लिंग महा पुराण
127- पशुपत योगमार्ग द्वारा शिव आराधना का वर्णन
ऋषि बोले-
हे श्रेष्ठ व्रत वाले सूतजी! योग मार्ग के द्वारा सब सिद्धियों को देने वाले वृषभध्वज त्रियम्बक भगवान का ध्यान कैसे करना चाहिए। इस पूरे विस्तार की बात को आप संक्षेप में कहने में समर्थ हैं। सो कृपा करके हमसे वर्णन कीजिए।
सूतजी बोले-
प्राचीन काल में सुमेरु पर्वत पर मुनियों के समूह के साथ बैठे हुए सूर्य के समान तेज वाले नन्दीश्वर ने सनत्कुमार को जो बतलाया था उन्होंने जो पितामह ब्रह्माजी से सुना था उसको अब आप लोगों के लिये पहले शिव को प्रणाम करके सुनाता हूँ।
नन्दिकेश्वर बोले-
हे भगवन् ! योग की विधि क्या है तथा वह कैसा कहा गया है? वह योग प्राणियों को ज्ञान और दिव्य मोक्ष देने वाला है। अतः उसको मुझसे कहिए।
श्री भगवान बोले-
हे देवि! पहला मन्त्र योग कहा गया है, दूसरा स्पर्श योग कहा गया है, तीसरा भाव योग, चौथा अभाव तथा पाँचवाँ महायोग कहा गया है। ध्यान में परायण होकर मन्त्र का अभ्यास करना मन्त्र योग कहलाता है। रेचक आदि क्रियाओं के द्वारा नाड़ी आदि की शुद्धि करना समस्त वायु आदि पर जय पाना, बल स्थिर आदि क्रियाओं से युक्त कुम्भक की तरह अभ्यास में धारणा के द्वारा तत्पर होना स्पर्श योग कहलाता है। मन्त्र और स्पर्श योग से विनिर्मुक्त हुआ महादेव में तत्पर संहारकारी अन्तर में स्थित अग्नि को प्रज्वलित रखना। ऐसा चित्त को शुद्धि प्रदान करने वाला यह भाव योग कहलाता है। स्थावर और जङ्गम सब जगत को अपने अवयवों में विलीन करके सब शून्य मय चिन्तन करना निर्वाण देने वाला अभाव योग कहा गया है। निर्मल, शुद्ध, स्वच्छन्द, शोभन सद्आलोक मय स्वयं को जानना, सब अपने स्वभाव से भासित करना महायोग कहलाता है। नित्य आलोकित स्वयं की ज्योति अपने चित्त में स्थित, निर्मल केवल अपनी आत्मा महायोग कहलाती है। एक के बाद एक-एक करके योग विशेष कहा गया है। इस योग को ब्राह्मण शिष्य के लिए अग्नि कार्य के लिए परीक्षा करके अकृतघ्नी धार्मिक पुरुष को देना चाहिये। अभक्त और अगुरु भक्त को कभी भी प्रदान न करे। हे अनघे! इसलिए सर्व प्रकार जानकर ही योग की शिक्षा देनी चाहिए। सर्व संगों से रहित, मेरी भक्ति में परायण, ज्ञान संयुक्त, श्रोतस्मार्त विशारद, गुरु भक्त पुण्यात्मा, योग के लिए सर्वथा योग्य साधक को ही यह प्रदान करे। हे देवि! मैंने तुमसे यह सनातन योगमार्ग कहा। इस योगामृत को पीकर योगी ब्रह्म को जानने वाला होता है और मुक्त हो जाता है। यही पाशुपत योग कहलाता है जो उत्तम योग को ऐश्वर्य देने वाला है। इसका आश्रय लेकर तथा इसको जानकर पुरुष मुक्त हो जाता है और क्या-क्या नहीं प्राप्त कर लेता अर्थात् सब कुछ पा लेता है। इसलिए हे प्रिये ! अपना इष्ट रखकर शिव की अर्चना में रत होना चाहिए। इस प्रकार कहकर भगवान वृषभध्वज ने देवी को समझाकर आत्मा को आत्मा में नियोजित किया।
शैलादि बोले –
हे योगीन्द्र ! इसलिये तुमको भी योगाभ्यास में रत होना चाहिये। मोक्षार्थी पुरुष को सब प्रकार यत्न पूर्वक नित्य ही भस्म से स्नान करके पाशुपत योग में निरत होना चाहिए, यह योगेश्वर शिव की निष्ठा का मैंने वर्णन किया।
सूतजी बोले-
हे ऋषियो! इस प्रकार से शैलादि के पुत्र कुल को आनन्द देने वाले तथा भस्म धारण करने वाले नन्दीश्वर ने यह उत्तम पाशुपत योग सनत्कुमार जी से कहा था। ब्रह्म पुत्र सनत्कुमार ने महान तेजस्वी भगवान व्यास के लिए कहा। उनसे इसको मैंने सुना जो आप लोगों को सुनाया। आपको यह सुनाकर अब मैं कृतकृत्य हो गया। हे यज्ञ स्वरूप! हे ब्राह्मणो! आपको नमस्कार है। शान्त स्वरूप शिव को तथा मुनीश्वर व्यासजी के लिए नमस्कार है।
यह ग्यारह हजार श्लोकों का उत्तम लिंग पुराण है। इसके आदि भाग (पूर्वार्द्ध) में १०८ अध्याय हैं। यह पुराण धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष देने वाला है। सो हे मुनीश्वरो ! मैंने तुम्हारे लिए वर्णन किया। हे नैमिषारण्य में इकट्ठे सभी मुनीश्वरो! आपके लिए मैं प्रणाम करता हूँ तथा भगवान ईशान के चरणों में प्रणाम निवेदन करता हूँ। जिनका कि यह ग्यारह हजार श्लोकों वाला सांख्य शास्त्र सम्मत पुराण है। यह स्वयंभू भगवान ब्रह्मा ने कहा है कि इस लिंग पुराण को जो आदि से लेकर अन्त तक पढ़ता है अथवा सुनता है अथवा ब्राह्मणों के द्वारा सुनाता है, वह परम गति को पाता है। तप, यज्ञ, दान, अध्ययन तथा विपुल शास्त्र आदि जो गति होती है वह केवल लिंग पुराण के पढ़ने और सुनने से मिल जाती है और संसार से निवृत्ति होती है तथा भगवान में मुझ (ब्रह्म) में तथा नारायण देव में श्रद्धा और भक्ति बढ़ती है। अक्षय विद्या तथा वंश की वृद्धि होती है, ऐसा ब्रह्माजी ने इसके विषय में कहा है।
ऋषि बोले-
हे लोमहर्षण जी! हमारी आपकी तथा तीर्थ यात्रा में रत नारद जी की सिद्धि और महान प्रीति इस पुराण के श्रवण करने से हुई है। यह सब भगवान विरूपाक्ष शंकर जी की महान कृपा है। इस प्रकार ब्राह्मणों ने और नारद जी ने सूतजी के शरीर का अपने हाथों से स्पर्श किया और कहा- हे सूतजी! महादेव वृषभध्वज आपका भला करें, आपका कल्याण हो। आपकी हमारे प्रति महान श्रद्धा है हमारा भगवान शिव के लिए बारम्बार नमस्कार है।