93- शिव-जलन्धर युद्ध तथा जलन्धर का वध

ऋषि बोले –

जटा के मुकुट वाले, भग के नेत्र हरने वाले शंकर ने इन्द्र के पराक्रम को हरण करने वाले जलन्धर का वध किस प्रकार किया था। सो हे सूतजी! आप कृपा करके कहिये।

सूतजी बोले-

हे द्विजो! जल मण्डल से उत्पन्न जलन्धर नामक दैत्य था। उसने तपस्या से बहुत बल प्राप्त किया। उसने यक्ष, गन्धर्व, उरग, देव, दानव सभी को जीत लिया। ब्रह्मा को भी जीत लिया। फिर देव देव विष्णु को जीतने के लिए उनके साथ लगातार युद्ध किया। जलन्धर ने विष्णु को भी जीत लिया। जलन्धर जनार्दन को जीतकर विष्णु से बोला – मैंने तुमको युद्ध में जीत लिया अब केवल शंकर बाकी है। उसको गणों के साथ और नन्दी के साथ क्षणमात्र में जीतकर मैं ही रुद्रपने को, ब्रह्मपने को तथा विष्णुपने को और इन्द्रपने को तुम्हारे लिये प्रदान कर दूंगा। ऐसा राक्षसों से कहा। जलन्धर के ऐसे वाक्य सुनकर राक्षस बड़े जोर से शब्द करने लगे। दैत्यों के साथ रथ, घोड़ा, हाथी आदि को लेकर यह महाबली शिवजी के पास गया। भग के नेत्रों का नाश करने वाले शिवजी ने इसको अवध्य सुन रक्खा था। ब्रह्मा के वचनों की रक्षा करते हुए शम्भु, पार्वती और नन्दी आदि गणों के सामने हँसते हुए कहने लगे कि मुझको अब क्या करना चाहिए। फिर राक्षस से बोले कि हे दैत्यराज! मेरे बाणों से छिन्न मस्तक वाला होकर तू मृत्यु को प्राप्त होगा। जलन्धर शिव के वचन सुनकर बोला- हे वृषभध्वज ! ऐसे वचनों से क्या लाभ, चन्द्रमा के समान चमकते हुए शस्त्रों से लड़ने के लिए यहाँ आया हूँ। यह सुनकर रुद्र ने पैर के अंगूठों से जल ही जल कर दिया  (यह लीला दिखलाई)। और हँसते हुए बोले- कि मेरे पैर के द्वारा बने इस महा समुद्र में से यदि तू बाहर निकल आवे तो मेरे साथ युद्ध में समर्थ हो सकता है अन्यथा नहीं। हँसता हुआ जलन्धर बोला कि हे शंकर! तुझे गदा के द्वारा और देवताओं सहित इन्द्र को मारकर मैं चराचर को हनन कर सकता हूँ। जिस प्रकार सर्प के बच्चों को गरुड़ मार डालता है। हे शंकर! ऐसा कौन है जो मेरे बाणों से छेदन न किया गया हो। मैंने बालकपन में तपस्या से ब्रह्मा को जीत लिया, जवानी में देवता और ऋषि मुनियों को तपस्या के बल से मैंने तीनों लोकों को क्षणमात्र में दग्ध कर दिया। हे रुद्र! तेरी क्या विष्णु को मैंने जीत लिया। इन्द्र, अग्नि, वरुण, कुबेर आदि देवता मेरी गन्ध को भी नहीं सह सकते जैसे नाग गरुड़ की गन्ध को नहीं सह सकते। पृथ्वी और आकाश में मेरी सब जगह भुजायें फैली हुई हैं। उनकी खुजली मिटाने के लिए मदराचल आदि पर्वतों को मींड डाला। गंगा को भी रोक दिया, ऐरावत गज को भी समुद्र के जल में फेंक दिया। ब्रह्मा का मुख भी उल्टा कर दिया। रथ सहित इन्द्र को भी सौ योजन दूर फेंक दिया। गरुड़ को नागपाश में बाँध दिया। उर्वशी आदि अप्सराओं को भी कारागर में बन्द कर दिया जैसे तैसे इन्द्र ने प्रार्थना करके और शरण में आकर एक शची को मेरे से प्राप्त कर लिया है। सो हे रुद्र! तू मुझे नहीं जानता।

ऐसा कहने पर महादेव ने नेत्र की अग्नि द्वारा उसका रथ भस्म कर दिया और दृष्टि मात्र से अन्य राक्षसों के घोड़े, रथ आदि को दग्ध कर दिया। वह दैत्य चलायमान नहीं हुआ और मरे हुए बान्धवों का सोच भी नहीं किया। सुदर्शन चक्र से रुद्र को मारने को तैयार हुआ। सुदर्शन चक्र को चलाने के लिए जैसे ही उसने अपने कन्धे पर रखा तैसे ही सिर से लेकर पैरों तक दो भाग में कटकर पृथ्वी पर गिर गया जैसे वज्र से कटा हुआ पर्वत गिर गया हो। उसके रक्त से सम्पूर्ण जगत व्यास हो गया और रुद्र के नियोग से उसका माँस भी रक्त हो गया। वही रक्त महा रौरव नर्क को प्राप्त हो रक्त का कुण्ड बन गया। जलन्धर को मरा देखकर सभी देव किन्नर यक्ष आदि हर्ष से गर्जना करने लगे। हे देव! अच्छा हुआ अच्छा हुआ आदि कहने लगे। इस जलन्धर वध को जो कोई पढ़े, सुने या सुनावे वह शिवजी के गाणपत्य रूप को प्राप्त होता है।