सारस्वत स्रोत के प्रसङ्ग में विष्णुपसर स्रोत एव राक्षस वृत्तान्त तथा राक्षस-महीत मुनि द्वारा अग्नि की प्रार्थना एव सारस्वत स्रोत राक्षसमुक्त मुनि का उसको उपदेश

पुलस्त्य उवाच ।

कश्चिदासीद् द्विजद्रोग्धा पिशुनः क्षत्रियाधमः ।

परपीडारुचिः क्षुद्रः स्वभावादपि निघृणः ॥१

पर्यामिताः सदा तेन पितृदेवद्विजातयः ।

स स्वायुपि परिक्षीणे जज्ञे घोरो निशाचरः ॥ २

तेनैव कर्मदोपेण स्वेन पापकृतां वरः।

रैश्चने ततो वृचिं राक्षसत्वाद् विशेषतः ।। ३

तस्य पापरतस्यैवं जग्मुर्वर्प शतानि तु ।

तेनैव कर्मदोपेण नान्यां वृत्तिमरोचयत् ।। ४

यं यं पश्यति सत्वं स तं तमादाय राक्षसः।

हे तपोधन! गजेन्द्र-मोक्ष पवित्र और सभी प्रकार के पापों का विनाशक है। इस गजेन्द्रमोक्ष के पदने, स्मरण करने और सुनने से मनुष्य तत्काल पाप से मुक्त हो जाता है। (८१)

मुरारि विष्णु का यह पवित्र चरित्र परम पुण्यदायक तथा चीर्तन करने योग्य है। इसे कहने से मनुप्य गजेन्द्र के सटश अनेक पापों के पन्धन से मुक्त हो जाता है। (८२)

में अज, वरेण्य, श्रेष्ठ, पद्मनाभ, नारायण, ब्रह्मनिधि, सुरेश, देवगुह्य पुराणपुरुष उन लोकपति को बन्दना करता (८३)

पुलस्त्य ने कहा-स्तुतियों में श्रेष्ठ गजेन्द्र द्वारा कीर्तित मुरारि के इस श्रेष्ठ स्तोत्र को मैंने तुमसे कहा। इसके कीर्तन, श्रवण तथा चिन्तन करने से मनुष्य पापों से मुक्ति पाता है।

श्री वामनपुराग में सट्टावनवाँ अध्याय समाप्त ।। ५९।।

५९

पुलस्त्य ने कहा-ग्रामण पिढेपी, घुगलसोर, दूसों को पीड़ा देने वाला, नीच, स्वभाव से भी निष्टर एक क्षयियापम था।

उसने सदा पितरों, देयों एवं द्विजातियों का निरादर किया। आयु समाप्त होने पर यह घोर निशायर हुआ। (२)

अपने उसी क्रम के दोष एवं विशेषकर राक्षस होने से यह जघन्य पापी पर कों द्वारा जीवन निराह परने लगा।

पापमं करते हुये उसके सौ य व्यतीत हो गये। उसी फर्म में दोप से अन्य वृत्ति में उसी रपि नही होती थी। (४)

चखाद रौद्रकर्मासौ बाहुगोचरमागतम् ॥ ५

एव तस्यातिदुष्टस्य कुर्वतः पाणिनां वधम् ।

जगाम च महान् कालः परिणामं तथा चयः॥६

स कदाचित् तपस्यन्तं ददर्श सरितम्तटे।

महाभागमूर्ध्वभुजं यथावत्संयतेन्द्रियम् ।। ७

अनया रक्षया ब्रह्मन् कृतरक्षं तपोनिधिम् !

योगाचार्य शुचिं दक्ष वासुदेवपरायणम् ।।८

विष्णुः प्राच्या स्थितश्चक्री विष्णुदक्षिणतो गदी।

प्रतीच्या शा¥िग्विष्णुर्विष्णुः सड्गी ममोत्तरे ॥ ९

हपीकेशो पिकोणेपु तच्छितेषु जनार्दनः

कोडरूपी हरि मौ नारसिंहोऽभ्नरे मम ॥ १०

क्षुरान्तममल चक्रं भ्रमत्येतत् सुदर्शनम् ।

अस्यांशुमाला दुष्प्रेक्ष्या हन्तुं तनिशाचरान् ॥ ११

गदा चेयं सहस्राचिरुद्धमन् पावको यथा ।

रक्षोभूतपिशाचानां डाकिनीनां च शावनी ॥ १२

शाङ्गं विस्फूर्जित चैव वासुदवस्य मद्रिपून् ।

तिर्यडमनुष्यक्ष्माण्डप्रेतादीन् हन्त्यशेषतः ॥ १३

खड्गधाराज्वलज्ज्योत्स्नानिधूता ये ममाहिताः ।

ते यान्तु सौम्यता सद्यो गरुडेनेव पन्नगाः ॥ १४

ये कूष्माण्डास्तया यक्षा दैत्या ये च निशाचराः।

प्रेता विनायकाः क्रूरा मनुन्या जृम्भका. खगाः ।।१५

सिंहादयो ये पशवो दन्दशकाच पन्नगाः ।

सधै भनन्तु मे सौम्या विष्णुचत्ररवाहताः ॥ १६

चित्तरत्तिहरा ये च ये जनाः स्मृतिहारकाः।

बलौजसा च हरिश्छायाविध्वंसकाश्च ये॥ १७

ये चोपभोगहारो ये च लक्षणनाशकाः ।

कूष्माण्डास्ते प्रणश्यन्तु विष्णुचक्ररवाहताः ॥ १८

बुद्धिस्वास्थ्य मनःस्वास्थ्य स्वास्थ्यमन्द्रियकं तथा ।

वह रौद्राराक्षस जिस प्राणी को दग्यता उसे अपनी भुजाओं से पकड़ कर सा जाता था।

इस प्रकार प्राणियों का पध करते हुए उस अतिदुष्ट का अधिक समय व्यतीत हो गया एव उसकी अवस्था दलने लगी। (६)

पिसी समय उसने नदी तट पर एक ऊर्चभुज, विधिवत् इन्द्रियों पर सयम किये हुए महाभाग्यवान् ऋषि को तपस्या करते देखा।

हे ब्रह्मन् । नीचे लिखे रक्षामन्त्रों द्वारा उस तपोनिधि, पवित्र, निपुण, वासुदेव परायण योगाचार्य ने अपनी रक्षा कर लीथी-

पूर्वदिशा मे चक्रधारी विष्णु, दक्षिण दिशा में गदाधर विष्णु, पश्चिम दिशा मे शाई धनुर्धारी विष्णु एच उत्तर दिशा मे सडगधारी विष्णु मेरी रक्षा करें।

दिकोणों मे हृषीकेश, उन (दिशाओं एवं विदिशाओं) के छिद्रों में जनार्दन, भूमि में वराह रूपधारी हरि एवं आकाश मे नृसिंह मेरी रक्षा करें। (१०)

प्रेतों एव निशावरों के वध के लिए यह अति तीक्ष्ण निर्मल सुदर्शन चक्र घूम रहा है। इसकी किरणमाला दुष्प्रेक्ष्य है। (११)

ज्वाला उगलने वाले अग्नि को भौति सहस्रों किरणों से

युक्त यह गदा राक्षसों, भूतों, पिशाचों और डाविनियों का बिनाश करे। (१२)

वासुदेव का चमकने वाला शाई धनुप मेरे शत्रुभूत हिंस्र पशु पक्षियों, मनुष्यों, दानयों तथा प्रेतों का पूर्णतया विनाश करे। (१३)

जैसे गरुड को देखकर सर्प शान हो जाते है उसी प्रकार (विष्णु) के खड्ग की धार के तीन तेज से मेरे अहितकारी इतप्रभ होकर तताल सौम्य पन जाँय। (१४)

समस्त कूष्माण्ड, यक्ष, दैत्य, निशाचर, प्रेत, विनायक, फूर मनुष्य, जम्भक, पक्षी, सिंहादि पशु एव तीन दंश वाले सर्प ये सभी विष्णु के चक्र के बेग से आइन होकर मेरे प्रति सौम्य हो जॉय। (१५-१६)

सभी पित्त की वृत्तियों का हरण परने वाले, स्मृतिहारी, बल एवं ओज के अपहारक, काम्नि विवसक, सुखी के विनाशक ५५ लक्षणों के विनाशक सभी कूष्माण्डादि ( भूत प्रेत ) विष्णु के चक्र के बेग से आहत होकर नष्ट हो जाँया। (१७-१८)

देवदेव वासुदेव के कीर्तन से मुझे बुद्धि, मन तथा

ममाग्नु देवपार पामुदेवाय कोधनात् ।। १९

पृष्ठे पुरम्नादर दधियोगी

रिकोपमा जनानी इस

वनीसामीमानमनन्धमा

जनादन निको न मीदति ।। २.

या परं प्रमहरिनु पर

गरपप ग पर पंगा।

हनन नेनापतनामकीतना-

रमगामेनु गिरि ममागुनम् ॥ २१

इत्यमामरया या पिवरम् ।

मंन्दिता गारपि पनी राय: गापादयन् ॥ २२

तो विनिपुपयापा भारत रतनापरः।

निवरेगः गरमा सम्धी मामगष्टयम् ॥ २३

पारद हिजम्प टप ममापि ममापितः ।

जातं जप्यारमानेगी तदा निमाररम् ॥ २४

दानं पालोमा फादि पं. वीजगम् ।

संदृष्ट्या कृपयापिटः गमागम्य निशाचरम् ।। २५

परनगमने तुंग गारट यातपम् ।

समापनारमनी र रथया नेजगः विनिम् ॥ २६

फ.विमा गरायः पारमिता

प्रगीराची पिं निर्षिनान कर्मणा ।। २७

पानि पापानि मया नानि पायो गाः।

नाः पियो मया परती विषया. पुप्रयहिताः ।

अनाग नगरपानामन्यशन एयः ठः ।। २८

पग्मा पापाद मोमिचानि त्यस्त्रमादतः ।

पापशमनापानं पुर में धर्मानम् ॥२९

पापम्पार परदे प्रयत मे।

सम्य स यगनं धुन्या गामम्प दिजोगमः ॥ ३०

पर मार मारमा इंतुमय गुमारितम् ।

फयंम्पमारम्प मनन्तर निशानर ।

गामा गमायाना जिनामा धर्मपर्मनि ॥३१

राहग उयान।

स्वा ममागमा भिमोरया पलान् ।

पर मंगर्गती मान जातो नियंद उसमः ॥३२

इन्द्रियों पम्पना मात्र हो। (६)

जमान हरि मेरे भागे, दाये, दायें वदिषोनों में यार। नुनि पने पोयम अप्यु जनादन पो मिपा एनं पार मार दुसी नदी अमेठी मी प्रगर दर भी है। फैशर दी जगतपाप है। अग्युग के नाम से जानन पे. राम गरय धारा मेरे विविध अमनट दी जाय। (२१)

गप्रसर अपनी बागु पिरमर दा विम्याम फर ये अस्थिय । पह मान राम मनी ओर (२२)

हे देवर्षि मदनगर द्विज द्वारा पिनियजित राग (की सीमा) में पपने पर यह पक्षम गतिहीन होर पार माम एक जप सफ. माहागी समाधि समाप्त नही पा रहा। उप समाप्त होने पर उन्होंने, उस निशापर को देगा। (२३-२४)

उन्होंने दीन, पटदीन, नीरमाद, भयाकुल, तथा तेजोद्दीन उस निशापर फो दम्पयर कपापूर्वक उसे भाषासन प्रदान किया और उसके आने का कारण पूसा। उसने शपों पयार्य समाप देगल पर आने पर संज का नाम होगा पाया। सदनमा र अनेक पारगोपा उन पर अपने घर में तुगी उस रासम में रायगे पर आर प्रगादी जाय। (२५-२७)

मैंने पढापार पिया है। मोर मनुष्यों को मारा। मैंने पानीधिको कपिपया + पुहिन पर दिया गया निरपराध भार प्राणियों का नाश पिया । (२)

भापती मृग गे में न पापों से मुक्त होना पाहता हूँ।  आप गुरे पापों का नाश पाने में समर्थ धर्म का उपदेश। (२९)

आप गुग इस पाप को नष्ट करने पासा उपदेश प्रदान परें। उस राग पं. उस वपन को द्विमोसम ने इंतुयुक्त मधुर ययन पक्षा- (३०)

हे  निशाचर! मर स्वभाव के होते हुए भी सहसा धर्ममार्ग में मुम्हारी सिमोसा में राम दुई ? (३१)

राक्षस ने कहा-मैं आज जैसे ही आपके समीप आया रहा द्वारा परशूर्पक पंक दिया गया। ब्रह्मन् ! आपके संसर्ग से मुझे उत्तम येराग्य हो गया। (३२)

का सा रक्षा न तो वेदि वेधि नास्याः परायणम् ।

यस्याः संसर्गमासाद्य निर्वेदं प्रापितं परम् ।। ३३

त्वं कृपां कुरु धर्मज्ञ मय्यनुक्रोशमायह ।

यथा पापापनोदो मे भवत्यार्य तथा कुरु ॥ ३४

पुलस्त्य उवाच ।

इत्येवमुफ्तः स निस्तदा वै तेन रक्षसा ।

प्रत्युवाच महाभागो विमृश्य सुचिरं मुनिः ॥ ३५

ऋषिरुवाच।

यन्ममाहोपदेशार्थ निर्विणः स्वेन कर्मणा।

युक्तमेतद्धि पापानां निवृत्तिरुपकारिका ।। ३६

करिये यातुधानानां नत्वहं धर्मदेशनम् ।

तान् संपृन्छ द्विजान सौम्य ये वै प्रयचने रताः ॥ ३७

एवमुक्त्वा ययौ चिपश्चिन्तामाप स राक्षसः ।

कथं पापापनोदः स्यादिति चिन्ताकुलेन्द्रियः ॥ ३८

न चखाद स तत्त्वानि क्षुधा संपाधितोऽपि सन् ।

पष्ठे पप्ठे तदा काले जन्तुमेकमभक्षयत् ।। ३९

स कदाचित्क्षुधाविष्टः पर्यटन विएले बने।

ददर्शाथ फलाहारमागतं ब्रह्मचारिणम् ॥ ४०

गृहीतो रक्षसा तेन स तदा मुनिदारक. ।

निराशो जीवित प्राह सामपूर्व निशाचरम् ॥ ४१

ब्राह्मण उवाच।

भो भद्र ब्रूहि यत् कार्य गृहीतो येन हेतुना।

सदनुभ्रूहि भद्रं ते अयमस्म्यनुशाधि माम् ।। ४२

राक्षस उवाच

पप्ठे काले त्वमाहारः क्षुधितस्य समागतः ।

निःश्रीकस्यातिपापस्य निघृणस्य द्विजद्रुहः ॥ ४३

ब्राह्मण उवाच।

यघवश्यं त्वया चाह भक्षितव्यो निशाचर ।

आयास्यामि तबाद्यैव निवेद्य गुरवे फलम् ।। ४४

गुर्वर्थमेवदागत्य यस्फलग्रहणं कृतम् ।

ममात्र निष्ठा प्राप्तस्य फलानि विनिवेदितुम् ।। ४५

स त्वं मुहूर्तमानं मामवं प्रतिपालय ।

मैं यह नहीं जानता कि जिसका ससर्ग पाकर मुझे श्रेष्ठ पैराग्य हुआ है वह रक्षा कैसी है एव उसका आश्रय कौन है? (३३)

हे धर्मज्ञ हे आर्य  आप कृपा करें। मेरे उपर दया लायें । आप वह कार्य करें जिससे मेरे पापों का विनाश हो (३४)

पुलस्त्य न कहा- उस राक्षस के ऐसा कहने पर उन महाभाग मुनि ने बहुत देर विचार कर उत्तर दिया। (३५)

भूपि ने कहा-अपने कर्म से दु सी होकर तुमने मुझसे जो उपदेश के लिये कहा है वह उचित ही है। पापों की निवृत्ति से उपकार होता है। परन्तु में राक्षसों को धर्मोपदेश नहीं दूंगा। अत हे सौम्य । तुम उन ब्राह्मणों से पूछो जो प्रवचन करते जाय।

ऐसा कहकर वह ब्राह्मण चला गया। वह राक्षस चिन्तामरत हो गया। 'मेरे पाप कैसे दूर होंगे' इस विषय की चिन्ता से उसकी इन्द्रियाँ आकुल हो गई। (३८)

मूख से क्लेश पाने पर भी उसने प्राणियों को नहीं खाया। प्रत्येक छठ सयय एक जन्तु का आहार करने (३९)

किसी समय भूख से पीड़ित होकर विशाल बन मे घूमते हुए उसने फल लेने के लिए आए हुए एक ब्रह्मचारी को देखा। (४)

राक्षस ने मुनिपुन को पकड लिया। तदनन्तर जीवन से निराश होकर उस ब्रह्मचारी ने सामयुक्त वचन कहा । (४१)

ब्राह्मण ने कहा-दे भद्र । यह यतलाओ कि तुम्हारा क्या कार्य है और तुमने मुझे क्यों पकडा है ? तुम्हारा कल्याण हो । में उपस्थित हूँ। मुझे आज्ञा दो। (४२)

राक्षस ने कहा-श्रीहीन, अतिपापी, क्रूर एवं ग्राह्मण द्रोही मुझ भूखे के समीप छठवें समय तुम ओहार के रूप में आये हो।

ब्राह्मण ने कहा-दे निशाचर । यदि अवश्य हो तुम मुझे खाना चाहते हो तो मैं यह फल गुरु यो निवेदित करके अभी आता हूँ। (४४)

गुरु के लिए यहाँ आकर जो मैंने फल सग्रह किया है, उसे उन्हें समर्पित करने के लिए मुझे श्रद्धा है। (४५)

अत तुम यहाँ मुहूर्त मात्र मेरी प्रतीक्षा करो जगदक मैं

निवेद्य गुरवे यारदिहागाम्यहं फलम् ॥ ४६

राक्षम उवाच ।

पप्ठे काले न मे प्रखन् कश्चिद् ग्रहणमागतः ।

प्रविमुच्येत देयोऽपि इति मे पापनीनिका ॥ ४७

एक एपार मोक्षस्य तव हेतुः शृणुप्प वन् ।

मुश्चाम्यहमसंदिग्धं यदि तत्परते भवान् ॥ ४८

प्रामण उपचा

गुरोर्यन्न विरोधाय यन्न धर्मोपरोधकम् ।

तत्सरियाम्यहं रक्षो यन्न प्रतहरं मम ।। ४९

राधम उसाच ।

मया निमर्गतो प्रमान जातिदोपाद् विशेषतः ।

निविन चित्तेन पापर्म मदा कृतम् ।। ५०

आनाल्यान्मम पापेषु न धर्मपु रतं मनः ।

वत्पापसंक्ष्यान्मोतं प्राप्नुयां येन तद् वद ॥५१

यानि पापानि कर्माणि पालत्यारिवानि च।

दुष्टां योनिमिमा प्राप्य तन्मुक्ति कथय द्विज ।। ५२

यद्येतद् द्विजपुत्र त्यं समाख्यास्यस्यशेपतः ।

वतः क्षुधान्मित्तस्त्वं नियतं मोक्षमापयसि ।। ५३

न घेत् उत्पापशीलोऽहमत्यर्थ क्षुत्पिपासितः ।

पप्ठे काले नृमात्मा भक्षयिष्यामि निघृणः ॥ ५४

पुलस्त्य उवाच ।

एवमुक्तो मुनिसुतम्तेन घोरेण रक्षसा।

चिन्तामयाप महवीमशस्वस्वदुदीरणे ।। ५५

स रिमृश्य चिरं विप्रः शरणं जातवेदसम् ।

जगाम ज्ञानदानाय मंशयं परमं गतः ॥५६

यदि शुधूपितो पहिर्गुरुशुधपणादनु ।

तानि या मुचीर्णानि समात्रिः पातु मां ततः ।। ५७

न मावर न पितरं गौरवेण या गुरुम् ।

नदेवारगम्छामि तपा मा पातु पावस. ॥ ५८

पया गुरं न मनमा कर्मणा पचमाऽपि या ।

अपनानाम्यहं तेन पातु सत्येन पायकः ॥ ५९

इत्येवं मनसा सत्यान् कुर्वतः शपयान् पुनः ।

इस पल को गुरु को देश लौट आऊँ। (४६)

राक्षस ने पहा-हे ब्रह्मन् । छठ समय मेरी पाट में आया हुआ कोई देवना भी मुक्त नहीं हो साता। यही मेरी पापनीवित है। (४७)

तुम्हारी मुक्ति या एक ही उपाय है, उसे सुनो । यदि आप उसे करें तो निरसन्देह मैं आपसे छोड़ दूंगा। (४८)

ग्राह्मण ने कहा- हे राक्षस । यदि यह कार्य गुरु का घिरोधी, धर्म का अवरोधक एप मेरे मन को सण्डित करने बारा न होगा तो में उसे करूँगा। (४६)

राक्षस ने यहा-हे ब्रह्मन् । मैंने स्वभावत एय विशेपत जातिदोपपश तथा विवेररहित चित्त के कारण सदा पापकर्म किया। (५०)

बचपन से ही मेरा मन धर्म में नहीं अपितु पाप मे लगा रहा। अत यह उपाय बतलाओ जिससे पाप या क्षय होकर मेरा मोक्ष हो जाय ।

हे द्विज। इस दुष्ट योनि को पाकर अज्ञतायश मैंने जिन पापकर्मों का आचरण किया है, उनसे मुक्ति का उपाय बतलाओ। (५२)

हे ब्राह्मणपुर । यदि तुम यह पूर्णरूप से मुझे बतलाओ तो गुन क्षुधार्त से अवश्य छुटगरा पा जाओगे। (५३)

यदि ऐमा नहीं हुआ तो अत्यधिक भूसा प्यासा निष्ठुर में छठवे समय (प्राप्त हुए) आप सा जाऊँगा । (५४)

पुलस्त्य ने कहा-उस भयर रायस के ऐसा कहने पर मुनिपुर ( राक्षस की पापमुक्ति का उपाय ) पहने मे असमर्थ होने से बहुत चिन्तित हुआ। (५५)

चिरकाल तक विचार करने के उपरान अत्यन्त संशयारन ग्रामण ज्ञानदान के निमित्त अग्नि की शरण में गया। (५६)

(उसने कहा---) हे अग्नि ! गुरु की सेपा ये पश्चात् यदि मैंने आपकी सेस की हो तथा व्रतों का भरी भौति पालन किया हो वो आप सप्ताचि मेरी रक्षा करें। (५७)

हे अग्नि । यदि मैंने माता और पिता से गौरव में गुरु को सदा ही अधिक महत्त्व दिया हो तो आप मेरी रक्षा करें।

यदि मन, कर्म एवं याणी से भी मैंने गुरु का अपमान न किया हो तो उस सत्य के कारण अग्नि मेरी रक्षा करें। (५६)

इस प्रकार मन से सत्य शपथों को लेने वाले उसके

सप्तर्चिपा समादिष्टा प्रादुरासीत् सरस्वती ॥ ६०

सा प्रोवाच द्विजसुतं राक्षसग्रहणाकुलम् ।

मा भैदिजसुताहं त्वां मोक्षयिष्यामि संकटात् ।। ६१

यदस्य रक्षसः श्रेयो जिहाग्रे संस्थिता तव ।

व सर्व कथयिष्यामि ततो मोक्षमवाप्स्यसि ॥ ६२

अदृश्या रक्षसा तेन प्रोक्त्वेत्थं सा मरस्वती ।

अदर्शनं गता सोऽपि द्विजः प्राह निशाचरम् ॥ ६३

ब्राह्मण उवाच।

श्रूयतां तब यच्छ्रेयस्तथाऽन्येषां च पापिनाम् ।

समस्तपापशुद्धधर्थ पुण्योपचयदं च यत् ॥ ६४

प्रातरुत्याय जप्तव्यं मध्याहेऽहाक्षयेऽपि वा।

असंशयं सदा जप्यो जपतां पुष्टिशान्तिदः ॥ ६५

ॐ हरि कृष्णं हपीके वासुदेवं जनार्दनम् ।

प्रणतोऽस्मि जगन्नाथं स मे पापं व्यपोहतु ।। ६६

चराचरगुरुं नाथं गोविन्दं शेषशायिनम् ।

प्रणतोऽस्मि परं देवं स मे पापं व्यपोहतु ॥ ६७

शविनं चक्रिणं शाईधारिणं स्रग्धरं परम् ।

प्रणतोऽस्मि पति लक्ष्म्याः स मे पापं व्यपोहत ।। ६८

दामोदरसुदाराक्षं पुण्डरीकाक्षमच्युतम् ।

प्रणतोऽस्मि स्तुतं स्तुत्यै. स मे पापं व्यपोहतु ।। ६९

नारायणं नरं शौरि माधयं मधुसूदनम् ।

प्रणतोऽस्मि धराधारं स मे पापं व्यपोहतु ॥ ७०

केशवं चन्द्रसूर्यावं कंसपेशिनिषूदनम् ।

प्रणतोऽस्मि महाबाहुं स मे पापं प्यपोहतु ।। ७१

श्रीवत्सवक्षसं श्रीशं श्रीधरं श्रीनिकेतनम् ।

प्रणतोऽस्मि थियः कान्तं स मे पापं व्यपोहतु ।। ७२

यमीशं सर्वभूतानां ध्यायन्ति यतयोऽक्षरम् ।

वासुदेवमनिटेंश्यं तमस्मि शरणं गतः ॥ ७३

समस्वालम्बनेम्यो यं व्यावृत्त्य मनसो गतिम् ।

घ्यायन्ति वासुदेवाख्यं तमम्मि शरणं गतः ।। ७४

समक्ष अग्नि के आदेश से सरस्वनी प्रकट हुई। (६)

उन्होंने राक्षस के द्वारा पकड़े जाने के कारण व्याकुल प्रामण-पुत्र से कहा-हे माझणपुत्र! डरो मत | मैं तुम्हें सस्ट से मुक्त करूंगी। (६१)

तुम्हारे जिदाम पर स्थित होकर में राक्षस फे श्रेयस्कर समस्त विषयों का पथन काँगी। तदनन्तर तुम मुक्त हो जाओगे। (६२)

उस राक्षस से अदृश्य रहती हुई सरस्वती सा कहने के उपरान्त तिरोहित हो गई। सस मामण ने निशाचर (६३)

प्राण मे यदा-सुनो! तुम्हारे और अन्य पापियों। पे लिए प्रेयसर, समस्त पापों की शुद्धि एवं पुण्यपर्दैन परने याला ( सत्व में कहता हूँ।) (६४)

प्रातकाल ठ पर, मध्यान में अथया सायंशल इस जपनीय स्लोन या रादा जप पाना पाहिए। यह जप जपा को निसन्देह शान्ति पय पुष्टि प्रदान करता है। (३५)

जों हरि, कृष्ण, पीरेश, पामुदेय, जनार्दन,जगमाप धे में प्रगाम करता हूँ। मेरे पाप को दूर करें। (६६)

परापर फे गुरू, नाय, रोपायी, परम देय गोपिन्दोको में प्रणाम करता हूँ। वे मेरे पाप को दूर परें। (६७)

शंसधारी, चक्रधारी, शाईधारी एवं उत्तम मालाधारी, लक्ष्मीपति को में प्रणाम करता हूँ। वे मेरे पाप को दूर वे (६८)

दामोदर, उदाराक्ष, पुण्डरोगास, स्तुतिपात्रों से स्तुत अच्युत को में प्रणाम करता हूँ। वे मेरे पापों को दूर परें। (६९)

नारायण, नर, शौरि, माधव, मधुसूदन एवं धराधार यो में प्रणाम करता है। वे मेरे पाप को दूर करें। (७०)

चन्दय सूर्यस्पी नेनों याले, पंस और फेशिनिपूदन महाराहु पेशर को प्रणाम करता। ये मेरे पापों को (०१)

यक्ष स्पल पर श्रीररस धारण करने वाले, श्रीश, श्रीधर, श्रोनितिन एवं श्रीरान्त यो में प्रणाम करता हूँ। ये मेरे पापों को दूर करें। (७२)

संयमी सोग जिन सर्पभूतों के स्वामी, अभर एवं अनिर्देश्य पासुदेप का ध्यान करने है मैं उनकी शरण महण करता हूँ। (७३)

(यतिगग) अग्य समस्त माटम्यनों से मन की गति की सोटा पर जिम वासुदेव नामक ईघर का ध्यान करणे हूँ में मनी शरण में जाता हूँ। (७४)

सर्पगं सर्वभूतं च सर्वस्याधारमीश्वरम् ।

वासुदेवं परं ब्रह्म तमस्मि शरणं गतः ॥ ७५

परमात्मानमव्यक्तं य प्रयान्ति सुमेधसः ।

कर्मक्षयेऽक्षयं देयं तमस्मि शरण गतः ॥ ७६

पुण्यपापविनिर्मुक्ता यं प्रविश्य पुनर्भवम् ।

न योगिनः प्राप्नुवन्ति तमस्मि शरण गतः ॥ ७७

ब्रह्मा भूत्वा जगत् सर्व मदेवासुरमानुपम् ।

यः सृजत्यच्युतो देवस्तमस्मि शरणं गतः ॥ ७८

ब्रह्मत्वे यस्य वक्त्रेभ्यश्चतुर्वेदमयं वपुः ।

प्रभुः पुरातनो जने तमम्मि शरणं गतः ॥७९

ब्रह्मरूपधरं देवं जगद्योनि जनार्दनम् ।

स्रष्ट्रत्ये संस्थितं सृष्टौ प्रणतोऽस्मि सनातनम् ।। ८०

स्रष्टा भूत्वा स्थितो योगी स्थितावसुरसुदनः ।

तमादिपुरुपं विष्णुं प्रणतोऽस्मि जनार्दनम् ।। ८१

धृता मही हता दैत्याः परित्रातास्तथा मुराः।

येन तं विष्णुमायेशं प्रणतोऽस्मि जनार्दनम् ।। ८२

यज्ञैर्यजन्ति य विना गनेश यज्ञभावनम् ।

तं यज्ञपुरुष विष्णुं प्रणतोऽस्मि सनातनम् ॥ ८३

पातालवीथीभूतानि तथा लोकान् निहन्ति यः ।

तमन्तपुरुष प्रणतोऽस्मि सनातनम् ।। ८४

संभक्षयित्वा सकलं यथासृष्टमिदं जगत् ।

यो चै नृत्यति स्द्रात्मा प्रणतोऽस्मि जनार्दनम् ।। ८५

सुरासुराः पितृगणाः यक्षगन्धर्व राक्षसाः।

संभूता याय यस्य सर्पगं तं नमाम्यहम् ।। ८६

समस्तदेवाः सफला मनुष्याणां च जावयः ।

यस्यांशभूता देवस्य सर्वगं त नतोऽस्म्यहम् ॥ ८७

वृक्षगुल्मादयो यम्य तया पशुमृगादयः ।

एकांशभूता देवस्य सर्वगं तं नमाम्यहम् ।। ८८

यस्मान्नान्यत् परं किंचिद् यस्मिन् सर्व महात्मनि ।

यः सर्वमध्यगोऽनन्तः सर्वगं तं नमाम्यहम् ।। ८९

में सर्यगत, सर्वभूत, सर्वाधार, ईश्वर एय वासुदेव नामक पर ब्रह्म की शरण जाता हूँ। (७५)

उत्तम मेधायुक्त लोग कर्म का क्षय होने पर जिन । अव्यक्त, अक्षय, परमात्मदेव को प्राप्त करते है, में उनका शरणागत हूँ। (७६)

पुण्य पाप से मुक्त योगि लोग जिन्हे पार पुन जन्म नहीं लेते, मैं उनकी शरण में जाता हूँ। (७७)

ब्रह्मा का रूप धारण कर देवता, असुर एव मनुष्यो से युक्त समस्त जगत की सृष्टि करने वाले अच्युत देव पी में शरण में जाता हूँ। (७)

प्रदा का रूप धारण करने पर जिनके मुखों से चतुर्वेदात्मक शरीरधारी पुरातन प्रभु का प्रादुर्भाव हुआ था मैं उनी शरण में जाता हूँ। (७६)

मैं सृष्टि के लिये स्रष्टारूप से स्थित ब्रह्मरूपधारी सनातन जगद्योनि जनार्दन को प्रणाम करता हूँ। (८०)

मष्टि र्ता होकर योगी रूप में विद्यमान एवं स्थिति पाल मे राक्षसों का नाश करने वाले आदिपुरुष जनार्दन को प्रणाम करता हूँ। (८१)

में न आदि ईश्वर जनार्दन विष्णु को प्रणाम करता  हूँ जिन्होंने पृथ्वी को धारण किया है, देत्यों को मारा है एवं देवों का परिमाण किया है (८२)

ब्राह्मण लोग यज्ञों द्वारा जिनरी आराधना करते में उन यक्षपुरुप यज्ञभावन, यतेश सनातन विष्णु को प्रणाम करता हूँ। (८३)

में पाताललोक निवासी प्राणियों तथा लोकों का विनाश करने वाले उन अन्त पुरुप सनातन रुद्र को प्रणाम करता (८०)

यथासष्ट इस समस्त जगत का भक्षण कर नृत्य करने वाले रद्रात्मा जनार्दन को मैं प्रणाम करता हूँ। (८५)

में उन सर्वगामी देव को प्रणाम करता हूँ जिनसे समस्त सुर, असुर, पितृगण, यक्ष, गन्धर्व एवं राक्षस उत्पन्न हुए है। (८६)

में उन सर्वगामी देव को प्रणाम करता हूँ जिनके अश से समस्त देय एव मनुष्यों की सभी जातियाँ उत्पन्न वृक्ष, गुल्म आदि तथा पशु, मृग आदि जिन परमदेय के एक अश रूप है में उन सर्वगामी देय को प्रणाम करता (८८)

मैं उन सर्वव्यापी देय को प्रणाम करता हूँ जिनसे

यथा सर्वेषु भूतेषु गूढोऽग्निरिव दारुप ।

विष्णुरेवं तथा पापं ममाशेपं मणश्यतु ॥९०

यथा विष्णुमयं सर्व ब्रह्मादि सचराचरम् ।

यच ज्ञानपरिच्छेचं पापं नश्यतु मे तथा ॥ ९१

शुभाशुभानि कर्माणि रजःसत्त्वतमांसि च ।

अनेकजन्मकर्मोत्यं पापं नश्यतु मे तथा ॥ ९२

यन्निशायां च यत्प्रातयन्मध्याह्वापराह्णयोः ।

संध्ययोश्च कृतं पापं कर्मणा मनसा गिरा ॥ ९३

यत् विष्ठता यद् बजता यच शय्यागतेन मे।

कृतं यदशुभं कर्म कायेन मनसा गिरा ॥ ९४

अज्ञानतो ज्ञानतो पा मदाचलितमानसः।

वत् क्षिप्नं विलयं यातु वासुदेवस्य कीर्तनात् ॥ ९५

परदारपद्रव्यवाञ्छाद्रोहोद्भवं च यत् ।

परपीडोद्भवां निन्दा कुर्यता यन्महात्मनाम् ।। ९६

यच भोज्ये तथा पेये भक्ष्ये चोष्ये विलेहने।

तद् यातु विलयं तोये यथा लवणमाजनम् ॥ ९७

यद् बाल्ये यच्च कौमारे यत् पाप यौवने मम ।

वयापरिणती यच्च यच्च जन्मान्तरे कृतम् ।। ९८

तन्नारायण गोपिन्द हरिकृष्णेश कीर्तनात् ।

प्रयातु विलयं तोये यथा लवणभाजनम् ॥ ९९

विष्णवे वासुदेवाय हरये केशवाय च ।

जनार्दनाय कृष्णाय नमो भूयो नमो नमः ।। १००

भविष्यन्नरकम्नाय नमः कसविधाविने ।

अरिष्टकेशिचाणूरदेवारिक्षयिणे नमः ।। १०१

कोऽन्यो पलेवचयिता त्वामृते चै भविष्यति ।

कोऽन्यो नाशयति पलाद् दर्प हेहयभूपतेः ।। १०२

कः करिष्यत्यथाऽन्यो चै सागरे सेतुबन्धनम् ।

यधिष्यवि दशग्रीवं का सामात्यपुरःसरम् ।। १०३

कस्त्वामृतेऽन्यो नन्दस्य गोकुले रतिमेष्यति ।

प्रलम्मपूतनादीनां त्वामृते मधुसूदन ।

भिन्न कोई वस्तु नहीं है एव जिन महात्मा मे समस्त पदार्थ स्थित हैं तथा जो सभी के अन प्रविष्ट और अनन्त हैं। (८९)

पाष्ठ मे अग्नि सदृश सर्वभूतों में निगूढ विष्णु मेरे समस्त पापों को नष्ट करें। (९०)

क्योंकि विष्णु से ब्रह्मादि सम्पूर्ण चराचरात्मक जगत व्याप्त है तथा जो ज्ञानपरिच्छेद्य है अत मेरे पाप नष्ट हो जाय। (६१)

(विष्णु की कृपा से) मेरे शुभाशुभ कर्म, सत्य, रज एय तमोगुण तथा अनेक जन्मों ये पर्म से उत्पन्न पाप नष्ट हो जायें। (९२)

शरीर, कर्म, मन एप पाणी द्वारा रात्रि, प्रात', मध्यान, अपराहन एव सभ्याओं में चलने, येठने एव सोसे हुए शान या अज्ञान पूर्पक अधया अहवार विचलित मन से मैंने जो शुभ या अशुभ पाप कर्म किये हों वे पामुदेय हे कीर्तन से शीघ्र विलीन हो जाय (९३-९५)

परस्त्री एवं परम्प की आयाभा, द्रोह, परपीड़ा, महामाओं की निन्दा तथा भोग्य, पेय, भय चोप्य एवं 'बिजेदन के कारण नमूत समस्त पाप इस प्रकार विलीन हो जॉय जैसे जल मे लयण पान विलीन हो जाता है। (९६-९७)

नारायण, गोविन्द, हरिकृष्णा, ईश का कीर्तन करने से याल्यसल, कौमार्य, यौवन, वार्द्धक्य एच जन्मान्तर मे किये गये मेरे समस्न पाप इस प्रकार विलीन हो जॉय जैसे जल में ल्यगभाजन विलीन हो जाता है। (९८-९९)

हरि, विष्णु, यासुदेव, फेशन, जनार्दन, कृष्ण पो पुन पुन नमस्कार है। (१०८)

भावी नरक कानाश करने वाले क्सविघाती को नमस्कार है। अरिष्ट, देशि एवं चाणूर आदिराक्षसों के क्षयरों को नमस्तार है। (१०१)

आपके अतिरिक्त फोन पलि को छल सकता था एवं आपरे यिना हैहयनरेश फे दर्प को पौन नष्ट कर सकना था? (१0२)

आपरे अतिरिक्त सागर में सेतुबन्धन कीन कर सकता है सथा अमात्य आदि सहित दशमीब पा पर कौन पर सकता था? (१०३)

दे मधुसूदन ! आपके अतिरिक्त ऐसा कौन है ओ नन्द के गोपुर में स्नेहमयी श्रीक्षा कर सके १ देवदेष! आपके

निहन्ताऽप्यथया शास्ता देवदेव भविष्यति ।। १०४

जपनेवं नरः पुण्यं वैष्णवं धर्ममुत्तमम् ।

इष्टानिष्टप्रसंगेम्यो ज्ञानतोऽज्ञानतोऽपि वा ।। १०५

कृतं तेन तु यत् पापं समजन्मान्तराणि वै ।

महापावासंवा तथा चैवोपपातकम् ॥ १०६

यज्ञादीनि च पुण्यानि जपहोमत्रतानि च ।

नाशयेद् योगिनां सर्वमामपात्रमिवाम्भसि ॥ १०७

नरः संवत्सरं पूर्ण तिलपात्राणि पोडश ।

अहन्यहनि यो दद्यात् पठत्येतच तत्समम् ।। १०८

अविलुप्तब्रह्मचर्य संप्राप्य स्मरणं हरेः ।

विष्णुलोकमवाप्नोति सत्यमेतन्मयोदितम् ।। १०९

यथैवत् सत्यमुक्तं मे न ह्यल्पमपि मे मृपा ।

राक्षसस्त्रस्तसर्वाङ्गं तया मामेप मुश्चतु ॥ ११०

पुलस्त्य उवाच ।

एवमुच्चारिते तेन मुक्तो विप्रस्तु रक्षसा ।

अकामेन द्विजो भूयस्तमाह रजनीचरम् ।। १११

एतद् भद्र मया ख्यातं तव-पातकनाशनम् ।

विष्णोः सारस्वतं स्तोत्रं यजगाद सरस्वती ।। ११२

हुताशनेन प्रहिता मम जिह्वाग्रसंस्थिता ।

जगादैनं स्तवं विष्णो. सर्वेषां चोपशान्तिदम् ।। ११३

अनेनैव जगन्नायं त्वमाराधय केशवम् ।

ततः शापापनोदं तु स्तुते लप्स्यसि केशवे ।। ११४

अहर्निशं हृषीकेशं स्तवेनानेन राक्षस ।

स्तुहि भक्तिं दृढां कृत्वाततः पापाद् विमोक्ष्यसे ॥ ११५

स्तुतो हि सर्वपापानि नाशयिष्यत्यसंशयम् ।

स्तुतो हि भक्त्या नृणां वै सर्वपापहरो हरिः ॥ ११६

पुलस्त्य उवाच ।

ततः प्रणम्य तं विघ्नं प्रसाद्य स निशाचरः।

सदैव तपसे श्रीमान् शालग्राममगाद् यशी ॥ ११७

अहर्निशं स एवैनं जपन् सारस्वतं स्तरम् ।

देवक्रियारतिर्भूत्या वपस्तेपे निशाचरः ।। ११८

अतिरिक्त प्रलम्ब एव पूतनादि का वध एवं नियमन कौन कर सकता था? (१०४)

इस धर्ममय उत्तम वैष्णव मन्त्र वाजपक्रने वाला मनुष्य इष्टानिष्ट-प्रसद्गवश तथा ज्ञान या अज्ञानपूर्वक सात जन्मों मे किये अपने महापातकों, उपपातकों, यज्ञ, होम एच व्रतादि के पुण्य क्मों के भी योग को इस प्रकार नष्ट कर देता है जैसे जल मे मिट्टी का कसा घड़ा नष्ट हो जाता है। (१०५-१०७)

में यह सत्य यहता हूँ कि अखण्डित ब्रह्मचर्य एव हरि-स्मरणपूर्वक एक वर्ष तक इस स्तोत्र के पाठ के साथ प्रतिदिन सोलह तिलपूर्ण पानों का दान करने वाला मनुष्य विष्णुलोक प्राप्त करता है। (१०८-२०९)

यदि मैंने यह सत्य कहा हो एव इसमें अल्पमात्र भी असत्य न हो तो यह राक्षस सर्वासपीड़ित मुझे (११०)

पुलस्त्य ने कहा-उसके ऐसा कहते ही राक्षस ने ग्राह्मण को छोड़ दिया। पुन. द्विज ने निष्काम भाव से राक्षस से कहा। (१११)

प्रामण ने कहा-हे भद्र ! सरस्वती देयो ने जिस  पापनाशक सारस्वत विष्णु स्तोत्र को कहा है उसे मैंने तुमसे कह दिया। (११२)

अग्निदेव से भेजी गयी एवं मेरी जिला के अमभाग में स्थित (सरस्वनी) ने सभी को शान्ति देने वाले इस विष्णु- स्तोत्र को कहा है। (११३)

तुम इसीसे जगत्वामी केशर की आराधना करो। तदनन्तर केशप की स्तुति करने से तुम शाप से मुक्त हो (११४)

राक्षस । इस स्तुति के द्वारा बढ़ भक्तिपूर्वक अहर्निश हृषीकेश की स्तुति करो। तदनन्तर केशव की स्तुति करने पर तुम पापमुक्त हो जाओगे। (१२५)

स्तुति किये गये हरि निस्सन्देह सभी पापोंको नष्ट करेंगे। भक्तिपूर्वक सुति करने से सर्वपापहारी हरि मनुष्यों के समस्त पापों का नाश कर देते हैं। (११६)

पुलात्य ने कहा-तदनन्तर आमवशी वह राक्षस ब्राझग को प्रणाम एवं प्रसन्न करने के उपरान्त उसी समय तपस्या के लिये शालग्राम नामक स्थान मे चला गया ।(११७)

वह निशाचर अहोरात्र इसी सारस्यतस्तोत्र का जप करते हुये देवक्रिया में अनुरक्त होकर तप करने लगा। (११८)

समाराध्य जगन्नाथं स तत्र पुरुपोत्तमम् ।

सर्वपापविनिर्मक्तो विष्णुलोकमवाप्तवान् ॥ ११९

एतत् ते कथितं ब्रान् विष्णोः सारस्वतं स्तवम् ।

विप्रवक्त्रस्थया सम्यक्सरस्वत्या समीरितम् ।। १२०

य एतत् परम स्तोत्रं वासुदेवस्य मानवः ।

पठिष्यति स सर्वेभ्यः पापेभ्यो मोक्षमाप्स्यति ॥ १२१

इति श्रीवामनपुराणे एकोनपटतमोऽध्याय' ।।