11 मार्कण्डेयकृत सरस्वती की स्तुति मार्कण्डेय द्वारा सरस्वती से कुरुक्षेत्र प्रवेश के लिए प्रार्थना

ऋपय ऊचुः।

कथमेपा समुत्पन्ना नदीनामुत्तमा नदी ।

सरस्वती महाभागा कुरुक्षेत्रप्रवाहिनी ॥ १

कथं सरः समासाद्य कृत्वा तीर्थानि पार्श्वतः ।

प्रयाता पश्चिमामाशां दृश्यादृश्यगतिः शुभा ।

एतद् विस्तरतो ब्रूहि तीर्थवंशं सनातनम् ॥२

लोमहर्पण उवाच ।

प्लक्षवृक्षात् समुद्भूता सरिच्छेष्टा सनातनी ।

सर्वपापक्षयकरी स्मरणादेव नित्यशः ।। ३

सैपा शैलसहस्राणि विदार्य च महानदी ।

प्रविष्टा पुण्यतोयौपा वनं द्वैतमिति स्मृतम् ।। ४

तस्मिन् प्लक्षे स्थितां दृष्ट्या मार्कण्डेयो महामुनिः ।

प्रणिपत्य तदा मूर्ना तुष्टावाथ सरस्वतीम् ॥ ५

त्वं देवि सर्वलोकानां माता देवारणिः शुभा ।

सदसद् देवि यत्किचिन्मोपदाय्यर्थवत् पदम् ॥ ६

तत् सर्व त्वयि संयोगि योगिवद् देवि संस्थितम् ।

अक्षरं परमं देवि यत्र सर्व प्रविष्ठिवम् ।

अक्षरं परमं ब्रह्म विश्वं चैतत् क्षरात्मकम् ॥७

करता है। (९०)

(इसको सुनने से) ब्राह्मण को वेद की प्राप्ति होती है, क्षत्रिय पृथ्वी की जय प्राप्त करता है तथा वैश्य को धन समृद्धि एवं शूद्र को सुख की प्राप्ति होती है। वामन का माहात्म्य सुनने से पापों से मुक्ति होती है।(११)

श्रीवामनपुराण के सरोमाहात्म्य मे दसवाँ अध्याय समाप्त ॥१०॥

ऋषियों ने पूछा-कुरुक्षेत्र में प्रवाहित होने वाली नदियों में श्रेष्ठ महाभागा यह सरस्वती नदी कैसे उत्पन्न हुई ?

सरोवर मे जाकर पार्यों में तीर्थों की सृष्टि करते हुये दृश्याश्य गति से यह शुम नदी किस प्रकार पश्चिम दिशा को गई ? विस्तारपूर्वक इस सनातन तीर्थ यश (परम्परा- क्रम, विस्तार) का वर्णन करे। (२)

लोमहर्षण ने कहा-स्मरणमात्र से नित्य सर्वपापचय परने वाली यह सनातनी श्रेष्ठ नदी प्लक्षवृक्ष से समुद्भूत हुई है। (३)

यह पुण्य सलिला महानदी हजारों पर्वनों को विदारित कर द्वैतनाम से प्रसिद्ध वन मे प्रविष्ट हुई। (४)

महामुनि मार्कण्डेय ने उस प्लझ मे सरस्वती को रियत देसकर शिर से प्रणाम करने के उपरान्त उसकी स्तुति की- (५)

हे देवि! आप सर्वलोकों की माता एव देवों की शुभ अरणि (उत्पादक - जननी) है। हे देवि ! समस्त सद्, असद्, मोक्षदायी एव अर्थयुक्त पद योगयुक्त पदार्थ, की भाँति आप मे सयुक्त होकर स्थित हैं। हे देवि । अक्षर परम ब्रह्म, तथा यह विनाशशील विध आप में प्रतिष्ठित है। (६-७)

दारुण्यवस्थितो वहि मौ गन्धो यथा ध्रुवम् ।

तथा त्वयि स्थितं ब्रह्म जगच्चेदमशेपतः ॥ ८

ॐकाराक्षरसंस्थानं यत् तद् देवि स्थिरास्थिरम् ।

तत्र मात्रात्रयं सर्वमस्ति यद् देवि नास्ति च ।। ९

त्रयो लोकास्त्रयो वेदास्त्रविद्यं पावकत्रयम् ।

त्रीणि ज्योतीपि वर्गाश्च त्रयो धर्मादयस्तथा ॥ १०

त्रयो गुणास्त्रयो वर्णास्त्रयो देवास्तया क्रमात् ।

त्रैधातवस्तथाऽवस्थाः पितरश्चैवमादयः॥ ११

एतन्मात्रात्रयं देवि तर रूपं सरस्मति ।

विभिन्नदर्शनामायां ब्रह्मणो हि सनातनीम् ॥ १२

सोमसंस्था हवि.संस्था पाकसंस्था सनातनी।

तास्त्वदुच्चारणाद् देवि क्रियन्ते ब्रह्मवादिभिः ॥ १३

अनिर्देश्यपदं त्वेतदर्डमात्राश्रितं परम् ।

अविकार्यक्षयं दिव्य परिणामयिवर्जितम् ॥ १४

तौवत् परमं रूपं यन शक्य मयोदितुम् ।

न चास्येन न वा जिह्वाताल्योष्ठादिभिरुच्यते ॥ १५

स विष्णुः स वृपो ब्रह्मा चन्द्रार्कज्योतिरेव च ।

विश्वावास विश्वरूपं विश्वात्मानमनीश्वरम् ।। १६

सायसिद्धान्तवेदोक्तं बहुशाखान्थिरीकृतम् ।

अनादिमध्यनिधनं सदसच सदेव तु ॥ १७

एक त्वनेकधाप्येकमाववेदसमाश्रितम् ।

अनाख्यं पड्गुणाख्यं च पहाख्यं त्रिगुणाश्रयम् ॥ १८

नानाशक्तिविभायज्ञं नानाशक्तिविभावकम् ।

सुखात् सुसं महत्सौख्यं रूपं तत्त्वगुणात्मकम् ।। १९

एवं देवि त्वया व्या सकलं निष्फलं च यत् ।

अद्वैतापस्थितं ब्रह्म यच द्वैते व्यवस्थितम् ॥ २०

येऽर्था नित्या ये विनश्यन्ति चान्ये

येाः स्थूला ये तथा सन्ति सूक्ष्माः ।

ये वा भूमौ येऽन्तरिक्षेऽन्यतो वा

तेषां देवि त्वत्त एयोपलब्धिः ॥ २१

जिस प्रकार काष्ठ में वह्रि एक भूमि मे गन्ध की शाश्वत स्थिति होती है उसी पकार तुम्हारे भीतर ब्रह्म एव यह सम्पूर्ण जगत् स्थित है। (८)

हे देवि। जो कुछ भी स्थिर तथा अस्थिर है वह सब ओंकार अझर में स्थित है। जो कुछ भी अस्ति या नास्ति है उन सब मे ओंकार की तीन मात्रायें अनुस्यूत है। (९)

(भू, भुव , स्व) तीनों लोक, (ऋक् , यजु , साम) तीन वेद, (आयुर्वेद, धनुर्वेद, गान्धर्व) तीन विद्याय, (गाईपत्य, आवहनीय, दक्षिणाग्नि) तीन अग्नियाँ, (सूर्य, चन्द्र, अग्नि) तीनों ज्योतियाँ, (धर्मादि) तीन वर्ग, (सत्यादि) तीनों गुण, (ब्राह्मणादि) तीनों वर्ण, तीनों देव, (वात, पित्त, कफ) तीनों धातुएँ तथा (जाप्रत, स्वप्न, सुपुप्ति), तीन अवस्थायें एव वोन (पिता आदि) पितर आदि ये सभी माना प्रय, हे सरस्वति । आप के रूप है। आप को ब्रह्मकी विभिन्न रूपों वाली आद्या एव सनातनी (मूर्ति कहा जाता है)। (१०-१२)

हे देवि । ब्रह्मवादी लोग आप के नाम का उच्चारण करके सोमसस्था, इवि सस्था एव सनातनी पाक्सस्था को करते हैं। (१३)

अर्धमात्रा में आश्रित आप का यह अनिदेश्य पद अविकारी, अक्षय, दिव्य तया अपरिणामी है। (१४)

यह आप का अनिर्देश्य पद परम रूप है जिसका वर्णन में नहीं कर सकता। न तो मुस से ही इस वर्णन हो सकता है और न जिह्वा, तालु, ओष्ठादि से ही। (१५)

तुम्हारा यह रूप ही विष्णु, वृप (धर्म) ब्रह्मा, चन्द्रमा, सूर्य एव ज्योति है। उसी को विश्वावास, विश्वरूप, विश्वात्मा एव अनीश्वर (स्वतन्त्र) कहते हैं। (१६)

आप का यह रूप साख्य सिद्धान्त तथा वेद द्वारा पर्णित, बहुत सी शाखाओं द्वारा स्थिर किया हुआ, आदि मध्य अन्त विहीन, सम्-असत् तथा एकमात्र सत् है। (१७)

यह एक तथा अनेक प्रकार का, वेदों द्वारा एकाप भक्ति से आश्रित, आख्या विहीन, ऐश्वर्यादि पड्गुणों से युक्त, बहुत सी आख्याओं वाला तथा निगुणाश्रय है। (१८)

आप का यह तत्त्वगुणात्मक रूप नाना शक्तियों के विभाव (उद्भव) को जानने वाला, तथा नाना शक्तियों का विभावर (जनक) है। वह सुखों से बढकर सुख तया महत्सुस है। (१६)

हे देवि । इस प्रकार से अद्वैत तथा द्वेद मे आनित निष्फल तथा सफल ब्रह्म आप के द्वारा व्याप्त है। (२०)

हे देवि ! जो पदार्थ नित्य है तथा जो विनष्ट हो जाने वाले है, जो पदार्थ स्थूल है तथा जो सूक्ष्म है, जो भूमि पर हैं तथा जो अन्तरिक्ष में है या जो अन्यत्र है उन समस्त पदार्थों की उपलब्धि आप से ही होती है। (२१)

यद्वा मृत यदमूर्त समस्त

यद्वा भूतेष्वेकमेकं च किंचित् ।

यच द्वैते व्यस्तभूतं च लक्ष्य

तत्संबडूं त्वत्स्वयंञ्जनैश्च ॥ २२

एवं स्तुता तदा देवी विष्णोजिहा सरस्वती ।

प्रत्युवाच महात्मानं मार्कण्डेयं महामुनिम् ।

यत्र त्वं नेष्यसे विप्र तर यास्याम्यतन्द्रिता ॥ २३

मार्कण्डेय उवाच ।

आयं ब्रह्मसरः पुण्यं ततो रामहदः स्मृतः ।

कुरुणा अपिणा कृष्टं कुरुक्षेत्रं ततः स्मृतम् ।

सस्य मध्येन चै गाढं पुण्या पुण्यजलावहा ॥ २४

इति श्रीवामनपुराणे सरोमाहात्म्ये एकादशोऽध्याय ||१||