87- पाशुपत योग का विस्तार से निरूपण

ऋषि बोले-

हे सूतजी! किस योग से योगियों को - अणमादिक सिद्धि और सत्पुरुषों को गुण प्राप्ति होती है सो विस्तार से हमसे कहिये।

सूतजी बोले-

अच्छा अब मैं परम दुर्लभ योग को कहूँगा। आदि में चित्त में पाँच प्रकार से शिव की स्थापना कर स्मरण करना चाहिए। सोम, सूर्य और अग्नि से युक्त चित्त में पद्मासन की कल्पना करनी चाहिए तथा छब्बीस शक्तियों से युक्त उस कमल के मध्य में उमा सहित शंकर का १६ प्रकार से और आठ प्रकार तथा १२ प्रकार से स्मरण करे इसी से अणुमादिक शक्ति प्राप्त होती है अन्यथा कर्मों से नहीं। अणिमा, लघिमा, महिमा प्राप्ति होती है। इन अणमादिक शक्तियों से युक्त योगी को शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, मन उसकी इच्छा से प्रवृत्त होते हैं। अपनी इच्छा से प्रवृत्त नहीं होते। ऐसा योगी न जलता है, न मरता है, न छेदा जा सकता है। वह अपवर्ग नाम वाले परम दुर्लभ पद को प्राप्त होता है। ऐसा यह पाशुपत योग जानना चाहिए। ब्रह्म का ही सदा सेवन करना चाहिए। ब्रह्म ही परम सुख है। वह हाथ पैर से रहित, जीभ मुख से रहित अत्यन्त सूक्ष्म है, वह बिना आँखों के ही देखता है, बिना कान के सुनता है तथा सबको देखता है, सब को जानता है उसी को महान पुरुष कहते हैं। जैसे पवन सब जगह विचरण करता है वैसे ही वह सब पुरी ( शरीर ) में रहने से पुरुष कहलाता है। वही अपने धर्म को त्यागकर माया के वशीभूत हो शुक्र शोणित होकर गर्भ में वास करता है और नौवें महीने में उत्पन्न होकर पाप कर्म रत होकर नर्क के भोगों को भोगता है। इसी प्रकार जीव अपने कर्मों के फल से नाना प्रकार के भोगों को भोगते हैं। अकेला ही अपने कर्मों को भोगता है और अकेला ही सबको छोड़कर जाता है। इसलिये सदैव सुकृत ही करने चाहिए। जीव के जाने पर उसके पीछे कोई नहीं चलता। बस उसका किया हुआ कर्म ही उसके पीछे चलता है। तामस रूपी घोर संसार छः प्रकार का उसको प्राप्त होता है। मनुष्य के पशुपने को प्राप्त होता है। पशु से मृगत्व को, मृगत्व से पक्षी भाव को, पक्षी भाव से सर्प आदि योनि को पाता है। सर्प आदि से स्थावर (वृक्ष) आदि की योनि को पाता है। इस प्रकार यह जीव मनुष्य से लेकर वृक्षों तक की अनेक योनियों में घूमता रहता है। जैसे कुम्हार का चाक घूमता है वैसे ही घूमता है। इसलिये संसार के भय से पीड़ित होकर धर्म की आराधना करनी चाहिए। जिससे वह संसार को तर सकता है। अतः देवेश तीनों लोकों के नायक रुद्र का ध्यान करके हृदयस्थ वैश्वानर में पंचहुति करनी चाहिए। पंचाहुति के मन्त्र निम्न प्रकार हैं- प्राणाय स्वाहा, अपानाय स्वाहा, व्यानाय स्वाहा, उदानाय स्वाहा तथा समानाय स्वाहा के द्वारा पाँच आहुति करके पुनः जल पान और भोजन करना चाहिए। इसके बाद प्रार्थना करे कि सब जगत के स्वामी हे प्रभो! आप प्रसन्न होइये। देवताओं में श्रेष्ठ आप ही हो। हमारा हवन किया हुआ यह अन्न आपका ही स्वरूप है। इस प्रकार रुद्र की प्रार्थना करे। यह योगाचार ब्रह्मा ने कहा है इसे पाशुपत व्रत जानना चाहिए। इसे पढ़े व सुनावे तो परम गति को प्राप्त होता है।