हरललित-शरद् वर्णन, शिव का सती के साथ मन्दराचल पर निवास, दक्ष के द्वारा यज्ञ का उपक्रम, शिव के कपाली होने का कारण

पुलस्त्य उवाच ।

ततस्त्रिनेनस्य गतः प्रावृट्कालो धनोपरि ।

लोकानन्दकरी रम्या शरत् समभवन्मुने ॥१

त्यजन्ति नीलान्युधरा नभरतलं

वृक्षांव कङ्काः कङ्काः सरितस्तटानि ।

पद्माः सुगन्धं निलयानि धायसा

रुरुर्विपाणं कलुपं जलाशयाः ॥ २

विकासमायान्ति च पङ्कजानि

चन्द्रांशवो भान्ति लताः सुपुष्पाः ।

नन्दन्ति हृष्टान्यपि गोकुलानि

सन्तश्च संतोपमनुव्रजन्ति ॥ ३

सरस्सु पद्मा गगने च तारका

जलाशयेष्वेव तथा

सतां च चित्तं हि दिशां मुखैः समं

वैमल्यमायान्ति शशाङ्ककान्तयः॥४

एतादृशे हरः काले मेघपृष्ठाधिवासिनीम् ।

सतीमादाय शैलेन्द्रं मन्दरं समुपाययौ ॥५

ततो मन्दरपृष्ठेऽसौ स्थितः समशिलातले ।

रराम शंभुर्भगवान् सत्या सह महाधुतिः ॥ ६

ततो व्यतीते शरदि प्रतिबुद्धे च केशवे ।

दक्षः प्रजापतिश्रेष्ठो यष्टुमारभत ऋतुम् ॥ ७

द्वादशैव स चादित्याञ् शकादींश्च सुरोत्तमान् ।

सकश्यपान् समामन्य सदस्यान् समचीकरत् ॥ ८

अरुन्धत्या च सहितं वसिष्ठं शंसितव्रतम् ।

सहानसूययात्रिं च सह धृत्या च कौशिकम् ॥ ९

अहल्यया गोतमं च भरद्वाजममायया।

चन्द्रया सहितं ब्रह्मन्नृपिमङ्गिरसं तथा ॥१०

आमन्व्य कृतवान्दक्षः सदस्यान् यज्ञसंसदि ।

विद्वान् गुणसंपन्नान् वेदवेदाङ्गपारगान् ॥ ११

धर्म च स समाहूय भार्ययाऽहिंसया सह ।

पुलस्त्य ने कहा-तत्पश्चात् त्रिनेत्र महादेव का वोशल मेघों के ऊपर व्यतीत हो गया। तदुपरान्त हे मुने, लोकों फी आनन्दकारिणी रमणीय शरद् प्रारंभ हुई। (१)

(शरदागम होने पर) नील मेघों ने आकाश का, बगुलों ने वृक्षों का और नदियों ने तट का त्याग कर दिया। कमल मुगन्ध छोड़ने लगे, काकों ने घोसलों का परित्याग पर दिया । रुरमृगों के शृङ्ग गिर गए और जलाशय मलिनता से रहित हो गए। (२)

कमल पियसित होने लगे, शुभ्र ज्योत्स्ना प्रभासित होने लगी,लताएँ पुष्पित हो गयीं, गोकुल सुपुष्ट एवं आनंदित हो गए तथा सजन रोगों यो सन्नोप की प्राप्ति हुई। (३)

जलाशयों में कमल, गगन में तारे, जलाशयों में जल दिशाओं के साथ-साय सजनों का चित्त तथा चन्द्रमा की पान्ति विमल हो गई। (४)

ऐसे समय शेर जी मेघ के ऊपर स्थित सती को लेकर श्रेष्ठ मन्दर पर्वत पर पहुंचे। (५)

तदनन्तर महाद्युतिमान् भगवान् शंकर मन्दराचल के ऊपर एक समतल शिला पर अवस्थित होकर सती के साथ रमण करने लगे। (६)

तदुपरान्त शरदकाल के बीतने पर तथा केशय (विष्णु) के जागृत होने पर प्रजापति-श्रेष्ठ दक्ष ने यज्ञ करना आरंभ (७)

उन्होंने द्वादश आदित्यों तथा कश्यपादि (पियों) के साथ इन्द्र आदि श्रेष्ठ देवताओं को निमन्त्रित कर उन्हें यज्ञ का सदस्य बनाया । (८)

हे ब्रह्मन् , उन्होंने अन्धती के साथ प्रशस्तप्रतधारी वसिष्ठ को, अनसूया के साथ अत्रि फो, धृति के साथ कौशिक को, अहल्या के साथ गौतम को, अमाया के साथ भरद्वाज को तथा चन्द्रा के साथ अगिरा ऋपि को (यज्ञ में) निमन्त्रित किया। (E-१०)

इन गुणसम्पन्न वेदवेदाङ्गपारगामी विधान सृपियों को

निमन्य यज्ञवाटस्य द्वारपालत्वमादिशत् ॥ १२

अरिटनेमिनं चक्रे इध्माहरणकारिणम् ।

भृगुं च मन्त्रसंस्कारे सम्यग् दक्षः प्रयुक्तवान् ॥ १३

तथा चन्द्रमसं देवं रोहिण्या सहित शुचिम् ।

धनानामाधिपत्ये च युक्तवान् हि प्रजापतिः ॥ १४

जामाहितृश्चैव दौहित्रांच प्रजापतिः ।

सशंकरां सती मुक्तवा मखे सर्वान् न्यमन्त्रयत् ॥ १५

नारद उवाच ।

किमयं लोकपतिना धनाध्यक्षो महेश्वरः।

ज्येष्ठः श्रेष्ठो बरिष्ठोऽपि आयोऽपि न निमन्त्रितः॥१६

पुलम्स्य उवाच।

ज्येष्ठः श्रेष्ठो वरिष्ठोऽपि आयोऽपि भगवाशिनः ।

कपालीति विदित्वेशो दक्षेण न निमन्त्रितः ॥ १७

नारद उवाच।

किमयं देवताश्रेष्ठः शूलपाणिस्निलोचनः ।

कपाली भगवाजातः कर्मणा केन शंकरः ॥ १८

पुलस्त्य उवाच।

भृणुष्वावहितो भूत्वा कथामेतां पुरावनीम् ।

प्रोक्तामादिपुराणे च ब्रह्मणाऽव्यक्तमूर्तिना ॥ १९

पुरा त्वेकार्णच सर्व जगत्स्थापरजङ्गमम् ।

नष्टचन्द्रार्कनक्षत्रं प्रणष्टपेवनानलम् ।। २०

अप्रतर्यमविज्ञेयं भावाभावविवर्तितम् ।

निमग्नपर्वततरु तमोभूतं मुदुर्दशम् ।। २१

तस्मिन् स शेते भगवान् निद्रां वर्प सहस्रिकीम् ।

राज्यन्ते सुनते लोकान् राजसं रूपमास्थितः ॥ २२

राजसः पञ्च यदनो वेदवेदाङ्गपारगः।

सप्टा चराचरस्यास्य जगतोऽद्भुतदर्शनः ॥ २३

तमोमयस्तथैवान्यः समुद्भूतप्रिलोचनः।

शूलपाणिः कपर्दी च अक्षमालां च दर्शयन् ॥ २४

ततो महात्मा घसृजदहकारं सुदारुणम् ।

येनामान्ताभी देवो तावेव ब्रह्मशंकरौ ।। २५

अहंकारावृतो रुदः प्रत्युवाच पितामहम् ।

निमन्त्रित कर दक्ष ने उन्हें यज्ञ में सदस्य बनाया । (२१)

धर्म यो उनकी पत्नी अहिंसा के साथ निमन्त्रित कर उन्हें यक्षमण्डप या द्वारपाल बनाया। (१२)

 दक्ष ने अरिष्टनेमि को समिधा राने का कार्य दिया क्या भृगु को मन्यसस्कार के कार्य मे भलीभाँति नियुक्त (१३)

तथा प्रजापति दक्ष ने रोहिणी के साथ शुचि चन्द्रदेय पो धनाधिपति के पद पर नियुक्त किया। (१४)

प्रजापति ने सती एव शर को छोड़कर अपने सभी जामाताओं, पुगियों एव दीहिनों को यज्ञ में आमन्त्रित (१५)

नारद ने कहा-लोरपति दक्ष रे माहेश्वर ये प्येर, शेर, यरिष्ठ, आद्य एघ धनाध्यक्ष होने पर भी उन्हें क्यों निमन्त्रित नहीं किया? (१६)

पुरस्त्य ने कहा-"ज्येष्ठ, श्रेष्ठ, परिष्ठ तथा आय होते हुए भी भगवान शिव को पारी जान पर प्रजापति दक्ष ने उन्हें निमग्रिन नहीं दिया।" (१७)

"देवश्रेष्ठ नारद ने कहा-शूटपाणि चिटोपा भगवान् शंकर क्यों एप किस फर्म से कपाटी बने" (१८)

पुलरत्य ने कहा-

"आप सावधान होर सुनें, में आदिपुराण में अव्यक्तमूर्ति प्रमा जी द्वारा यही गई इस प्राचीन क्या को कहता हूँ।" (१६)

प्राचीन समय में समस्त स्थावरनगमात्मक जग एकार्णय था । पन्द्र, सूर्य, नक्षत्र, यायु एवं अग्नि तिरोहित ये । तत्कालीन जगत् की अवस्था अप्रतार्य, अविशेय तथा भाव अभाव से रहित थी। सभी पया एवं वृक्ष जल में निमग्न थे तथा सम्पूर्ण जगन् तमोभूत एघ दुर्दशामस्त था। (२०-२५)

उस एरार्णय में भगरान विष्णु सहस पो की निद्रा में शयन पले में एक पति के अंत में राजसिक रूपया आश्रय कर वे समरत लोकों पी पष्टि करते हैं। (२२)

उनरा राजस स्वरूप इस चराचरात्मक जगत् पासा, अद्मुतदर्शन, पत्रमुय एवं वेदवेदाङ्गपारगाव था । (२३)

उसी प्रमर र अन्य पुरुष प्रादुर्भूत हुआ जो तमोमप, निलोपन, शूलपाणि,फपी दया रद्राक्षमालाधारी था (२४)

सदनन्तर परमात्मा ने अतिधारण अपर पी पुष्टि की जिससे रक्षा तथाकर दोनों ही देयता आनन्द हुए।(२५)

को भवानिह संप्राप्तः केन सृष्टोऽसि मां पद ॥ २६

पितामहोऽप्यहंकारात् प्रत्युवाचाथ को भवान् ।

भवतो जनकः कोऽत्र जननी वा तदुच्यताम् ॥ २७

इत्यन्योन्यं पुरा ताभ्यां ब्रह्मशाभ्यां कलिप्रिय ।

परिवादोऽभवत् तत्र उत्पत्तिर्भवतोऽभवत् ।। २८

भवानप्यन्तरिक्षं हि जातमात्रस्तदोत्पतत् ।

धारयनतुलां वीणां कुर्वन् किलकिलाध्वनिम् ।। २९

ततो विनिर्जितः शंभुर्मानिना पायोनिना।

तस्थावधोमुखो दीनो ग्रहाक्रान्तो यथा शशी ।। ३०

पराजिते लोकपती देवेन परमेष्ठिना।

क्रोधान्धकारितं रुद्रं पश्चमोऽथ मुखोऽब्रवीत् ॥ ३१

अहं ते प्रतिजानामि तमोमूर्ते त्रिलोचन ।

दिग्यासा वृपभारढो लोकक्षयकरो भवान् ॥ ३२

इत्युक्तः शंकरः क्रुद्धो वदनं धोरचक्षुपा ।

निर्दग्धुकामस्त्वनिशं ददर्श भगवानजः ॥ ३३

ततस्त्रिनेत्रस्य समुद्भवन्ति

वक्त्राणि पश्चाथ सुदर्शनानि ।

श्वेतं च रक्तं कनकावदावं

नीलं तथा पिङ्गजटं च शुभ्रम् ॥ ३४

यत्राणि दृष्ट्वार्कसमानि सपः

पतामहं वक्त्रहवाच वाक्यम् ।

समाहवम्याथ जलस्य युवुदा

भवन्ति किं तेषु पराक्रमोऽस्ति ॥ ३५

तच्छ्रुत्या कोधयुक्तेन शंकरेण महात्मना ।

नसाग्रेण शिरश्छिन्नं मागं परुपयादिनम् ॥ ३६

तच्छिन्नं शंकरस्यैव सव्ये करतलेऽपतत् ।

पवते न कदाचिच्च तच्छंकरकराच्छिरः ॥ ३७

अथ क्रोधावृतेनापि ब्रह्मणाऽद्भुतकर्मणा ।

सृष्टस्तु पुरुषो धीमान् कवची कुण्डली शरी ॥ ३८

धनुष्पाणिर्यहागहुर्याणशक्तिधरोऽव्ययः ।

चतुर्भुजो महातूणी आदित्यसमदर्शनः ।। ३६

स प्राह गच्छ दुर्घद्धे मा त्वां शूलिन् निपातये ।

अहकारावृत शकर ने पितामह से कहा-"आप कौन यहाँ आये हैं ? मुझे बतलाओ कि किसने तुम्हारी सृष्टि की है " (२६)

पितामह ने भी अहकार से उत्तर दिया-"यह बताइये कि आप कौन हैं तथा आपके जनक एय जननी कौन है ?" (२७)

हे कलिप्रिय नारद, इस प्रकार प्राचीन काल मे ब्रह्मा और शकर के मध्य पारस्परिक विवाद हुआ। यहीं आपकी उत्पत्ति हुई थी। (२८)

और आप भी उत्पन्न होते ही अनुपम वीणा धारण किये किलकिल ध्वनि करते हुए ऊपर अन्तरिक्ष की ओर चले गये। (२६)

तदुपरान्त मानी पद्मयोनि (ब्रह्मा) द्वारा विजित होकर प्रहाकान्त चन्द्रमा के सदृश दीन शकर अधोमुख होकर (३०)

परमेष्ठि देव (ब्रह्मा) के द्वारा लोकपति (शकर) के पराजित होने पर क्रोधान्धकारित रुद्र से (श्री ब्रह्मा जी के पाँचव मुख ने कहा- (३१)

हे तमोमूर्ति त्रिलोचन। मैं आपको पहचानता हूँ

कि आप दिगम्बर, पारोही एवं लोकसंहारक है। (३२)

ऐसा कहे जाने पर अजन्मा भगवान शंकर ने भरम करने की कामना से अपने भयङ्कर नेत्र द्वारा (ब्रह्मा के उस) सुख का निरन्तर अवलोकन किया। (३३)

तदनन्तर श्री शकर के श्वेत, रक्त, स्वर्णिम नील एच पिगल वर्ण के सुन्दर पाँच मुस समुद्भूत हुए। (३५)

सूर्य सदृश सत्य (समुद्भूत) मुखों को देखकर पिता- मह के मुख ने कहा "समाहृत जल मे बुबुद् तो उत्पन्न होते है किन्तु क्या उनमे पराक्रम भी होता है ?" (३५)

यह सुनकर कोधयुक्त महात्मा शंकर ने नख के अन भाग से ब्रह्मा के परुपभाषी शिर को काट दिया। (३६)

यह पटा हुआ शिर शकर के ही वाम हथेली पर गिरा एव यह कपाल श्री शंकर के उस हथेली से किसी प्रकार भी नहीं गिरा। (३७)

तदनन्तर अगुवर्मा क्रोधावृत ब्रह्माने भी कवच कुण्डल एवं शर धारण करने वाले, धनुर्धर, महाबाहु, बाणशक्तिधर, अव्यय, चतुर्भुज, महातूणीर युक्त, आदित्य के समान दिख- लाई पडने वाले एक बुद्धिमान पुरुष की सृष्टि की । (३८-३६)

उन्होंने कहा-“हे दुर्बुद्धि शूलधारी शंकर, तुम चले

भवान् पापममायुक्तः पापिष्ठं को जिघांसति ॥ ४०

इत्युक्तः शकरस्तेन पुरुषेण महात्मना ।

अपायुक्तो जगामाय रुद्रो बदरिकाश्रमम् ॥ ४१

नरनारायणस्थानं पर्वते हि हिमाश्रये ।

सरस्वती यत्र पुण्या स्यन्दते सरितां वरा ॥ ४२

तत्र गत्वा च तं दृष्ट्या नारायणमुनाच ह ।

मिक्षा प्रयच्छ भगवन् महाफापालिकोऽस्मि भोः॥ ४३

इत्युक्तो धर्मपुत्रस्तु रुद्र वचनमब्रवीत् ।

सव्यं भुजं ताडयस्व त्रिशूलेन महेश्वर ॥ ४४

नारायणवचः श्रुत्वा त्रिशूलेन त्रिलोचनः ।

सव्यं नारायणभुजं ताडयामास वेगवान् ॥ ४५

त्रिशूलाभिहतान्मार्गात् तिस्रो धारा विनिर्ययुः ।

एका गगनमान्य स्थिता ताराभिमण्डिता ॥ ४६

द्वितीया न्यपतद् भूमौ ता जग्राह तपोधनः ।

अविस्वस्मात् समुद्भुतो दुर्वासाः शंकरांशतः ॥ ४७

तृतीया न्यपतद् धारा कपाले रौद्रदर्शने ।

तस्माच्छिशुः समभवत् संनडुकवचो युवा ॥ ४८

श्यामावदातः शरचापपाणि

गर्जन्यथा प्रावृषि तोयदोऽसौ।

इत्थ त्रुवन् कस्य विशातयामि

स्कन्धाच्छिरस् तालफलं यथैव ॥ ४९

तं शंकरोऽभ्येत्य वचो यभापे

नरं हि नारायणराहुजातम् ।

निपातयैनं नर दुष्टवाक्य

ब्रह्मात्मजं सूर्यशतप्रकाशम् ॥ ५०

इत्येवमुक्तः स तु शंकरण

आद्यं धनुस्त्वाजगवं प्रसिद्धम् ।

जग्राह तूणानि तयाऽक्षयाणि

युद्धाय वीरः स मतिं चकार ॥५१

ततः प्रयुद्धौ सुधृशं महाबलौ

ब्रह्मात्मजो बाहुभवश्व शाव।

दिव्यं सहस्र परिवत्सराणां

ततो हरोऽभ्येत्य विरश्चिमूचे ।। ५२

जितस्त्वदीयः पुरुषः पितामह

जाओ, मैं तुम्हें नहीं मारूंगा। तुम पापयुक्त हो, पापिष्ठ को कौन मारना चाहता है?( ४0)

उस महापुरुष ने शकर से इस प्रकार कहा तब रुद्र लज्जित होकर बदरिकाश्रम को चले गए। (४१)

हिमालय पर्वत पर (वह बदरिकाश्रम) नर नारायण का स्थान है जहाँ नदियों में श्रेष्ठ पवित्र सरस्वती नदी प्रवाहित होती हैं। (४२)

वहाँ जाकर और उन नारायण को देखकर शकर ने कहा-“हे भगवन् । मैं महाकापालिक हूँ। आप मुझे भिक्षा दें। (४३)

ऐसा कहे जाने पर धर्मपुत्र (नारायण) ने रुद्र से कहा- "हे महेश्वर । तुम त्रिशूल के द्वारा मेरी वायी भुजा को ताडित करो। (४४)

नारायण के वचन को सुन कर वेगवान् त्रिलोचन ने त्रिशूल से उनकी याम भुजा को ताडित किया। (४५)

निशूराहत्त मार्ग से तीन धाराएँ निकलीं । एक धारा आकाश मे जाकर ताराओं से अभिमण्डित हुई। दूसरी धारा पृथ्वी पर गिरी जिसे तपोपन अनि ने ग्रहण किया। उससे

शङ्कर के अश से दुर्वासा का प्रादुर्भाव हुआ। तृतीय धारा भयानक दिखाई पडने वाले कपाल पर गिरी जिससे एक शिशु उत्पन्न हुआ, वह (तत्काल) कवच बाँधे, श्यामवर्ण का, हाथों मे धनुषवाण धारण किए एक युवक हो गया। वर्षा काल में जिस प्रकार मेघ गर्जन करते हैं उसी प्रकार यह (युवा पुरुष) यह कह रहा था मैं तालफल के सदृश किसके स्कन्ध से शिर को काढूँ।" (४-४९)

श्री नारायण के बाहु से उत्पन्न पुरष के समीप जाकर श्रीशकर ने कहा-'हे नर । शत सूर्यसदृश प्रकाशमान कटु भाषी ब्रह्मा से उत्पन्न इस पुरुष को तुम मारो।" (५०)

शकर के ऐसा कहने पर उस पार पुरुष ने प्रसिद्ध आद्य अजगव (नामक) धनुप एव अक्षय तूणीर ग्रहण कर युद्ध का निश्चय किया। (५१)

तदनन्तर ब्रह्मात्मज एव बाहुजात शकर पुरुष-दोनों महाबलवान् पुरुपों ने सहस्र दिव्य वर्षों तक प्रबल युद्ध किया। तत्पश्चात् श्रीशकर ने ब्रह्मा के पास जाकर कहा- (५२)

"हे पितामह । यह एक अद्भत बात है कि दिव्य प'

नरेण दिव्याझुवकर्मणा चली।

महाप्रपत्रभिपत्य ताडित-

स्तदद्भुतं चेह दिशो दशैव ।। ५३

ब्रह्मा तमीशं वचनं पभापे

नेहास्य जन्मान्यजितस्य शंभो।

पराजितश्चेष्यतेऽसौ त्वदीयो

इति श्रीवामनपुराणे द्वितीयोध्याय।।२।।

पुलस्त्य उवाच ।

ततः करतले रुद्रः कपाले दारुणे स्थिते ।

संतापमगमद् ब्रह्मंश्चिन्तया व्याकुलेन्द्रियः ॥ १

ततः समागता रौद्रा नीलाञ्जनचयप्रभा ।

संरक्तमूईजा भीमा ब्रह्महत्या हरान्तिकम् ॥ २

तामागतां हरो दृष्ट्या पप्रच्छ विकरालिनीम् ।

कासि त्वमागता रौद्र केनाप्यर्थेन तद्वद ॥३

कपालिनमथोवाच ब्रह्महत्या सुदारुणा।

अद्भुत कर्म वाले नर ने दशों दिशाओं में व्याप्त महान् आगों के प्रहार से ताडित कर आपके पुरुष को जीत लिया। (५३)

ब्रह्मा ने उस ईश से कहा कि- इस अजित का जन्म यहाँ दूसरों से हारने के लिये नहीं हुआ है। यदि किसी

श्री वामन पुराग में द्वितीयअध्याय समाप्त।।२।।