वामन महा पुराण
सुकेशिवृत्तान्त में भोज्य अन्नों का वर्णन, द्व्यों की शुद्धि का कथन, द्रव्यों का शोधन तथा शीच, गृहस्थ के सदाचरणों का वर्णन अभोज्यों के लक्षण, शौश्च का स्वरुप, वर्णाश्रमधर्म का वर्णन
ऋपय ऊचुः।
यच्च वर्ण्य महाबाहो सदाधर्मस्थितैर्नर।
यद्भोज्यं च समुद्दिष्टं कथयिष्यामहे वयम् ॥ १
भोज्यमन्नं पर्युपितं स्नेहाक्तं चिरसंभृतम् ।
अस्नेहा बीहयः श्लक्ष्णा विकाराः पयसस्तथा ॥२
शशकः शल्यको गोधा श्वाविधो मत्स्यकच्छपौ।
तद्वद् द्विदलशादीनि भोज्यानि मनुरब्रवीत् ।। ३
मणिरत्नप्रवालाना तद्वन्मुक्ताफलस्य च ।
शैलदास्मयानां च तृणमूलीपधान्यपि ॥ ४
शूर्पधान्याजिनाना च सहताना च वाससाम् ।
के आने के अतिरिक्त विना कारण रानि में स्नान नहीं करना चाहिये। (५३)
हे रजनीचरेश | मालिश किये हुये शरीर का स्पर्श न करे, स्नान करने के उपरान्त (तत्काल) केशों को न झाडे तथा स्नान करके हाथ एव वस्त्र से शरीर को नहीं पोंछना चाहिये। (५४)
शोभन राजा से युक्त तथा एकतायुक्त मनुष्यों वाले एव जहाँ क्रोध हीन, न्यायी, ईष्याविहीन मनुष्य हों तथा कृषक एव औषधियाँ हो-ऐसे राज्य में रहना चहिये । (५५)
बुद्धिमान् व्यक्ति को ऐसे देश में नहीं रहना चाहिये जहाँ का राजा दण्ड में सदैव रुचि रखने वाला तथा अशक्त हो और जहाँ की जनता नित्य उत्सव मनाने घाली तथा परस्पर वैर करने वाली एव सदेव जय की इच्छा (५६)
श्रीवामनपुराण में चदहवाँ अध्याय समाप्त ॥१४॥
१५
ऋपियों ने कहा-हे महाबाहो । धर्मनिष्ट व्यक्तियों के। लिये जो (पदार्थ) सदैव वर्जनीय है एवं जो भोज्य कहे गये है हम उनरा वर्णन करेंगे। (१)
स्नेहाक्त (तैल, घृत आदि स्निग्ध पदार्थों से पकाया गया) अप्न पासी एवं बहुत समय का रसा होने पर भी भोग्य है, तया अस्निग्ध चिकने चावल एव दूध के विकार (दधि, पत आदि) यासी एवं पुराने होने पर भी मक्ष्य हैं। (२)
शशक (सरहा), वाल्यक (साही), गोधा (गोह), श्वाविध (पशु विशेष), मत्य एवं कच्छप तथा दालों को मनु ने साने योग्य कहा है। (३)
मणि, रत्न, प्रवाल (मूंगा), मुसाफल (मोती), पत्थर और लकड़ी के बने वर्तन, तृण, मूल तथा औषधियों शूर्प-धान्य, अजिन (मृगचर्म ), महतवरत्र (सिले हुये
वल्कलानामशेपाणामम्बुना शुद्धिरिष्यते ।। ५
सस्नेहानामथोष्णेन तिलफस्केन वारिणा।
कार्यासिकानां वस्त्राणां शुद्धिः स्यात्सह भस्मना ।।
नागदन्तास्थिशृङ्गाणां तक्षणाच्छुद्धिरिष्यते ।
पुनः पाकेन भाण्डानां मृन्मयानां च मेध्यता ।। ७
शुचि भैक्षं कारुहस्तः पण्यं योपिन्मुखं तथा ।
रथ्यागतमविज्ञानं दासवर्गेण यत्कृतम् ॥ ८
वाक्प्रशस्तं चिरातीतमनेकान्तरितं लघु ।
चेष्टितं वालवृद्धानां बालस्य च मुखं शुचि ॥९
कर्मान्ताङ्गारशालासु स्तनधयसुताः स्त्रियः ।
वाग्विापो द्विजेन्द्राणां संतपाश्चाम्युबिन्दयः ॥ १०
भृमिर्विशुध्यते खातदाहमार्जनगोक्रमः ।
लेपादुल्लेखनात् सेकाद् वेश्म संमार्जनार्चनात् ॥ ११
केशकीटावपन्नेऽन्ने गोमाते मक्षिकान्विते ।
मृदम्बुभस्मक्षाराणि प्रक्षेपव्यानि शुद्धये ॥ १२
औदुम्बराणां चाम्लेन क्षारेण त्रएसीसयोः ।
भस्माम्युभिश्व कांस्यानां शुदिः प्लावोद्रवस्य च ॥१३
अमेध्याक्तस्य मृत्तोयैर्गन्धापहरणेन च ।
अन्येपामपि द्रव्याणां शुद्धिर्गन्धापहारतः ॥ १४
मातुः प्रत्रवणे वत्सः शकुनिः फलपातने ।
गर्दभो भारवाहित्वे श्वा मृगग्रहणे शुचिः ।। १५
रथ्याकर्दमतोयानि नावः पथि तृणानि च ।
मारुतेनैव शुद्धयन्ति पक्वेष्टकचितानि च ॥ १६
भृतं द्रोणाढकस्यान्नममेध्याभिप्लुतं भवेत् ।
अग्रमुद्धृत्य संत्याज्यं शेपस्य प्रोक्षणं स्मृतम् ॥ १७
उपवासं त्रिरात्र वा दूषितान्नस्य भोजने ।
अज्ञाते ज्ञातपूर्वे च नैव शुद्धिर्विधीयते ॥ १८
उदक्याचाननग्नाश्च सूतिकान्त्यावसायिनः ।
वस्त्र ), एवं समस्त वल्कलों की शुद्धि जल से होती है।
स्नेह ( तैलपतादि ) युक्त वस्त्रों की शुद्धि उष्ण जल तथा सिल-कल्क ( खली) से एवं कपास के वस्त्रों की शुद्धि भस्म से होती है। (६)
हाथी के दौत, हड्डी और शृङ्ग की शुद्धि तक्षण ( तराशने ) से होती है। मिट्टी के वर्तन पुन. आग मे जलने से शुद्ध होते हैं। (७)
भिक्षान्न, कारीगरों का हाथ, विक्रय यस्तु, स्त्रीमुस, मार्ग से लायी हुई वस्नु, अज्ञात पदार्थ तथा नौकरों द्वारा निमित वस्तुएँ पवित्र होती हैं। (८)
षचन द्वारा प्रशस्त, चिरातीत ( पुराना ), अनेकान्तरित एवं लघु यस्तुएँ, बालों और युद्धो द्वारा किया गया कर्म तथा शिशु का मुस शुद्ध होता है।
कर्मगृह, अन्तर्गृह एवं अग्निशाला में दुधमुंहे पुत्रों वारी, स्त्रियां, योरते हुए श्रेष्ठ मास के मुख के छोटे तथा उष्ण जलविन्दु पवित्र होते हैं। (१०)
भूमि की शुद्धि खनने से, जलाने से, झाद, देने से, गोचारण से, टीपने से, सरोंचने से तथा सींचने से होती है और गृह की शुद्धि झाद देने तथा अन से होती है। (११)
फैश, कीट एवं मक्षिायुक्त तथा गोमात अन्न की शुद्धि के लिये मिट्टी, जल, भाम और क्षार छिड़कना चाहिये। (१२)
अम्ल के द्वारा औदुम्बर (ताम्रपान) की, क्षार के द्वारा जरते और शीशे की, भस्म और जल के द्वारा काँसे की वस्तुएँ तथा (कुछ अश को ) बहा देने से तरल पदार्थ शुद्ध होते हैं।
अपवित्र वस्तु से मिश्रित पदार्थ मिट्टी और जल से तथा गन्ध दूर कर देने से शुद्ध होते हैं। अन्य पदार्थों की शुद्धि भी गन्ध दूर करने से होती है। (१४)
माता के सन को प्रस्तुत कराने मे बछड़ा, वृक्ष से फल गिराने मे पक्षी, बोझा ढोने में गया और शिकार पकड़ने में कुत्ता शुद्ध होता है। (१५)
मार्ग, कीचड़, जल, नाव, पथ पर पड़ा हुआ तृण एवं पकी हुई ईटों की चितियाँ वायु के द्वारा ही शुद्ध होती हैं। (१६)
एक द्रोण या एक आढक के पके अन्न के अविन पस्तु से संयुक्त होने पर उसके ऊपर का अंश निकाल कर फेंक देना चाहिये व शेप पर जल छिड़कने से शुद्धि मानी गयी है। (१७)
अज्ञात रूप से दूषित अन्न साने पर तीन रात्रि तक उपवास करने से शुद्धि का विधान है किन्तु जानबूत कर साने पर शुद्धि नहीं हो सकती।
स्पृष्ट्या स्नायीत शौचार्थ तथैव मृतहारिणः ॥ १९
सस्नेहमस्थि संस्पृश्य सवासा. स्नानमाचरेत् ।
आचम्यैव तु नि.म्नेह गामालम्यार्कमीक्ष्य च ॥ २०
न लायेत्पुरीपासम्ठीवनोदर्चनानि च ।
गृहादुच्छिष्टविण्मूने पादाम्भामि दिपेद् पहिः ॥ २१
पञ्चपिण्डाननुत्य न स्नायात् परवारिणि ।
स्नायीत देवसातेपु सरोदसरित्सु च ॥ २२
नोयानादी विझालेषु प्राइस्तिष्ठेन् कदाचन ।
नालपेद् जननिद्विष्टं चीरहीनां तया त्रियम् ॥ २३
देववापिसच्छास्त्रयज्ञवेदादिनिन्दकैः ।
कृत्या तु स्पर्शमालापं शुद्धयतेऽपिलोकनात् ॥ २४
अभोज्याः सूतिकापण्डमाजीरासुधकुक्कुटाः ।
पतितापविद्धनग्नाचाण्डालायधमाश्च ये ॥ २५
सुरेशिरुवाच ।
भवद्भिः कीर्तिताऽभोज्या य एते सूतिकादयः ।
अमीषां श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतो लग्णानि हि ।। २६
ऋपय ऊचुः।
ब्राह्मणी प्राह्मणस्यैव याऽवरोधत्वमागता ।
वायुमौ मूर्तिकत्युक्ती तयोरग्नं विगर्हितम् ॥ २७
न जुहोत्युचिते काले न स्नाति न ददाति च ।
पितृदेवार्चनाद्धीनः स पण्डः परिगीयते ।। २८
दम्भार्थ जपते यश्च तप्यते यजते तथा ।
न पत्रार्यमुयुक्तो स मार्जारः प्रकीर्तितः ।। २९
विभये सति नैवाति न ददाति जुहोति च ।
तमाहुरासुं वस्यान्नं भुक्त्वा कृच्छ्रेण शुद्वयति ॥ ३०
यः परेपां हि मर्माणि निकन्तन्निव भापते ।
नित्यं परगुणद्वेपी स श्वान इति कथ्यते ॥ ३१
सभागतानां यः सभ्यः पक्षपातं समाश्रयेत् ।
तमाहुः कुक्षुटं देवास्तम्याप्यन्नं दिगर्हितम् ॥ ३२
रजस्वला स्त्रो, कुत्ता, नग्न, प्रसृता स्त्री, अन्त्यावसायी (चाण्डाल ) और शरवाहको को स्पर्श कर पवित्र होने के लिये स्नान करना चाहिये। (१९)
मज्जा युक्त हड्डी छू जाने पर वस्त्र सहित स्नान करे किन्नु सूखी हडडी को स्पर्श होने पर आचमन, गोस्पर्श, तथा मूर्यदर्शन करने से ही शुद्धि होती है। (२०)
पुरीप (विष्ठ), रक्त, टीवन (थूक) एव उद्वर्तन (उबटन । का लड्डन नहीं करना चाहिए । उच्छिष्ट पदार्थ विष्ठा, मूत्र एव पैर धोने के जल को घर से बाहर फेंक देना चाहिये। (२१)
दूसरे के द्वारा निर्मित बावली इत्यादि मे विना पाँच अजलि मिट्टी निमाले स्नान न करे। देव निर्मित झीलों, सराय छोर नदियों में स्नान करे।
बुद्धिमान व्यक्ति उद्यानादि मे कदापि असमय में न रहे। लोक विद्विष्ट व्यक्ति तथा पति-पुनहीना स्त्री से वार्ता लाप नहीं करना चाहिये। (२३)
देवों, पितरों, भले शास्त्रों (स्मृति आदि), यज्ञ एव वेदादि के निन्दकों या स्पश और उनसे वार्तालाप करने पर मनुष्य सूर्यदर्शन करने से शुद्ध होता है। (२४)
सूतिका, पण्ड, मार्जार, आखु, श्वान, कुक्कुट, पतित, अपविद्ध, नग्न तथा चाण्डाल आदि अधम प्राणियों के यहाँ नहीं खाना चाहिये। (२५)
सुकेशी ने कहा-आप ने जिन सूतिकादि का अन अभक्ष्य कहा है में तत्वत उनके रक्षण सुनना चाहता (२६)
ऋपियों ने कहा-अन्य ब्राह्मण के साथ ब्राह्मणी के व्यभिचरित होने पर उन दोनों को सूतिका कहा जाता है। उन दोनों का अन्न विगहित होता है। (२७)
उचित समय पर हयन, स्नान और दान न करने वाला तथा पितरो एष देवनाओं की पूजा से रहित व्यक्ति को पण्ड कहते है। (२८)
दम्भ के लिये जप, तप और यज्ञ करने वाले तथा पर- लोकार्थे उद्योग न करने वाले व्यक्ति को 'मार्जार' कहते हैं। (२६)
ऐश्वर्य रहते हुए भोग, दान एय हवन न करने वाले को 'आखु' कहते हैं उसका अन्न खाने पर मनुष्य कृच्छव्रत करने से शुद्ध होता है। (३०)
दूसरों का मर्म भेदन करते हुए वार्तालाप करने वाले परगुणद्वेषी को 'श्वान' कहते हैं। (३१)
सभा में आगत व्यक्तियों में जो सभ्य पक्षपात करता
सपर्म यः समुत्सृज्य परधर्म समाश्रयेत् ।
अनापदि स विद्वद्भिः पतित. परिकीर्त्यते ॥ ३३
देवत्यागी पितृत्यागी गुरुभक्त्यरतस्तथा ।
गोब्राह्मणस्त्रीवधकृदपविद्ध. स कीर्त्यते ॥ ३४
येषा कुले न वेदोऽस्ति न शास्त्र नैव च नतम् ।
ते नग्ना. कीर्तिता. सद्भिस् तेषामन्नं निगर्हितम् ।। ३५
आशार्तानामदाता च दातुश्च प्रतिपेधक. ।
शरणागत यस्त्यजति स चाण्डालोऽधमो नरः ॥३६
यो यान्धः परित्यक्तः साधुभिाह्मणैरपि ।
कुण्डाशी यश्च तस्यान्नं भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ।। ३७
यो नित्यकर्मणो हानि कुर्यान्नैमित्तिकस्य च ।
मुक्त्वान्नं तम्य शुद्धघेत त्रिरात्रोपोपितो नर. ।। ३८
गणकस्य निपादस्य गणिकाभिपजोस्तथा ।
कदर्यस्यापि शुद्धयेत त्रिरात्रोपोपितो नरः ॥ ३९
नित्यस्य कर्मणो हानिः केरलं मृतजन्मसु ।
न तु नैमित्तिकोच्छेदः कर्तव्यो हि कथचन ॥ ४०
जाते पुत्रे पितुः स्नानं सचैलस्य विधीयते ।
मृते च सर्वन्धूनामित्याह भगवान् भृगुः ॥ ४१
प्रेताय सलिलं देय पहिर्दग्ध्या तु गोत्रजः
प्रथमेऽति चतुर्थे वा सममे वाऽस्थिसंचयम् ।। ४२
ऊद्धं सचयनात्तेपामङ्गस्पर्शो विधीयते
सोदकैस्तु त्रिया कार्या सशुद्धस्तु सपिण्डः ॥ ४३
विपोद्भन्धनशस्त्राम्बुवहिपातमृतेषु च ।
चाले प्रवाजि संन्यासे देशान्तरमृते तथा ॥४४
सद्यः शौचं भवेद्वीर तच्चाप्युक्तं चतुर्विधम् ।
गर्भस्रावे तदेवोक्तं पूर्णकालेन चेतरे ।। ४५
है उसे देवताओं ने 'कुक्कुट' कहा है उसका भी अन्न विग हित है। (३२)
विपत्तिकाल के अतिरिक्त अन्य समय में अपना धर्म छोद कर दूसरे का धर्म ग्रहण करने वाले को विद्वानों ने 'पतित' कहा है। (३३)
देवस्यागी, पितृत्यागी, गुरुभक्ति से विमुस, तथा गौ, ब्राह्मण एव स्त्री की हत्या करने वार को 'अपविद्ध' कहते है। (३४)
जिनके कुल में वेद, शास्त्र एव ब्रत नहीं है उन्हें सजन रोग 'नग्न' कहते हैं। उनका अन्न निन्दित है। (३५)
आशा रखने वालों को न देने याला, दाता को मना करने वाला तथा शरणागत का परित्याग करने वाला अघम मनुष्य 'चाण्डाल' कहा जाता है। (३६)
यान्धयों, साधुओं एवं ब्राह्मणों से परित्यक्त तथा वुण्ड पति के जीवित रहने पर एपुरूप से उत्पन्न पुर) के यहाँ खाने पाले का अन्न साकर घान्द्रायग व्रत करना चाहिये। (३७)
नित्य और नैमित्तिक कर्म न करने पाले व्यक्ति का अन्न साने पर मनुष्य तीन रात तक उपवास करने से शुद्ध होता है। (३८)
गणक (ज्योठिपी), निषाद, वेश्या, पेय तया कदयं
(कृपण ) का भी अन्न साने पर मनुष्य निराजोपवास से शुद्ध होता है। (३६)
घर में जन्म या मृत्यु होने पर नित्य कर्म नहीं होता किन्तु नैमित्तिक कर्म का उच्छेद कभी नहीं करना चाहिये।(४०)
भगवान् भृगु ने कहा है कि पुत्र उत्पन्न होने पर पिता के लिये एव मरण में सभी घन्धुओं के लिये वस्त्र के साथ स्नान का विधान है। (४१)
ग्राम के बाहर शवदाह करने के उपरान्त सगोत्र लोग प्रेत के उद्देश्य से जलदान करें तथा प्रथम, चतुर्थ या सतम दिन अस्थि सचय करें।
अस्थिसन्नय के उपरान्त उनके अद्ग-पर्श का विधान है। शुद्ध होकर सोदक (चौदह पीढ़ी के अन्तर्गत फे रोग) एव सपिण्डज ( सात पीढ़ी के अन्दर के लोग ) जनों को ऊध्य दैहिक क्रिया करनी चाहिये । (४३)
हे पीर । पिप, पन्धन, शरत्र, जल, अग्नि और गिरने से मृत्यु होने पर तथा वालक, परिग्राजक, सन्यासी एय देशान्तर में मृत्यु होने पर सब शौच होता है । यह (सद्य शौच ) भी चार प्रकार का कहा गया है। गर्भस्रार में भी धैसी ही शुद्धि होती है। अन्य अशीच पूरे समय पर शुद्ध होते हैं। (४५-४५)
ब्राह्मणानामहोरानं क्षत्रियाणां दिनत्रयम् ।
पात्रं चैव वैश्यानां शूद्राणां द्वादशाह्निकम् ।। ४६
दशद्वादशमासार्द्धमाससस्यैदिनैश्च तैः ।
स्माः स्याः कर्मक्रियाः कुर्युः सर्वे वर्णा यथाक्रमम् ॥ ४७
प्रेतमुदिश्य कर्त्तव्यमेकोदिष्टं विधानतः ।
सपिण्डीकरण कार्य प्रेते आवत्सरामरैः ॥ ४८
तत. पितृत्वमापन्ने दर्शपूर्णादिभिः शुभैः।
श्रीणनं तम्य कर्त्तव्य यथा श्रुतिनिदर्शनात् ।। ४९
पितुरथं समुद्दिश्य भूमिदानादिकं स्वयम् ।
कुर्यायनाम्य सुप्रीताः पितरो यान्ति राक्षस ॥५०
यद् यदिष्टतमं किंचिद् यच्चास्य दयितं गृहे |
तत्तद् गुणवते देय तदेवाश्यमिच्छता ।। ५१
अध्येतच्या त्रयी नित्यं भाव्यं च चिदुपा सदा ।
धर्मतो धनमाहार्य यष्टव्यं चापि शक्तितः ॥ ५२
यच्चापि कुर्वतो नात्मा जुगुप्सामेति राक्षस ।
तत् कर्त्तव्यमशङ्केन यन्न गोप्यं महाजने ॥ ५३
एवमाचरतो लोके पुरुषस्य गृहे सतः ।
धर्मार्थकामसंप्रामिः परस्त्रेह च शोभनम् ॥ ५४
एप तूदेशतः प्रोक्तो गृहस्थाश्रम उत्तमः ।
वानप्रस्थाश्रमं धर्म प्रवक्ष्यामोऽवधार्यताम् ॥ ५५
अपत्यसंततिं दृष्ट्वा प्राज्ञो देहस्य चानतिम् ।
वानप्रस्थाश्रमं गच्छेदात्मनः शुद्धिकारणम् ।। ५६
तत्रारण्योपभोगैश्च तपोभिश्वात्मकर्षणम् ।
भूमी शय्या ब्रह्मचर्य पितृदेवातिथिक्रिया ॥ ५७
होमस्त्रिपरणं म्नानं जटावल्कलधारणम् ।
वन्यम्नेहनिपेवित्व वानप्रस्थरिधिस्त्वयम् ।। ५८
सर्वसङ्गपरित्यागो ब्रह्मचर्यममानिता ।
जितेन्द्रियत्वमावासे नैकस्मिन् वसतिश्चिरम् ॥ ५९
( बद्द सद्यः शौच ) ब्राह्मणों या एक अहोरात्र का, क्षत्रियों का तीन दिनों का, वैश्यों का छ दिनों का एय शूद्रों का धारह दिनों का होता है। (४६)
सभी यगों के लोग यथाक्रम दश, यारह, पन्द्रह दिन एवं एक मासके अन्तर पर अपनी अपनी क्रियाएँ करें। (४७)
प्रेत के उद्देश्य से विधि के अनुसार एकोद्दिष्ट श्राद्ध करना चाहिये । मरने के एक वर्ष यीत जाने पर मनुष्य को सपिण्डीकरण करना चाहिये। (४८)
तदनन्तर प्रेत के पितर हो जाने पर अमावस्या और पूर्णमासी के दिन वेदविहित रीति से उनका तर्पण (श्राद्ध) करना चाहिये।
हे राक्षस । पिता के उद्देश्य से स्वय भूमिदानादि परे जिससे पितृगण इस के उपर प्रसन्न होकर (५)
व्यक्ति की जोयितावस्या में घर में जो-जो पदार्थ उसग अत्यन्त अभिलपित एवं जो उसी प्रिय यस्तु रही हो उसे उसकी अश्यता की कामना से गुणान पात्र को देना चाहिये। (५१)
सदा यी (वेद) का अध्ययन करना चाहिये, विद्वान बनना पाहिये, धर्मपूर्वक धनार्जन एवं यया. शक्ति यज्ञ करना चाहिये।
हे राक्षस । मनुष्य को ऐसा कार्य नि शङ्क होकर करना जिसके करने से उसको आत्मा निन्दित न हो एवं जो कार्य घड़े लोगों से छिपाने योग्य न हो। (५३)
ऐसा आचरण करने याने पुरुप के गृहस्थ होने पर भी उसे धर्म, अर्थ एवं काम की प्राप्ति होती है तथा वह व्यक्ति इसलोक और परलोक मे कल्याण का मागीबनता है। (५४)
सक्षेप से हमने उत्तम गृहरयाश्रम का वर्णन किया । अब हम लोग वानप्रस्थाश्रम के धर्म का वर्णन करेंगे। ध्यानपूर्वक सुनो।
बुद्धिमान व्यक्ति पुन की संतान तथा अपने शरीर की अवनति देसकर आत्मा की शुद्धि फे हेतुभूत यानप्रस्य आश्रम में जाय।
यहाँ वन्य पदार्थों का उपभोग और तप द्वारा शरीरोपण करे। इस आम भूमि पर शयन, प्रवचर्ष का पालन एव पितर, देवता तथा अतिथियों की पूजा (१७)
हवन, तीन चार स्नान, जटा और वल्कल काधारण तथा यन्य पलों से निकाझे स्नेह या सेवन करे । यही धान- प्रस्थाश्रम की विधि है। (५८)
(पतुर्य आगम के धर्म ये हैं.)सर्वसह परित्याग, ब्रह्मचर्य, अहंकार का अमात्र, जिसेन्द्रियता, एक आयास में बहुत
अनारम्भस्तथाहारो मैशनं नातिकोपिता।
आत्मज्ञानावयोधेच्छा तथा चात्मावबोधनम् ॥ ६०
चतुर्थे त्वाश्रमे धर्मा अस्माभिस्ते प्रकीर्तिताः ।
वर्णधर्माणि चान्यानि निशामय निशाचर ।। ६१
गार्हस्थ्यं ब्रह्मचर्य च वानप्रस्थं त्रयाश्रमाः ।
क्षत्रियस्यापि कथिता ये चाचारा द्विजस्य हि ॥ ६२
वैखानसत्वं गार्हस्थ्यमाश्रमद्वितयं विशः ।
गार्हस्थ्यमुत्तमं त्वेकं शूद्रस्य क्षणदाचर ।। ६३
स्वानि वर्णाश्रमोक्तानि धर्माणीह न हापयेत् ।
यो हापयति तस्यासौ परिकुप्यति भास्करः ॥ ६४
कुपितः कुलनाशाय ईश्वरो रोगवृद्धये ।
भानु यतते तस्य नरस्य क्षणदाचर ॥ ६५
तस्मात् स्वधर्म न हि संत्यजेत
न हापयेचापि हि नात्मवंशम् ।
यः संत्यजेचापि निजं हि धर्म
तस्मै प्रकुप्येत दिवाकरस्तु ॥ ६६
पुलस्त्य उवाच ।
इत्येवमुक्तो मुनिभिः सुकेशी
प्रणम्य तान् ब्रह्मनिधीन् महीन् ।
जगाम चोत्पत्य पुरं स्वकीयं
मुहुर्मुहुर्धर्ममवेक्षमाणः ॥ ६७
इति श्रीवामनपुराणे पञ्चशोऽध्याय ॥ १५ ॥
काल तक न रहना, उद्योगाभाव, भिक्षान्नभोजन, अतिकोप न करना, आत्मज्ञान की इच्छा तथा आत्मज्ञान । (५९-६०)
हे निशाचर ! हमने तुमसे चतुर्थ आश्रम के इन धर्मों का वर्णन किया । अव अन्य वर्णधर्मों को सुनो। (६१)
क्षत्रियों के लिये भी गार्हस्थ्य, ब्रह्मचर्य एवं वानप्रस्थ इन तीन आश्रमों एवं ब्राह्मणों के लिये विहित आचारों का विधान है। (६२)
हे राक्षस! वैश्यों के लिये यानप्रस्थ एवं गार्हस्थ्य इन दो आश्रमों का विधान है तथा शूद्र के लिये एकमात्र उत्तम गाईस्थ्य आनम पा विधान है। (६३)
अपने यर्णाश्रमोक्त धर्मों का इस लोक में त्याग नहीं करना चाहिये। इनका त्याग करने वाले पर सूर्य क्रुद्ध
होते हैं। (६४)
हे निशाचर । क्रुद्ध भगवान भास्कर मनुष्य की रोग- वृद्धि एव उसके कुल का नाश करने के लिये प्रयत्न करते हैं। (६५)
अत स्वधर्म का न तो त्याग करे और न उसकी हानि होने दे तथा अपने वश की हानि न होने दे। जो मनुष्य अपने धर्म का त्याग करता है उस पर दिवाकर (सूर्य) क्रोध करते हैं। (६६)
पुलस्त्य ने कहा-मुनियों के ऐसा कहने के उपरान्त उन ब्रह्मज्ञानी महर्षियों को प्रणाम कर सुकेशी पारम्बार धर्म का चिन्तन करते हुए उड़कर अपने पुर को चला गया। (६७)
श्रीवामनपुराण में पद्रहवाँ अध्याय समाप्त ॥१५॥