प्रह्राल-तीर्थयात्रा में त्रिकूटगिरि पर स्थित सरोवर में प्राह गज का प्रहण, गजेन्द्र द्वारा विष्णु की स्तुति, गज ग्राह की उद्धार एव दोनों को वरदान, गजेन्द्रमोक्षण, स्रोत की प्रशसा

नारद उवाच ।

यान् जप्यान् भगवद्भभक्त्या प्रलादो दानयोञ्जपत् ।

गजेन्द्रमोक्षणादींस्तु चतुरस्तान् वदस मे ॥ १

पुलस्त्य उवाच ।

भृणुष्य कथयिष्यामि जप्यानेतांस्तपोधन ।

दुःस्वप्ननाशो भवति यैरुक्तः संश्रुतैः स्मृतः ।। २

गजेन्द्रमोक्षणं त्वादौ शृणुष्य तदनन्तरम् ।

सारस्वतं ततः पुण्यौ पापप्रशमनी स्तयौ ॥३

सर्वरत्नमयः श्रीमास्त्रिकूटो नाम पर्यतः ।

सुतः पर्वतराजस्य सुमेरोस्किरातेः ।। ४

क्षीरोदजलवीच्यघीतामलशिलावलः ।

उत्थितः सागरं भित्त्या देवर्षिगणसेवितः ॥५

अप्सरोभिः परिवृतः श्रीमान् प्रस्रवणाकुलः ।

गन्धः किन्नरः सिद्धचारणपन्नगैः।। ६

विद्याधरैः सपत्नीकैः संयतैश्च तपस्विभिः ।

वृकद्वीपिगजेन्द्रश्च वृतगात्रो विराजते ॥७

पुन्नागैः कणिकारैश्च दिल्यामलकपाटलैः ।

चूतनीपकदम्बैश्च चन्दनागुरुचम्पकैः ॥ ८

शालस्तालैरतमालय सरलार्जुनपटें।

तथान्यैविविध क्षः सर्वतः समलंकृतः ॥ ९

नानाघात्वसितैः शृङ्गैः प्रत्र पद्भिः समन्ततः ।

शोभितो रुचिरप्रख्यै स्त्रिभिस्तीर्णसानुभिः ॥ १०

मृगैः शासामृगैः सिंहर्मातगश्च सदामदैः ।

जीवंजीवकसंघुटैश्चकोरशिसिनादितः॥ ११

तस्यैकं काञ्चनं शृङ्गं सेवते य दिवाकरः ।

नानापुष्पसमाकीर्ण नानागन्धाधिवासिवम् ॥ १२

द्वितीयं राजतं शृङ्ग सेवते यं निशाकरः ।

५८

नारद ने पहा-दानव प्रहलाद ने भगवद्भफिपूर्वक जिन गजेन्द्रमोक्षणादि जपनीय स्तोत्रों का जप किया था उन चार जपों को आप मुझे पतलायें ।

पुलस्त्य ने पहा-हे तपोधन। मैं उन स्तोतों फा वर्णन करता हूँ, आप सुनें । इनके कहने, सुनने और स्मरण करने से दुसानों का नाश होता है। (२)

प्रथम गजेन्द्रमोक्षण स्तोत्र सुनिए । तदनन्तर सारस्वत स्तोत्र एवं तत्पश्चान् दो पवित्र पापप्रशमन स्तयों का वर्णन याँगा।

सर्यररनमय सुन्दर नियूट नामक पर्यंत, सूर्य के समान प्रभायाने पर्वतराज सुमेर या पुत्र है।

श्रीरसागर फेजलरङ्गों से प्रभाविनिर्मलशिलातलगला यह पर्वत समुद्र का भेदन कर ऊपर निग्ला है एवं देवता और शपिगण पहा सर्वदा निवास करते हैं। (५)

अप्सराओं से परिपृत, झरनों से परिपूर्ण, गधों, पिनरों, यशों, सिद्धों,पारगों, पन्नगों, पत्नीयुक्त विद्याधरों, संयमी तपक्षियों और यूक,व्याघ्र एवं गजेन्द्रों से भारतशरीर याला यह श्रीमान् पर्वन अत्यन्त सुशोभित होता है। (६-७)

पुनाग, यर्णिकार, विल्य, आमलक, पाटल, आम्र, नीप, क्दम्य, चन्दन, अगुरु, चम्पक, शाल, ताल, तमाल, सरल, अर्जुन, पर्पट एवं अन्य अनेक प्रार के वृक्षों से यह पर्यंत पूर्णतया अलड्कृत है। (८-8)

यह पर्वत अनेक प्रकार के धातुओं से ललित घोटियों, चारों ओर से यहने पारे झरनों और अत्यन्त सचिर सथा विस्तृत तीन शिसरों से शोभित है। (१०)

यह पन निरन्तर मृग, यानर, सिंह, मदमस हायी, घातक, घोर एवं मयूर आदि पे शब्दों से निनादित होता रहता है। (११)

अनेक प्रकार के पुप्पों से ज्यात एवं पिविध मुगन्धों से सुवासिन उसके एक सुवर्गमय राम का सूर्य सेवन (१२)

शुक्लवर्ण मैप की तरह एवं तुपार-समूह-सटश उसके

पाण्डुराम्बुदसंकाशं तुपारचयसंनिभम् ॥ १३

यवेन्द्रनीलपैडूर्यतेजोभिर्भासयन्

तृतीयं ब्रह्मसदनं प्रकृष्टं भृशमुत्तमम् ।। १४

न तत्कृतमाः पश्यन्ति न नृशंसा न नास्तिकाः ।

नातमतपमो लोके ये च पापकृतो जना. ॥ १५

तस्य सानुमतः पृष्ठे सरः काञ्चनपड़ जम् ।

कारण्डयसमाकीर्ण राजहंमोपशोभितम् ॥ १६

कुमदोत्पलकहारः पुण्डरीकैश्च मण्डितम् ।

कमलैः शतपश्च काचनैः समलडकृतम् ।। १७

पत्रमरकतप्ररन्यैः पुष्पैः काञ्चनसनिभैः ।

गुल्म. कीचकवेणूनां समन्तात् परिवेष्टितम् ।। १८

तस्मिन् सरसि दुष्टात्मा निरूपोऽन्वर्जलेशयः।

आमीद् ग्राहो गजेन्द्राणां रिपुराकरेक्षणः ॥ १९

अथ दन्तोज्ज्वलमुखः कदाचिद् गजबूथपः ।

मदसावी जलाकानी पादचारीय पर्वतः ॥ २०

वासयन्मदगन्धेन गिरिमरावतोपमः।

गजो ह्यजनसंकाशो मदाचलितलोचन. ॥ २१

तृ पित. पातुकामोऽसौ अवतीर्णश्च तज्ज्लम् ।

सलीलः पङ्कजवने युथमध्यगतवरन् ॥ २२

गृहीतस्तेन रौद्रेण ग्राहेणाध्यक्तमूर्तिना ।

पश्यन्तीनां करेणूनां क्रोशन्तीनां च दारुणम् ॥ २३

हियते पङ्कजपने ग्राहेणातिवलीयमा

पारुणैः संयतः पार्शनिप्रयत्नगति कृत' ॥ २४

वेष्टचमानः सुधोरैस्तु पाशैर्नागो दृढैस्तथा ।

विस्फूर्य च यथाशक्ति विक्रोशंश्च महारवान् ।। २५

व्यथित. स निरुत्साहो गृहीतो घोरकर्मणा ।

परमापदमापन्नो मनसाऽचिन्तयरिम् ॥२६

स तु नागवर. थीमान् नारायणपरायणः ।

तमेव शरणं देवं गत. सर्वात्मना तदा ।। २७

एकात्मा निगृहीतात्मा विशुद्धनान्तरात्मना ।

जन्मजन्मान्तराभ्यासात् भक्तिमान् गरुडध्वजे ।। २८

नान्य देवं महादेवात् पूजयामास केशयात् ।

दूसरे रजतमय रङ्ग का सेवन चन्द्रमा करते है। (३)

हीरा, इन्द्रनील, वेडूर्य आदि रत्नों की ज्योति से दिशाओं से प्रकाशित करने वाला उसका अत्यन्त उत्तम तृतीय शृङ्ग ब्रह्मा का निवास स्थान है। (१७)

कृतघ्न, क्रूर, नास्तिक, तपस्या से हीन एवं लोक में पापकर्म करने वाले मनुष्य उसे नही देग सकते। (१५)

उस पर्वत के पृष्ठभाग मे सुवर्णकमों से युक्त, कारण्डयों से आकीर्ण, राजहसों से सुशोभित, कुमुद, उत्पल, पहार, पुण्डरीक आदि नाना जातीय घमरों से मण्डिन, शतपनों यारे सुवर्ण कमलों से अरकृत तथा मरक्त के सदृश पत्रों पाले पाचन के समान पुष्पों एवं कौचक नामा घाँस के गुल्मों से चारों ओर से परिवेष्टित एक सरोवर है। (१६-१८)

उस सरोयर ये जल मे गजेन्द्रों का एक पुरूप दुरात्मा अर्थनिमीलित नेत्रोयाला माह रहता था। (१६)

एक समय दोतों से चल मुख्यारा, मदसावयुक्त, जराभिलाषी, पादचारी पर्वत तुल्य, ऐसयत के सदृश, थान-तुल्य, मद के कारण पशल नेत्रों पारा, सुपायुक्त एक गजबूथपति अपने मन की मुगन्ध से पर्वत यो मुवासित करते हुए जल पीने की इच्छा से उस सरोवर के जल में उतरा एव यमलों के समूह में अपने झुण्ड के साथ क्रीडा करने लगा। (२०-२२)

प्रच्छन्न शरीर वाले प्राद ने उसे पकड लिया। करुण रूप से आर्तनाद कर रही हथिनियों के देसते ही देखते अशिबलवान् प्राह उसे पङ्कजवन में खींच ले गया २ वरुण के पाशों से बाँधार उसे निष्प्रयत्न तथा गतिहीन कर दिया। (२३ -२४)

बद्द गजराज दृढ और भयङ्कर पाशों से आरद्ध हो जाने के कारण यथाशक्ति फड़फड़ाकर ऊँचे स्वा से चीत्कार करने लगा। (२५)

फर वम वाले (उस प्राइ) के द्वारा पकड़े जाने पर यह व्यथित तथा निरस्साह दो गया। अत्यन्त विपत्ति मे पहार यह मन से भगरान हरि का ध्यान करने लगा। (२६)

यह सुन्दर गजराजनारायण का भक्त था। अन उस समय यह सर्वात्मना उन्ही देव की पारण में गया । (२७)

यह हाथी जन्म-जन्मान्तर फे अभ्यास से एकाप्र और संयन चित्त होकर विशुद्ध अन परण से गरुयज विष्णु का भक्त हुआ। (२८)

उसने महान् देय ऐशय के अतिरिक अन्य देवता

क्षीरोदकार्णवनिक्तयशोधराय ।

नानाविचित्रमुकुटाङ्गदभूपणाय

सर्वेश्वराय वरदाय नमो पराय ।। ४१

भक्तिप्रियाय वरदीप्तसुदर्शनाय

फुल्लारविन्दविपुलायवलोचनाय ।

देवेन्द्रविनशमनोयतपौरुपाय

योगेश्वराय विरजाय नमो घराय ॥ ४२

प्रझायनाय त्रिदशायनाय

लोकाधिनाथाय भवापनाया

नारायणायात्महितायनाय

महापराहाय नमस्करोमि ।। ४३

कूटस्थमव्यक्तमचिन्त्यरूपं

नारायणं कारणमादिदेवम् ।

युगान्तशेपं पुस्पं पुराणं

तं देवदेवं शरणं प्रपद्ये ।। ४४

योगेश्वरं चारुविचित्रमौलि-

मज्ञेयमायं प्रकृतेः परस्थम् ।

क्षेत्रज्ञमात्मप्रभयं परेण्यं

तं वासुदेवं शरणं प्रपद्ये ॥ ४५

अदृश्यमव्यक्तमचिन्त्यमव्ययं

महर्पयो प्रझमयं सनातनम् ।

वदन्ति यं वै पुस्पं सनातन

तं  देवगुह्यं शरणं प्रपद्ये ॥ ४६

यदक्षरं ब्रह्म वदन्ति सर्वगं

निशम्य यं मृत्युमुसान् प्रमुच्यते ।

तमीश्वर तृप्तमनुत्तमैर्गुणैः

परायणं विष्णुसपैमि शाश्वतम् ॥ ४७

कार्य क्रिया कारणमप्रमेयं

हिरण्यवाहुँ घरपझनामम् ।

महारलं वेदनिधिं सुरेशं

प्रजामि विष्णु शरणं जनार्दनम् ॥ ४८

किरीटवेयरमहार्हनिष्क-

मण्युत्नमालकतसर्यगावम् ।

पीताम्बरं काञ्चनभक्तिचित्र

मालाधरं केशयमम्युमि ॥ ४९

भवोद्भव वेदविदां वरिष्ठं

योगात्मनां सास्यविदां वरिष्ठम् ।

आदित्यरुद्राविवसुप्रभावं

वरदाता एच वरस्वरूप सर्वेश्वर को नमस्कार है। (४१)

भक्तिप्रिय, श्रेष्ठ दीप्ति से सम्पन्न, सुन्दर दिखलाई देने वाले, विकसित कमल के समान विशाल नेत्रों वाले, देवेन्द्र के विघ्नों का नाश करने के लिये पुरुषार्थ करने को उद्यत, वरस्वरूप, विरज योगेश्वर को नमसार है।

ब्रह्मा वा अन्य देशों के अप' स्वरूप, लोकधिनाया, भवहर्ता, नारायण, आत्महित के आश्रयस्थान महावराद को नमस्कार करता हूँ। (४३)

मैं कूटस्थ, अव्यक्त, अचिन्त्य रूप वाले, कारणस्वरूप, आदिदेव नारायण, युगान्त मे शेप रहने वाले पुराण पुरुप, देवाधिदेव की शरण प्रहण करता हूँ। (४४)

में योगेश्वर, सुन्दर विचित्र वर्णयुक्त मुकुटधारी, अज्ञेय, सर्वश्रेष्ठ, प्रकृति के परे अवस्थित क्षेत्रज्ञ, आत्मप्रभव, वरेण्य उन घासुदेव की शरण प्रहण करता हूँ। (४५)

ब्रह्मर्षि रोग जिसे अदृश्य, अव्यक्त, अचिन्तनीय, अव्यय, ब्रह्ममय और सनातन पुरुष कहते हैं, उन देव गुह्य की शरण ग्रहण करता हूँ। (४६)

( ब्रह्मवेत्ता ) जिसे अक्षर एय सर्वव्यापी ब्रह्म कहते तथा जिसके श्रवण से मृत्यु के मुख से मुक्ति प्राप्त होती है

में उसी श्रेष्ठ गुणों से युक्त, आत्मतृप्त, शाइयत आश्रय स्वरूप ईशा की झारण ग्रहण करता हूँ। (४५)

मैं कार्य, क्रिया और कारणस्वरूप, प्रमाण से अगम्य, हिरण्यबाहु, नाभि मे श्रेष्ठ कमल धारण करने वाले,

महाबलशाली, वेदनिधि, सुरेश्वर जनार्दन विष्णु की शरण में जाता हूँ। (४८)

मैं क्रीिट, केयूर एव अतिमूल्यवान श्रेष्ठ मणियों से अलकृत समस्त शरीर वाले, पीताम्बरधारी, स्वर्णिम पत्र रचना से सुशोभित, माला धारण करने वाले केशय की शरण में जाता हूँ। (४१)

मैं ससार के उत्पादक, वेद के जानने वालों में श्रेष्ठ,

प्रभु प्रपयेऽच्युठमात्मवन्तम् ।। ५०

श्रीवस्साई महादेवं देवगुदमनीपमम् ।

प्रपद्ये सूक्ष्ममचलं वरेण्यममयप्रदम् ।। ५१

प्रभवं सर्वभूतानां निर्गुणं परमेश्वरम् ।

प्रपद्ये मुक्तसंगानां पतीनां परमां गतिम् ॥ ५२

भगवन्तं गुणाध्यक्षमक्षरं पुप्फरेक्षणम् ।

शरण्यं शरणं भक्त्या प्रपये भक्तवत्सलम् ।। ५३

त्रिविक्रम त्रिलोकेशं सर्वेषां प्रपितामहम् ।

योगात्मानं महात्मानं प्रपद्येऽहं जनार्दनम् ।। ५४

आदिदेवमजं शंभुं व्यक्ताव्यक्तं सनातनम् ।

नारायणमणीयांसं प्रपये ब्राह्मणप्रियम् ॥ ५५

नमो घराय देवाय नमः सर्वसहाय च ।

प्रपये देवदेवेशमणीयांममणोः सदा ।। ५६

एकाय लोकतत्त्वाय परतः परमात्मने ।

नमः सहम शिरसे अनन्ताय महात्मने ।। ५७

त्वामेव परमं देवमृपयो वेदपारगाः।

कीर्तयन्ति च यं सर्वे प्रलादीनां परायणम् ॥ ५८

नमस्ते पुण्डरीकाक्ष भक्तानामभयप्रद ।

सुब्रह्मण्य नमस्तेऽस्तु प्राहि मां शरणागतम् ॥ ५९

पुलस्त्य उपाचा

भक्ति तस्यानुसंचिन्त्य नागस्यामोघसंमवः ।

प्रीतिमानभवद् विष्णुः शचक्रगदाधरः॥ ६०

सान्निध्य कल्पयामास वस्मिन् सरमि केशमः।

गरुडस्थो जगत्मामी लोकाधारस्तपोधनः॥ ६१

ग्राहग्रस्तं गजेन्द्रं तं तं च ग्राहं जलाशयात् ।

उअद्दाराप्रमेयात्मा तरसा मधुसूदनः ॥ ६२

स्थलस्थं दारयामास ग्राहं चक्रेण माधयः ।

मोक्षयामास नागेन्द्र पाशेभ्यः शरणागवम् ॥ ६३

स हि देवलशापेन हर्गन्धर्वमत्तमः ।

ग्राहत्यमगमत् कृष्णाद् यचं प्राप्य दिवं गतः ॥ ६४

योगात्माओं तथा सांग्यमों में श्रेष्ठ,आदित्य,रद,अश्विनीकुमार एय पमुओं के प्रभार से युक्त, अच्युत, आत्मस्वरूप प्रभु पी शरण प्रहण परता हूँ। (५०)

मैं श्रीयत्स चिह धारण करने वाले, महान् देय, देवताओं में गुप, उपमा रहित, सूक्ष्म, अपल तथा अभय देनेवाले परेण्य देय फी भरण प्रहण यरसाहूँ।(५१)

में समस्त प्राणियों में उत्पादक, निर्गुण, निसा यतियों की परम गति स्यरूप परमेश्वर की शरण महण करताहूँ। (५२)

में गुणाध्यक्ष, अभर, पालोचन, आभयणीय, भरण देने याने भत्तयरसन्न भायान् की भक्तिपूर्वक कारण प्रहण पाता हूँ। (५३)

मैं प्रिमियम, भिटोपेपर, ममी के प्रपितामह, योगात्मा, मदारमा जनार्दन की शरण ग्रहण करता।

मैं आदिदेव, अजन्मा, शान, व्यकाव्यपवरूप, सनातन, परम पदम, मापयप्रिय नारायण की शरण मदन परगा।

भेट देय पो समरसर है। सर्वशकिमान को नमस्कार है। सदा सूक्ष्म से गरम देवदेवेश प शरणागा हूँ। (५६)

प्येकास्ययरूप, एकमात्र, परात्पर परमात्मा, सदानी मदारमा मननपो नमरगर है।

वेदपारगामी पिगण आपसे ही परम देय एवं ब्रह्मादि देयों का आप्रयस्थान कहते हैं। (५८)

दे पुण्डरीराक्ष । हे भक्तों के अभयदाता। आपको नमरगर है। हे मुबदण्य । आपको नमस्कार है। आप मुझ शरणागत की रक्षा करें।

पुरस्त्य ने पहा-शव-पक एवं गदा धारण करने वाले अमोघसम्भर विष्णु उस गजेन्द्र की मपि का विचार कर प्रसन्न हो गए। (६०)

सदनन्तर रोपाधार जगरायामी तपोधन पेश गरम पर सवार होकर उस मरोपर ये समीप गये। (६१)

अप्रमेयात्मा मधुसूदन ने माह से परा उस गोन्द्र तथा उस माह पो बेगपूर्वक जलाशय से बाहर निगला। (६२)

माधव ने पयो पर स्थित प्राह को एक द्वारा पिदीर्ण पर दारणागत गजेन्द्र को पारों में मुख (६३)

देपल के शाप में प्रदपना मा गमभटर समे मुरयु पास एवर्ग पा गया। (१५)

गजोऽपि विष्णुना स्पृष्टो जातो दिव्यवपुः पुमान् ।

आपद्विमुक्तौ युगपद् गजगन्धर्षसत्तमौ ॥ ६५

प्रीतिमान् पुण्डरीकाक्षः शरणागतवत्सलः ।

अभवत् त्वथ देवेशरताभ्यां चैव प्रपूजितः ॥ ६६

इदं च भगवान् योगी गजेन्द्र शरणागतम् ।

प्रोवाच शनिशार्दूल मधुरं मधुसूदनः ॥ ६७

श्रीभगवानुवाच ।

यो मां त्वाश्च सरश्चैव ग्राहस्य च विदारणम् ।

गुल्मकीचकरेणूनां रूपं मेरोः सुतस्य च ॥ ६८

अश्वत्थं भास्करं गङ्गां नैमिषारण्यमेव च ।

संस्मरिष्यन्ति मनुजाः प्रयताः स्थिरबुद्धयः ।। ६९

कीर्तयिष्यन्ति भक्त्या च श्रोष्यन्ति च शुचियवाः ।

दुःस्वप्नो नश्यते तेषां मुस्वप्नच भविष्यति ॥ ७०

मात्स्यं कौमञ्च वाराहं वामनं ताक्ष्यमेव च ।

नारसिंह च नागेन्द्रं सृष्टिप्रलयकारकम् ॥ ७१

एतानि प्रातरुत्थाय संस्मरिष्यन्ति ये नराः ।

सर्वपापैः प्रमुच्यन्ते पुण्यं लोकमवाप्नुयुः ।। ७२

पुलस्त्य उपाय।

एवमुक्त्वा हपीकेशो गजेन्द्र गरुडध्वजः।

स्पर्शयामास हस्तेन गजं गन्धर्वमेव च ।। ७३

सतो दिव्यवपुत्वा गजेन्द्रो मधुसूदनम् ।

जगाम शरणं विन नारायणपरायणः ।। ७४

ततो नारायणः श्रीमान् मोक्षयित्वा गजोत्तमम् ।

पापरन्धाच शापाच ग्राहं चातकर्मकृत् ॥ ७५

ऋपिभिः स्तूयमानश्र देवगुहापरायणैः ।

गतः स भगवान विष्णुर्दुर्विज्ञेयगतिः प्रभुः ।। ७६

गजेन्द्रमोक्षणं दृष्ट्वा देवाः शक्रपुरोगमाः ।

ववन्दिरे महात्मानं प्रभु नारायणं हरिम् ॥ ७७

महर्षयश्चारणाश्च दृष्ट्वा गजविमोक्षणम् ।

विस्मयोत्फुल्लनयनाः संस्तुवन्ति जनार्दनम् ।। ७८

प्रजापतिपतिमा चक्रपाणिविचेष्टितम् ।

गजेन्द्रमोक्षणं दृष्ट्या इदं वचनमब्रवीत् ॥ ७९

य इदं शृणुयान्नित्यं प्रातरुत्थाय मानवः ।

प्राप्नुयात् परमां सिद्धिं दुःस्वप्नस्वस्य नश्यति ।। ८०

विष्णु का स्पर्श होने से वह हाथी भी दिव्यशरीरधारी पुरुष हो गया। इस प्रकार हाथी एष गन्धर्वश्रेष्ठ दोनों एक ही साथ आपत्ति से मुक्त हो गए। (६५)

तदनन्तर उन दोनों से पूजित होकर शरणागतवत्सल पुण्डरीशक्ष देवेश प्रसन्न हुए।

हे मुनिशाईल। योगी भगवान मधुसूदन ने शरणागत गजेन्द्र से यह मधुर वचन कहा- (६७)

श्रीभगवान ने कहा-जोस्थिरबुद्धि से शुचित्रत मनुष्य प्रयत्नपूर्वक मेरा तुम्हारातथा सरोवर, प्राह के विदारण,गुल्म, वीचक, रेणु एघ मेरु पुत्र के रूप, अश्वत्य, भास्कर, गगा स्था नैमिपारण्य का स्मरण एवं भक्तिपूर्वक कीर्तन तथा श्रवण करेंगे उनके दुस्वप्न का विनाश एवं सुस्वप्न की सष्टि होगी। (६८-७०)

जो मनुष्य प्रातः काल मठपर मत्स्यावतार, पूर्भावतार, घराहावतार, यामनावतार, गरड, नरसिंहावतार, गजेन्द्र और सुप्टिप्रलयकारक (मगवान्) का स्मरण करेंगे ये समस्त पापों से मुक्त होकर पुण्य लोक को प्राप्त करेंगे। (७१-७२)

पुलस्त्य ने कहा-गजेन्द्र से ऐसा कहकर गरुडध्वज हपीकेश ने हाथ से गजेन्द्र और गन्धर्थ दोनों का स्पर्श किया। (५३)

हे विप्र! तदनन्तर नारायणपरायण गजेन्द्र दिव्य शारीर धारण कर मधुसूदन की शरण मे गया। (७४)

तदुपरान्त श्रीमान् अद्भुतकर्मा नारायण ने गजोत्तम एवं प्राह को पापबन्ध एवं शाप से मुक्त किया । (७५)

मगवद्भक्त ऋषियों द्वारा स्तुत हाते हुए वे वे अविज्ञेय गति वाले प्रभु भगवान् विष्णु चले गये।

गजेन्द्र के मोक्ष को देखकर इन्द्रादि देवों ने महात्मा प्रभु नारायण हरि की वन्दना की। (५७)

गज-विमोक्षण को देखकर विरमय से उत्फुल्ल नेत्रों वाले महपियों एवं चारणों ने जनार्दन की स्तुति की। (५८)

गजेन्द्रमोक्षण रूपी चक्रपाणि के वर्म को देखकर प्रजापति ब्रह्मा ने यह वचन कहा- (७९)

जो मनुष्य प्रात' काल ठकर प्रतिदिन इसे सुनेगा, पद परमसिद्धि प्राप्त करेगा और उसरा दुःस्वप्न विनष्ट हो जायेगा। (८०)

गजेन्द्रमोक्षणं पुण्यं सर्वपापप्रणाशनम् ।

कथितेन स्मृतेनाथ श्रुतेन च तपोधन ।।

गजेन्द्रमोक्षणेनेह सद्यः पापात् प्रमुच्यते ॥ ८१

एतत्पवित्रं परम परमं सुपुण्यं

संकीर्तनीयं चरितं मुरारेः ।

यस्मिन् किलोक्ते बहुपापन्धनात्

लम्येत मोक्षो द्विरदेन यत् ।। ८२

अजं वरेण्यं वरपझनाभ

नारायणं ब्रह्मनिधि सुरेशम् ।

तं देवगुह्यं पुरुपं पुराणं

चन्दाम्यहं लोकपति वरेण्यम् ।। ८३

पुलस्त्य उवाच ।

एक्व वोक्तं प्रवरं स्ववानां

स्त मुरारेयरनागकीर्तनम् ।

यं कीर्त्य संश्रुत्य तथा विचिन्त्य

पापापनोदं पुरुषो लभेत ॥ ८४

इति श्रीवामनपुराणे अष्टपपश्चाशोऽध्याय ।।५८||