वामन महा पुराण
सरोमाहात्म्ये 18 कुरुक्षेत्र के तीर्थ(पूर्वानुवृत्त)
लोमहर्पण उवाच ।
तवस्त्वौशनसं तीर्थ गच्छेत्तु श्रद्धयान्वितः ।
उशना यत्र संसिद्धो ग्रहत्वं च समाप्तवान् ॥ १
तस्मिन् स्नात्वा विमुक्तस्तु पातकर्जन्मसभवैः ।
ततो याति परं ब्रह्म यस्मानावर्तते पुनः ॥ २
रहोदरो नाम मुनिर्यत्र मुक्तो बभूव ह ।
महवा शिरसा ग्रस्तवस्तीर्थमाहात्म्यदर्शनाद ॥ ३
सपय ऊचुः ।
कथं रहोदरो ग्रस्त, कथं मोक्षमवाप्तवान् ।
तीर्थस्य तस्य माहात्म्यमिच्छामः श्रोतुमादरात् ॥ ४
लोमहर्षण उवाच ।
पुरा चै दण्डकारण्ये राघवेण महात्मना ।
वसता द्विजशार्दूला राक्षसास्तत्र हिंसिताः ॥५
तकस्य शिरश्छिन्नं राक्षसस्य दुरात्मनः ।
आपकी कृपा से सभी देवगण निर्भय होकर आनन्दित होते हैं। इस प्रकार महादेव की स्तुति करने के अनन्तर ऋषि ने प्रणाम कर कहा- (१९)
हे भगवन् । आपकी कृपा से मेरे तप का क्षय न हो।
तदनन्तर महादेव ने प्रसन्न होकर उन ऋषि से यहवचन कहा।(२०)
ईश्वर ने कहा--हे विप्र । मेरी कृपा से तुम्हारी तपस्या सहस्र प्रकार से बढे। मैं तुम्हारे साथ इस आश्रम में सदा निवास करूँगा। (२१)
जो मनुष्य इस सप्त सारस्वत मे स्नान कर के मेरो पूजा करेगा उसे इस लोक और परलोक मे कुछ भी दुर्लभ नहीं होगा। यह निस्सन्देह सारस्वत रोकको जायेगा एव (मुझ) शिव के अनुप्रह से परम पद प्राप्त करेगा। (२२-२३)
श्रीवामनपुराण के सरोमाहात्म्य में सत्रहवाँ अध्याय समाप्त ॥१७॥
लोमहर्षण ने कहा-तदनन्तर श्रद्धान्वित होकर औशनस तीर्थ में जाना चाहिये, जहाँ उशना (शुक्र) ने सिद्धि प्राप्त कर महत्व प्राप्त किया था।
वहाँ स्नानकर पुरुष विभिन्न जन्मों के पातकों से विमुक्त होकर परब्रह्म को प्राप्त करता है जहाँ से उसे पुन लौटनो नहीं पड़ता। (२)
वहाँ तीर्थ-दर्शन के माहात्म्य से महान् शिर से प्रस्त रहोदर नामक मुनि मुक्त हुए थे। (३)
ऋषियों ने कहा-रहोदर मुनि कैसे (शिर से)प्रस्त हुयेथे एव वे कैसे मुक्त हुए ? हम लोग उस तीर्थ के माहात्म्य को आदर पूर्वक सुनना चाहते हैं। (४)
लोमहर्पण ने कहा-हे द्विजश्रेष्टो ! प्राचीन काल में दण्डकारण्य में रहते हुए महात्मा राघव ने राक्षसों का वध किया। (५)
क्षुरेण शिवधारेण तत् पपात महावने ॥ ६
रहोदरस्य तल्लानं जड्डायां वै यदृच्छया ।
पने विचरतरतत्र अस्थि भित्त्या विवेश ह ।। ७
स तेन लग्नेन तदा द्विजातिनं शशाक है।
अभिगन्तुं महाप्राज्ञस्तीर्थान्यायतनानि च ॥ ८
स पूतिना विस्रवता वेदनात्तों महामुनिः ।
जगाम सर्वतीथानि पृथिव्यां यानि कानि च ॥ ९
ततः स कथयामास ऋषीणां भावितात्मनाम् ।
तेऽघुवन् ऋपयो विनं प्रयाह्यौशनसं प्रति ॥ १०
तेषां तद्वचनं श्रुत्वा जगाम स रहोदरः ।
ततस्त्वौशनसे तीर्थे तस्योपस्पृशतस्तदा ।। ११
तच्छिरचरण मुक्त्या पपातान्तनले द्विजाः ।
ततः स विरजो भूत्वा पूतात्मा बीतकल्मषः ॥ १२
आजगामाश्रमं प्रीतः कथयामास चाखिलम् ।
ते ते श्रुत्या ऋषयः सर्वे तीर्थमाहात्म्यमुत्तमम् ।
कपालमोचन मिति नाम चक्रुः समागवाः ।। १३
तत्रापि सुमहत्तीथ विश्वामित्रस्य विश्रुतम् ।
ब्राह्मण्यं लब्धवान् यत्र विधामित्रो महामुनिः ॥१४
तस्मिस्तीर्थवरे स्नात्या ब्राह्मण्यं लभते ध्रुवम् ।
ब्राह्मणस्तु पिशुद्धात्मा परं पदमवाप्नुयात् ॥ १५
तत. प्रथूदक गच्छेनियतो नियवाशनः ।
तत्र सिद्धस्तु ब्रह्मपी रुपड्गुर्नाम नामतः ।। १६
जातिम्मरो रुपड्गुम्तु गङ्गाद्वारे सदा स्थितः ।
अन्तकालं ततो दृष्ट्वा पुत्रान् वचनमब्रवीत् ।
इह श्रेयो न पश्यामि नयघं मां पृथदकम् ॥ १७
विज्ञाय वस्य तद्भाव रसङ्गोस्ते तपोधनाः।
त वै तीर्थे उपानिन्युः सरस्वत्यास्तपोधनम् ।। १८
स तैः पुत्रः समानीत. सरस्वत्या समाप्लुतः ।
स्मृत्वा वीर्थगुणान् सर्वान् प्राहेदमृपिसत्तमः ।। १९
सरस्वत्युत्तरे तीर्थे यस्त्यजेदात्मनस्तनुम् |
पथदके जप्यपरो नूनं चामरतां ब्रजेत् ॥ २०
तत्रैव ब्रह्मयोन्यम्ति ब्रह्मणा यत्र निर्मिता ।
वहाँ एक दुरात्मा राक्षस का शिर तीव्रधार वाले क्षुर बाण से कटकर उस महावन में गिरा। सयोगवश यह वन में विचरण कर रहे रहोदर मुनि की जघा में हड्डी को तोड़कर सलग्न हो गया। (७)
वह महाप्राज्ञ ब्राह्मण उस मस्तक के ला जाने से तीर्थों और देवालयों में नहीं जा पाते थे। (८)
दुर्गन्धपूर्ण स्राव से वेदनात वे महामुनि पृथ्वी के समस्त वीथों मे गये। (६)
तदनन्तर उन्होंने पवित्र ऋषियों से (अपना वृत्तान्त) कहा। ऋषियों ने विप्र से कहा-औशनस (तीर्थ) मे जाओ। (१०)
हे द्विजो। उनका यह वचन सुनकर रहोदर यहाँ से औश- नस तीर्थ में गये (व उसके (जल का) स्पर्श करते ही यह मस्तक उनके चरणों को छोड़कर जल मे गिर गया। तदनन्तर वे मुनि निर्मल, पवित्रात्मा एवं पाप- रहित होकर प्रसन्नता पूर्वक आश्रम में आए एच (शपियों से) समस्त (वृत्तान्त ) कहा । उन सभी समागत पियों ने उत्तम तीर्थ के माहात्म्य को सुनार (उस तीर्थ का) 'कपाल मोचन नाम रक्खा। (११-१३)
यहीं विश्वामित्र का विख्यात महान् तीर्थ है । जहाँ पर महामुनि विश्वामित्र ने ब्राह्मणत्व प्राप्त किया था। (१४)
उस श्रेष्ठ तीर्थ मे स्नान करने से मनुष्य निश्चय ही ब्राह्मगत्व को प्राप्त करता है तथा विशुद्धात्मा ब्राह्मण परं पद की प्राप्ति करता है। तदनन्तर नियमपूर्वक नियताशी होकर पृथूक तीर्थ मे जाना चाहिये । यहाँरुपगु नामक ब्रदापि सिद्ध हुए थे। (१६)
सदा गगाद्वार में रहने वाले जातिस्मर रुपनु नै अन्त-काल उपस्थित देखकर पुत्रों से कहा- यहाँ में कल्याण नहीं देसना । मुझे पृथूदक में ले चलो। रुपगु के उस भाव को जानार वे वपरवी उन तपोधन को सरस्वती के तीर्थ मे ले गए। (१८)
उन पुत्रों द्वारा समानीत ऋषिश्रेष्ठ ने सरस्वती में स्नान करने के उपरान्त समस्त तीर्थगुणों का स्मरण कर यह फहा-सरस्वती के उत्तरस्थ पृथूदक तीर्थ में शरीर-त्याग करने याला जपपरायण मनुष्य निश्चय ही देवत्व प्राप्त करता है। (१९-२०)
वहीं ब्रह्मा द्वारा निर्मित ब्रह्मयोनि तीर्थ है जहाँ सरस्वती के किनारे अवस्थित पृथूदक में स्थित हो ब्रह्मा चातुर्वण्य की
पृथदकं समाश्रित्य सरस्वत्यास्तटे स्थितः ॥ २१
चातुर्वर्ण्यस्य सृष्ट्यर्थमात्मज्ञानपरोऽभवत् ।
वस्याभिध्यायतः सृष्टिं ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः ॥ २२
मुखतो ब्राह्मणा जाता बाहुभ्यां क्षत्रियास्तथा ।
ऊरुभ्यां वैश्यजातीयाः पद्यां शूद्रास्ततोऽभवन् ।। २३
चातुर्वण्यं ततो दृष्ट्वा आश्रमस्थं ततस्ततः ।
एवं प्रतिष्ठित तीर्थ प्रायोनीति संज्ञितम् ॥ २४
वत्र स्नात्वा मुक्तिकामः पुनोनिं न पश्यति ।
तत्रैव तीर्थ विख्यातमवकीर्णेति नामतः ।। २५
यस्मिन् तीर्थे यको दाल्भ्यो धृतराष्ट्रममर्पणम् ।
जुहाव वाहनैः सार्ध तत्रायुध्यत् ततो नृपः ॥ २६
रुपय ऊचुः।
कथं प्रतिष्ठितं तीर्थमवकीर्णेति नामतः ।
धृतराष्ट्रेण राज्ञा च स झिमर्थ प्रसादितः ।। २७
लोमहर्षण उवाच
ऋपयो नैमिषेया ये दक्षिणार्थ ययुः पुरा ।
तत्रैव च षको दाल्भ्यो धृतराष्ट्रमपाचत ॥ २८
तेनापि तत्र निन्दार्थमुक्तं पश्वनृतं तु यत् ।
वतः क्रोधेन महता मांसमुत्कृत्य तत्र ह ।। २९
पृथूदके महातीर्थे अवकीर्णेति नामतः ।
जुहाव धृतराष्ट्रस्य राष्ट्र नरपतेस्ततः ॥ ३०
हयमाने तदा राष्ट्र प्रवृत्ते यज्ञकर्मणि ।
अक्षीयत ततो राष्ट्र नृपतेर्दुष्कृतेन वै ॥ ३१
वतः स चिन्तयामास ब्राह्मणस्य निचेष्टितम् ।
पुरोहितेन सयुक्तो रत्नान्यादाय सर्वशः ॥ ३२
प्रसादनार्थ विप्रस्य धवकीर्ण ययौ तदा ।
प्रसादितः स राज्ञा च तुष्टः प्रोवाच तं नृपम् ।। ३३
माझगा नायमन्तव्याः पुरुपेण विजानता।
अयज्ञातो ब्राह्मणस्तु हन्यात् त्रिपुरुष कुलम् ॥ ३४
एवमुक्त्वा स नृपति राज्येन यशसा पुनः ।
उत्थापयामास ततस्तस्य राज्ञो हिते स्थित. ॥ ३५
तस्मिस्तीर्थे तु यः स्नाति श्रदधानो जितेन्द्रियः ।
सृष्टि हेतु आत्मज्ञान मे तत्पर हुये थे । अव्यक्तजन्मा ब्रह्मा के सृष्टि का चिन्तन करने पर उनके मुख से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिय, दोनों अरुओं से वैश्य जाति के लेग और दोनों पैरों से शूद्र उत्पन्न हुये। (२१-२३)
तदनन्तर उन्होंने चातुर्वर्ण्य को विभिन्न आश्रमों मे स्थित हुआ देखा ब्रह्मयोनि नामक तीर्थ की इस प्रकार प्रतिष्ठा हुई थी। (२४)
वहाँ स्नान करने से मुक्तिकामी व्यक्ति पुनर्जन्म नहीं देखता। वहीं अवकीर्ण नामक विख्यात तीर्थ है। जहाँ पर दालभ्य (दल्भ या दल्मि गोत्र में उत्पन्न) वक नामक ऋपि ने क्रोधी धृतराष्ट्र को वाहन के साथ हवन कर दिया श एव तत्पश्चात् राजा को ज्ञान हुआ (२५-२६)
ऋषियों ने कहा-अबकोण नामक तीर्थ कैसे प्रतिष्ठित हुआ एव राजा धृतराष्ट्र ने उसे (दाल्भ्य वकको) क्यों प्रसन्न किया था? (२७)
लोमहर्पण ने कहा-प्राचीनकाल में नैमिषारण्यवासी ऋषि लोग दक्षिणा हेतु ( राजा धृतराष्ट्र के यहाँ गए)।
वहाँ दल्भिवशीय धक ऋषि ने धृतराष्ट्र से याचना की।(२८)
उसने भी निन्दार्थक प्राम्य और असत्य बात कही। तदनन्तर वे (धरुदाल्भ्य ) अत्यन्त क्रोधपूर्वक मास काट कर पृथूदक मे स्थित अवकीर्ण नामक त थे में राजा धृतराष्ट्र के राष्ट्र का हवन करने लगे। (२६-३०)
यज्ञ में राष्ट्र का हवन प्रारभ होने पर राजा के दुष्कर्म से राष्ट्र का क्षय होने लगा। (३१)
तदनन्नर उसने विचार किया और इसे ब्राह्मण का कर्म जान समस्त रत्नों को लेकर पुरोहित के साथ विप्र को प्रसन्न करने के लिये अवकीर्ण तीर्थ में गया। राजा द्वारा प्रसन्न किये जाने पर उन्होंने प्रसन्न होकर राजा से कहा-विद्वान् मनुष्य को ब्राह्मण की अवमानना नहीं करनी चाहिये । अपमानित ब्राह्मण मनुष्य के कुल के तीन पुरुषों (पीढियों) का नाश कर देता है। (३२-३४)
ऐसा कह कर उन्होंने पुन राजा को राज्य एव यश के साथ उत्थापित कर दिया तथा उस राजा के हित. कारी हो गए। (३५)
उस तीर्थ में श्रद्धापूर्वक स्नान करने वाला जितेन्द्रिय
स प्राप्नोति नरो नित्यं मनसा चिन्तितं फलम् ॥ ३६
सत्र तीर्थ सुविरयातं यायातं नाम नामतः ।
यस्येह यजमानस्य मधु सुस्राव पै नदी ॥ ३७
तस्मिन् स्नातो नरो भक्त्या मुच्यते सर्वकिल्निपैः ।
फलं प्राप्नोति यज्ञस्य अश्वमेधस्य मानवः ॥३८
मधुसवं च तत्रैव तीर्थ पुण्यतमं द्विजाः ।
तस्मिन् स्नात्वानरो भक्त्यामधुनातर्पयेत् पितॄन् ॥३९
तत्रापि सुमहत्तीर्थ वसिष्ठोद्वाहसंज्ञितम् ।
तत्र स्नातो भक्तियुक्तो वासिष्ट लोकमाप्नुयात् ॥ ४०
इति श्रीवामनपुराणे सरोमाहात्म्ये अष्टादशोऽध्याय ॥१८॥