश) भास्करों से एव नियातक्वचादि ने साध्यो तथा मरद्गणों से युद्ध किया। (५६)
हे महामुने। इस प्रकार साठ दिव्य यों तक प्रमथों एव दानवों के सहस्रों युग्म परस्पर द्वन्द्वयुद्ध परते (६०)
जब असुर गण देवों से युद्ध करने में असमर्थ हो गए तो उन लोगों ने माया का आश्रयकर देवों का प्रमश
तदा मायां समाश्रित्य ग्रमन्त स्मोऽव्ययान् ॥ ६१
ततोऽभवच्छैलपृष्ठं प्राडभ्रममप्रमैः ।
आवृतं वनितं मः प्रमथैरमरैरपि ॥ ६२
दृष्ट्वा शून्यं गिरिप्रस्थं ग्रस्ताश्च प्रमयामरान् ।
क्रोधादुत्पादयामास रुद्रो जृम्भायिका चशी ॥ ६३
तया स्पृष्टा दनुसुता अलमा मन्दभापिणः ।
वदन पिकृतं कृत्वा मुक्तशस्त्रं विजम्भिरे ।। ६४
जम्भमाणेषु च तदा दानवेषु गणेश्वरा. ।
सुराश्च निर्ययुस्तूर्ण दैत्यदेहेम्य आकुलाः ॥ ६५
मेघप्रमेभ्यो देत्यम्यो निर्गच्छन्तोऽमरोचमा ।
शोभन्ते पनपत्राक्षा मेषम्य इस विद्युत. ।। ६६
गणामरेषु च समं निर्गतेपु तपोधन ।
अयुध्यन्त महात्मानो भूय एनातिकोपिताः ॥ ६७
ततस्तु देवैः सगण. दानमाशर्वपालित।
पराजीयन्त सग्रामे भूयो भूयस्त्वहनिशम् ॥ ६८
ततस्त्रिनेत्र. सां संध्यां सप्ताब्दशतिक गते ।
कालेऽभ्युपामत तदा सोऽष्टादशभुनोऽव्ययः ॥ ६०
संस्पृश्यापः मरसत्या स्नात्वा च विधिना हरः।
कृतार्थो भक्तिमान मूर्ना पुष्पाञ्जलिमुपाक्षिपत् ।। ७०
ततो ननाम शिरमा ततश्चक्रे प्रदक्षिणम् ।
हिरण्यगर्भेत्यादित्यमुपतस्थे जजाप ह ।। ७१
स्पष्टै नमो नमस्तेऽस्तु सम्यगुच्चार्य शूलधृक् ।
ननत मारगम्भीरं दोर्दण्ड भ्रामयन् बलात् ।। ७२
परिनृत्यति देवेशे गणाचैयामरास्तथा ।
नृत्यन्ते भारसंयुक्ता हरस्यानुनिलासिनः ॥ ७३
सभ्यामुपास्य देवेशः परिनृत्य यथेच्छया।
युद्धाय दानो. साई मतिं भूय. समादधे ।। ७४
ततोऽमरगण. सस्त्रिनेत्रभुजपालिन ।
दानवा निनिता. सर्वे पलिमिर्भयपनित. ॥ ७५
सरलं निनितं दृष्ट्या मत्वाऽजेय च शंस्म् ।
अन्धकः सुन्दमाहूय इद यवनमरवीत् ॥ ७६
सुन्द भ्रातासि मे वीर विद्यास्यः सर्ववस्तुपु ।
प्राप्त करना प्रारम्भ क्यिा। (६१)
तदनन्तर समस्त प्रमों एव देवों से रहित पर्वत वर्षा कालीन मेघ के सदृश दानयों से आवृत हो गया। (६२)
पर्वत प्रदेश को शून्य एष प्रमयों तथा देवों को प्रस्त हुआ देसार जितेन्द्रिय रुद्र ने ग्रोध से जृम्भायिका को उत्पन किया। (६३)
उसके स्पर्श करने पर अखों को छोटकर मन्दभाषण करते हुए आलस्यपूर्ण दानव मुस का विस्त कर जम्हाई हेने लगे। (६४)
दानों के जन्हाई लतेसमर आकुल गणेश्वर एव देवता लोग शीघ्रता पूर्वक दैत्यों की देह से बाहर निकल गय। (६५)
मेघ सदृश दैत्यों के (शरीर से) वाहर निकल रहे कमल के समान नेत्र वाले श्रेष्ट देवगण मेघ से प्रकट होने वाली विद्युत् के सदृश शोभित हो रहे थे। (६५)
हे तपोधन । गणों और देवों के निम्ल आन पर वे महात्मा (देत्य) अति ऋद्ध होकर युद्ध करने लगे। (६७)
तदनन्तर शम्भुपारित गणों एष दयों ने सग्राम में दानवों को अहर्निश यारम्बार पराजित किया। (६८)
तदनन्तर सात सौ वर्षों का समय व्यतीत हो जाने पर अष्टादश भुजाओं वाले अभ्यय प्रिनेत्र अपनी सन्ध्या करने लगे। (६६)
जल का स्पर्श र विधिपूर्वक सरस्वती मे स्नान कर कृतार्थ भक्तिमान् श्कर ने मस्तक से पुप्पाञ्जलि अर्पित की। (७०)
तदनन्तर शिर से प्रणाम एघ तदनन्तर प्रदक्षिणा कर 'हिरण्यगर्भ' इत्यादि मन्त्र से सूर्य की वन्दना और जप किया। (७१)
तदुपरान्त 'त्वष्ट्र नमो नमस्तेऽस्तु' इसका सम्यर स्प से उच्चारण कर शूलपाणि बलपूर्वक भुजदण्ड घुमाते हुए भागम्भीर हारर नाचने लगे। (७२)
देवेश्वर क नाचने पर गग और देवता भी भक्तियुक्त होकर हर का अनुगमन करते हुए नाचने लगे। (७३)
सध्योपासन र यच्छ नृत्य के याद देवेश ने पुन दानों से युद्ध करने का विचार किया । (७१)
वदनम्वर शहर की भुजाओ से रक्षित पलयान एप भय- रहित समस्त दवों ने समस्त दानों को जीत लिया। (७५)
अपना सना का पराजित देख तथा महादेव को अजेय जानकर अन्धन ने मुन्द को बुलाकर यह वचन कहा-(७६)
हे वीर मुन्द । तुम मेरे भाई हो और सभी विषयों में तुम मेरे विश्वासपात्र हो। अत' आर मैं तुमसे जो कहता हूँ
तद्वदाम्यद्य यद्वाक्यं तच्छ्रुत्वा यत्क्षमं कुरु ॥ ७७
दुर्जयोऽसौ रणपटुर्धर्मात्मा कारणान्तरः ।
समासते हि हृदये पद्माक्षी शैलनन्दिनी ॥ ७८
तदुत्तिष्ठस्व गच्छामो यत्रास्ते चारुहासिनी ।
तत्रैना मोहयिष्यामि हररूपेण दानव ॥ ७९
भवान् भवस्यानुचरो भव नन्दी गणेश्वरः ।
ततो गत्वाऽथ भुक्त्वा तां जेण्यामि प्रमथान् सुरान।।८०
इत्येवमुक्ते वचने पाढं सुन्दोऽभ्यभाषत ।
समजायत शैलादिरन्धकः शंकरोऽप्यभूत् ।। ८१
नन्दिरुद्रौ ततो भूत्वा महासुरचमूपती ।
सप्रासौ मन्दरगिरि प्रहारैः क्षतविग्रहौ ।। ८२
हस्तमालम्ब्य सुन्दस्य अन्धको हरमन्दिरम् ।
विवेश निर्विशङ्कन चित्तेनासुरसत्तमः ॥८३
ततो गिरिसुता दूरादायान्त वीक्ष्य चान्धकम् ।
महेश्वरवपुश्छन्नं प्रहारैर्जर्जरच्छविम् ।। ८४
सुन्दं शैलादिरूपस्थमवष्टभ्याविशत् ततः।
तं दृष्ट्वा मालिनी प्राह सुयश विजयां जयाम् ॥ ८५
जये पश्यस्व देयस्य मदर्थे विग्रहं कृतम् ।
शत्रुभिर्दानववरैस्तदुनिष्ठस्व सत्वरम् ॥ ८६
घृतमानय पौराणं बीजिकां लपणं दधि ।
व्रणमझं करिष्यामि सयमेव पिनाकिनः ।। ८७
कुरुष्व शीघ्र सुयशे स्वभर्तणनाशनम् ।
इत्येवमुक्त्वा वचनं समुत्थाय वरामनात् ।। ८८
अभ्युधयो तदा भक्त्या मन्यमाना वृपध्वनम् ।
शूलपाणेस्ततः स्थित्या रूपं चिहानि यत्नतः ॥ ८९
अन्षियेष ततो ब्रह्मन्नोभौ पार्थस्थितौ पौ।
सा ज्ञात्या दानवं रौद्र मायाच्छादितविग्रहम् ॥ ९०
अपयानं तदा चक्रे गिरिराजसुता मुने ।
देव्याचिन्तितमाज्ञाय सुन्दं त्यक्त्वान्धकोऽसुरः॥ ९१
समाद्रवत वेगेन हरकान्तां विभावरीम् ।
समाद्रवत दैतेयो येन मार्गेण साऽगमद् ॥ ९२
अपस्कारान्तरं भञ्जन पादप्लुतिभिराकुलः ।
उसे सुनकर यथाशक्ति पूर्ण करो। (७७)
किसी कारणवश यह रणपटु धर्मारमा दुर्जेय है। मेरे हृदय मे कमलनयनी पार्वती समासीन है। (७८)
अत बठो। हम यहाँ चले जहाँ वह सुहासिनी स्थित है। हे दानव । वहाँ मैं शङ्कर के रूप से उसे मोहित करूँगा। (७६)
तुम शङ्कर का अनुचर गणेश्वर नन्दी बनो। तदनन्तर वहाँ जाकर उसका भोगकर प्रमथों एव देषों को जीतूंगा। (८०)
ऐसा कहने पर सुन्द ने कहा- ठीक है। तदनन्तर वह शैलादि (नन्दी) बन गया एव अन्धक शिव बन गया (८१)
तदनन्तर महामुर (अन्धक) ए सेनापति (सुन्द) प्रहारों से क्षत विक्षत शरीर वाले रुद्र और नन्दी का रूप धारण कर मन्दर गिरि पर पहुंचे। (८२)
सुन्द का हाथ पक्डकर असुरश्रेष्ठ अन्धक निर्भयचित्त से महादेव के मन्दिर में प्रविष्ट हुआ। (८३)
तदनन्तर शैलादिनन्दीके वेश में स्थित सुन्द को पकडकर प्रहारों से जर्जरित महादेव के शरीर में प्रच्छन्न अन्धक को दूर से आते हुए देखकर पानी ने यशस्विनी मालिनी, विजया तथा जया से कहा- (८४-८५)
हे जये। देखो। दानव-शत्रुओं ने मेरे लिए स्वामी का शरीर कैसा कर डाला है। अत शीघ्र पठो । (८६)
पुराना घृत, बीजिका, लवण एव दधि लाओ। मैं स्वय ही पिनाकी शकर के व्रणों को भरूँगी।
हे यशस्विनी । शीघ्र अपने स्वामी के पावों को भरो। ऐसा कहते हुए आसन से उठकर उन्हें कृपष्वज मामती हुई वे भक्ति पूर्वक उसके समीप गई। तदननर खडी होकर वे शकर के रूप ष लक्षणों को भलीभाँति देखने लगीं। हे ब्रह्मन् । उन्होंने देसा कि उनके पार्श्व में स्थित दोनों वृप नहीं है। अत उन्हें ज्ञात हो गया कि यह माया से प्रच्छन्न शरीर वाला भयङ्कर दानव है। (८८-९०)
हे मुने। तदनतर गिरिराजपुत्री भाग गई। देवी के विचार को जानकर अन्धकासुर सुन्द को छोड़कर वेग पूर्वक शकर प्रिया विभावरी के पीछे उसी मार्ग से दौडने लगा जिससे वे गई थी। (९१-९२)
चरणचपेटों से राह के अवरोधों को चूर चूर करते हुए
तमापतन्तं दृष्ट्यैव गिरिजा प्राद्रवद् भयात् ॥ ९३
गृहं त्यक्त्वा ह्युपपनं सखीभिः सहिता तदा ।
तत्राप्यनुजगामापौ मदान्धो मुनिपुंगर ॥ ९४
तथापि न शशापनं तपसो गोपनाय तु ।
तद्भयादाविशद् गौरी श्वेतार्ककुसुमं शुचि ॥ ९५
विजयाद्या महागुल्मे संप्रयाता लयं मुने ।
नष्टायामथ पार्थत्यां भूयो हैरण्यलोचनिः ॥ ९६
सुन्दं हस्ते समादाय स्वसैन्यं पुनरागमत् ।
अन्धकै पुनरायाते स्ववलं मुनिसत्तम ।। ९७
प्रायतंत महायुद्धं प्रमयासुरयोरथ ।
ततोऽमरगणश्रेष्ठो विष्णुश्चक्रगदाधरः॥९८
निजघानासुरवलं शंकरप्रियकाम्यया ।
शाईचापच्युत्तेर्माणैः सत्यूता दानवर्षभाः ॥ ९९
पञ्च पट् सम्र चाटो वा प्रघ्नपादेपना इव ।
गदया काश्विदयधीत् चक्रेणान्यान् जनार्दनः ॥ १००
खङ्गेन च चकर्तान्यान् दृष्ट्याऽन्यान् भस्मसाद् व्यधात् ।
हलेनाकृप्य चैान्यान् मसलेन व्यचूर्णयत् ॥ १०१
गरुड पक्षपाताभ्यां तुण्डेनाप्युरसाऽहनन् ।
स चादिपुरुषो धाता पुराणः प्रपितामहः ॥ १०२
भ्रामयन् विपुलं पद्ममभ्यपिञ्चत यारिणा ।
संस्पृष्टा ब्रह्मतोयेन सर्वतीर्थमयेन हि ॥ १०३
गणामरगणाथासन् नवनागशताधिकाः ।
दानवास्तेन तोयेन संस्पृष्टाश्चापहारिणा ॥ १०४
सवाहनाः क्षयं जग्मुः कुलिशेनेन पर्वताः।
दृष्ट्या ब्रह्महरी युद्धे घातयन्तौ महासुरान् ॥ १०५
शवकतुश्च दुद्राय प्रगृह्य कुलिश ली।
तमापतन्तं संप्रेक्ष्य यलो दानवसत्तमः ॥ १०६
मुक्त्या देवं गदापाणि विमानस्थं च परजम् ।
शक्रमेवाद्रयद् योद्धमुटिनुद्यम्य नारद ।
बलवान् दानवपतिरजेयो देवदानः ॥ १०७
तमापतन्तं त्रिदशेवरस्तु
दोष्णा सहस्रेण यथानलेन ।
वह व्याकुलतापूर्वक दौड़ा । उसे आते देख गिरिजा भय से भागीं।
हे मुनिपुंगव । तदनन्तर देवी सखियों के साथ गृह छोड़कर उपवन में चली गयीं। वहाँ भी मदान्ध (अन्धक) ने उनका अनुसरण किया। (६४)
इतने पर भी अपने तप की रक्षा के लिए उन्होंने उसे शाप नहीं दिया। गौरी उसके भय से पवित्र शुक्ल अर्थपुष्प में लीन हो गयीं।
हे मुने । विजया आदि भी घनी झाडियों में लीन हो गयीं। तदनन्तर पार्वती के लुप्त हो जाने पर हिरण्या क्षपुत्र (अग्धक) सुन्द का हाथ पाडार पुन अपनी सेना में चला गया। हे मुनिसत्तम' अन्धक के पुन अपनी सेना में लौट आने पर प्रमों एव असुरों में महायुद्ध होने लगा। तदनन्तर सुरश्रेष्ठ चम्गदायर विष्णु शङ्कर का प्रिय करने की कामना से असुर सेना का वध करने लगे। शाई धनुष से निकले पाणों से पाँच, छ, सात या आठ श्रेष्ठ दानव उसी प्रकार विद्ध होने लगे जैसे सूर्य की किरणों से मेघ विद्ध होते हैं। जनार्दन ने बुख को गदा से ५५ युद्ध को चक्र से मार डाला। (९६-१००)
किन्हीं को सड्ग के द्वारा काट डाला और किन्हीं को दृष्टि से भस्म कर दिया तथा कुछ असुरों को इल द्वारा सींचार मुसल से पूर्ण कर दिया। (१०१)
गरुड़ ने अपने दोनों पलों, चोंच तथा यक्ष से अनेक दैत्यों को मार डाला। पुरातन आदिपुरुष धाता प्रपितामह ने महान पड़ा को घुमाते हुए सभी को जल से सिश्चित क्यिा । सर्वतीर्थमय ब्रह्मतोय का स्पर्श होने से गण एवं देवता लोग सौ युवा हाथिया से अधिक घटयान हो गए। तथा उस पापहारी जल के स्पर्श से वाइन-सहित दानर इस प्रकार नष्ट होने लगे जैसे वय से पर्वत नष्ट होते हैं । ब्रह्मा यि विष्णु को युद्ध में महासुरों को मारते देखकर बल्यान इन्द्र भी अपना यम लेकर दौड़े। हे नारद । उन्हें आते देखकर देवा तथा दानरों से अजेय दानवश्रेष्ठ घलयान् दानवपति पल देव गदाधर एवं विमानस्थ ब्रह्मा को छोड़कर मुष्टि को उठाये हुए इन्द्र से ही लड़ने के लिए दौड़ा। (२०२१-७)
उसे आते देस निदशेश्वर इन्द्र ने सहस भुजाओं से अपनी शक्ति मर पत्र को घुमाते हुए थल के मस्तक पर हे मूह ।
वत्रं परिभ्राम्य बलस्य मूनि
चिक्षेप हे मूढ हतोऽस्युदीर्य ॥ १०८
स तस्य मूर्ध्नि प्रबरोऽपि वजो
जगाम तूर्ण हि सहस्रधा मुने ।
वलोऽद्रवद् देवपतिश्च भीतः
पराङ्मुखोऽभूत् समरान्महर्षे ॥ १०९
तं चापि जम्मो विमुखं निरीक्ष्य
भूत्वाऽग्रतः प्राह न युक्तमेतत् ।
तिष्ठस्व राजाऽसि चराचरस्य
न राजधर्म गदितं पलायनम् ॥ ११०
सहस्राक्षो जम्भवाक्यं निशम्य
भीतस्तुर्ण विष्णुमागान्मह ।
उपेत्याह श्रूयता वाक्यमीश
त्वं मे नाथो भूतभव्येश निष्णो ॥ १११
जम्भस्तर्जयतेऽत्यर्थ मां निरायुधमीक्ष्य हि ।
आयुधं देहि भगवन् त्वामहं शरणं गतः ॥ ११२
तमुवाच हरिः शक्र त्यक्त्वा दर्प व्रजाधुना ।
प्रार्थयस्वायुधं यहि स ते दास्यत्यसंशयम् ।। ११३
जनार्दनवचः श्रुत्वा शकस्त्वरितविक्रमः ।
शरणं पावकमगादिदं चोवाच नारद ॥ ११४
शक्र उवाच।
निम्नतो मे पलं पज कृशानो शसधा गतम् ।
एप चाहूयते जम्भस्तस्माद्देयायुध मम ॥ ११५
पुलस्त्य उवाच ।
तमाह भगवान् वह्नि. प्रीतोऽस्मि तव वासव ।
यत्त्वं दर्प परित्यज्य मामेव शरणं गतः ।। ११६
इत्युचार्य स्वशक्त्यास्तु शक्ति निष्क्राम्य भावतः ।
प्रादादिन्द्राय भगवान् रोचमानो दिव गत. ॥ ११७
तामादाय वदा शक्ति शतघण्टा सुदारुणाम् ।
प्रत्युद्ययौ तदा जम्भं हन्तुकामोऽरिमर्दनः ॥ ११८
तेनातियशसा दैत्य. सहसैयाभिसंद्रुतः ।
क्रोधं चक्रे तदा जम्भो निजधान गजाधिपम् ॥ ११९
जम्भमष्टिनिपातेन भनकुम्भकटो गज. ।
निपपात यथा शैलः शक्रवज्रहतः पुरा ॥ १२०
तुम मारे गये' कह कर पका। (१०८)
हे मुनि । वह श्रेष्ट वन भी उसके शिर पर शीघ्र हजारों खण्डों में विभक्त हो गया। बल (इन्द्र की ओर) दौडा । हे महर्षि । भयभीत होकर देवराज युद्ध से पराङ्मुख हो गये। (१०६)
उन्हें विमुख होते देख जम्भ ने आगे आनर कद्दा- यह सचित नहीं है। रविए, आप चराचर के राजा है। राजधर्म मे पलायन करने का विधान नहीं है। (११०)
हे महर्षि । जम्भ का वचन सुनकर भयभीत इन्द्र शीघ्र विष्णु के समीप गये । वहाँ जाकर उन्होंने कहा-हे ईश ! मेरी यात आप सुनें। हे भूत तथा भव्य ये स्वामी विष्णु । आप मेरे नाथ हैं। (१११)
निरायुध देखर जम्भ मुझें अतिशय तजित कर रहा है। हे भगवन् । आप मुझे आयुध प्रदान करें । मैं आपकी शरण में आया हूँ। (११२)
विष्णु ने इन्द्र से कहा-इस समय दर्प छोडकर तुम अग्नि के समीप जाफर उनसे आयुध की प्रार्थना करो। चे निस्सन्देह तुम्हें प्रदान करेगें। (११३)
हे नारद । जनार्दन की यात सुनार शीघ्र गति वाले इन्द्र अग्नि की शरण मे गये और यह कहा। (११४)
इन्द्र ने कहा-हे अग्नि । बल को मारने मे मेरा वन सैक्डों सण्ड हो गया। यह जम्भ मुझे ललकार रहा है। अत आप मुझे आयुध प्रदान करें। (११५)
पुलस्त्य ने कहा--भगवान् यहि ने उनसे कहा-हे वासव । मैं आपके ऊपर प्रसन्न हूँ। क्योंकि आप दर्प को छोड कर मेरी शरण मे आये हैं। (११६)
ऐसा कहने के उपरान्त प्रकाशमान भगवान अग्नि ने भावपूर्वक अपनी शक्ति से एक अन्य शक्ति निकाल कर इन्द्र को दिया एव स्वर्ग चले गये । (११७)
शत्रुमदन इन्द्र उस शतघण्टाओं से युक्त भीषण शक्ति को लेकर जम्भ को मारने के लिए गये। (११८)
उन अति यशस्वी के सहसा पीछा करने पर जम्भ ने क्रोधपूर्वक गजाधिप (ऐरावत) पर प्रहार किया। (११९)
जम्भ की मुठ्ठी के प्रहार से हाथी का कुम्भस्थल भग्न हो गया। तदनन्तर यह इस प्रकार गिर पड़ा जैसे पूर्वकाल मे के वन से आहत पर्वत गिरता था। (१२०)
पतमानाद् द्विपेन्द्रात्तु शक्रश्चाप्लुत्य वेगवान् ।
त्यक्त्व मन्दरगिरि पपात वसुधातले ।। १२१
पतमान हरि शिद्धाश्चारणाश्च तदात्रुवन् ।
मा मा शक्र पतस्वाद्य भूतले विष्ठ वासव ॥ १२२
स तेषां वचनं श्रुत्या योगी तस्थौ क्षणं तदा ।
प्राह चैतान् कथ योत्स्ये अपत्रः शत्रुभिः सहः ॥ १२३
वमूचुर्देवगन्धर्वा मा पिपादं ब्रजेश्वर ।
पुष्यस्स त्वं समारसप्रेपयिष्याम यद् रथम् ।। १२४
इत्येवमुफ्त्या विपुलं रथं स्वस्तिकलक्षणम् ।
पानरध्वजसंयुक्तं हरिभिर्ह रिभिर्यतम् ॥ १२५
शुद्धजाम्यूनदमयं फिङ्किणीजालमण्डितम् ।
शक्राय प्रेषयामासुर्विश्वावसुपुरोगमाः ॥ १२६
तमागतमुदीक्ष्याथ हीनं मारथिना हरिः।
प्राह योत्स्ये कथं युद्धे संयमिप्ये कयं हयान् ॥ १२७
यदि कश्चिद्धि सारथ्यं फरिष्यति ममाधुना ।
ततोऽहं घातये शत्रून् नान्यथेति कथंचन ।। १२८
ततोऽत्रुवंस्ते गन्धर्या नास्माकं सारथिविभो ।
विद्यते स्वयमेवाश्यास्त्वं संयन्तुमिहार्हसि ॥ १२९
इत्येवमुक्त भगवांस्त्यक्त्वा स्यन्दनमुत्तमम् ।
क्ष्मातलं निपपातैव परिभ्रष्टसगम्मरः ।। १३०
चलन्मौलिर्मुक्तकचः परिभ्रष्टायुधाङ्गदः ।
पतमानं सहस्राक्षं दृष्ट्वा भूः समफम्पत ॥ १३१
पृथिव्यां कम्पमानायां शमीकस्तपस्विनी ।
भार्याऽप्रवीत् प्रभो वालं वहिः कुरु यथासुसम् ॥ १३२
स तु शीलायचः श्रुत्वा किमर्थमिति चाब्रवीत् ।
सा चाह श्रूयतां नाथ दैवज्ञपरिभापितम् ॥ १३३
यदेयं कम्पते भूमिस्तदा प्रक्षिप्यते बहिः ।
यद्वाह्यतो मुनिश्रेष्ट तद् भवेद् द्विगुणं मुने ।। १३४
एतद्वाक्यं तदा श्रुत्वा बालमादाय पुत्रकम् ।
निराशको यहिः शीघ्र प्राक्षिपद मातले द्विजः ॥१३५
मृयो गोयुगलार्थाय प्रविष्टो भार्यया द्विजः ।
निवारितो गता वेला अईहानिर्भविष्यति ।। १३६
गिर रहे गजेन्द्र से इन्द्र वेग पूर्वक उछले एव मन्दर पर्वत को भी छोड़कर पृथ्वी पर गिरे। (१२१)
तदनन्तर गिर रहे इन्द्र से सिद्धों एव चारणों ने कहा-हे इन्द्र । पृथ्वी पर न गिरें । आप स्के। (१२२) सनी यात सुनार योगी इन्द्र उस समय क्षणभर के लिए ठहर गए और बोले-में वाहन रहित होकर इन शनुओं से कैसे लड़े गा ? (१२३)
देवताओं और गन्धवों ने उत्तर दिया-हे ईश्वर आप विपण्ण न हों। हम लोग जो रथ भेज रहे है, उस पर आरूढ होकर आप युद्ध करें। (१२४)
ऐसा कहकर विश्वावसु आदि ने स्वस्तिमशर, कपिध्वज संयुक्त, हरितवर्ण के अञ्चों से युक्त, शुद्ध स्वर्ण से निमित तथा विहिणीजालमण्डित विपुल रय इन्द्र के लिये भेजा। (१२५-१२६)
इन्द्र उस सारधिरहित रथ को देखकर घोरे-कैसे मैं युद्ध मे लडूंगा और कैसे घोडों को सयत फरँगा ? (१२७)
इस समय यदि कोई मेरे सारथि का काम करें तो मैं शपभों का नाश कर सकता हूँ, अन्य किसी प्राप्त नही। (१२८)
तदनन्तर गन्धयों ने पहा-हे विमो । हमारे पास कोई लगी। मारधि नहीं है। आप स्यय अश्वों को सयत कर सकते है। (१२९)
ऐसा कहने पर भगवान इन्द्र अस्तव्यस्त माला और यस्त्रों के साथ पृथ्वी पर गिरे। (१३०)
(पृथ्वी पर गिरते समय इन्ट का) शिर हिल रहा था, उनके केश विसर गये थे एवं उनके आयुध तथा अङ्गद नीचे गिर पडे थे। इन्द्र को गिरते देख पृथ्वी कम्पित होने (१३१)
पृथ्वी के कॉपने पर शमीक ऋपि की तपस्विनी पत्नी ने कहा-प्रभो । यालक से सुम्पपूर्वक बाहर ले जाइये । (१३२)
उन्होंने शीला की पात सुनार कहा- क्यों ? उसने कहा-हे नाथ । सुनिये, ज्यातिपियों का कथन है कि भूमि के कम्पित होने पर वस्तुएँ याहर निकाल दी जाती है। क्योंकि हे मुनिश्रेष्ठ। उस समय बाहर स्थित यस्तु द्विगुणित हो जाती है। (१३३-२३४)
इस वाक्य को सुनकर उस समय ब्राह्मण ने अपने याटक पुत्र को लेकर तरकाल शारहित होकर बाहर भूतल पर फेंक दिया। (१३५)
पुन दो गायों के लिये भीतर अपिष्ट होने पर परनी ने ब्राह्मण को मना करते हुए कहा-बेला समाप्त हो गई सय
इत्येवामुक्त देवर्षे वहिनिर्गम्य वेगवान् ।
ददर्श पालद्वितयं समरूपमयस्थितम् ॥ १३७
तं दृष्ट्या देवताः पूज्य मायाँ चावदर्शनाम् ।
प्राह तत्त्वं न विन्दामि यत् पृच्छामि यदस्व वत् ॥१३८
पालस्यास्य द्वितीयस्य के भविष्यद्गुणा बद ।
भाग्यानि चास्य यत्रोक्तं कर्म तत् कथयाधुना ॥ १३९
साऽप्रवीनाद्य ते वक्ष्ये वदिष्यामि पुनः प्रभो ।
सोऽनयीद् वद मेऽद्यैव नोचेन्नाश्नामि भोजनम् ॥ १४०
सा प्राह श्रूयतां ब्रह्मन् वदिष्ये वचनं हितम् ।
कातरेणाय यत्ष्टं भाव्यः कारुरयं फिल ॥ १४१
इत्युक्तवति वाक्ये तु पाल एव त्वचेतनः ।
जगाम साह्यं शक्रस्य कर्तु सौत्यविशारदः॥१४२
तं वजन्तं हि गन्धर्वा विश्वावसुपुरोगमाः ।
शात्वेन्द्रस्यैव साहाय्ये तेजसा समवर्धयन् ॥ १४३
गन्धर्वतेजसा युक्तः शिशुः शक्र समेत्य हि ।
प्रोवाचैह्येहि देवेश प्रियो यन्ता भवामि ते ॥ १४४
तच्छ्रुत्वास्य हरिः प्राह कस्य पुत्रोऽसि यालक ।
संयन्ताऽसि कथं चाधान संशयः प्रतिभाति मे ॥१४५
सोऽब्रवीद्यपितेजोत्थं माभवं विद्धि वासव ।
गन्धर्वतेजसा युक्तं वाजियानविशारदम् ।। १४६
वत्वा भगवान्छऋः सं भेजे योगिनां वरः।
स चापि विप्रवनयो मातलि मविश्रुतः ।। १४७
ततोऽधिरूढस्तु रथं शक्रस्त्रिदशपुंगवः ।
| रश्मीन् शमीकतनयो मावलिः प्रगृहीतवान् ॥ १४८
ततो मन्दरमागम्य विवेश रिपुवाहिनीम् ।
प्रविशन् ददृशे श्रीमान् पतितं कार्मुकं महत् ॥ १४९
सशरं पञ्चवमं सितरफ्तासितारुणम् ।
पाण्डच्छायं सुरश्रेष्टस्तं जग्राह समार्गणम् ॥ १५०
ततस्तु मनसा देवान् रजःसत्त्वतमोमयान् ।
नमस्कृत्य शरं चापे साधिज्ये विनियोजयत् ।। १५१
इस समय अर्थाश की हानि हो जायेगी। (१३६)
है देवपि ! ऐसा कहने पर ( माहाण ने ) वेगपूर्वक माहर निपल पर देखा कि समानरप के दो यालक पड़े हुए हैं।
उन्हें देनर उसने देवताओं की पूजा करने के उपरान्त अपनी अद्भुत शानी मायां से कहा-मैं सरा तस्य नहीं जानता । अत. में जो पूछना हूँ उसे बतलाओ। (१३८)
यह यताओ कि इस दूसरे पालक में पौन से गुण दोग? इसके भाग्यों एवं फर्मों को भी तुम अभी बनलाओ। (१३९)
परनी ने कहा-हे प्रभो। मैं तुम्हें आज नही पतलाउंगी। दूसरे समय पांगी। उन्होंने कहा- भाजही मुहो यताओ, अन्यथा में भोजन नही परगी। (१४०)
उसने पहा-ई बहन् । सुनिये, मैं सही पात करती हूँ। आपने पातरता पूर्वक जो पूछा है उससे यह (पारप) निश्चय ही पाम (शिल्पी) होगा। (१४१)
ऐमा पर जाने पर अबोध ( अपरया मे) होने हुए भी पर गर्म कुदाल पा इन की सहायता गया। (१४२)
विधायगु आदि गापों ने इन्द्र की सहायता हेतु जा रहे गापाठा सागर सरतेश को पनाया। (१४३)
गन्धयों के तेज से सम्पन्न शिशु ने इन्द्र के समीप जापर कहा-हे देश आइये, में आपरा प्रिय सारथी बनूंगा। (१४४)
उसे सुनकर इन्द्र ने पहा-हे पालक! तुम रिसफे पुन हो ? फैसे तुग अश्यों या सयमन करोगे? इस विषय मे मुझे संशय हो रहा है। (१४)
उसने कहा-दे यासय! मुझे प्रापि के तेजसे उस्पिन, भूमि से उद्भूत ६ गन्धर्षों के तेज से युक्त अधयान- विशारद समझो। (१४६)
रसे मुनगर योगिभ्रेष्ठ भगयान इन्द्र आयाश मे गये मानलि नाम से प्रसिद्ध ये ग्राह्यपुत्र भी आराय में गए। (१४७)
तदनन्तर देय घेष्ट इन्द्र रथ पर आम्द हुए ये ज्य शमीरपुत्र मातलि ने प्रमह (लगाम) प्रहण किया। (१४८)
तदुपरान्न मन्दर पर पहुँचरर पे रिपुमेना में प्रपिट हुए प्रवेश करते समय गुरमेश धीमान (इन्द्र) ने एक पागयुष, स्पेन, रस, पृष्ण, अरग एवं पाण्डइन पाप पों याने मदान धनुए पो पड़ा देशार पागसदित पसे उठा लिया। (१४-१५)
तदनन्तर रज सत्यतमोमय (मा, पिशु ओर मदन) देयों को मन से गमगार पर हरदोंने मरयम्पा पड़ा पर पापिनियोनिवरिया। (१५१)
ततो निश्चरुरत्युग्राः शरा यहिणवाससः।
ब्रह्मशविष्णुनामाझाः सूदयन्तोऽसुरान् रणे ॥ १५२
आकाशं विदिशः पृथ्वी दिशश्च स शरोत्करैः ।
सहस्राक्षोऽतिपटुभिश्छादयामास नारद ॥ १५३
गजो विद्धो हयो भिन्नः प्रथिव्यां पवितो रथः ।
महामात्रो धरां प्राप्तः सद्यः सीदञ्छरातुरः ॥ १५४
पदाति पतितो भुम्यां शक्रमार्गणताडितः ।
हतप्रधानभूयिष्ठं यलं तदभवद् रिपोः ॥ १५५
तं शुक्रवाणाभिहतं दुरासदं
सैन्यं समालक्ष्य तदा कुजम्भः ।
बम्भासुरथापि मुरेशमव्ययं
प्रजग्मतुर्गृह्य गर्द गदे सुधोरे ।। १५६
तावापतन्ती भगवान् निरीक्ष्य
सुदर्शनेनारिविनाशनेन ।
विष्णुः कुजम्मं निजघान वेगात्
स स्यन्दनाद् गामगमद् गतासुः॥ १५७
तस्मिन् हते भ्रावरि माधवेन
जम्मस्ततः क्रोधवशं जगाम |
क्रोधान्वितः शक्रमपाद्रवद् रणे
सिंह यथणोऽतिविपन्नयुद्धिः ॥ १५८
तमापतन्तं प्रसमीक्ष्य शक्र-
स्त्यक्त्वैव चापं सशरं महात्मा ।
जग्राह शक्ति यमदण्डकल्पा
तामग्निदत्तां रिपये ससर्ज ॥ १५९
शक्ति सघण्टां कृतनिःस्वनां वे
दृष्ट्या पतन्ती गदया जधान ।
गदा च कृत्वा सहसैव भस्मसाद्
विभेद जम्भं हृदये च तूर्णम् ॥ १६०
शक्त्या स भिन्नो हृदये सुरारिः
पपात भूम्यां विगतासुरेव ।
तं वीक्ष्य भूमौ पतितं विसंज्ञ
दैत्यास्तु भीता विमुखा बभूवुः ॥ १६१
उससे ब्रह्मा, विष्णु महेश्वर के नामों से अङ्कित मयूर- पुच्छयुक्त अति उग्र वाण निकले और असुरों का विनाश करने लगे। (१५२)
हे नारद । उन सहस्राक्ष ने अतिपटुतापूर्वक पाणों की वर्षा से आशश, पृथ्वी, दिशाओं एवं विदिशाओं को आच्छादित पर दिया । (१५३)
हाथी विद्ध हो गए, घोड़े विदीर्ण हो गये, रथ पृथ्वी पर गिर पड़े एवं वागों से व्याकुल हाथी चालक क्लेशपूर्वक पृथ्वी पर पतित हो गया। (१५४)
इन्द्र के याणों से आहत पदाति योद्धा भूमि पर गिर पडे शन की सेना के अधिकाश प्रधान मारे गए। (१५५)
उस दुर्धर्ष सेना को इन्द्र के थाणों से निहत हुई देश असुर कुजम्भ और जम्भ भयंकर गदा लेकर अविनाशी सुरेन्द्र की ओर दौड़े। (१५६)
उन दोनों को आते देखकर भगवान् विष्णु ने विनाशक सुदर्शनचक्र से वेगपूर्वक कुजम्भ को मारा। वह
निष्प्राण होकर रथ से पृथ्वी पर गिर पड़ा। (१५७))
माधव द्वारा उस भाई के मारे जाने पर जन्म क्रोध के वशीभूत हो गया। क्रोधान्वित होकर वह युद्ध में इन्द्र की ओर इस प्रसर दौड़ा जैसे हतबुद्धि मृग सिंह की ओर दौड़ता है। (१५८)
उसे आते देपर महात्मा इन्द्र ने धनुप घाण को छोड़ कर अग्नि द्वारा प्रदत्त यमदण्डतुल्य शक्ति को प्रहण कर उसे शत्रु की ओर फेंगा। (१५९)
शब्द करती हुई घण्टायुक्त शक्ति को देखकर (जम्म ने) उस पर गदा से प्रहार किया। (उस शक्ति ने) गदा को सहसा भरमशात् कर जम्म का हृदय शीघ्र ही विदीर्ण कर दिया। (१६०)
शक्ति से हृदय के विदीर्ण हो जाने पर यह देयशत्रु निष्प्राण होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। उसे निष्प्राण होकर पृथ्वी पर गिरा देखकर देत्यगण भयभीत होकर पराङ्मुस हो गए। (१६१)
जम्मे हते दैत्यवले च भग्ने
गणास्तु हृष्टा हरिमर्चयन्तः।
वीर्य प्रशंसन्ति शतक्रतोश्च
स गोत्रभिच्छर्यमुपेत्य तस्थौ ॥१६२
इति श्रीवामनपुराणे त्रिचत्वारिंशोध्याय.॥४३॥