वामन महा पुराण
सुकेशि के नगर का वर्णन सुकेशि के नगर का पातन, सूर्य का अघ पातन तथा पुनरारोपण
पुलस्त्य उवाच ।
ततः सुकेशिवर्षे गत्या स्वपुरमुत्तमम् ।
समाहूयात्रवीत् सर्वान राक्षसान् धार्मिकं वचः ॥१
अहिंसा मत्यमस्तेयं शोचमिन्द्रियसंयमः ।
दानं दया च शान्तिश्व ब्रह्मचर्यममानिता ।।२
शुभा सत्या च मधुरा वाङ् नित्यं सक्रिया रतिः ।
सदाचारनिपेवित्वं परलोकप्रदायकाः ।। ३
इत्यूचुर्मुनयो मा धर्ममायं पुरातनम् ।
सोहमाज्ञापये सर्वान क्रियतामविकल्पतः॥४
पुलस्त्य उवाच ।
वत. सुकेशिवचनात् सर्व एय निशाचराः ।
प्रयोदशाङ्गं ते धर्म चक्रुर्मुदितमानसाः ।। ५
ततः प्रवृद्धिं सुतरामगच्छन्त निशाचराः।
पुत्रपौत्रार्यसंयुक्ताः सदाचारसमन्विताः ॥ ६
तज्ज्योतिस्तेजसस्तेषां राक्षसानां महात्मनाम् ।
गन्तुं नाशक्नुवन् सुयों नक्षत्राणि न चन्द्रमाः ।। ७
वतस्त्रिभुवने ब्रह्मन् निशाचरपुरोऽभवत् ।
दिवा चन्द्रस्य सदशः क्षणदायां च सूयवत् ॥ ८
न ज्ञायते गतियोम्नि भास्करस्य ततोऽम्बरे ।
शशाङ्कमिति तेजस्त्वादमन्यन्त पुरोत्तमम् ।। ९
खं विकासं विमुश्चन्ति निशामिति व्यचिन्तयन् ।
कमलाकरेपु कमला मित्रमित्यवगम्य हि ।
रात्रौ विकसिता ब्रह्मन् विभूति दातुमीप्सवः ।। १०
कोशिका रात्रिसमयं बुद्धा निरगमन् किल ।
वान् वायसास्तदा ज्ञात्वा दिवा निमन्ति कोशिकान् ॥ ११
स्नातकास्त्वापगास्वेव स्नानजप्यपरायणाः।
आझण्ठमनास्तिष्ठन्ति रात्री ज्ञात्वाऽथ वासरम् ।। १२
न व्ययुज्यन्व चक्राच वदा चै पुरदर्शने।
पुलस्त्य ने कहा-हे देव! तदनन्तर अपने उत्तम नगर में जाकर सुकेशी ने समस्त राक्षसों को बुलाकर उनसे धम की पात कही।
'अहिंसा, सत्य, अचौर्य, शौच, इन्द्रियसंयम, दान, दया, श्रमा, ब्रह्मचर्य, अहंकार पा अभाव, प्रिय, सत्य और मधुरयाणी, सदा ससार्यों में अनुरक्ति एवं सदाचार पालन- ये सभी परलोक (में सुस.) प्रद (धर्म) हैं। मुनियों ने इस प्रकार के आद्य और पुरातन धर्म को मुझे पतलाया है। अस्तु में तुम लोगों को आज्ञा देता हूँ कि तुम लोग विना विचार के इन सभी का अनुष्ठान करो। (२-४)
पुलस्त्य ने कहा-तदनन्तर मुकेशी फे यचन से सभी राक्षस प्रसन्नचित्त होकर (अहिंसादि) प्रयोदश अन्न याने धर्म का आचरण करने लगे।
इससे सदाचार-समन्धित राक्षस पुत्र पौत्रादिसंयुक्त होकर अतिशय प्रवृद्धि प्राप्त किए।
उन महात्मा राक्षसों के तेज से सूर्य, नत्र और चन्द्रमा
(अपने मार्ग में) नहीं चल सके। (७)
हे अझन् ! तदनन्तर त्रिभुवन में निशाचरों की नगरीदिन में चन्द्र के समान और रात में सूर्य के समान हो गई। (८)
तदुपरान्त आकाश में सूर्य की गति दिसाई नहीं पड़ती थी। यह श्रेष्ट नगर सेज के कारण आगश में पन्द्रमा के सहा प्रतीत होता था। (६)
मझन् । (दिन यो) रात्रि समझ कर सरोवर के फमलों ने विकसित होना यन्द कर दिया तथा रात्रि में (सुरेशी के पुर को) मूर्य समझकर विभूति प्रदान करने की इच्छा से विसित होने लगे।
उल्लू (दिन को) रात्रि का समय जान कर पाहर निकल आए और कौए दिन जानकर उल्लुओं को मारने लगे।
स्नातक येग रात्रि को दिन समा आरण्ठ मग्न होकर स्नान प्य जप करते हुए जल में सड़ रहे। (१२)
उस समय नगर का दर्शन होने से पायाक पक्षी
मन्यमानास्तु दिवसमिदमुर्घयन्ति च ॥ १३
नूनं कान्ताविहीनेन केनचिचक्रपत्रिणा।
उत्सृष्टं जीवितं शून्ये फूत्कृत्य सरितस्तटे ॥ १४
ततोऽनुकृपयाविष्टो विवस्वांस्तीवरश्मिभिः ।
संवापयजगत् सर्व नास्तमेति कथंचन ॥ १५
अन्ये पदन्ति चाहो ननं कविन् मृतो भवेत् ।
तत्कान्तया तपस्तमं भई शोकाया यत ॥ १६
आराधितस्तु भगांस्तपमा चै दिवाकरः ।
तेनासौ शशिनिर्जेदा नास्तमेति रविधवम् ।। १७
यज्यिनो होमशालासु सह ऋत्विम्भिरघरे ।
प्रावर्तयन्त कर्माणि रात्रायपि महामुने ॥ १८
महाभागवताः पूनां विष्णोः कुन्ति भक्तितः।
रवी शशिनि चैवान्ये ब्रह्मणोऽज्ये हरस्य च ॥ १९
कामिनथाप्यमन्यन्त साधु चन्द्रमसा फवम् ।
यदियं रजनी रम्या कृता सततकौमुदी ॥ २०
अन्येऽत्रुबॅल्लोकगुरुरस्माभिश्चक्रभृद् वशी।
निर्व्याजेन महागन्धैरचितः कुसुमैः शुभैः ॥ २१
सह लक्ष्म्या महायोगी नभस्यादिचतुर्वपि ।
अशून्यशयना नाम द्वितीया सर्वकामदा ॥ २२
तेनासौ भगवान् प्रीत. पादाच्छयनमुत्तमम् ।
अशून्यं च महाभोगैरनस्तमितशेसरम् ॥ २३
अन्येऽघुवन् ध्रुवं दव्या रोहिण्या शशिनः क्षयम् ।
दृष्ट्वा तमं तपो घोरं रुद्राराधनकाम्यया ॥ २४
पुण्यायामक्षयाप्टम्यां वेदोक्तविधिना स्वयम् ।
तुष्टेन शंसुना दत्तं वरं चास्यै यदृच्छया ।। २५
न्येऽध्रुवन् चन्द्रममा ध्रुवमाराधितो हरिः ।
व्रतेनेह त्यसण्डेन तेनासण्डः शशी दिन ॥ २६
अन्येऽत्रुपञ्छशाङ्कन ध्रुवं रक्षा कृतात्मनः ।
पदद्वयं समभ्यर्य विष्णोरमिततेजसः ।। २७
तेनासी दीमिमांश्चन्द्रः परिभूय दिवाकरम् ।
रात्रि को दिन मान कर परस्पर वियुक्त नहीं हुए एवं उपस्वर से पहने लगे- (१३)
निधय दी किसी पत्नी से यिहीन घयाक पक्षी ने एकान्त में नदी तट पर पूसार करके जीवनोत्सर्ग रिया है। (१४)
इसी से दयाद होगर सूर्य तीव्र हिरणों से जगन् को सन्ताप देते हुए किसी प्रकार अस्त नहीं होरहे हैं। (१५)
दूसरे कहने है-"नियय ही कोई घप्रयास मर गया है और पतिशोयत उसी काना ने तप किया है। (१६)
इमीलिये नियही एसरी तपस्या से प्रसन्न पदजयो भगवान सूर्य अस्त नहीं हो रहे हैं। (१७)
महामुने! पासलाओं में ऋविजों के साथ यज. मान लोग रात्रि में भी यारर्म में प्रवृत्त हो रहे हैं। (१८)
महाभागयत (यि शुभक) भक्तिपूर्वक विष्णु की पूजा रहे है प्य दूसरे सेग पूर्ण, पन्द्र, प्रधा और शिव की आराधना में प्रत हो रहे हैं। (१६)
पामियों ने गोपा किमान पन्द्रिपा-पूर्ण रम्य रात्रि की रचना पर पनमा ने एक मुन्दर पार्य किया है। (२०)
दूसरे कहने लगे कि हम लोगों ने निध्यपट भाव से अति सुगन्धित पवित्र पुष्पों के द्वारा महालक्ष्मी के साथ महायोगी चक्रधारी विष्णु की पूजा भावग आदि पार मासों में थी। इसी अवधि में सर्वशमा अशुन्यशयना द्वादशी तिथि होती है। उसी से प्रसन्न होकर भगवान ने अशून्य तथा महामोगों से पूर्ण उत्तम शयन प्रदान किया है। (२१-२३)
दूसरों ने कहा कि चन्द्रमा का क्षय देस फर देयी रोहिणी ने निश्चय ही रद पी आराधना करने की इच्छा से परम पवित्र अक्षयारमी तिथि में वेदोक्त विधान से घोर तप किया है। जिससे प्रसन्न होर भगवान् शेर ने उसे इच्छानुसार पर दिया है। (२४-२५)
दूसरे पहने लगे निश्चय ही चन्द्रमा ने भगवान् हरि थी अखण्ड प्रत द्वारा अराधना की है। इसमे आराश चन्द्रमा अयण है। (२६)
दूमरों ने कहा कि अपरिमित सेनारी भोपिष्ट के घरगयुगउ की अर्धना कर फे. अवश्य ही पन्द्रमा ने अपनी रक्षा की है। (२७)
इसीमे दीप्तिमान पदमा सूर्य को पास करके हमें
अस्माकमानन्दकरो दिवा तपति सूर्यवत् ।। २८
लक्ष्यते कारणरन्पैहुभिः सत्यमेव हि ।
शशाङ्कनिर्नितः सूर्यो न विभाति यया पुरा ।। २९
यथामी कमलाः श्लक्ष्णा रणभृङ्गगणावृताः।
विकचाः प्रतिमासने जातः सूर्योदयो ध्रुवम् ॥ ३०
यथा चामी विमासन्ति विचाः मुदाकराः।
अतो विज्ञायते चन्द्र उदितय प्रतापवान् ॥ ३१
एवं संमापता ता सूर्यो वाक्यानि नारद ।
अमन्यत फिमेतद्धि लोको यक्ति शुभाशुभम् ॥ ३२
एवं संचिन्त्य भगवान् दध्यो ध्यानं दिवाकर।
आममन्ताज्जगद् ग्रस्त त्रैलोक्यं रजनीचरैः ।। ३३
ततस्तु भगवाज्ञात्वा तेजसोऽप्यमहिन्शुताम् ।
निशाचरम्य वृद्धिं वामचिन्तयत योगविद् ॥ ३४
ततोऽशासीय तान् सर्वान् सदाचाररवाशुचीन् ।
देवघामणपूजामु समक्तान् धर्ममपुतान् ॥ ३५
तवस्तु रक्षाक्षयक तिमिरद्विपकमरी ।
महांशुनसरः सूर्यस्तद्वियातमचिन्तयत् ।। ३६
ज्ञातवांश्च ततपिछद्रं राक्षसानों दिवस्पतिः ।
स्वधर्मविच्युति म सर्वधर्मविघातकृत् ।। ३७
वतः क्रोधाभिभूतेन भानुना रिपुमेदिभिः ।
भानुभी रामसपुरं वद् दृष्टं च यथेच्छया ॥३८
स भानुना सदा दृष्टः क्रोधाघ्मातेन चक्षुपा ।
निपपाताम्मराद् भ्रष्टः क्षीणपुण्य इव ग्रहः ॥ ३९
मतमान समालोक्य पुरं शालकटटः ।
नमो भवाय शर्वाय इदमुच्चैरुदीरयन् ।। ४०
समाक्रन्दितमाकर्ण्य चारणा गगनेचराः।
हा हेलि मुसुः सर्षे हरभक्तः परत्यप्ती ।। ४१
तच्चारणवचः शर्मः श्रुतवान् मर्यगोऽन्ययः ।
श्रुत्या संचिन्तयामाम फेनासौ पात्यते भुवि ॥ ४२
ज्ञातवान् देवपतिना सहस्रफिरणेन न् ।
आनन्द देते हुए दिन में सूर्य के समान तप रहे हैं। (२८)
पस्तुत. अन्य अनेक प्रकार के कारणों से यह टक्षित हो रहा है कि चन्द्रमा के द्वारा पराजित सूर्य पूर्व के सदृश नहीं प्रतीत हो रहे हैं। (२९)
यत गुआर पर रहे भ्रमर समूह से आवृत ये सुन्दर कमल विरसित दिसलाई पड़ रहे हैं. अतः निश्चय ही सूर्यो- दय हुआ है। (३०)
तथा प, यत ये कुमुदयन्द विसित है अतः यह सात होता है कि प्रतापमान पन्द्रमा अदित हुआ है। (३१)
नारद ! इस प्रकार यार्ता फरने वालों के पाग्यों को मुन कर मूर्य सोचने लगे कि ये लोग इस प्रकार शुभाशुभ यपन क्यों योल रहे हैं? (३२)
भगवान दियार ऐसा विचार कर ज्यान मग्न हो गये। उन्होंने देखा कि समस्त ग्रेगेश्य पारों ओर से राक्षसो द्वारा प्रस नो गया है। (३३)
तदनन्तर योगी भगवान् भार सों की वृद्धि क्या तेज की असहनीयता को जान फर विचार करने लगे। (३१)
मदुपरान उन्हें यह सात हुआ कि सभी राक्षस सदा. पार-परायग, पवित्र, देवता और मामयों की पूजा में अनु- रक्त तथा धार्मिक हैं। (३५)
तदनन्तर राक्षसों के विनाराक तथा अन्धकाररूपी हाथी के लिये सिंह के सरश तीक्ष्य रश्मि रूपी नस याले मृर्य उनके (राक्षसों फे) विनाश के विषय में सोचने रलगे।
तदुपरान्त सूर्य को राक्षसों के स्वपर्म-विच्युति रूपी छिद्र का ज्ञान हुआ जो समस्त धर्मों का यिनाशक है। (३७)
तदनन्तर शोधाभिभून गूर्य ने रिपुभेदी रश्मियों के द्वारा भलीभांति उस राइसपुर को देवा । (३८)
उस ममय मूर्य द्वारा प्राधपूर्ण दृष्टि से देया गया यह पुर घोगपुण्य प्रह के सदृश पाराश से गिर पड़ा। (३९)
अपने नगर को गिरते देख कर शाल टंक्ट (मुरुली) ने उच्च पर से 'नमो भयाय शाय' यह कहा। (४०)
एसके उस आन्दन को मुन र सभी आयशपारी पारण चिराने लगे-दाय हाय ! यह दर भक्त गिर रहा (४१)
संरंगामी अव्यय राय (शहर) ने पारमों के उस पचन को मुना पर्य मुनम सोचने लगे कि इसे पूची पर कोन गिराया है। (४२)
उन्होंने यह जान लिया कि देषपति गहरा रित
पातितं राक्षसपुरं ततः क्रुद्धस्त्रिलोचनः ।। ४३
क्रुद्धस्तु भगवन्तं तं भानुमन्तमपश्यत ।
दृष्टमात्रधिणेत्रेण निपपात ततोऽमरा ॥ ४४
गगनात् स परिप्रष्टः पथि वाय निविते ।
यदृच्छया निपतितो यन्त्रमुक्तो यथोपलः ॥ ४५
ततो वायुपान्मुक्तः किंशुकोज्ज्वलविग्रहः।
निपपातान्तरिक्षात् स वृतः किन्नरचारणैः ।। ४६
चारणर्वेष्टितो भानुः प्रविभात्यम्मरात् पतन् ।
अईपक्वं यथा तालात् फलं कपिगिरामृतम् ॥ ४७
ततस्तु ऋपयोऽभ्येत्य प्रत्युचुर्भानुमालिनम् ।
निपतम् हरिक्षेत्रे यदि श्रेयोऽभिवाञ्छमि ।। ४८
ततोऽभवीत् पतन्नेव विवस्वास्तांस्तपोधनान् ।
किंवत् क्षेत्रं हरेः पुण्यं वदनं शीघ्रमेव मे ॥ ४९
तमूर्सनयः सूर्य भृणु क्षेत्रं महाफलम् ।
माम्प्रत वासुदेवस्य भारि तच्छंकरम्य च ॥ ५०
योगशायिनमारभ्य यावत् केशवदर्शनम् ।
एतत् क्षेत्रं हरेः पुण्यं नाम्ना वाराणसी पुरी ॥ ५१
तच्छुत्वा भगवान् भानुभवनेत्राग्नितापितः ।
वरणायास्तथैवाम्यास्त्वन्तरे निपपात ह ॥ ५२
तत. प्रदह्यति तनौ निमज्यास्यां लुलद् रविः ।
वरणायां समभ्येत्य न्यमजत यथेच्छया ॥ ५३
भूयोऽसिं वरणां भृयो भूयोऽपि वरणामसिम् ।
लुलंरित्रणेत्रवतय भ्रमतेऽलातचक्रवत् ॥ ५४
एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मन् मपयो यक्षराक्षसा. ।
नागा विद्याधराथापि पक्षिणोऽप्सरसस्तथा ॥ ५५
यावन्तो भास्कररथै भूतप्रेतादयः स्थिताः ।
तावन्तो ब्रह्मसदनं गता वेदयितुं मुने ।। ५६
|ततो ब्रह्मा सुरपति. सुरैः साधं समभ्यगात् ।
रम्यं महेश्वरापामं मन्दरं रनिकारणात् ॥ ५७
गत्या दृष्ट्वा च देवेशं शंकरं शूलपाणिनम् ।
(सूर्य) द्वारा राक्षस वापुर गिराया गया है। इससे निलोचन पर हो गए। (४३)
फुद्ध होरर उन्होंने भगान् सूर्य को देश । त्रिनेत्र के देसने ही वे (सूर्य) आकाश से गिर पड़े। (2) आकाश से च्युत सूर्य, वायुनिपेधित मार्ग मे यन्त्रमुक्त पत्थर पसरश गिरने लगे। (४५)
सदान्तर किंगुक पे सटश उरावल शरीर वाले सूर्य पायुपथ से मुक्त होने के उपरान रिन्नर एवं चारणों से आपन होकर अनरिक्ष से नीचे गिरने लगे। (०६)
पारणों से घिरे हुए भानु आगश से नीचे गिरते समय तारपृक्ष से गिरने यारे कपियों से आवृत अर्द्धपक पल के सदश प्रतीत हो रहे थे। (४७)
तदनन्तर मुनियों ने सूर्यदेय ये निट आउर उनसे पहा कि यदि कल्याण चाहते हो तो हरि के क्षेत्र में (१८)
गिरते हुए हो सूर्य ने उन तपस्वियों से पूछा-हरि पा पद पवित्र क्षेत्र कौन है ? मुझे शीघ्र यवटाओ।' (४६)
मुनियों में सूर्य से कहा-महाफलदायक इस क्षेत्र विपरग मुनो। सम्प्रति पर पामुदेष का क्षेत्र है किन्तु भविष्य मे यह शर वाक्षेत्र होगा। (५०)
योगशायी से प्रारम्भ कर देशवदशन तक का पवित्र क्षेत्र हरि फाक्षेत्र है। इसका नाम वाराणसी पुरी है । (५१)
यह सुन कर भव (शिव) के नेत्राग्नि से तापित भगवान् सूर्य वरुणा और असि के मध्य गिरे।
तदनन्तर शरीर के प्रदग्ध हाते रहने से व्याफुल रवि ने असि मे निमानन करने के उपरान्त परुणा में जाकर यथेच्छ निमग्नन किया। (५३)
इस प्रकार विनेत्र के यहि मे आर्त होकर वे थारपार अमि और यरुणा की ओर अगतचक्र के सदृश दौड़ने लगे।
हे प्रशन् । हे मुने। इस पीच पि, यक्ष, राक्षस, नाग, विद्याधर, पक्षी, अप्सरायें और मारपर के रथ में जितने भूतन आदि थे ये सभी यह समाचार देने के लिये प्राण पं सदन में गये। (५५-५६)
तदनना मुरपति बहा देवताओं के साथ सूर्य के लिये महेपर के रमगीय आवासस्थान मन्दर पर्वत पर गए।
वहाँ जाकर पय देवेश शूलपाणि शंकर को देश कर
प्रसाद्य भास्करार्थाय वाराणस्यामुपानयत् ॥ ५८
तो दिवाकरं भूयः पाणिनादाय शंकरः ।
कृत्या नामास्य लोलेति रथमारोपयत् पुनः ॥ ५९
आरोपिते दिनकरे ब्रह्माऽभ्येत्य सुकेशिनम् ।
सबान्धवं सनगरं पुनरारोपयद् दिवि ।। ६०
समारोप्य सुकेशि च परिष्वज्य च शंकरम् ।
प्रणम्य केशवं देवं चैराज स्वगृहं गतः ॥ ६१
एवं पुरा नारद भास्करण
पुरं मुकेशे वि सन्निपातितम् ।
दिवाकरो भूमितले भवेन
क्षिप्तस्तु दृष्ट्या न च संप्रदग्धः ॥ ६२
आरोपितो भूमितलाद् भयेन
भूयोऽपि भानुः प्रतिगसनाय ।
स्वयंभुवा चापि निशाचरेन्द्रर
स्वारोपित. से सपुरः सबन्धुः ॥ ६३
इति श्रीवामनपुराणे पौडशोऽध्यायः ॥१६॥