वामन महा पुराण
देवों की शयनविधि, अशून्यशयनद्वितीयाव्रत, कृष्णाष्टमी व्रत में रुद्र का पूजन
नारद उवाच ।
यानेतान् भगवान प्राह कामिभिः शशिनं प्रति ।
आराधनाय देवाभ्यां हरीशाम्यां यदस्व तान् ।। १
पुलस्त्य उवाच ।
मृणुष्व कामिभिः प्रोक्तान् व्रतान् पुण्यान् कलिप्रिय ।
आराधनाय शर्वस्य केशवस्य च धीमतः ॥२
यदा त्यापाढी संयाति व्रजते चोत्तरायणम् ।
सदा स्वपिति देवेशो मोगिभोगे श्रियः पतिः ॥३
प्रतिसुमे विभौ तस्मिन् ठेवगन्धर्वगुह्यकाः ।
देवानां मातरश्चापि प्रसुप्राधाप्यनुक्रमात् ।। ४
तथा भास्कर के लिये उन्हें प्रसन्न कर ब्रह्मा उन्हें वाराणसी में यये। (५८)
तदनन्तर वाकर ने दिवाकर को हाथ से उठाकर उनका 'लोले' नाम रसने के उपरान्त उन्हें पुन उनके रथ पर स्थापित किया।
दिनकर के अपने रथ में आरोपित हो जाने पर ब्रह्मा सुकेशी के निकट गए एव उसे पुन बान्धवों एवं नगर के साथ थाराश में आरोपित किया। (६०)
सुकेशी को (आकाश में) समारोपित करने के उपरान्त शकर का आलिङ्गन कर तथा केशवदेव को प्रणाम कर ब्रह्मा अपने वैराज नाम लोक को चले गए। (६१)
हे नारद । प्राचीन समय में इस प्रकार सूर्य ने सुकेशी के नगर को पृथ्वी पर गिराया एव महादेव ने दिवाकर को नेत्रानल से दग्ध न कर भूमितल पर गिराया था। (६२)
शंकर ने पुन सूर्य को प्रतिमासित होने के लिये भूमितल से (आकाश मे) आरोपित किया तथा ब्रह्मा ने निशाचरेन्द्र को उसके पुर और बधुओं के सहित आगश में आरोपित किया।
श्रीवामनपुराण में सोलहवाँ अध्याय समाप्त।।
नारद ने पूछा-आपने चन्द्रमा के विषय में कामियों द्वारा श्री हरि और शंकर की आराधना के लिये जिन व्रतों वा उल्लेख किया है उनका वर्णन करें। (२)
पुलस्त्य ने कहा-हे कलिप्रिय (कलहप्रिय = नारद)! महादेव और धीमान् केशव की आराधना के लिये कामियों द्वारा कथित पवित्र व्रतों का वर्णन सुनो। (२)
जब आपाढी पूर्णिमा आनेवाली होती है वथा उत्तरायण बीत जाता है उस समय श्रीपति देवेश मोगिभोग (शेषशय्या) परसोते हैं। (३)
उन विमु के सो जाने पर देवता, गन्धर्व, गुह्यक एवं
नारद उवाच ।
कथयस्व सुरादीनां शयने विधिमुत्तमम् ।
सर्वमनुक्रमेणैव पुरस्कृत्य जनार्दनम् ।। ५
पुलस्त्य उवाच ।
मिथुनाभिगते सूर्ये शुक्लपक्षे तपोधन ।
एकादश्यां जगत्स्वामी शयनं परिकल्पयेत् ॥ ६
शेपाहिमोगपर्यवं कृत्वा संपूज्य केशवम् ।
कृत्योपवीतकं चैव सम्यक्संपूज्य वै द्विजान् ॥ ७
अनुज्ञां ब्राह्मणेभ्यश्च द्वादश्यां प्रयतः शुचिः ।
लब्ध्या पीताम्बरधरः स्वस्ति निद्रां समानयेत् ।। ८
त्रयोदश्यां ततः कामः स्वपते शयने शुभे ।
कदम्बानां सुगन्धानां कुसुमैः परिकल्पिते ।। ९
चतुर्दश्यां ततो यक्षाः सपन्ति सुखशीतले ।
सौवर्णपङ्कजकृते सुखास्तीर्णोपधानके ॥ १०
पौर्णमास्यासमानाथः स्वपते चर्मसंस्तरे ।
येयाने च जटामारं समुद्ग्रन्थ्यान्यचर्मणा ॥ ११
ततो दिवाकरो राशि संप्रयाति च कर्कटम् ।
ततोऽमराणां रजनी भवते दक्षिणायनम् ॥ १२
ब्रह्मा प्रतिपदि तथा नीलोत्पलमयेऽनघ ।
तल्पे स्वपिति लोकानां दर्शयन् मार्गमुत्तमम् ॥ १३
विश्वकर्मा द्वितीयायां तृतीयायां गिरेः सुता ।
विनायकश्चतुथ्यो तु पञ्चम्यामपि धर्मराट् ॥ १४
पष्ठ्यां स्कन्द. प्रस्वपिति सम्म्यां भगवान् रविः
कात्यायनी तथाष्टम्यां नवम्यां कमलालया ॥ १५
दशम्यां भुजगेन्द्राश्च स्वपन्ते वायुभोजनाः ।
एकादश्यां तु कृष्णायां साध्या ब्रह्मन् स्वपन्ति च ॥१६
एप क्रमस्ते गदितो नभादौ स्वपने मुने ।
स्वपत्सु तत्र देवेषु प्रायट्कालः समाययौ ॥ १७
कङ्काः समं बलाकाभिरारोहन्ति नगोत्तमान् ।
वायसाश्चापि कुर्वन्ति नीडानि ऋषिपुंगव ।
वायसाथ स्वपन्त्येते मतो गर्भभरालसाः ॥ १८
यस्यां तिथ्यां प्रस्वपिति विश्वकर्मा प्रजापतिः।
देवमाताएँ भी क्रमश सो जाती हैं। (४)
नारद ने पूछा-जनार्दन से प्रारम्भर क्रमश देवतादि के शयन की समस्त उत्तम विधि मुझे बतलाएँ। (8)
पुलस्त्य ने कहा-हे तपोधन। (आपाद के) शुक्ल पक्ष में सूर्य के मिथुन राशि में जाने पर एकादशी तिथि को जगत्वामी जनार्दन शयन करते हैं। (६)
शेषनाग के शरीर का पर्यव बना र यज्ञोपवीतयुक्त श्रीकेशव एवं द्विजों की पूजा करने के उपरान द्वादशी तिथि में ब्राह्मगों से अनुज्ञा लेकर सयम एर पवित्रता-पूर्वक पीताम्बरधर को सुपपूर्वक निद्रा का आश्रय प्रहण करावे। (७-८)
तदनन्तर योदशी तिथि मे सुगन्धित कदम्य पुष्पों से निमित पविन शय्या पर कामदेव शयन करते हैं। (६)
तदुपरान्त चतुर्दशी को सुखदायकरूप में विधाये गये एवं उपधानयुक्त सुशीतल स्वर्णपङ्कज निर्मित शय्या पर यक्ष- गण शयन करते हैं। (१०)
पूर्णमासी तिथि को उमानाथ शंकर एक दूसरे चर्म द्वारा जटाभार याँध कर व्याघ्रचर्म की शय्या पर सोते हैं। (११)
तदनन्तर दिवाकर ट राशि मे गमन करते हैं। तर देवताओं के लिये रात्रिस्वरूप दक्षिणायन का आरम्भ होता है। (१२)
हे निष्पाप। लेगों को उत्तम मार्ग दिसलाते हुए ब्रह्मा प्रतिपद् तिथि मे नीलकमल की शय्या पर सोते है। (१३)
विश्वकर्मा द्वितीया को, पर्वतनन्दिनी तृतीया को, विना- यक (गणेश) चतुर्थी को और धर्मराज पञ्चमी को, स्कन्द पष्टी को, भगवान सूर्य सप्तमी को, कात्यायनी अष्टमी को, लक्ष्मी नवमी को, यायुभोजा सर्प दशमी को, तथा हे ब्रह्मन् । साध्यगण कृष्ण एकादशी को साते हैं। (१४-२६)
हे मुने । श्रावणादि मे क्रमानुसार देवताओं के सोने का क्रम हम ने तुम्हें बतलाया। देवों के सो जाने पर वाल का समागम होता है। (१७)
हे ऋषिश्रेष्ठ । बलाकाओं के साथ कव ऊँचे पर्वतों पर चढ़ जाते हैं तथा कोए घोंसले पनाने लगते हैं एवं मादा कौए इस ऋतु में गर्भ भार से भालस्य के कारण सोती है। (१८)
प्रजापति विश्वकर्मा जिस तिथि में सोते हैं वह कल्याण-
द्वितीया सा शुभा पुण्या अशून्यशयनोदिता ।। १९
तस्यां तिथापर्य हरि श्रीवत्साई चतुर्भुजम् ।
पर्यवस्थं समं लक्ष्म्या गन्धपुष्पादिभिर्मने ॥ २०
ततो देवाय शग्यायां फलानि प्रक्षिपेत् क्रमात् ।
सुरभीणि निवेद्येत्थं विज्ञाप्यो मधुसूदनः ।। २१
यथा हि लक्ष्या न वियुज्यसे त्वं
त्रिविक्रमानन्त जगन्निवास ।
तथाऽस्त्वशून्यं शयनं सदैव
अस्माकमेवेह तब प्रसादात् ।। २२
यथा स्वशून्यं तव देव तल्पं
समं हि लक्ष्म्या वरदाच्युतेश ।
सत्येन तेनामितवीर्य विष्णो
गार्हस्थ्यनाशो मम नास्तु देव ॥ २३
इत्युचार्य प्रणम्येशं प्रसाद्य च पुनः पुनः ।
नक्तं भुञ्जीत देवर्षे तैलक्षारविवर्जितम् ॥ २४
द्वितीयेऽह्नि द्विजाध्याय फलान् दद्याद् विचक्षणः ।
लक्ष्मीधरः प्रीयतां मे इत्युचार्य निवेदयेत् ।। २५
अनेन तु विधानेन चातुर्मास्यत्रतं चरेत् ।
यावद् वृश्चिकराशिस्थ. प्रतिभाति दिवाकरः ॥ २६
ततो विजुध्यन्ति सुराः क्रमशः क्रमशो मुने ।
तुलास्थेकें हरिः कामः शिवः पश्चाद्वियुध्यते ।। २७
तत्र दानं द्वितीयायां मूर्तिलक्ष्मीधरस्य तु ।
संशयास्तरणोपेता यथा विभवमात्मनः ॥ २८
एप व्रतस्तु प्रथमः प्रोक्तस्तव महामने ।
यस्मिवीर्णे वियोगस्तु न भवेदिह कस्यचित् ।। २९
नभस्ये मासि च तया या स्यात्कृष्णाष्टमी शुभा।
युक्ता मृगशिरेणैव सा तु कालाष्टमी स्मृता ॥ ३०
तस्यां सर्वेषु लिङ्गेपु तियो स्वपिति शंकरः ।
वसते संनिधाने तु वत्र पूजाऽक्षया स्मृता ॥ ३१
तत्र स्नायीत वै विद्वान् गोमूत्रेण जलेन च ।
कारिणी पवित्र अशून्यशयना नामक द्वितीया तिथि होती है। (१६)
हे मुने! उस तिथि में लक्ष्मी के साथ पर्यवस्थ श्रीवरसाडू चतुर्भुज हरि का गन्ध-पुष्पादि के द्वारा अर्चन कर उन देव के निमित्त शय्या पर क्रमशः फल तथा सुगन्ध निवेदित करने के उपरान्त मधुसूदन से इस प्रकार प्रार्थना करे- (२०-२१)
हे त्रिविक्रम ! हे अनन्त ! हे जगन्निवास जिस प्रकार आप लक्ष्मी से पृथक् नहीं होते उसी प्रकार आपकी । कृपा से हम लोगों का शयन कभी (स्त्री से) शून्य न हो। (२२)
हे देव ! हे परद! हे अच्युल । हे ईश हे अमितचीर्य याले विग्यो ! क्योंकि आपकी शय्या लक्ष्मी से शून्य नहीं होती इसी सत्य के प्रभार से हमारे गाईरध्य का नाश न हो।
हे देव! इस प्रकार स्तुति करने के पश्चात् इंश को प्रणाम द्वारा पुनः पुनः प्रसन्न पर रात्रि मे तेल एवं नमक से रहित भोजन करे। (२४)
दूसरे दिन युद्धिमान व्यक्ति लक्ष्मीघर मेरे ऊपर प्रसन्न हों' यह उच्चारण कर श्रेष्ठ ब्राह्मग को फल प्रदान करें। (२५)
इस विधान के द्वारा जय तक सूर्य वृश्चिक राशि पर रहते हैं तब तक चातुर्मास्य व्रत का पालन करना चाहिये। (२६)
हे मुने । तदनन्तर क्रमश देवगण जगते हैं। सूर्य के तुलाराशिस्थ होने पर हरि प्रबुद्ध होते हैं। तत्पश्चात् काम और शिव जगते हैं। (२७)
तदनन्तर द्वितीया के दिन अपने विभय के अनुसार आस्तरण. युक्त शय्या के साथ लक्ष्मीधर की मूर्ति या दान करे । (२८)
हे महामुने । इस प्रकार मैंने आप को प्रथम प्रत यत- लाया जिसरा आचरण करने पर इस संसार में किसी को वियोग नहीं होता। (२६)
इसी प्रकार भाद्रपद मास में मृगशिरा नक्षत्र से युक्त पवित्र कृष्णाटमी को वाराष्टमी माना गया है। (३०) उस तिथि में भगवान शंकर समस्त लिंगों में सोते एवं उनके सानिधान में निवास करते हैं। इस अवसर पर की गई शंकर की पूजा अक्षय मानी गई है। (३१)
उस विधि में विद्वान् मनुष्य गोमूत्र और जस से स्नान
स्नातः संपूजयेत् पुष्पैर्धत्तुरस्य त्रिलोचनम् ॥ ३२
धूपं केसरनिर्यास नैवेद्यं मधुसर्पिपी ।
प्रीयतां मे विरूपाक्षस्त्वित्युच्चार्य च दक्षिणाम् ।
विप्राय दद्यान्नैवेद्यं सहिरण्यं द्विजोत्तम ॥ ३३
वद्वदाश्वयुजे मासि उपवासी जितेन्द्रियः ।
नवम्यां गोमयस्नानं कुर्यात्पूजां तु पङ्कजै ।
धूपयेत् सर्जनिर्यास नैवेयं मधुमोदकैः ॥ ३४
कृतोपवासस्त्वष्टम्यां नवम्यां स्नानमाचरेत् ।
प्रीयतां मे हिरण्याक्षो दक्षिणा सतिला स्मृता ॥ ३५
कार्तिक पयसा स्नानं करवीरेण चाचनम् ।
धूपं श्रीवासनिर्यास नैवेद्यं मधुपायसम् ।। ३६
सनैवेद्यं च रजतं दातव्यं दानमग्रजे ।
प्रीयतां भगवान् स्थाणुरिति वाच्यमनिष्ठुरम् ॥ ३७
कृत्योपयासमष्टम्यां नवम्यां स्नानमाचरेत् ।
मासि मार्गशिरे स्नानं दमार्चा भद्रया स्मृता ।। ३८
धूपं श्रीवृक्षनिर्यासं नैवेद्यं मधुनोदनम् ।
संनिवेद्या रक्तशालिदक्षिणा परिकीर्तिता ।
नमोऽस्तु प्रीयतां शर्वस्त्विति वाच्यं च पण्डितैः ॥ ३९
पौपे स्नानं च हविपा पूजा स्यात्तगरैः शुभैः ।
धूपो मधुकनिर्यासो नैवेद्यं मधु शम्कुली ॥ ४०
समुद्गा दक्षिणा प्रोक्ता प्रीणनाय जगद्गुरोः ।
वाच्य नमस्ते देवेश व्यम्बकति प्रकीतयेत् ॥ ४१
माघे कुशोदकस्नानं मृगमदेन चार्चनम् ।
धूपः कदम्यनिर्यासो नैवेद्यं सविलोदनम् ॥ ४२
पयोभक्तं सनैवेद्यं सरुवमं प्रतिपादयेत् ।
प्रीयतां मे महादेव उमापतिरितीरयेत् ।। ४३
एवमेव समुद्दिष्टं पड्भिर्मामैस्तु पारणम् ।
पारणान्ते त्रिनेत्रस्य स्नपनं कारयेत्क्रमात् ॥ ४४
करें। स्नानोपरान्त घत्तर के पुष्पों से शंकर की पूजा करें। (३२)
हे द्विजोत्तम । केसर के निर्यास (गोंद) का धूप तथा मधु एवं घृत का नैवेद्य अर्पण करने के अनन्तर 'विरूपाक्ष मेरे ऊपर प्रसन्न हों यह कह कर ब्राह्मण को दक्षिणा तथा स्वर्ण के साथ नैवेद्य प्रदान करे।
इसी प्रकार आश्विन मास मे नरमी तिथि को उपवासी एव जितेन्द्रिय होकर गोबर से स्नान करने के उपरान्त कमलों से पूजन फरे तथा सर्ज वृक्ष के निर्यास का धूप एव मधु और मादक का नैवेद्य अर्पण करे। (३४)
अष्टमी पो उपवास करके नरमी को स्नान करने के परान्त 'हिरण्यास मेरे ऊपर प्रसन्न हों' यह कहते हुए तिलमिश्रित दक्षिणा प्रदान करे। (३१)
फार्तिक मे दुग्धस्नान तथा करवीर के पुष्प से अर्चन फरे तदनन्तर श्रीवास (सरल) वृक्ष की गोंद का घूप तया मधु एवं पायस का नैवेद्य अर्पण करने के पश्चात् नम्रता पूर्वक 'भगान् स्थाणु मेरे ऊपर प्रसन्न हों' यह रशारण करते हुए वामग को नैवेद्य के साथ रजत का दान करे। (३६-२७)
मार्गशीर्ष मास में अष्टमी तिथि को उपवास करके नग्मी तिथि में घिसे स्नान परे। इस अवसर पर भद्रा (औषधि- विशेप) के द्वारा पूजा बताई गई है। (3=)
श्रीवृक्ष के निर्यास का धूप, एक मधु और ओदन का नैवेद्य देकर पण्डित व्यक्ति 'शर्व को नमस्कार है, वे मेरे उपर प्रसन्न हों' यह कहते हुए रक्तशालि की दक्षिणा प्रदान करे। (३६)
पीप मास में घृत का स्नान तया सुन्दर तार पुष्पों द्वारा पूजा करे तदनन्तर महुए के वृक्ष की गोंद से घूप देकर मधु एव शब्कुली का नैवेद्य अपित करे तथा 'हे देवेश ध्यम्यक ! आपको नमस्कार है' यह कहते हुए जगद्गुरु के प्रीणनार्थ मुद्ग (मूंग) सहित दक्षिणा प्रदान (४०-४१)
माघ मास मे कुशोदक से स्नान तथा मृगमद् (कस्तूरी) से अर्चन करे । तदनन्तर कदम्ब वृक्ष के निर्यास का धूप देकर तिल एवं ओदन का नैवेद्य अर्पित करने के उपरान्त 'महादेव उमापति मेरे ऊपर प्रसन्न हों' यह कहते हुए स्वर्ण के साथ दूध एव भाउ की दक्षिणा प्रदान करे। (४२-४३)
इस प्रकार छ मासों के अनन्तर (प्रथम) पारण का विधान कहा गया। पारण के अन्त मे ग्रिनेत्र महादेय का क्रम से स्नान कार्य सम्पन्न कराये। (४४)
गोरोचनायाः सहिता गुडेन
देवं समालभ्य च पूजयेत ।
प्रीयस्न दीनोऽस्मि भवन्तमीश
मच्छोकनाशं प्रकुरुष्व योग्यम् ॥ ४५
ततस्तु फाल्गुने मासि कृष्णाष्टम्यां यतत्रत ।
उपवासं समुदितं कर्तव्यं द्विजसत्तम ॥ ४६
द्वितीयेऽसि ततः स्नानं पश्चगव्येन कारयेत् ।
पूजयेत्युन्दकुसुमेधूपयेत् चन्दनं स्वपि ॥ ४७
नैवेद्यं सघृतं दद्यात् ताम्रपात्रे गुडोदनम् ।
दक्षिणां च द्विजातिभ्यो नैवेद्यसहितां मुने ।
वासोयुगं प्रीणयेच्च रुद्रमुच्चार्य नामतः ॥ ४८
चैत्रे चोदुम्मरफलैः स्नानं मन्दारकार्चनम् ।
गुग्गुलु महिपाख्यं च घृताक्तं धूपयेद् बुधः ॥ ४९
समोदकं तथा सर्पिः प्रीणनं विनिवेदयेत् ।
दक्षिणा च सनैवेद्यं मृगाजिनमुदाहृतम् ॥ ५०
नाट्येश्वर नमस्तेऽस्तु इदमुच्चार्य नारद ।
प्रीणनं देवनाथाय कर्याच्छ्डासमन्वितः ॥ ५१
वैशाखे स्नानमुदितं सुगन्धकुसुमाम्भसा ।
पूजनं शंकरस्योकं चूतमञ्जरिभिर्विभो ।। ५२
धूपं सर्जाज्ययुक्तं च नैवेधं सफलं घृतम् ।
नामजप्यमपीशस्य कालग्नेति विपश्चिता ॥ ५३
जलकुम्भान् सनैवेद्यान् ब्राह्मणाय निवेदयेत् ।
सोपवीतान् सहानाधास्तचित्तैस्तत्परायणैः ॥ ५४
ज्येष्ठे स्नान चामलकै पूजाऽर्ककुसुमैस्तथा ।
धूपयेचत्रिनेत्र च आयत्या पुष्टिकारकम् ॥ ५५
सस्तूंच सघृतान् देवे दध्नास्तान् पिनिवेदयेत् ।
उपानधगलं छत्र दान दधाच भक्तिमान् ।। ५६
नमस्ते भगनेत्रन्न पूष्णो दशननाशन ।
इदमुच्चारयेद्भक्त्या प्रीणनाय जगत्पतेः ॥ ५७
आपाढे स्नानमुदित श्रीफलैरर्चन तथा ।
धत्तूरकुसुमै. शुक्लधूपयेत् सिल्हक तथा ॥ ५८
नैवेद्याः सघृता. पूपा. दक्षिणा सधृता यवाः ।
गोरोचन के सहित गुड द्वारा महादेव की प्रतिमा का अनुलेपन कर उसकी पूजा करे तथा इस प्रकार प्रार्थना करे "हे ईश । मैं दीन हूँ तथा थापकी शरण मे हूँ, आप मेरे ऊपर प्रसन्न हों तथा मेरे शोक का भलीभाँति नाश करें।" (४५)
तदनन्तर हे व्रतधारी द्विजश्रेष्ठ | फाल्गुन मास की कृष्णाष्टमी को उपवास करे । दूसरे दिन पश्चगव्य से स्नान कराये तथा कुन्द पुष्प द्वारा अर्चन कर चन्दन काधूप और ताम्रपान में घृतसहित गुडोदन का नैवेद्य प्रदान करे। तदुपरान्त 'रुद्र' शब्द का उच्चारण कर ब्राह्मणों को नैवेद्य के सहित दक्षिणा तथा दो वस्त्र प्रदान कर, महादेव को प्रसन्न करे। (४६४८)
चैत्र मास में गूलर के फल के जल से स्नान कराये और मन्दार के फूलों से पूजा करे। तदनन्तर बुद्धिमान व्यक्ति घृतमिमित महिप नामक गुग्गुलु से घूप देकर मोदक सहित घृत प्रसन्नता अर्पण करे एव 'नाट्येवर को नमस्कार है' यह कहते हुए नैवेद्य सहित मृगचर्म की दक्षिणा प्रदान करे। इस प्रकार श्रद्धायुक्त होकर देवनाय को प्रसन्न करे। (४६-५१)
हे विभो। वैशास मास में सुगन्धित पुष्पों के जल से स्नान तथा आम्रमारियों से शहर के पूजन का विधान है। इस समय घृतमिश्रित सर्ज वृक्ष के निर्यास का धूप तथा फल सहित घृत का नैवेद्य अर्पण करे। बुद्धिमान व्यक्ति को श्री शिव के 'कालन' नाम का जप करना चाहिये, तथा तम्मना एव तत्परायण होकर ब्राह्मण को नैवेद्य, उपवीत एव अन्नादि के साथ जलकुम्भ की दक्षिणा (५२५४)
ज्येष्ठ मास में आमलक के जल से स्नान कराये तथा अर्क (मन्दार) के पुष्पों से पूजन करे। तदनन्तर भविष्य में पुष्टिकारक त्रिनेत्र को धूपदान करे एवं घृत तथा दधिमिश्रित सत्तू का नैवेद्य अपित करे। जगत्पति के प्रीत्यर्थ है भगननघ्न एव पूपा के दाँत के नाशक आप को नमस्कार है' यह यहार भक्तिपूर्वक छत्र एव उपानयुगल दक्षिणा में प्रदान करे। (५५-५७)
आषाढ मास में प्रोफ्लसयुक्त जल से स्नान कराये तथा पत्र के श्वेत पुष्पों से अचन करे। तदनन्तर सिल्हक का घूप देकर पृढ सहित पूप का नैवेर अर्पण करे एवं 'हे दश्यमन आप को नमस्कार ,इसे सच स्वर से
नमस्ते दक्षयज्ञघ्न इदमुच्चैरुदीरयेत् ॥ ५९
श्रावणे मृगभोज्येन स्नानं कृत्वायेद्धरम् ।
श्रीवृक्षपत्रः सफलधूपं दधात् तथाऽगुरुम् ।। ६०
नैवेधं सघृतं दद्यात् दधि पूपान् समोदकान् ।
दध्योदनं सकृसरं मापधानाः सशप्कुलीः ॥ ६१
दक्षिणां श्वेतपमं धेनुं च कपिलां शुभाम् ।
कनकं रक्तवसनं प्रदद्याद् ब्राह्मणाय हि ।
गङ्गाधरेति जप्तव्यं नाम शंभोश्च पण्डितैः ॥ ६२
अमीभिः पभिरपरैमासैः पारणमुत्तमम् ।
एवं संवत्सरं पूर्ण संपूज्य वृषभध्वजम् ।
अक्षयान् लभते कामान् महेश्वरवचो यथा ॥ ६३
इदमुक्तं व्रतं पुण्यं सर्वाक्षयकरं शुभम् ।
स्वयं रुद्रेण देवर्षे तत्तथा न तदन्यथा ॥ ६४
इति श्रीवामनपुराणे सप्तदशोऽध्यायः ॥१७॥