स्कन्द द्वारा तारक-विजय के लिए अनुमति की याचनास सकन्द का श्वस्त्ययन तथा युद्ध के लिए प्रयाण, तारकादि की मग्नण, पातालकैतुयृत्ताग्त, सकन्द का तारक-महिष आदि से युद्ध, तारकवध, महिप का कौश्च की गुहा में प्रेवश सकन्द एव शाक में विवाद सकन्द द्वारा क्रौश्च भेदन तथा महिषासुर का वध, हर का सुध्वक्राक्ष के लिए वर प्रदान

पुलस्त्य उवाच ।

सेनापत्येऽभिषिक्तस्तु कुमारो दैवतैरथ ।

प्रणिपत्य भवं भक्त्या गिरिजां पावकं शुचिम् ॥ १

पट् कृत्तिकाश्च शिरसा प्रणम्य कुटिलामपि ।

ब्रह्माणं च नमस्कृत्य इदं वचनमब्रवीत् ॥ २

बुमार उवाच।

नमोऽस्तु भवतां देवा ओ नमोऽस्तु तपोधनाः ।

पुप्मस्प्रसादाज्जेष्यामि शत्रू महिपतारको ।। ३

शिशुरस्मि न जानामि वक्तुं किंचन देवताः ।

दीयतां ब्रह्मणा सार्द्धमनुज्ञा मम साम्प्रतम् ॥ ४

इत्येवमुक्ते वचने कुमारेण महात्मना ।

मुसं निरीक्षन्ति सुराः स विगतसावसाः ॥५

शंकरोऽपि सुवस्नेहान् समुत्याय प्रजापतिम् ।

आदाय दक्षिणे पाणौ स्कन्दान्तिकमुपागमत् ।। ६

अथोमा प्राह तनय पुत्र एोहि शत्रुहन् ।

चन्दस्व चरणौ दिव्यौ विष्णोलोकनमस्कृती ॥७

ततो विहस्याह गुहः कोऽयं मातवेदस्व माम् ।

यम्यादराव प्रणामोऽयं क्रियते मद्विधैर्जनैः ।। ८

त माता ग्राह वचन कृते कर्मणि पद्मभूः ।

यक्ष्यते तव योऽय हि महात्मा गरुडध्वनः ॥९

केवलं त्यिह मां देवस्त्वत्पिता प्राह शंकरः।

नान्यः परतरोऽस्माद्धि वयमन्ये च देहिनः ॥ १०

पार्वत्या गदिते स्कन्दः प्रणिपत्य जनार्दनम् ।

वस्थौ कृवाझलिपुटस्त्याज्ञां प्रार्थयतेऽच्युतात् ॥ ११

कृताञ्जलिपुटं सन्दं भगवान् भूतभाननः ।

कृत्वा सस्त्ययनं देवो ह्यनुज्ञा प्रददी ततः ॥ १२

नारद उवाच ।

यत्चत् स्वस्त्ययनं पुण्यं कृतवान् गरुडध्वजः ।

३२

पुलस्त्य ने कहा-देवताओं द्वारा सेनापति के पद पर अभिपिक्त कुमार ने भक्ति पूर्वक शङ्कर, पार्वती और पवित्र अग्नि को प्रणाम करने के उपरान छ कृत्तिकाओं एय कुटिला को शिरसे प्रणाम र तथा ब्रह्मा को नमस्कार कर यह वचन कहा- (१-२)

कुमार ने कहा- हे देवताओ। आप लोगों को नमस्कार है। हे तपोधनो। आप रोगों को ओंकार के साथ नमस्कार है। आपलोगों के अनुप्रह से मैं महिप एवं तारक दोनों शत्रुओं को जीतूंगा। (३)

हे देवताओ । में याला हूँ, कुछ योलना नहीं जानता ब्रह्मा सहित आप लोग इस समय मुझे अनुमति दें। (४)

महात्मा कुमार के ऐसा कहने पर सभी देवता निर्भय होकर सनरा मुख देखने लगे।

पुन्न के स्नेह से दौकर वठे और प्रदा को दाहिने हाय से पकड़कर स्कन्द के निकट आये। (६)

तदनन्तर उमा ने पुन से कहा-हे शनुनाशक पुत्र । आओ आओ। लोक द्वारा नमस्कृत विष्णु के दिव्य चरणों की यन्दना करो। (७)

तदनन्तर गुह ने हंसर कहा-हे माता। मुझे पतलाओ कि ये कौन हैं जिन्हें हमारे जैसे लोग भी आदर पूर्वक प्रणाम करते हैं?

माता ने उनसे कहा-कार्य कर लेने पर ब्रह्मा तुम्हें बतलागे कि ये महात्मा गरुडप्पन कौन हैं।

तुम्हारे पिता देव शकर ने मुझसे केवल यही कहा है कि इनसे बढ़कर हम लोग या अन्य कोई देहधारी नहीं है। (१०)

पार्वती के कहने पर पद ने जनार्दन को प्रणाम किया वया हार्यों को जोड़कर सड़े हो गये और अच्युत से आशा माँगने लगे।

भूतमारन भगवान् विष्णुदेव ने हाय जोदकर स्थित स्कन्द का स्थस्ययन फर उन्हें अनुमति दी।

नारद ने कहा- हे निप्रर्पि। मयूरम्पज फीलिंफेय के लिए

शिसिध्वजाय चिन तन्मे व्यारयातुमर्हसि ॥ १३

पुलस्त्य उवाच ।

भृशु स्वस्त्ययनं पुण्य यत्प्राह भगवान् हरिः।

स्कन्दस्य विनयार्थाय महिपस्य वधाय च ।। १४

स्वस्ति ते कुस्ता ब्रह्मा पद्मयोनी रजोगुणः ।

स्वम्ति चमाङ्कितकरी विष्णुस्ते विद्धत्वानः ॥ १५

म्वस्ति ते शकरो भक्त्या सपत्नीको पचनः ।

पावकः स्वस्ति तुम्यं च करोतु शिसिवाहन ॥ १६

दिवाकरः स्वस्ति करोतु तुभ्यं

सोमः सभौम. सधो गुस्थ ।

काव्यः सदा स्वस्ति करोतु तुम्य

शनैश्चरः स्वस्त्ययनं करोतु ॥ १७

मरीचिरत्रिः पुलइ. पुलस्त्य.

नयसिष्ठो भृगुरङ्गिराश्च ।

मृफण्ड जस्ते करता हि सस्ति

स्वस्ति सदा सम महर्षयश्च ॥ १८

विश्वेधिनी साध्यमरुद्गणाग्नयो

दिवाकरा शूलधरा महेश्वराः ।

यक्षा पिशाचा वसवोऽथ किन्नराः

ते सस्ति फुर्वन्तु सदोघवास्त्वमी ॥ १९

नागाः सुपर्णाः सरित. सरास

तीर्थानि पुण्यायतना. समुद्राः ।

महारला भूतगणा गणेन्द्रा

ते मस्ति कुर्वन्तु सदा समुघताः ॥ २०

स्वस्ति द्विपादिकम्यस्ते चतुष्पादेभ्य एव च ।

स्वरित ते यहुपादभ्यस्त्वपादभ्योऽप्यनामयम् ॥ २१

प्राची दिग् रश्ता वजी दक्षिणा दण्डनायकः ।

पाशी प्रतीची रक्षतु लक्ष्माशु. पातु चोत्तराम् ।। २२

वहिर्दक्षिणपूर्वा च मेरो दधिणापराम् ।

प्रतीचीनुत्तरा यायुः शिय. पूर्वोत्तरामपि ॥ २३

उपरिष्टाद् धृव. पातु अधस्ताच धराधरः ।

मुसली लागली चनी धनुष्मानन्तरेषु च ॥ २४

वाराहोऽम्युनिधी पातु दुर्ग पातु नृकेसरी ।

गरवन विष्णु द्वारा दिये गए पुण्यजनक स्वस्त्ययन को भाप मुझसे कहें। (१३)

पुरस्त्य ने कहा- मन्द की विनय प्य महिप के वध हेतु भगवान हरि द्वारा कहे गये पुण्य-जनक स्वरत्ययन को सुनो। (१४)

पायोनि रजोगुणी ब्रह्मा तुम्हारा मनगल परें।हाय में चक धारण करनेयाने अजन्माविष्णु तुम्हारा मगल करें। (१५)

पती सहित पभघन शहर स्नेह पूर्वक तुम्हारा मंगल परें। शिरमान । अग्निदेय तुम्हारा मद्गल परें। (१६)

सूर्य तुम्हारा मगन या मोम सहित सोम तथा युध सहित यहापनि मुम्हारा महल करें 1 गुम मदैय तुम्हारा माल परें सथा भनेघा तुम्हारा महल करें। (१७)

मरीरि, अनि, पुटर, पुलस्त्य, मनु, यसिष्ठ, भृगु, अगिरा, मापण्डेय ये अपि तुम्हारा मंगल करें तथा सप्तपि गाग्दारा सदा मगर करें। (१८)

विदेष, अधिनीकुमार, साम्य, मरुद्गग, अग्नि,

सूर्य, शूल्धर, महेश्वर, यक्ष, पिशाच वसु और पिलर- ये सब तत्परता से सदा तुम्हारा मद्गल करें।

नाग, पक्षी, नदियाँ, सरोवर, तीर्थ पुण्यायतन, समुद्र महाबलशाली मूतगण तया पिनायकगण सदा तत्पर होरर तुम्हारा महल करें। (२०)

द्विपदों एव चतुष्पदों से तुम्हारा मद्गल हो । बहुपदों द्वाप तुम्हारा मगल हो एय विना पैर यालों से तुम्हारा अनामय (२१)

यमधारी। इन्द्र) पूर्व दिशा की, दण्डनायक ( यम) दक्षिा दिशा की, पाश घारी (परुण) पश्चिम दिशा की तथा चन्द्रमा उत्तर दिशा की रक्षा करें। (२२)

अग्नि अग्निरोग की, युथर नेस्य कोण फी, पयन पायव्य कोण पी और शिव ईशान कोण की (रक्षा करें)। (२३)

ऊपर ग्रे यार भुव, न की ओर परापर (शेप या पर्यत) सथा अन्नराली में मुसल, दल, पत्र सपा पाप धारण करने याने (विष्णु) रक्षा करें। (२१)

समुद्र में पाराह, दुर्गमस्यान में नरसिद तपा साम-

सामवेदध्वनिः श्रीमान् सर्वतः पातु माधयः ॥ २५,

पुलस्त्य उवाच ।

एवं कृतस्वस्त्ययनो गुहः शक्तिधरोऽग्रणीः ।

प्रणिपत्य सुरान् सर्यान समुत्पतत भूतलात् ॥ २६

तमन्वेच गणाः सर्वे दत्ता ये मुदितैः सुरैः ।

अनुजग्मुः कुमारं ते कामरूपा विहङ्गमाः ॥ २७

मावरच तथा सर्वाः समुत्पेतुर्नभस्तलम् ।

समं स्कन्देन बलिना हन्तुकामा महासुरान् ॥२८

वतः सुदीर्घमध्यानं गत्वा स्कन्दोऽब्रवीद् गणान् ।

भूम्यां तूर्ण महावीर्याः कुरुध्वमयतारणम् ॥ २९

गणा गुहवचः श्रुत्वा अवतीर्य महीतलम् ।

आराद पतन्तस्तदेशं नादं चक्रुर्भयंकरम् ॥ ३०

तन्निनादो महीं सर्वामापूर्य च नभस्तलम् ।

विवेशार्णवरन्ध्रण पातालं दानवालयम् ।। ३१

श्रुतः स महिपेणाथ तारकण च धीमता ।

विरोचनेन जम्भेन कुजम्भेनासुरेण च ॥ ३२

श्रुत्वा सहसा नादं वज्रपातोपमं दृढम् ।

किमेतदिति संचिन्त्य तूर्ण जग्मुस्तदान्धकम् ।। ३३

ते समेत्यान्धकनैव समं दानवपुंगवाः ।

मन्त्रयामासुरुविनास्तं शब्द प्रति नारद ॥ ३४

मन्त्रयत्सु च दैत्येषु भूतलाव सूकराननः ।

पातालकेतुर्दैत्येन्द्रः संप्राप्तोऽथ रसातलम् ।। ३५

स वाणविद्धो व्यथितः कम्पमानो मुहुर्मुहुः ।

अत्रवीद् वचनं दीनं समभ्येत्यान्धकासुरम् ॥ ३६

पातालपेतुरुवाच ।

गतोऽहमासं दैत्येन्द्र गालवस्याश्रमं प्रति ।

तं विध्वंसयितुं यत्नं समारब्धं पलान्मया ॥ ३७

यावत्सूकररूपेण प्रविशामि तमाश्रमम् ।

न जाने तं नरं राजन् येन मे प्रहितः शरः ॥ ३८

शरसंभिन्नजत्रुश्च भयात् तस्य महाजवः ।

वेद ध्वनि रूप श्रीमान् माधर तुम्हारी सभी ओर से रक्षा करें। (२५)

पुलस्त्य ने कहा-इस प्रकार स्वस्ययन हो जाने पर शक्ति धारी सेनापति गुह समस्त देवताओं को प्रणाम कर भूतल से उड़े। (२६)

प्रसन्न देवताओं द्वारा दिये गये सभी गण यथेच्छरूप- धारी पक्षी बन कर थुमार या अनुसरण किये।(२७)

सभी मातायें भी पलवान सन्द के साथ महान् असुरों को मारने के लिए आकाश में उड़ीं। (२८)

तदनन्तर घहुत दूर जाने पर सन्द ने गणों से सदा-हे महा-बल-शालियो ! शीघ्र ही तुम लोग पृथ्वी पर उतरो। (२९)

गुह की बात सुनकर सभी गण पृथ्वी पर उतरे एवं उतरसे समय दूर से ही उस स्थान पर भयङ्कर नाद किये।

वह निनाद समस्त पृथ्वी एवं आकाश को आपूरित कर समुद्र-राध से दानयों के निवास स्थान पाताल में प्रविष्ट हुआ।

बुद्धिमान् महिंप, वारक, विरोचन, जम्म तथा कुजम्म प्रभृति असुरों ने उस ध्वनि को सुना। (३२)

सहसा वचपात-तुल्य उस घोर शब्द को सुनकर 'यह क्या है' यह सोचकर वे सभी शीघ्रता से अन्धक के समीप गये।

हे नारद ! वे सभी असुरपुङ्गय उद्विग्न होकर उस शब्द के विपय में अन्धक के साथ मिलकर विचार करने लगे। (३४)

उन दैत्यों के मन्त्रणा करते समय सूर के समान मुख याला दैत्येन्द्र पागलकेतु भूतल से रसातल में आया। (३५)

वाण विद्ध होने से व्यथित एवं पारम्बार कांपता हुआ यह अन्धमासुर के निकट जाकर दीन वचन (३६)

पातालकेनु ने कहा-दैत्येश्वर! गालय के आश्रम में में गया था। मैं उसको बलपूर्वक नष्ट करने का यल करने लगा। (३७)

हे राजन् ! में मुकर का रूप धारण कर जैसे ही उस आश्रम में गया वैसे ही न जाने किस मनुष्य ने मेरे ऊपर धारा चलया। (३८)

बाण से जा फै टूट जाने पर में इसकी भय के कारण

प्रणष्ट आश्रमात् तस्मात् स च मां पृष्ठतोऽन्वगात् ।। ३९

तुरङ्गसुरनिधोपः श्रूयते परमोऽसुर ।

तिष्ठ विष्ठेति वदतस्तस्य शुरस्य पृष्टतः ।

तद्भयादस्मि जलधि संप्राप्तो दक्षिणार्णवम् ॥ ४०

यावत्पश्यामि तत्रस्थान् नानावेपाकतीन् नरान् ।

केचिद् गर्जन्ति घनवत् प्रतिगर्जन्ति चापरे ॥ ४१

अन्ये चोचुर्वयं नूनं निधनामो महिषासुरम् ।

वारकं घातयामोऽध बदन्त्यन्ये सुतेजसः ॥ ४२

तच्छ्रुत्वा सुतरां त्रासो मम जातोऽसुरेश्वर ।

महार्णवं परित्यज्य पतितोऽस्मि भयातुरः ।। ४३

घरण्यां विलं ग स मामन्यएतद् अली ।

तद्भयात् संपरित्यज्य हिरण्यपुरमात्मनः ॥ ४४

ववान्तिकमनुप्राप्तः प्रसादं कर्तुमर्हसि ।

तच्छ्रुत्वा चान्धको वाक्यं प्राह मेघस्वनं वचः ।। ४५

न भेतव्यं त्वया तस्मात् सत्यं गोमाऽस्मि दानव ।

महिपम्तारकश्योभौ पाणच पलिनां वरः ॥ ४६

अनारन्यापैव ते वीरास्त्वन्धक महिपादयः ।

स्वपरिग्रहसंयुक्ता भूमि युद्धाय निर्ययुः ॥ ४७

यत्र ते दारुणाकारा गणाश्चमहास्वनम् ।

तत्र दैत्याः समाजग्मुः सायुधाः सबला मुने ।। ४८

दैत्यानापततो दृष्ट्वा कार्तिकेयगणास्ततः ।

अभ्यद्रयन्त सहसा स चोरो मालमण्डलः ॥ ४९

तेपा पुरस्सर. स्थाणु. प्रगृह्य परिषं चली।

निषूदयत् परयलं क्रुद्धो रुद्रः पशूनिव ।। ५०

तं निघ्नन्त महादेवं निरीक्ष्य कलशोदरः।

कुठारं पाणिनादाय हन्ति सर्वान् महासुरान् ॥ ५१

ज्यालामुखो भयकरः करेणादाय चासुरम् ।

सरथ सग माश्वं विस्तृते वदनेऽक्षिपत् ।। ५२

दण्डकथापि संक्रुद्धः प्रासपाणिर्महासुरम् ।

सवाहनं प्रक्षिपति समुत्पाटय महार्णवे ॥ ५३

शङ्कुकर्णश्च मुसली हलेनाकृष्य दानवान् ।

आश्रम से वेग पूर्वक भागा। उसने भी मेरा – पीछा रिया। (३६)

हे असुर । हमारे पीछे आ रहे 'रुको रुको' कहने पाले उस वीर के घोडे की खुर का महान् शब्द सुनाई पड़ रहा था। उसके भय से में दक्षिण समुद्र मे आ गया। (५०)

वहाँ मैंने अनेक प्रकार के वेप तथा आकार वाले मनुष्यों को देखा। उनमे कुछ मेघ के समान गर्जन कर रहे थे तथा अन्य वेसा ही प्रतिगर्जन कर रहे थे। (४१)

दूसरे कह रहे थे कि हम महिषासुर को अवश्य मारेंगे और परमतेजस्वी दुसरे लोग कह रहे थे कि आज हम तारक को मारेंगे। (४२)

है असुरेश्वर' उसने मुनकर मुझ अत्यन्त भय उत्पन्न हो गया। विशाल समुद्र को छोड़कर में भयातुर हो पृथ्वी के षिवृत गर्त मे भागा। उस पलयान ने मेरा पीछा किया। उसके भय से में अपना हिरण्यपुर छोडर आप के निकट आया हूँ। मेरे ऊपर कृपा कीजिए। यह बात सुनकर अन्धा ने मेघ-सदृश पनि से यह वचन कहा- (४३-४५)

हे दानव । तुम उससे मत डरो। मैं यथार्थत तुम्हारा रक्षक हूँ। तदनन्तर महिप एव तारक ये दोनों तथा वलयानों में श्रेष्ठ घाण ये सभी अन्धक से पूछे बिना ही अपने अनुचरों के साथ युद्धार्थ पृथ्वी पर निकल पडे ।(४६-४७)

हे मुने आयुधधारी दैत्य सेना-सहित उस स्थान पर गये जहाँ भयंकर आकार वाले गण गर्जन कर रहे थे।

दैत्यों को आते हुए देखकर कार्तिकेय के गण तथा उप्र मातृकाओं का समूह सहसा टूट पड़ा। (४९)

उन सभी के अप्रभाग में पलान् स्थाणु-रद्र-परिष लेकर शोधपूर्वक पशुओं के सटश शव सेना को मारने (५०)

महादेव को असुरों को मारते हुए देस क्लशोदर हाय मे कुठार लेकर महासुरों को मारने लगा। (५१)

मयङ्कर पालामुस रथ, हाथी और घोड़ों के सहित असुरों को हाथ पकड़ कर अपने विस्तृत मुख में फेरने (५२)

हाथ में पस लिए हुये मुद्ध दण्डक महामु शो याहन सहित उठाकर समुद्र में फेकने ख्या। (१३)

मुसल एय प्रासघारी जिसेन्द्रिय शहपर्ण दानयों को हल

संचूर्णयति मंत्रीय राजानं प्रासभृइ वशी ॥ ५४

सङ्गचर्मधरो वीरः पुष्पदन्तो गणेश्वरः ।

द्विधा विधा च बहुधा चक्रे दैतेयदानवान् ।। ५५

पिकलो दण्डाद्यम्य यत्र यत्र प्रधावति ।

नम्र तत्र प्रदृश्यन्ते राशयः शायदानवैः ॥ ५६

सहस्रनयनः शूलं भ्रामयन् ये गणाग्रणीः ।

निजयानासुरान् चीरः समाजिरथकुञ्जरान् ।। ५७

भीमो भीमशिलावः स पुरस्सरतोऽसुरान् ।

निजधान यथेवेन्द्रो ववृष्टया नगोत्तमान् ॥ ५८

रौद्रः एकटचमाक्षो गणः पश्चशिसो वली।

प्रामयन् मुदरं वेगानिजघान घलाद् रिपून् ।। ५९

गिरिभेदी तलेनैव सारोई कुखरं रये।

भस्म चा महावेगो रथं च रथिना सह ।। ६०

नाडीजलोऽट्विपातश्च सृष्टिभिर्जानुनाऽसुरान् ।

कोलाभिर्यजतुल्याभिर्जपान यलयान मुने ॥ ६१

कर्मग्रीवो ग्रीवयैव शिरसा चरणेन च ।

लुण्ठनेन तथा दैत्यान् निजधान सराहनान् ॥ ६२

पिण्डारकस्तु तुण्डेन शृङ्गाम्यां च कलिप्रिय ।

विदारयति संग्रामे दानवान् समरोवान् ॥ ६३

ततस्तसैन्यमतुल वध्यमान गणेश्वरः ।

प्रदुद्रावाथ महिपस्तारकच गणाग्रणीः ।। ६४

| ते हन्यमानाः प्रमथा दानवाभ्यां परायुधः ।

परिवार्य समन्तात् ते युयुधुः पृपितास्तदा ।। ६५

हसास्य. पट्टिशेनाय जघान महिपामुरम् ।

पोडशाक्षरित्रशूलेन शवशीपों चरामिना ॥ ६६

श्रुतायुधस्तु गदया यिशोको मुसलेन तु ।

पन्धुदत्तम्तु शूलेन मूनि दैत्यमताडयत् ॥ ६७

वयान्पैः पार्षदेपुढे शूलशक्त्यष्टिपदिशः।

से सींच पर इसप्रकार पूर्ण करने रगा जैसे मन्त्री (अना स्मयान ) राजा को नष्ट करता है।(५४)

सहग दाल को धारण परने पाला गणों का स्वामी पीर पुप्पदन्त भी दैत्यों एवं दानों को दो, तीन और अनेक सण्डों में पाटने लगा। (५५)

दण्द को उठाकर  पिगड जहाँ-जहाँ दौड़ता था यदा यहाँ देत्यों ये शव या देर दिसलाई पड़ता। (५६)

गमों में श्रेष्ठ घोर सहसनयन शूल घुमाते हुए पोदे, रय और हाथियों के सहित असुरों को मार रहे (५७)

भीम भयर शिटाओं की पर्या से आगे आ रहे अमु पो प्रा प्रहार से हद रस की पूर्ति से उसम पर्वतों को नष्ट करने हैं। (५८)

भयर शफ्ट यमाक्ष पाशिरा नामक पठयान गए क्षेगपूर्वक मुद्गगा घुमाते हुए पलपूर्वक शत्रुओं का यप कर

मदावेगशारी गिरिभेदी समान में पप्पो से प्रहार से ही सवार के सहित हाथी ग्रे पर्व रथी के सहित रद को पनापूर करने (६०)

है मुने । पश्याम नाडीजह पैरों, मुक्यों जानुओं एवं यमतुल्य वोहनियों में प्रहार से अमुरों को मारने लगा। (६१)

धर्मग्रीय मीया, शिर एव चरणों के प्रहारों से तथा धक्का देकर चाइनों के साथ दैत्यों को मारने लगा। (६२)

हे नारद । पिण्डारक अपने मुस तथा गृह से समरोद्धत दानवों को समाम में विदीर्ण करने (६३)

तदनन्तर गणेघरों द्वारा उस अतुल सैन्य को मारा जाता देस गयाप्रगी महिप एवं तारक दौड़े। (६४)

उन दोनों दानयों द्वारा श्रेष्ठ आयुषों से मारे जा रहे ये सभी प्रमथगग चारों ओर से पेरपर प्रोधपूर्वक (६५)

ईसास्य पटिश से, पोशाक्ष त्रिशूल से एवं शमी श्रेष्ठ तलवार से महिपामुर को मारने लगा। (६६)

धुनायुघ ने गदा से, यिशोफ ने मुसल से क्या बन्धुदत्त ने शूल से दप्त देय पं मस्तक पर प्रहार (६७)

इसी प्रकार अन्य पार्षदों द्वारा शुल, शशि, टिप्य पहिशों से ताहित होने पर भी यह मेनार पर्यंत फे माया अरिहा (६८)

नाकम्पत् वाड्यमानोऽपि मैनाक इव पर्वतः ॥ ६८

वारको भद्रकाल्या च तथोलूखलया रणे ।

वध्यते चैकचूडाया दार्यते परमायुधैः ॥ ६९

तो ताड्यमानी प्रमथैर्माभिश्च महासुरौ

न योभं जग्मतुर्वीरौ क्षोभयन्तौ गणानपि ॥ ७०

महिपो गदया तूर्ण प्रहारैः प्रमथानथ ।

पराजित्य पराधावत् कुमारं प्रति सायुधः ॥ ७१

तमापतन्तं महिएं सुचकाक्षो निरीक्ष्य हि ।

चक्रमुधम्य संक्रुद्धो रुरोध दनुनन्दनम् ।। ७२

गदाचक्राङ्कितकरी गणासुरमहारथौ ।

अयुध्येतां सदा ब्रह्मन् लघु चित्रं च सुष्टु च ।। ७३

गदा मुमोच महिपः समाविध्य गणाय तु ।

सुचत्राक्षो निजं चत्रमुत्ससजासुरं प्रति ॥ ७४

गदा छित्त्या सुतीक्ष्णारं चक्रं महिपमाद्रवत् ।

सत उच्चुकुशुदैत्या हा हतो महिपस्त्विति ॥ ७५

तच्छुत्याऽभ्यद्रवद् वाणः प्रासमाविध्य वेगवान् ।

बघान चक्रं रक्ताक्षः पञ्चमुष्टिशतेन हि ।। ७६

पश्चवाहुशतेनापि सुचक्राक्षं घबन्ध सः ।

बलवानपि पाणेन निष्प्रयत्नगतिः कृतः ॥ ७७

सुचक्राक्षं सचक्रं हि बडूं बाणासुरेण हि ।

दृष्ट्वाद्रपद्गदापाणिर्मकराक्षो महाबलः ॥ ७८

गदया मूनि घाणं हि निजधान महाबलः।

वेदनात्तों मुमोचाथ सुचक्राक्षं महासुरः ।

स चापि तेन संयुक्तो नीडायुक्तो महामनाः ।। ७९

स संग्रामं परित्यज्य सालिग्राममुपाययौ ।

वाणोऽपि मकाराःण ताडितोऽभूत्पराङ्मुखः ॥ ८०

प्रभज्यत बलं सर्व दैत्यानां सुरवापस ।

ततः स्वालमीक्ष्यैव प्रभग्न तारको बली ।

खड्गोधतकरो दैत्य. प्रदुद्राव गणेश्वरान् ।। ८१

ततस्तु तेनाप्रतिमेन सासिना

ते हंसवक्त्रप्रमुखा गणेश्वराः ।

समातरथापि पराजिता रणे

आयुधों से तारक के ऊपर प्रहार किया। (६६)

वे दोनों महान् असुर पार्षदों और मातृशक्तियों से प्रताडित होने पर भी सुध न होकर गणों को क्षुब्ध कर रहे थे। (७०)

तदनन्तर गदा और प्रहारों से प्रमथों का शीघ पराजित कर महिषासुर आयुध सहित कुमार की ओर दौड़ा। (७१)

उस महिप को आते देखकर अत्यन्त गुद्ध सुचक्राक्ष ने पक उठा पर दनुनन्दन को रोका। (७२)

दे ग्रहान् । हाथों मे गदा और पकधारण किये असुर और गण दोनों महारथी उस समय परस्पर रघु, विचिन और सुन्दर युद्ध करने एगे।

गहिप ने गदा घुमा पर सुचमाक्ष के ऊपर फेंका। मुपाक्ष ने भी अपने पम यो उस असुर की ओर पटाया। (७४)

सुतीक्ष्ण अरों से युक्त यह पक गदा यो छिन्न भिन्न पर महिप के ऊपर पला । तदनन्तर देयलोग 'हाय ! महिप मारा गया' यह पहले हुए जोर से चिल्ला घठे। (७५)

उसे मुनने के उपरान्त लाल नेत्रों पाला पाणामुर प्राप्त दौड़ा।

लेकर वेग पूर्वक दौड़ा एवं पाँच सौ मुष्टियों से एक पर प्रहार किया। (७६)

और पाँच सौ भुजाओं, से सुचक्राक्ष को घाँध लिया। माणासुर के द्वारा बलवान होते हुए भी सुचक्राक्ष प्रयासशून्य कर दिया गया।

याणासुर के द्वारा सुचक्राक्ष को चक्र सहित बँधा हुआ देखकर महाबली मकराक्ष हाथ में गदा लेकर (७८)

महापली मरराक्ष ने गदा से धारण के मस्तक पर प्रहार किया। तदनन्तर चोट से व्याकुल याण ने सुचक्राक्ष को छोड़ दिया। यह मनस्वी भी उससे छूटकर लज्जित हुआ और युद्ध छोड़कर शालिग्राम के समीप चला गया । बाण भी मकराक्ष से चोट खार युद्ध से विमुस हो गया। (७९-८०)

हे नारद ! दैत्यों की सारी सेना लिन्न-भिन्न हो गई। तदुपरान्त अपनी सेना को नष्ट हुआ देश परयान देत्य चारक हाथ में तलवार लेकर गणेश्वरों की ओर दीदार (८१)

तदनन्तर खड्गधारी उस अप्रतिम पीर ने उन

स्कन्दं भयार्त्ताः शरणं प्रपेदिरे ।। ८२

भग्नान् गणान् वीक्ष्य महेश्वरात्मज-

स्तं तारकं सासिनमापतन्तम् ।

दृष्ट्वैव शक्त्या हृदये रिभेद

स भिन्नमर्मा न्यपठन् पृथिव्याम् ॥ ८३

तस्मिन्हते भ्रातरि भग्नदो

मयातुरोऽभून्महिपो

संत्यज्य संग्रामशिरो दुरात्मा

जगाम शैलं स हिमाचलाव्यम् ।। ८४

याणोऽपि वीरे निहतेऽध तारके

गते हिमादि महिपे भयानें।

मयाद् विवेशोग्रमपा निधान

गणैर्यले वध्यति सापराये ।। ८५

हत्वा कुमारो रणमूनि तारक

प्रगृह्य शक्ति महता जवेन ।

मयूरमारुह्य शिखण्डमण्डितं

ययो निहन्तु महिषासुरस्य ॥ ८६

स पृष्ठतः प्रेक्ष्य शिखण्डिकेतनं

समापतन्तं वरशक्तिपाणिनम् ।

कैलासमुत्सृज्य हिमाचलं तथा

क्रौञ्चं समस्येत्व गुहां विवेश ।। ८७

दैत्यं प्रविष्टं स पिनाकिसूनु-

र्जुगोप यवाद् भगवान् गुहोऽपि ।

स्वबन्धुहन्ता भरिता कथं वह

संचिन्तयन्नेव ततः स्थितोऽभूत् ॥ ८८

सतोऽम्यगात् पुप्फरसंभवस्तु

हरो मुरारिस्त्रिदशेश्वरश्च ।

अभ्येत्य चोचुमहिपं सलं

भिन्दस्य शक्त्या पुरु देवकार्यम् ॥ ८९

चत् कार्तिकेय. प्रियमेव तथ्य

श्रुत्वा वचः प्राह सुरान् विहस्य ।

कथं हि मातामहनप्तकं वधे

स्वभ्रावरं भ्रासुतं च मातुः ॥ ९०

एपा श्रुतिश्चापि पुरावनी किल

मातृकाओं सहित सवनादि गणेश्वरों को पराजित कर दिया। ये सभी भयार्त होकर स्कन्द को शरण (८२)

महेश्वर के पुत्र कुमार ने अपने गणों को उत्साहद्दीन तथा तलवारधारी तारकासुर को आते हुए देखकर शक्ति के प्रहार से उसका हृदय विदीर्ण कर दिया। मर्म का भेद हो जाने से वह धरती पर गिर पडा। (८३)

हे महपि । उस भाई के मरने पर महिषासुर का अभिमान चूर हो गया। बद दुष्टात्मा भय से व्याकुल हो युद्ध छोड़कर हिमालय पर्वत पर भाग गया। (८४)

वीर तारक के मारे जाने, भयात महिप के हिमालय पर भाग जाने एक गणों द्वारा अपराधी सेना का वध किये जाने पर बाण भी भय वश उप (गम्भीर) समुद्र में प्रविष्ट हो गया।

रण मे तारक का वध कर कुमार शक्ति लेकर शिखण्ड- युक्त मयूर पर आरूद हुए एव अत्यन्त वेगपूर्वक महिषासुर को मारने चले।

हाथ मे श्रेष्ठ शक्ति लिए हुए शिवण्डिकेतन (कुमार) को पीछे आसे देख वह महिषासुर कैलास एव हिमालय को छोड़कर क्रौञ्च पर्वत पर गया एव उसकी गुफा मे प्रविष्ट हो गया। (८७)

महादेव के पुन भगवान् गुह पर्वतगुफा में प्रविष्ट दैत्य की यत्न पूर्वक रखवाली करने लगे। अपने बन्धु की हत्या कैसे करूँ यह सोचकर वे खड़े रहे। (८८)

तदनन्तर पद्मयोनि ब्रह्मा, भगवान् शकर, विष्णु और इन्द्र वहाँ आ गये और आकर इन्होंने कहा-शक्ति के प्रहार से पर्वत सहित महिष को मारो और देवताओं का कार्य पूर्ण करो।

कार्तिकेय ने इस प्रिय एव यथार्थ वचन को सुनकर हंसते हुए देवताओं से कहा-"मैं मावामह के नाती, अपने भाई और माता के भतीजे को कैसे मारूँ ? (९०)

(इस विषय मे) यह प्राचीन श्रुति भी है जिसे वेदज्ञानी महर्षिगग(आभणक) कहते हैं । इस उत्तम श्रुति के

गायन्ति यां वेदविदो महर्षयः।

कृत्वा च यस्या मतमुत्तमायाः

स्वर्ग बजन्ति त्वतिपापिनोऽपि ॥९१

गां साह्मणं युद्धमथासवाक्यं

पालं स्वमन्युं ललनामदुष्टाम् ।

कृतापराधा अपि नैव वध्या

आचार्यमुस्त्या गुरवस्तथैव ॥ ९२

एवं जानन् धर्ममायं सुरेन्द्रा

नाहं हन्यां भ्रावरं मातुलेयम् ।

यदा दैत्यो निर्गमिष्यद् गुहान्तः

तदा शक्त्या घातयिष्यामि शत्रुम् ॥९३

श्रुत्वा कुमारवचनं भगवान्महर्षे

कृत्या मतिं स्वहृदये गुहमाह शक्रः।

मत्तो भवान् न मतिमान् चदसे किमर्थ

वाक्यं शृणुष्व हरिणा गदितं हि पूर्वम् ॥ ९४

नैकस्यार्थे यहून् हन्यादिति शास्त्रेपु निश्चयः ।

एक हन्याद् यहुभ्योऽर्थे न पापी तेन जायते ॥ ९५

एतच्छुत्या मया पूर्व समयस्थेन चामिज ।

निहतो नमुचिः पूर्व सोदरोऽपि ममानुजः ॥ ९६

तस्मात् पहनामर्थाय सक्रौञ्च महिषासुरम् ।

घातयस्व पराक्रम्य शक्त्या पावकत्वया ॥ ९७

पुरंदरवचः श्रुत्वा क्रोधादारतलोचनः ।

कुमारः प्राह वचनं कम्पमानः शतक्रतुम् ॥ ९८

मूढ किं ते वलं पाहोः शारीरं चापि वृत्रहन् ।

येनाधिक्षिपसे मां त्वं ध्रुवं न मतिमानसि ।। ९९

तमुवाच सहस्राक्षस्त्यत्वोऽहं पलवान् गुह ।

तं गुहः प्राह एहोहि युधस्व बलवान् यदि ।। १००

शक्रः प्राहाथ बलवान् ज्ञायते कृत्तिकासुत ।

प्रदक्षिणं शीघ्रतरं यः कुर्यात् क्रौश्चमेव हि ॥ १०१

श्रुत्वा तद्वचनं स्कन्दो मयूरं प्रोय वेगवान् ।

प्रदक्षिणं पादचारी कत्तुं तूर्णतरोऽभ्यगात् ।। १०२

शक्रोऽवतीर्य नागेन्द्राव् पादैनाथ प्रदक्षिणम् ।

अनुसार आचरण र महान् पापी भी स्वर्ग जाते हैं। (६१)

गौ, ब्राह्मण, वृद्ध, यथार्थवता, पालक, अपना सम्बन्धी, दोपरहित स्त्री तथा आचार्य आदि गुरुजन अप- राधरने पर भी अयध्य होते। (९२)

दे सुरेन्दो! में इस श्रेष्ठ धर्म को जानते हुए अपने भाई यो नहीं मार सांगा। गुहा के भीतर से जब यह दैत्य निकरेगा तय में शक्ति द्वारा उस शत्रु का वध (९३)

हे मह । पुमार या पचन सुनने के उपरान्त इन्द्र ने अपने हदय मे विचार पर गुह से कहा-आप मुझ- मे अधिक बुद्धिमान नहीं है। आप क्यो योल रहे हैं। पर्यशाल मे हरिद्वारा यही पात को मुनिये। (९४)

यद भाषों का निश्चय है कि एक व्यक्ति के लिए पाहतों की हत्या नही करनी चाहिये । परन्तु यहुनों के हित फेरि एक पो मारने से मनुष्य पापी नहीं होता। (६५)

हे अग्रि पुत्र! इस (उपदे) को मुनर पूर्वगट में मैंने सन्धि फे रदने पर भी अपने सहोदर अनुष्ट नमुचि को मारा। (९६)

अतः यहुतों के हित के लिए तुम क्रोश्च सहित महिपा- सुर को पराममपूर्वक अमि-प्रदत्त शक्ति से मार

इन्द्र का वचन सुनकर मोघ से रक्त नेत्रों याले कोपमे हुये कुमार ने शतमतु इन्द्र से कहा । (९८)

हे मूढ नारि! तुम्हारी यादों एवं शरीर में कितना पल है जिससे तुम मुसुपर भाप कर रहे हो। तुम निभाय ही युद्धिमान नहीं हो। (९९)

सहस्राक्ष इन्द्र ने उनसे कहा-हे गुह! मैं तुमसे यलवान हूँ। गुहने इन्द्र से पहा-यदि तुम यलयान हो तो आओ, युद्ध करो। (१००)

तय इन्द्र ने कहा-हे चियानन्दन! हम दोनों में जो पहले यौन पर्यन की प्रदक्षिणा पर सकेगा यही बल्यान समझा जायेगा। (१०१)

इस पाव को सुनार मन्द मपूर योदर पैदल प्रद क्षिणा परने के लिये पेग पूर्वक पल पड़े। (१०२)

कृत्वा तस्थौ गृहोऽभ्येत्य मूढं कि संस्थितो भवान्॥१०३

तमिन्द्रः प्राह कौटिल्यं मया पूर्व प्रदक्षिणः ।

कृतोऽस्य न स्वया पूर्व कुमारः शक्रमप्रयीत् ।। १०४

मया पूर्व मया पूर्व विवदन्तौ परस्परम् ।

प्राप्योचतुर्महेशाय ब्रह्मणे माधवाय च ॥ १०५

अथोवाच हरिः स्कन्द प्रष्टुमर्हसि पर्वतम् ।

योऽयं वक्ष्यति पूर्व स भविष्यति महानलः ॥ १०६

तन्माधववचः श्रुत्वा क्रौञ्चमभ्येत्य पायकिः ।

पप्रच्छादिमिदं केन कृत पूर्व प्रदक्षिणम् ॥ १०७

इत्येवमुक्तः क्रौञ्चस्तु प्राह पूर्व महामतिः ।

चकार गोत्रभित् पश्चात्त्वया कृतमथो गुह ॥ १०८

एवं ध्रुवन्त क्रौनं स क्रोधात्प्रस्फुरिताधरः ।

विभेद शक्त्या कौटिल्यो महिपेण समं तदा ॥ १०९

तस्मिन्हतेऽथ तनये बलपान सुनामो

वेगेन भूमिधरपार्थिवजस्तयागात् ।

ब्रोन्द्ररुद्रमस्दश्विवसुप्रधांना

जम्मुर्दिवं महिपमीक्ष्य हतं गुहेन ॥ ११०

स्वमातुलं वीक्ष्य बली कुमारः

शक्ति सत्पाट्य निहन्तुकामः ।

निवारितश्चक्रधरेण वेगा-

दालिङ्गथ दोम्या गुरुरित्युदीर्य ॥ १११

सुनाभमभ्येत्य हिमाचलस्तु

प्रगृह्य हस्तेऽन्यत एव नीतवान् ।

हरिः कुमारं सशिसण्डिनं नय-

द्वेगादिवं पन्नगशनुपत्रः॥ ११२

ततो गुहः प्राह हरि सुरेश

मोहेन नष्टो भगवन् विवेकः ।

इन्द्र भी गजराज से उतर कर पैर से प्रदक्षिणा कर वहाँ आ गये। सन्द ने उनके निकट जारर कहा-हे मूह । क्यों वेठे हो? (१०३)

इन्द्र ने उन कौटिल्य (कुटिला के पुनस्कन्द) से कहा-मैंने तुमसे पहले ही इसकी प्रदक्षिणा कर लिया। कुमार ने इन्द्रसे कहा-तुमने पहले नहीं दिया है। (१०४)

"मैंने पहले किया, मैंने पहले किया” इस प्रकार आपस में विवाद करते हुए उन दोनों ने शकर, ब्रह्मा एव विष्णु से जाकर कहा। (१०५)

तदनन्तर विष्णु ने स्कन्द से कहा-तुम पर्वत से पूछो यह जिसे पहले आया हुआ कहेगा, यही महायलयान् माना जायेगा। (१०६)

माधर की यह बात सुनार अग्निनन्दन ने क्रौन पर्वत के निकट जाकर उससे यह पूछा कि पहले किसने प्रदक्षिणा की है? (१०७)

इस बात को सुनकर महामति कौन ने कहा-हे गुह पहले इन्द्र ने प्रदक्षिणा की तदनन्तर तुमने की है। (१०८)

ऐसा बहने वाले मोश्च को क्रोध से अघर पाते हुए उस पौटिल्य (पुटिलानन्दन कुमार) ने शक्ति के प्रहार से महिषासुर के साथ विदीर्ण कर दिया। (१०९)

उस पुत्र के मारे जाने पर गिरिराजतनय बलयान सुनाभ वेगपूर्वक वहाँ आये। ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र, वायु, अश्विनीकुमार, वसु आदि देवता गुह के द्वारा महिष को मारा गया देखकर स्वर्ग चले गये। (११०)

अपने मातुल को देखने के उपरान्त वलयान कुमार ने शक्ति लेकर (उसे) मारना चाहा। किन्तु विष्णु ने वेग-पूर्वक भुजाओं से आलिंगन करते "ये गुरु है" ऐसा कहकर उन्हें रोक दिया। (१११)

हिमालय सुनाम के पास आये एव उनका हाय पकड कर दूसरी ओर ले गये तथा गरुडवाहन हरि मयूर सहित कुमार को वेग पूर्वक स्वर्ग ले गये। (११२)

तदनन्तर गुह ने सुरेश्वर हरि से कहा- हे भगवन्  मोह से मेरा विवेक नष्ट हो गया। मैंने अपने ममेरे भाई को मारा है। अत मैं अपने शरीर का शोषण

भ्राता मया मातुलजो निरस्त-

स्तस्मात् करिष्ये स्वशरीरशोपम् ॥ ११३

तं प्राह विष्णुव्रज वीर्यवर्य

पृथूदकं पापतरोः कुठारम् ।

स्नात्वौघवत्यां हरमीक्ष्य भक्त्या

भविष्यसे सूर्यसमप्रभावः ॥ ११४

इत्येवमुक्तो हरिणा कुमार-

स्त्वस्येत्य तीर्थ प्रसमीक्ष्य शभुम् ।

स्नात्वार्य देवान् स रविप्रकाशो

जगाम शेलं सदन हरस्य ।। ११५

सुचक्रनेत्रोऽपि महाश्रमे सप.

श्वचार शैले पवनाशनस्तु ।

आराधयानो वृषभध्वज तदा

हरोऽस्य तुष्टो वरदो पभूव ।। ११६

देवात् स बरे वरमायुधार्थे

चत्र तथा वै रिपुमाहुपण्डम् ।

छिन्यायथा त्वप्रतिमं करेण

पाणस्य तन्मे भगवान् ददातु ॥ ११७

तमाह शंभुर्ब्रज दत्तमेतद्

वरं हि चक्रस्य तवायुधस्य ।

पाणस्य तदाहुबल प्रवृद्ध

सछेत्स्यते नात्र विचारणाऽस्ति ॥११८

वरे प्रदचे त्रिपुरान्तकेन

गणेश्वरः स्कन्दमुपाजगाम ।

निपत्य पादौ प्रतिबन्ध हटो

निवेदयामास हरप्रसादम् ।। ११९

एवं तयोक्त महिपासुरस्य

वधं त्रिनेत्रात्मजशक्तिभेदात् ।

गौञ्चस्य मृत्युः शरणागतार्थ

पापापहं पुण्यविवर्धनं च ॥ १२०

इति श्रीवामनपुराणेद्वात्रिंशोऽध्याय ॥३२॥

करूँगा।

विष्णु ने उनसे कहा-हे कुमार | तुम पापरूपी वृक्ष के लिये कुठार स्वरूप श्रेष्ठ तीर्थ पृथूदक मे जाओ। यहाँ ओघवती के जल में स्नान कर भक्तिपूर्वक महादेव का दर्शन बरने से तुम सूर्य के समान प्रभायुक्त हो जाओगे। (११४)

हरि के ऐसा कहने पर कुमार (पृथूदक) तीर्थ में गये रघ वाहोंने महादेव का दर्शन क्यिा। स्नान करने के उपरान्त देवताओं की पूजा कर सूर्य के समान प्रमायुक्त हो वे महादेव के गृहभूत पर्वत पर चर गये। (११५)

सुचकनेन नामक गणेश्वर पायु मात्र भक्षण कर पर्वत पर महाश्रम में शरर की आराधना करता हुआ तपस्या परने लगा। तब प्रसन्न होकर शकर उसे वर देन के लिए उद्यत हुए। (११६)

उसने अख के निमित्त पर माँगा। "हे भगवन् । शुनु क बाहु समूह को काटने वारा ऐसा अनुपम पक मुझे दें जिससे मैं हाथ से ही बाणासुर की बाहों को काट सकूँ।

महादेव ने उससे कहा-जाओ। तुमने पक आयुध के निमित जो वर माँगा, मैंने उसे दिया। यह निस्सन्देह थाणासुर के अतिशय बढे हुए पाहुघल को वाटेगा। (११८)

त्रिपुरान्तक महेश्वर के घर देने पर गणेश्वर स्कन्द के पास गया और उनके चरणों मे गिरकर वन्दना करने के उपरान्त उनसे प्रसन्नता पूर्वक महादेव की कृपा का वर्णन किया। (११६)

इस प्रकार मैंने तुमसे शंकर पुन द्वारा शक्ति से महिपा सुर के मारे जाने का वर्णन किया । शरणागत के लिये कौश्च की मृत्यु हुई। यह आख्यान पापनाशा एवं पुण्यवर्धक है। (१२०)

श्रीवामतपुराण में बत्तीसवाँ अध्याप समाप्त ।। ३२ ।।