सरोमाहात्म्ये 15 कुरुक्षेत्र के तीर्थ

लोमहर्पण उवाच ।

मानुपस्य तु पूर्वेण क्रोशमाने द्विजोत्तमा.।

आपगा नाम विन्याता नदी द्विजनिपेविता ।। १

श्यामाकं पयसा सिद्धमाज्येन च परिप्लुतम् ।

ये प्रयच्छन्ति विप्रेभ्यस्तेषां पापं न विद्यते ॥ २

ये तु श्राद्धं करिष्यन्ति प्राप्य तामापगां नदीम् ।

ते सर्वकामसंयुक्ता भविष्यन्ति न संशयः ।। ३

शंसन्ति सर्वे पितरः स्मरन्ति च पितामहाः ।

अस्माक च कुले पुत्रः पौत्रो वापि भविष्यति ॥ ४

य आपगां नदीं गत्वा तिलैः संतर्पयिष्यति ।

तेन तृप्ता भविष्यामो यावत्कल्पशतं गतम् ॥५

नभस्ये मासि सम्प्राप्ते कृष्णपक्षे विशेषतः ।

चतुर्दश्यां तु मध्याह्ये पिण्डदो मुक्तिमाप्नुयात् ॥ ६

ततो गच्छेत विप्रेन्द्रा ब्रह्मणः स्थानमुत्तमम् ।

प्रमोदुम्मरमित्येवं सर्वलोकेषु विश्रुतम् ॥ ७

तत्र प्रमर्पिचण्डेपु स्नातस्य द्विजसत्तमाः।

समीणां प्रसादेन समसोमफलं भवेत् ।। ८

भरद्वाजो गौतमश्च जमदग्निश्च कश्यपः ।

विश्वामित्रो वमिष्टश्च अत्रिश्च भगवानृपिः ॥ ९

एतैः समेत्य तत्कुण्ड कल्पितं भुवि दुर्लभम् ।

ब्रह्मणा सेवितं यस्माद् ब्रह्मोदुम्मरमुच्यते ॥ १०

तस्मिस्तीर्थवरे स्नातो ब्रह्मणोऽध्यक्तजन्मनः ।

ब्रह्मलोकमवाप्नोति नात्र कार्या विचारणा ॥ ११

देवान् पितृन् समुद्दिश्य यो विप्रं भोजयिष्यति ।

पितरस्तम्य सुसिता दास्यन्ति भुवि दुर्लभम् ॥ १२

सप्तपींश्च समुद्दिश्य पृथक् स्नान समाचरेत् ।

रोमहर्षण ने कहा-“हे द्विजोत्तमो। मानुप तीर्थ की पूर्व दिशा में एक पोश पर द्विजों से सेवित आपगा नामक एक विख्यात नदी है।

वहाँ साँवा के चावल को दूध मे पकार और उसमे घी मिलाकर जो ब्राह्मणों को देते है उनके पाप नहीं रह जाते। (२)

उस आपगा नदी के तट पर जाकर जो श्राद्ध करेगे वे नि सदेह समस्त कामनाओं से युक्त होंगे। (३)

पितृगण यह कहते है तथा पितामहगण यह स्मरण करते हैं कि हमारे फुल मे कोई ऐसा पुन या पौन उत्पन्न होगा जो आपगा नदी के तट पर जाकर तिल से तर्पण करेगा जिससे हम सभी सैकड़ो कल्प तक तृप्त रहेंगे।

भाद्रपद मास मे, विशेषत कृष्ण पक्ष मे, चतुर्दशी को मध्याह्न मे पिण्ड दान करने वाल मनुष्य मुक्ति को प्राप्त करता है।

हे विप्रोत्तमो। तदनन्तर समस्त लोफ में ब्रह्मोदुम्बर नाम से प्रसिद्ध ब्रह्मा के उत्तम स्थान मे जाना चाहिए।

हे द्विजसत्तमो । वहाँ ब्रह्मपिकुण्डों मे स्नान करने वाले को सपियों की कृपा से सात सोम यज्ञों का फल मिलता है।

भरद्वाज, गौतम, जमदग्नि, कश्यप, विश्वामित्र, वसिष्ठ एव भगवान् अनि ऋपि ने मिलकर पृथ्वी मे दुर्लभ इस कुण्ड को बनाया था। ब्रह्मा द्वारा सेवित होने से यह ब्रह्मोदुम्बर कहलाता है।(ह-१०)

अव्यक्तजन्मा ब्रह्मा के उस उत्तम तीर्थ में स्नान करके मनुष्य निस्सन्देह ब्रह्मलोक प्राप्त करता है। (११)

जो मनुष्य वहाँ देवताओं और पितरों क उद्देश्य से प्राहाणों को भोजन कराएगा, उसके पितर सुसी होकर उसे संसार में दुर्लभ वस्तु प्रदान करेंगे। (१२)

सात पियों के उद्देश्य से जो पृथक् रूप से

नारसिंहं वपुः कृत्वा हत्या दानवमूर्जितम् ।

तिर्यग्योनौ स्थितो विष्णुः सिंहेषु रतिमाप्नुवन् ॥ २९

ततो देवाः सगन्धर्वा आराध्य वरदं शिवम् ।

ऊचुः प्रणतसाङ्गा विष्णुदेहस्य लम्भने ॥ ३०

ततो देवो महात्माऽसौ शारभं रूपमास्थितः ।

युद्धं च कारयामास दिव्यं वर्पसहस्रकम् ।

युध्यमानौ तु तो देवौ पतितौ सरमध्यतः ।। ३१

तस्मिन् सरस्वटे विप्रो देवपिनारदः स्थितः ।

अश्वत्थवृक्षमाश्रित्य ध्यानस्यस्तो ददर्श ह ॥ ३२

विष्णुश्चतुर्भुजो जो लिङ्गाकार. शिवः स्थितः ।

वौ दृष्ट्वा तत्र पुरुपौ तुष्टाव भक्विभावितः ॥ ३३

नमः शिवाय देवाय विष्णवे प्रभविष्णवे ।

हरये च उमाभत्रे स्थितिकालभृते नमः ॥ ३४

हराय बहुरूपाय विश्वरूपाय विष्णवे ।

श्यम्बकाय सुसिद्धाय कृष्णाय ज्ञानहेतवे ।। ३५

धन्योऽहं सुकृती नित्यं यद् दृष्टो पुरुषोत्तमौ ।

ममाश्रममिदं पुण्यं युवाभ्यां विमलीकृतम् ।

अद्यप्रभृति त्रैलोक्ये अन्यजन्मेति विश्रुतम् ।। ३६

य इहागत्य स्नात्वा च पितॄन् संवर्पयिष्यति ।

तस्य श्रद्धान्वितस्येह ज्ञानमैन्द्र भविष्यति ॥ ३७

अश्वत्थस्य तु यन्मूलं सदा तत्र वसाम्यहम् ।

अश्वत्थवन्दनं कृत्या यमं रौद्रं न पश्यति ॥ ३८

ततो गच्छेत विप्रेन्द्रा नागस्य हृदमुत्तमम् ।

पौण्डरीके नरः स्नात्वा पुण्डरीकफलं लभेत् ॥ ३९

दशम्यां शुक्लपक्षस्य चैत्रस्य तु विशेषतः ।

स्नानं जपं तया श्राई मुक्तिमार्गप्रदायकम् ॥ ४०

ततस्त्रिविष्टपं गच्छेत् तीर्थ देवनिपेवितम् ।

तत्र वैतरणी पुण्या नदी पापप्रमोचनी ।। ४१

तत्र स्नात्वार्चयित्वा च शूलपाणि वृपध्वजम् ।

नरसिंह शरीर धारण कर बलवान् दानव का वध करने के उपरान्त तिर्यग्योनि में स्थित विष्णु सिहों मे प्रेम करने लगे। (२६)

तदनन्तर गन्धर्वो सहित सभी देवों ने वरदाता शिव की कर साष्टाङ्ग प्रणाम पूर्वक विष्णु के पुन देह (स्वरूप) धारण की प्रार्थना की। (३०)

तदनन्तर महादेव ने सरभ रूप धारण कर ( नरसिंह से ) सहस्र दिव्य यों तक युद्ध किया। दोनों देवता युद्ध करते हुए सरोवर में गिर पड़े  उस सरोवर के तट पर अश्वत्थ वृक्ष के नीचे देवर्षि नारद ध्यानस्थ होकर बैठे थे । उन्होंने उन दोनों को देखा। चतुर्भुज रूप में विष्णु और लिङ्ग रूप में शिव हो गये। उन दोनों पुरुषों को देखार उन्होंने भक्ति भाव से उनकी स्तुति (३१-३३)

शिव देव को नमस्कार है। प्रभावशाली विष्णु को नमस्कार है। स्थिति तथा सहार के आधार- स्वरूप हरि एवं उमापति को नमस्कार है। (३४)

बहुरूपधारी हर एव विश्वरूपधारी विष्णु को नमस्कार है। सुसिद्ध त्र्यम्बक एवं ज्ञान के हेतु कृष्ण को नमः स्कार है।

मैं धन्य तथा सदा पुण्यवान हूँ क्योंकि मुझे दोनों पुरुष श्रेष्ठों का दर्शन प्राप्त हुआ। आप दोनों पुरुषों द्वारा शुद्ध किया गया मेरा यह आश्रम पवित्र हो गया। आज से रैलोक्य मे यह 'अन्यजन्म' नाम से प्रसिद्ध होगा। (३६)

जो व्यक्ति यहाँ आकर स्नान कर पिनरों का तर्पण करेगा उस श्रद्धापन् पुरुष को यहाँ ऐन्द्र ज्ञान प्राप्त होगा। (३७)

अश्वत्थ वृक्ष के मूल मे मैं सदा निवास करूँगा। अश्वत्थ का वन्दन करने वाले व्यक्ति भयंकर यमराज को नहीं देखता। (३८)

हे विप्रेन्द्रो । तदनन्तर उत्तम नागडद मे जाना चाहिए। पौंडरीक मे स्नान कर मनुष्य पुण्डरीक (यज्ञ विशेष) का फल प्राप्त करता है। (३९)

शुक्ल पक्ष की, विशेषत चैन मास की, दशमी तिथि में वहाँ स्नान, जप और श्राद्ध करने से मुक्तिमार्ग की प्राप्ति होती है। (४०)

तदनन्तर देवताओं से निषेवित त्रिविष्टप नामक तीर्थ में जाना चाहिये वहाँ पाप को छुड़ाने वाली पवित्र वैतरणी नदी है। (४१)

वहाँ स्नानकर शूलपाणि वृषध्वज की पूजा कर

सर्वपापरिशुद्धात्मा गच्छत्येव परां गतिम् ॥ ४२

ततो गच्छेत विप्रेन्द्रा रसावर्त्तमनुत्तमम् ।

तत्र स्नात्वा भक्तियुक्तः सिद्धिमाप्नोत्यनुत्तमाम् ।। ४३

चैत्र शुक्लचतुर्दश्यां तीर्थे स्नात्या हलेपके ।

पूजयित्वा शिवं तत्र पापलेपो न विद्यते ॥ ४४

ततो गच्छेत विप्रेन्द्राः फलकीवनमुत्तमम् ।

यत्र देवाः सगन्धर्वाः साध्याश्च ऋषयः स्थिताः ।

तपश्वरन्ति विपुल दिव्यं वर्षसहस्रकम् ।। ४५

दृपदत्या नर स्नात्वा तर्पयित्वा च देवताः ।

अग्निष्टोमातिरात्राम्या फलं विन्दति मानवः ।। ४६

सोमक्षये च संग्राले सोमस्य च दिने तथा ।

यः श्राडु कुरुते नय॑स्तस्य पुण्यफल भृणु ॥ ४७

गयायां च यथा श्राडूं पितृन् प्रीणाति नित्यशः ।

तथा श्राद्धं च कर्तव्य फलकीवनमाश्रितैः ॥ ४८

मनसा स्मरते यस्तु फलकीवनमुत्तमम्।

तस्यापि पितरस्वनि प्रयास्यन्ति न संशयः॥ ४९

तत्रापि तीर्थ सुमहत् सर्वदरलंकृतम् ।

तस्मिन् स्नातस्तु पुरुषो गोसहस्रफलं लभेत् ।। ५०

पाणिसाते नरः स्नात्वा पितृन् संतप्य मानवः ।

अवाप्नुयाद् राजसूयं सांख्य योगं च विन्दति ॥ ५१

वतो गच्छेत सुमहत्तीर्थ मिश्रकमुत्तमम् ।

तत्र तीर्थानि मुनिना मिश्रितानि महात्मना ।। ५२

व्यासेन मुनिशार्दूला दधीच्यर्थ महात्मना ।

सर्वतीर्थेपु स स्नाति मिश्रके स्नाति यो नरः ।। ५३

ततो व्यासवनं गच्छेनियतो नियताशनः ।

मनोजवे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा देवमणि शिवम् ।। ५४

मनसा चिन्तितं सर्व सिध्यते नात्र संशयः ।

गत्वा मधुवटीं चैन देव्यास्तीथं नरः शुचिः ॥ ५५

तत्र स्नात्वार्चयेद् देवान् पितृश्च प्रयतो नरः ।

स देव्या समनुज्ञातो यथा सिद्धि लमेन्नरः ॥ ५६

मनुष्स स्मरते यस्तु फलफीवनमुत्तमम् । मनुष्य समस्त पापों से विशुद्ध होकर निश्चय ही परमगति प्राप्त करता है।

हे विप्रश्रेष्ठो । तदुपरान्त उत्तम रसावर्त नामक तीर्थ में जाना चाहिये। वहाँ भक्ति-युक्त होकर स्नान करने से अति उत्तम सिद्धि मिलती है। (४३)

चैत्र मास की शुक्ल चतुर्दशी तिथि को अलेपक नामक तीर्थ मे स्नान करके वहाँ शिव की पूजा करने से पाप का स्पर्श नहीं होता। (४४)

हे विप्रश्रेष्ठो । वहाँ से उत्तम फलकीवन मे जाना चाहिये । वहाँ देवता, गन्धर्व साध्य और पि लोग रहते एव दिव्य सहस्र वर्प पर्यन्त विपुल तप करते हैं। (४५)

दृपद्धती नदी में स्नान कर देवताओं का तर्पण करने से ममुख्य अस्मिष्टेम और अतिर गामम.यहो, का फल पाता है। (४६)

सोमवार के दिन चन्द्र का क्षय (अमावस्या) होने पर जो मनुष्य वहाँ श्राद्ध करता है उसका पुण्यफल सुनो-(४७)

गया क्षेत्र में जिस प्रकार किया गया श्राद्ध पितरों को नित्य तृप्त करता है उसी प्रकार श्राद्ध फलकीवन में रहने वालों को करना चाहिये। (४८)

जो मनुष्य श्रेष्ठ फलकी वन का मन में भीस्मरण करता है उसके भी पितृगण नि सन्देह तृप्ति लाभ करते हैं। (४९)

वहीं सभी देवों से अलकृत एक सुमहत् तीर्थ है जिसमें स्नान करने वाला पुस्प सहस्र गोदान का फल प्राप्त करता है। (५०)

पाणिखात तीर्थ में स्नान कर पितरों का तर्पण करने से मनुष्य राजसूय यज्ञ तथासाख्य (ज्ञान) और योग (कम) के अनुष्ठान का फल प्राप्त करता है। (५१)

तदनन्तर मिश्रक नामक महान् तथा उत्तम तीर्थ में जाना चाहिए। हे मुनिश्रेष्ठो । यहाँ महात्मा व्यास मुनि ने दधीचि के हेतु तीयों को मिश्रित किया था। मिश्रक तीर्थ में स्नान करने वाला मनुष्य सभी तीर्थों में स्नान कर लेता है। (५२-५३),

तदनन्तर सयमी तथा नियमित भोजनगला होरर व्यास वन में जाना चाहिये । 'मनोजर' में स्नान कर देवमणि शिप का दर्शन करने से निस्सन्देह मनुष्य को अभीष्ट सिद्धि होती है। मनुष्य को देवीके मधुवटी नामक दीर्थ में जाकर स्नान कर देयो एव पितरों की पूजा करनी चाहिये। ऐसा करने वाला व्यक्ति देवी की आज्ञा से सिद्धि की प्राप्ति करता है। (५४-५६)

कौशिक्याः संगमे यस्तु दृपद्वत्यां नरोत्तमः ।

स्नायीत नियताहारः सर्वपापैः प्रमुच्यते ।। ५७

ततो व्यासस्थली नाम यत्र व्यासेन धीमता ।

पुत्रशोकाभिभूतेन देहत्यागाय निश्चयः ॥ ५८

कृतो देवैव विप्रेन्द्राः पुनरुत्थापितस्तदा ।

अभिगम्य स्थली तस्य पुत्रशोकं न विन्दति ॥ ५९

किंदत्तं कूपमासाद्य तिलप्रस्थं प्रदाय च ।

गच्छेत परमां सिद्धि ऋणैर्मुक्तिमयाप्नुयात् ॥ ६०

अहं च सुदिनं चैव द्वे तीर्थे भुवि दुर्लभे ।

तयोः स्नात्वा विशुद्धात्मा सूर्यलोकमवाप्नुयात् ॥ ६१

कृतजयं ततो गच्छेत् त्रिपु लोकेषु विश्रुतम् ।

तत्रामिपेकं कुर्वीत गद्गाया प्रयतः स्थितः ।। ६२

अर्चयित्वा महादेवमश्वमेधफलं लभेत् ।

कोटितीर्थ च तत्रैव दृष्ट्वा कोटीश्वरं प्रभुम् ॥ ६३

तत्र स्नात्वा श्रद्दधानः कोटियज्ञफलं लभेत् ।

फौशिकी और पद्वती के संगम में स्नान करने वाला नियताहारी श्रेष्ठ पुस्प सभी पापों से मुक्त हो जाता है। (५७)

हे विप्रेन्द्रो! तदनन्तर व्यासस्थली है जहाँ पुत्रशोकाभिभूत बुद्धिमान् वेदव्यास ने शरीरत्याग का निश्चय किया था एवं तत्पश्चात् देवों ने उन्हें पुनः उठाया था। उस स्थल में जाकर मनुष्य को पुत्रशोक नहीं होता। (५८-५९)

किंदचकूप मे जाकर एक प्रस्य (परिमाण विशेष) विल दान करने से मनुष्य परमसिद्धि एवं मण से मुक्ति करता है। (६०)

अन एय सुदिन नामक दो तीर्थ पृथ्वी मे दुर्लभ हैं। उन दोनों में स्नान करने से विशुद्धात्मा मनुष्य सूर्यटोक प्राप्त करता है। (६१)

तदनन्तर नैलोक्यपियुत कृतज्ञप्य नामक तीर्थ में जाना चाहिये । वही नियमपूर्वक रहते हुए गंगा में स्नान करना चाहिये । यहाँ महादेव का अर्चन करने से अश्वमेध या फल प्राप्त होता है । वदुपरान्त यही पर श्रद्धा पूर्वक कोटितीर्थ में स्नान कर कोटीश्वर प्रभु का दर्शन करने से मनुष्य को कोटि यशों का फल प्राप्त होता है। तदनन्तर त्रैलोक्य प्रसिद्ध वामनक तीर्थ में जाना चाहिये जहाँ बासनरूपधारो प्रभाव-

ततो वामनकं गच्छेत् त्रिपु लोकेषु विश्रुतम् ।। ६४

यत्र वामनरूपेण विष्णुना प्रभविष्णुना ।

चलेरपहृतं राज्यमिन्द्राय प्रतिपादितम् ॥ ६५

तत्र विष्णुपदे स्नात्वा अर्चयित्वा च वामनम् ।

सर्वपापविशुद्धात्मा विष्णु लोकमवाप्नुयात् ।। ६६

ज्येष्ठाश्रमं च तत्रैव सर्वपातकनाशनम् ।

व तु दृष्ट्वा नरो मुक्ति संप्रयाति न संशयः ।। ६७

ज्येष्ठे मामि सिते पक्ष एकादश्यामुपोपितः ।

द्वादश्यां च नर स्नात्वा ज्येष्ठत्व लभते नृषु ॥ ६८

वत्र प्रतिष्टिता विद्या विष्णुना प्रभविष्णुना ।

दीक्षाप्रतिष्ठासंयुक्ता विष्णुप्रीणनतत्पराः ॥ ६९

तेभ्यो ददानि श्राद्धानि दानानि विविधानि च ।

अक्षयाणि भविष्यन्ति यावन्मन्वन्तरस्थितिः ॥ ७०

तत्रैव कोटितीर्थ च त्रिपु लोकेषु विश्रुतम् ।

वस्मिस्तीर्थे नरः स्नास्वा कोटियज्ञफलं लभेत् ॥ ७१

शाली विष्णु ने बलि से राज्य अपहृत कर इन्द्र को अपित किया था।(६२-६५)

वहाँ विष्णुपद तीर्थ मे स्नान कर वामनदेव की पूजा करने से मनुष्य समस्त पापों से शुद्ध होकर विष्णु-लोक प्राप्त करता है। (६६)

वहीं पर अवस्थित सर्वपापनाशक ज्येष्ठानम का दर्शन कर मनुष्य निरसन्देह मुक्ति प्राप्त करता है। (६७)

ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को उपवास कर द्वादशी के दिन स्नान करने से मानव मनुष्यों में श्रेष्ठता प्राप्त करता है। (६८)

वहाँ प्रभावशाली विष्णु ने यज्ञादि में दीक्षित तथा प्रतिष्ठित एवं अपनी आराधना में तत्पर ब्रह्मणों को प्रतिष्ठित किया था। (६९)

उन्हें दिये गये श्राद्ध और विविध दान अक्षय एवं मन्वन्तर पर्यन स्थिर रहने वाले होते हैं। (७०)

यही प्रैलोक्यविद्युत कोटि तीर्थ है । उस तीर्थ में स्नान कर मनुष्य कोटि यज्ञों के पल को प्राप्त करता है। (७१)