हरललित(शिव की लीलाएँ)- वर्षावर्णन तथा शङ्कर के जीमूतकेतु होने का कारण

नारायणं नमस्कृत्य नरं धैव नरोत्तमम्।

देवी सरस्पती व्यासं ततो जयसुदीरयेत्।।

त्रैलोक्यराज्यमाक्षिप्य मलेरिन्द्राय यो ददौ ।

श्रीधराय नमस्तस्मै छपवामनरूपिणे ॥१

पुलस्त्यमृपिमासीनमाश्रमे वाग्निदां वरम् ।

नारदः परिपप्रच्छ पुराणं वामनाश्रयम् ॥ २

कथं भगवता ब्रह्मन् विष्णुना प्रभविष्णुना ।

वामनत्वं धृतं पूर्व उन्ममाचक्ष्य पृन्तः ॥ ३

कथं च वैष्णयो भूत्वा प्रदादो दैत्यसत्तमः ।

त्रिदशैर्युयुधे सार्धमत्र मे संशयो महान् ॥ ४

श्रूयते च द्विजश्रेष्ठ दक्षस्य दुहिता सती ।

शंकरस्य प्रिया भार्या वभूव वरवर्णिनी ॥ ५

किमर्थ सा परित्यज्य स्वशरीरं वरानना ।

जाता हिमरतो गेहे गिरीन्द्रस्य महात्मनः ॥६

पुनश्च देवदेवस्य पत्नीत्वमगमच्छुभा ।

एतन्मे संशयं छिन्धि सर्ववित् त्वं मतोऽसि मे ॥७

तीर्थानां चैत्र माहात्म्यं दानानां चैव सत्तम ।

प्रतानां विपिधानां च विधिमाचक्षन मे द्विज ॥८

एवमुक्तो नारदैन पुलस्त्यो मुनिसत्तमः ।

प्रोवाच वदतां श्रेष्ठो नारदं वपसो निधिम् ॥ ९

पुलस्त्य उवाच।

पुराणं वामनं वक्ष्ये क्रमानिखिलमादितः।

अवधानं स्थिरं कृत्वा शृणुष्प मुनिसत्तम ।। १०

पुरा हेमवती देवी मन्दरस्थं महेश्वरम् ।

नारायण, नरों में श्रेष्ठ नर, देवी सरस्वती और व्यास  को नमस्कार करने के अनन्तर जय(पुराणादि) वो पड़े।

जिन्होंने घलि से त्रैलोक्य (स्वर्ग, मर्त्य और पाताल) के राज्य को छीन कर इन्द्र को देदिया था, छल से वामनरूप धारण करने वाले उन श्रीधर विष्णु को नमस्कार है। (२)

विद्वानों मे श्रेष्ठ महर्षि पुलस्त्य आश्रम में बैठे थे। देवर्षि नारद ने उनसे वामन से सम्बद्ध पुराण की कथा

पूड़ी- (२)

हे ब्रह्मन् , सामर्थ्यशाली भगवान विष्णु ने कैसे पूर्व काल में घामन-शरीर ग्रहण किया था, इसे आप मुझ प्रश्न कर्ता को बताइये। (३)

दैत्यों में श्रेष्ठ प्रहलाद, वैष्णव होकर भी देवताओं के साथ संग्राम में क्यों प्रवृत्त हुए थे, इस विषय में मुझे बड़ा सदेह है। (४)

हे द्विजश्रेष्ठ, ऐसा सुनने में आता है कि प्रजापति दक्ष की परम सुन्दरीक्ग्या सती शर की प्रिय परती हुई थीं। (५)

वह सुन्दर मुखवाली (सती) क्यों अपने शरीर को छोड़

कर पर्वतराज महात्मा हिमाचल के घर में उत्पन्न हुई । (६)

और पुन वह कश्याणी देवदेव (महादेव) की पत्नी बनी। मेरे विचार से आप सर्वज्ञ है, अत इस सशय को आप दूर करें। (७)

हे सत्पुरुषों मे श्रेष्ठ, हे द्विज, तीर्थों तथा दानों की महिमा तथा विविध वनों की अनुष्टान विधि भी मुझे यताइये। (८)

नारद के द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर मुनियों में मुख्य तथा वक्ताओं में श्रेष्ठ पुलस्त्य, तपोधन नारद से कहने लगे- (९)

पुलस्त्य ने कहा-मैं आदि से प्रारम्भ करके प्रमश सम्पूर्ण वामन पुराण का वर्णन करूँगा । हे मुनिश्रेष्ठ, आप ध्यान लाकर सुनिये। (१०)

प्राचीन समय में देवी हैमवती (सती) ने प्रीष्म ऋतु का आगमन देसकर मन्दर पत पर बैठे हुए महेश्वर से यह वचन कहा (११)

उवाच वचनं दृष्ट्वा ग्रीष्मकालमुपस्थितम् ॥ ११

ग्रीष्मः प्रवृत्तो देवेश न च ते विद्यते गृहम् ।

यत्र वातातपौ ग्रीष्मे स्थितयोनौं गमिष्यतः ॥ १२

एवमुक्तो भवान्या तु शंकरो वाक्यमब्रवीत् ।

निराश्रयोऽहं मुदति सदाऽरण्यचरः शुभे ॥ १३

इत्युक्ता शंकरेणाथ वृक्षच्छायासु नारद ।

निदाघकालमनयत् समं शर्वेण सा सती ॥ १४

निदाघान्ते समुद्भूतो निर्जनाचरितोऽद्भुत ।

घनान्धकारिवाशो वै प्रादकालोऽतिरागवान् ॥ १५

तं दृष्ट्या दक्षतनुजा प्रावृटकालमुपस्थितम् ।

प्रोवाच वाक्यं देवेशं सती सप्रणय तदा ॥ १६

विवान्ति वाता हृदयावदारणा

गर्जन्त्यमी तोयधरा महेश्वर ।

स्फुरन्ति नीलाघ्रगणेषु विद्यतो

वाशन्ति केकारवमैव पर्हिणः ॥ १७

पतन्ति धारा गगनात् परिच्युता

वफा बलाकाश्च सरन्ति तोयदान् ।

कदम्बसर्जार्जुनकेतकीद्रुमाः

पुष्पाणि मुञ्चन्ति सुमारुताहताः ॥ १८

श्रुत्वैव मेघस्य दृढं तु गर्जितं

त्यजन्ति हंसाश्च सरांसि तत्क्षणात् ।

यथाश्रयान् योगिगणाः समन्तात्

प्रवृद्धमूलानपि सत्यजन्ति ॥ १९

इमानि यूथानि वने मृगाणां

चरन्ति धावन्ति रमन्ति शंभो ।

तथाऽचिराभा. सुतरा स्फुरन्ति

पश्येह नीलेषु पनेषु देव ।

नूनं समृद्धि सलिलस्य दृष्ट्या

चरन्ति शरास्तरुणद्रुमेपु ॥ २०

उवृत्तवेगाः सहसैव निम्नगा

जाताः शशाङ्कासितचास्मौले ।

किमत्र चित्रं यदनुज्ज्वलं जनं

निषेव्य योपिद् भवति त्वशीला ॥ २१

नीलैश्च मेघैश्च समावृतं नमः

पुष्पैश्च सर्जा मुकुलैश्च नीपा.।

फलैश्च विल्या. पयसा तथापगा.

हे देवेश, प्रीष्म ऋतु का आरम्भ हो गया है किन्तु आपका कोई घर नहीं है जहाँ रहते हुए हम दोनों प्रीष्म के वायु प्रवाह और ताप को बिता सकें। (१२)

भवानी के ऐसा कहने पर शकर ने कहा- 'हे शुभे, हे सुन्दर दाँतों वाली, मैं गृहहीन और सदा वन मे विचरण करने वारा हूँ। (१३)

हे नारद, शकर के इस प्रकार कहने पर उन सती ने श्कर के साथ वृक्षों की छाया मे प्रीष्मकाल बिताया। (१४)

ग्रीष्म ऋतु के अन्त में अद्भुत वर्षाऋतु का आगमन हुआ जो अत्यधिक राग को बढाने वाला था। इससे लोगों का आना जाना रुक गया तथा मेघों के द्वारा आच्छन्न हो जाने से दिशायें अन्धकारमय हो गई। (१५)

उस यवाल को उपस्थित देखकर दक्ष पुत्री सती ने प्रेमपूर्वक महादेव से यह बात कही-(१६)

"हे महेश्वर, हृदयविदीर्णकारी वायु वेग से चल रहे है, ये मेघ गर्जन कर रहे हैं, नील मेघ महली मे बिजलियाँ चमक रही है और मोर केका शब्द कर रहे हैं।

गगनमडल से छूटी हुई जलधारायें गिर रही है, बगुले और सारस मेघों का अनुगमन कर रहे है । प्रबल वायु द्वारा आहत कदम्ब सर्ज, अर्जुन तथा केतकी के वृक्ष पुष्प गिरा रहे हैं। (१८)

मेघ का गम्भीर गर्जन सुनकर हंस तुरन्त जलाशयों को छोड़कर चले जा रहे है, जिस प्रकार योगिजन अपने सब प्रकार से समृद्ध घर को भी सर्वथा छोड देते हैं । (१६)

हे शम्भो, पन में मृगों के ये झुण्ड आनन्दित होकर इतस्तत दौड रहे हैं। और हे देव, देखिये-काले-काले मेघों मे विद्युत् भलीभाँति चमक रही हैं। मानो जल की वृद्धि वो देखकर शूरगण तरण वृक्षों पर विचरण कररहे हैं।(२०)

नदियाँ एकाएक वेग से प्रवाहित हो रही है। हे चन्द्रशेखर । इसमें क्या आश्चर्य है कि चरित्रहीन व्यक्ति को प्राप्त कर स्त्री दु शील हो जाती है। (२१)

नीलमेघों के द्वारा आकाश आच्छन्न हो गया है, पुष्पों के द्वारा सर्ज, मुकुलों के द्वारा कदम्य, फलों के द्वारा बिल्व वृक्ष, जल के द्वारा नदियाँ, तथा कमलों से युक्त पत्रों के

पत्रैः सपद्मश्च महासरांसि ॥ २२

इतीदृशे शंकर दुःसहेऽद्भते

काले सुरौद्रे ननु ते प्रवीमि ।

गृहं कुरुम्बात्र महाचलोत्तमे

सुनिता येन भवामि शंभो ॥ २३

इत्यं त्रिनेत्रः श्रुतिरामणीयक

श्रुत्या धचो वाक्यमिदं घमापे।

न मेऽस्ति वित्तं गृहसंचयार्थे

मृगारिचर्मावरणं मम प्रिये ॥ २४

ममोपवीतं भुजगेश्वरः शुमे

कर्णेऽपि पद्मश्च तथैव पिङ्गलः ।

केयूरमेकं मम कम्पलस्त्यहि-

द्वितीयमन्यो भुजगो धनंजयः ॥ २५

नागस्तथैवाचतरो हि कङ्कण

सव्येतरे तक्षक उत्तरे तथा ।

नीलोऽपि नीलाअनतुल्यवर्णः

श्रोणीतटे राजति सुप्रतिष्ठः ॥ २६

इति श्रीवामनपुराणे प्रथमोध्याय।।१।।

श्रीवामनपुराण मे प्रथम अध्याय समाप्त।।१।।

पुलस्त्य उवाच ।

इति वचनमथोग्रं शंकरात्सा मृडानी

ऋतमपि तदसत्यं श्रीमदाफर्ण्य भीता।

अनितलमवेक्ष्य स्वामिनो वासकृच्छात्

परिवदति सरोपं लज्जयोच्छ्वस्य चोष्णम् ॥२७

देव्युवाच ।

कथं हि देवदेवेश प्रावृट् कालो गमिष्यति ।

वृक्षमूले स्थिवाया मे सुदुःखेन बदाम्यतः ।। २८

शंकर उवाच ।

पनायस्थितदेहायाः प्राट्कालः प्रयास्यति ।

यथाम्बुधारा न तर निपतिष्यन्ति विग्रहे ।। २९

पुलस्त्य उवाच ।

ततो हरस्तद्घनखण्डमुन्नत-

मारुह्य तस्थौ सह दक्षकन्यया ।

ततोऽभवन्नाम तदेश्वरस्य

जीमृतकेतुस्त्विति विश्रुतं दिवि ।। ३०

द्वारा बड़े-बड़े सरोवर आच्छन्न हो गए है। (२२)

हे शंकर, इसीलिए मैं कहती हूँ कि ऐसे दु सह, अद्भुत तथा भयकर समय में आप इस महान् तथा उत्तम पर्वत पर गृहनिर्माण कीजिए, हे शभो, जिससे मैं निश्चिन्त हो जाऊँ। (२३)

सती के इन मधुर वाक्यों को सुनकर त्रिनेत्र शकर ने क्हा-'हे प्रिये, गृह निर्माण के लिये मेरे पास धन नहीं मैं व्याघ्र का चमं पहनता हूँ। (२४)

हे शुभे, सर्पराज मेरा जनेऊ है। एक और दिल नामक दो सर्प मेरे दोनों कानों में है। क्बल और धनजय नामक दो सर्प मेरी दोनों बाहों के बाजूबन्द है। (२५)

मेरे दाहिने हाथ में अश्वतर नाग और बाएँ हाथ में तक्षक नाग क्गन बने है। मेरे कटिप्रदेश में नीलाजन के समान वर्णवाला नील नामक सर्प अवस्थित होकर सुशोभित हो रहा है। (२६)

पुलस्त्य ने कहा महादेव के इस प्रकार कठोर तथा ओजस्यी एव सत्य होने पर भी असत्य प्रतीत हो रहे वचन को सुनकर सती अत्यन्त भयभीत हो गई और स्वामी के निवासकष्ट के कारण क्रोध और लज्जा से गरम साँस छोड- कर भूमि की ओर देखती हुई कहने लगी- (२७)

देवी ने कहा-'हे देवदेवेश। वृक्ष के मे दुख पूर्वक रहकर मेरा किस प्रकार वर्षाकाल बीतेगा ? अत में (गृह निर्माण के लिये) कहती हूँ। (२८)

शार ने यहा-हे देवि, मेव मडली के ऊपर शरीर स्थित कर तुम वर्षाऋतु विता सकोगी, जिससे वृष्टि की जलधारा तुम्हारे शरीर पर नहीं गिरेगी।' (२९)

पुरस्त्य ने कहा-तदनन्तर महादेव दक्ष कन्या सती के साथ उस उन्नत धनखड के ऊपर चढकर बैठ गये । अत तब से उनका नाम स्वर्ग में 'जीमूतकेतु' ऐसा विख्यात  हुआ। (३०)