लिंग महा पुराण
8- शिव तत्व को साक्षात्कार करने के लिए योग के स्थानों का वर्णन
सूतजी बोले-
हे ब्राह्मणो! संसार के कल्याण के लिए इस समय मैं योग के स्थानों को संक्षेप में कहूँगा। गले से नीचे और नाभी से ऊपर एक वितस्त्य (बालिस्त) की दूरी पर तथा नाभि के नीचे आवर्त में और दोनों भौंहों के मध्य में योग के स्थान कहे गये हैं। सभी प्रकार के अर्थ और ज्ञान का प्राप्त हो जाना ही योग कहा गया है। शिवजी की कृपा से उसमें हमेशा एकाग्रता होनी चाहिए। भगवान की कृपा से जो ज्ञान प्राप्त होता है, उसको ब्रह्मा आदि देवता भी कहने में समर्थ नहीं हैं। योग शब्द से ही निर्वाण (मोक्ष) अर्थात् महेश्वर शिव का लोक प्राप्त हो कहा गया है। उसका हेतु ऋषियों का ज्ञान है, जो शिव की कृपा से ही प्राप्त होता है। ज्ञान से इन्द्रियों के विषयों को रोक कर पाप को जला देना चाहिए । इन्द्रियों की वृत्ति के निरोध से ही योग की सिद्धि होगी।
हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग कहा है। योग की सिद्धि के निम्न आठ प्रकार के साधन कहे हैं। प्रथम यम, दूसरा नियम, तीसरा आसन, चौथा प्राणायाम, पाँचवाँ प्रत्याहार, छठा धारण, सातवाँ ध्यान तथा आठवाँ समाधि परम तपस्या ही यम कहा जाता है। हे योगियों में श्रेष्ठ मुनियो ! अहिंसा सबसे पहला यम का हेतु है। इसके बाद सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह (अधिक इकट्ठा न करना) आदि भी यम के हेतु हैं। यहाँ तक कि नियम का मूल भी यम ही है, इसमें कोई संशय नहीं है। अपने सामने ही संसार के सभी प्राणियों को समझना ही अहिंसा कही है, जो आत्मज्ञान की सिद्धि को देने वाली है। देखी हुई, सुनी हुई, अनुमान की हुई, अनुभव की हुई तथा दूसरे को भी पीड़ा पहुंचाने वाली न हो; ऐसी कही हुई बात को सत्य कहते हैं। ब्राह्मणों के लिए अश्लील बात न कहना तथा दूसरों के दोष जानकर भी न कहना चाहिए। ऐसा वेदों का आदेश है। अपने ऊपर या दूसरे के ऊपर आई हुई मुसीबत में भी किसी का धन न लेना ही संक्षेप में अस्तेय कहा गया है तथा मन से, कर्म से, वाणी से भी लेने की इच्छा न करें। मन, वाणी और कर्म से मैथुन में प्रवृत्ति न रखना ही यतियों को और ब्रह्मचारियों को ब्रह्मचर्य कहा है। यह बात वैखानस (संन्यासी) तथा जिनके पास पत्नियाँ नहीं हैं, ऐसे महात्माओं को विशेषरूप से पालन करने को कही हैं। सपत्नीक गृहस्थी को भी इसका पालन बताता हूँ। उनको तो केवल अपनी पत्नी के साथ विधिपूर्वक मैथुन करना तथा अन्यों की पत्नियों से अपनी निवृत्ति मन, कर्म और वाणी से करनी चाहिये, ऐसा स्मृतियों को बताया धर्म है। विधिपूर्वक अपनी ही पत्नी से सम्भोग करके स्नान करना चाहिये, ऐसा सद् गृहस्थी भी आत्मयुक्त ब्रह्मचारी कहा गया है। ब्राह्मण, गुरु तथा अग्नि के पूजन में अहिंसा का त्याग भी हो जाए तो भी कोई बात नहीं है, क्योंकि इस प्रकार की विधिपूर्वक की गई हिंसा भी अहिंसा ही है, ऐसा स्मृतियों तथा (वेद) का भी मत है । स्त्रियों को सदा परित्याग करे, उनका साथ कभी भी न करे। मुर्दे में जिस प्रकार का चित्त हो जाता है, निवृत्ति का, वैसा ही निवृत्ति का चित्त स्त्रियों के प्रति रखना चाहिए। स्त्री अंगार के समान और पुरुष घी के समान है। इससे नारी का संसर्ग दूर से ही परित्याग कर देना चाहिए। भोग से विषयों की तृप्ति कदापि नहीं हो सकती है। मन कर्म वाणी से विचार करके तथा वैराग्य से ही विषय शान्त हो सकते हैं। इन्द्रियों के द्वारा विषयों को भोगने से काम (इच्छायें ) शान्त नहीं होतीं, अपितु अग्नि में घी आहुति देने के समान वे अधिक बढ़ती हैं। हे वेद शास्त्र जानने वाले ऋषियो! त्याग से ही अमरत्व मिलता है। वह कर्म, सन्तान या द्रव्य से प्राप्त नहीं हो सकता। इसलिए मन, वाणी और कर्म से विराग करना चाहिए और ऋतु काल को छोड़कर मैथुन से निवृत्ति रखना ब्रह्मचर्य कहा है। हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! ये मैंने आपसे यम कहे। अब नियमों को बताता हूँ। शौच, यज्ञ, तप, दान, स्वाध्याय, इन्द्रिय निग्रह, व्रत, उपवास, स्नान, अनिच्छा, ये दस नियम कहे हैं। शिव मन्त्र का जप तथा पद्म आदि आसन कहे हैं। भीतरी- बाहरी पवित्रता ही शौच है। बाहरी पवित्रता से युक्त होकर भीतरी पवित्रता का आचरण करना चाहिए । शिवजी की पूजा करने वाले को अग्नि, वरुण तथा ब्राह्मण सम्बन्धी कर्तव्य करने चाहिए। विधान पूर्वक स्नान आदि करके पुनः भीतरी पवित्रता का आचरण करना चाहिये । तीर्थ के जल में सदा ही मिट्टी आदि ( भस्म ) शरीर में लगानी चाहिए। स्नान आदि करने पर भी मनुष्य भीतरी पवित्रता से हीन होते हैं, जैसे शैवाल, मगर, मछली आदि जीव । सदा मछली के द्वारा जीवन यापन करने वाले धीवर आदि भी सदा जल में रहते हुए भी मलिन (अपवित्र) रहते हैं। इसलिए हे ब्राह्मणो! सदा जल में अवगाहन करने से ही मनुष्य पवित्र नहीं होते, विधान पूर्वक हमेशा भीतरी पवित्रता भी रखनी चाहिए। आत्म ज्ञान रूपी पवित्रता जल में सदा स्नान करके सुन्दर वैराग रूपी मिट्टी का चन्दन लगाकर अपने को पवित्र करना चाहिए। शुद्ध के लिए ही सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं, अशुद्ध को नहीं। अर्थ सिद्धि के लिए सन्तोष पूर्वक चान्द्रायण व्रत आदि से पवित्रता प्राप्त करनी चाहिए। ओंकार का जप ही स्वाध्याय कहा गया है जो तीन प्रकार का होता है। वाणी के द्वारा किया हुआ जप अधम कहा है। उपाँशु जप ही सर्वोत्तम है। मानसिक जप भी श्रेष्ठ है। इनका विस्तार से वर्णन आगे पंचाक्षर वाले अध्याय में किया गया है। गुरु की अचल भक्ति से शिव का ज्ञान प्राप्त होता है। इन्द्रियों को विषयों से रोकना प्रत्याहार कहा गया है। चित्त की धारणा को संक्षेप से बताता हूँ। स्वस्थ चित्त से विचार पूर्वक एक चित्त होकर दूसरी तरफ से मन हटा कर ध्यान करना ही समाधि कहा गया है। समाधि में अपने शरीर को शून्य मात्र समझता हुआ चिद् आनन्द का आभास होता है। समाधि का मूल कारण प्राणायाम है। प्राणायाम में अपने देह की वायु को निरोध करते हैं। मन्द, मध्यम और उत्तम तीन प्रकार का प्राणायाम कहा है। प्राणवायु का रोकना ही प्राणायाम कहा है, प्राणायाम का मान बारह मात्राओं का कहा गया है। नीचे की ओर भी बारह मात्रा तथा ऊपर भी बारह मात्राओं का उसका मान होता है। मध्यम में तो चौबीस मात्राओं का मान होता है। मुख्य रूप से तीनों ३६ मात्रा के ही कहे हैं। आनन्द की उत्पत्ति के योग के लिए प्रस्वेद, कम्पन, उत्थान, रोमाँच, ध्वनि, अङ्गों का मोटन तथा कम्पन गर्भ में क्रमानुसार जप करना चाहिए। न्यायपूर्वक योग का सेवन करता हुआ स्वस्थपने को प्राप्त करता है। जैसे जंगल का मतवाला सिंह, हाथी तथा आठ पैर वाला शरभ नाम का पशु स्वस्थ घूमते हैं, वैसे ही योगी भी निर्द्वन्द विचरते हैं। योग के अभ्यास से व्यसन (शौक) नहीं लगते। इसका अभ्यास करते हुए मुनि लोगों को मन और वाणी से उत्पन्न दोषों को जला देना चाहिए। बुद्धिमान लोग प्राणायाम से भली भांति दोषों को नष्ट करते हैं तथा स्वाँस के द्वारा उन्हें जीर्ण कर लेते हैं। प्राणायाम से ही दिव्य शान्ति, प्रशान्ति, दीप्ति तथा प्रसाद आदि सिद्धियों को साथ लेते हैं। हे द्विजो! इन चारों में प्रथम शान्ति कही गई है। सहज ही आये हुए पापों को नष्ट कर देना ही शान्ति है। भली प्रकार वाणी के द्वारा संयम करना अशान्ति है। प्रकाश को दीप्ति कहा गया है। बुद्धि के द्वारा सभी इन्द्रियों को तथा वायु को भी वश में करना प्रसाद कहा गया है। इन चारों में प्रसाद तो अपने अन्दर ही होता है। इसमें प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, नाग, कूर्म, कुकर, देवदत्त, धनंजय आदि दस पवनों को भी जीतना पड़ता है।
प्रयाण (चलना) करती है, इससे वायु को प्राण वायु कहते हैं । आहार आदि क्रम से जो वायु नीचे की तरफ जाये, वह अपानवायु (पाद) है। व्यान नाम की वायु अङ्गों में व्याधियाँ पैदा करती है तथा ऊपर की ओर चलती है। मर्मों को जो झकझोरती है वह उदान नाम की वायु कहती है। अङ्गो को जो समान रूप से ले जाती है वह समान नाम की वायु है। उद्गार ( डकार) को नाग नाम की वायु कहा है। उन्मीलन को कूर्म कहा है। भूख लगाने वाली वायु को कुकर कहते हैं । जंभाई वाली वायु को देवदत्त कहा है। बड़ी भारी आवाज करने वाली वायु को धनंजय कहते हैं। वह मरने पर भी रहती है। इस प्रकार ये दस वायु प्राणायाम से सिद्ध की जाती हैं। शान्ति आदि चारों सिद्धियों में प्रसाद चौथी है। विस्वर, महान, मन, ब्रह्मा, चित्त, स्मृति, ख्याति, ईश्वर, मति, बुद्धि इनको महत नाम वाला कहा गया है और ये बुद्धि प्रसाद तथा प्राणायाम से सिद्ध होते हैं। सभी द्वन्द्वों ( दो में) में जो स्विरी (विनास्वर) भाव है, उसे विस्वर कहा जाता है। सभी तत्वों में सर्व प्रथम पैदा होने से दूसरा महान कहा है। हे ब्रह्म को जानने वाले मुनियो ! जो प्रमाण में छोटा है उसे मनन करने के कारण मन कहा है। बड़ा और चौड़ा होने से ब्रह्म कहते हैं। सर्व कर्मों को भोग के लिए जो चुनता है उसे चित्ति कहा है। सभी सम्बन्धों को स्मरण करता है इससे स्मृति कहा है। ज्ञान आदि के द्वारा अनेकों की व्याख्या करता है इससे उसे ख्याति कहते हैं। सभी तत्वों का स्वामी सभी कुछ जानने वाला ईश्वर कहा गया है। मनन करती है तथा मानती है इससे मति कहते हैं । अर्थ का बोध कराती है तथा बोध करती है इससे उसे बुद्धि कहते हैं। इस बुद्धि के प्रसाद से प्राणायाम सिद्ध होता है। यम का पालन करने वाला आदि में सब दोषों को जलाकर प्राणायाम करता है। धारणा के द्वारा पातकों को प्रत्याहार से जला देना चाहिए। विषयों को विष के समान जानकर ईश्वर के गुणों का ध्यान करना चाहिए। समाधि द्वारा प्रज्ञा को बढ़ाना चाहिए। स्नान करके अष्टांग योग को क्रम पूर्वक करना चाहिए। विधिवत् योग सिद्धि के लिए आसन प्राप्त करके आत्मा को देखे। अदेश और असमय में योग साधन न करे । अग्नि के अभ्यास में, जल में, सूखे पत्तों में, जन्तुओं से व्याप्त जगह में, श्मशान में, जीर्ण पशुओं के कोष्ठ में, शब्द होने वाले स्नान में तथा शब्द वाले समय में, दीमक के घर में ( बमई), अशुभ जगह में, दुष्ट पुरुषों से आक्रान्त जगह में, मच्छर आदि से युक्त स्थान में, शरीर में बाधा उत्पन्न होने पर, दुर्मन होने पर योग साधन न करे तथा गुप्त शुभ स्थान में रमणीक पर्वत की गुफा में, शिवजी के क्षेत्र में, शिवजी के बगीचे में, वन में, अथवा घर में, शुभ देश में, जन्तुओं से रहित निर्जन देश में, अत्यन्त निर्मल, अच्छी प्रकार लिपा पुता, चित्रित, दर्पण के दरस से युक्त, अगर धूप आदि से सुगन्धित अनेक प्रकार के फूलों के वितान से घिरा हुआ फल पत्ते तथा मूल आदि से युक्त, कुशा पुष्प आदि के सहित स्थान में, सम आसन पर बैठकर बुद्धिमान को स्वयं योगाभ्यास करना चाहिए। सबसे प्रथम गुरु को प्रणाम करे इसके बाद शिव को, देवी को, गणेश को, शिष्यों सहित योगीश्वरों को प्रणाम करके युक्ति पूर्वक योग में लगना चाहिए। आसन पर बैठकर पद्म अथवा अर्घासन बाँध कर बैठे। सम जंघाओं से अथवा एक जंघा से दोनों पैरों को सिकोड़ कर दृढ़ पूर्वक आसन बाँध कर रहे। आँखों को एक जगह स्थिर करके छाती को सीधी रखे। पास की एड़ियों से अंडकोषों की तथा मूत्र इन्द्री की रक्षा करे। कुछ-कुछ ऊपर को उठा हुआ सिर रखे। दाँतों को दाँतों से स्पर्श न करे। नासिका के अग्र भाग को ही देखे, इधर उधर न देखे। तमोगुण को रजोगुण से, रजोगुण को सतोगुण से ढक लेना चाहिए तथा अपने में स्थिर होकर शिव के ध्यान में अभ्यास करे। ओंकार का, शुद्ध दीपशिखा का, श्वेत कमल की पंखुड़ी पर शिव का ध्यान करे। नाभि के नीचे विद्वान पुरुष कमल का ध्यान करके तीन या आठ अंगुल के कोण में अथवा पंचकोण में या त्रिकोण में अग्नि, सोम तथा सूर्य की शक्तियों के द्वारा सूर्य, चन्द्र, अग्नि अथवा अग्नि, सूर्य और चन्द्रमा का इस क्रम से ध्यान करे। तीन गुणों के क्रम से ऊपर के इन तीन मण्डलों की भावना करनी चाहिये। अपने में स्थित होकर रुद्र का अपनी शक्ति के अनुसार शक्ति के सहित चिन्तन करे। नाभि में अथवा गले में अथवा दोनों भौंहों के मध्य में यथा विधि ललाट की फलिका में मध्य सिर में योगस्थ होकर ध्यान करना चाहिए।
दो दल में, सोलह में, बारह में, दस में, छ: में अथवा चार कोणों में शिव का ध्यान करे। स्वर्ण की सी आभा वाले, अंगार के समान, श्वेत अथवा द्वादश आदित्य के समान तेजस्वी अथवा चन्द्रमा की परछाईं के समान, बिजली की चमक के समान, अग्नि के वर्ण वाला अथवा बिजली की लपट के समान आभा वाले परमेश्वर का चिन्तन करना चाहिए अथवा करोड़ों वज्र (हीराओं) की सी चमक वाले अथवा पद्म राग मार्ग की आभा वाले नीललोहित शिव का ध्यान योगी को करना चाहिए।
महेश्वर का हृदय में ध्यान करे, नाभि में सदाशिव का, चन्द्रचूड़ का ललाट में तथा दोनों भौंहों के मध्य भाग में शंकरजी का ध्यान करना चाहिए।
निर्मल, निष्कल, ब्रह्म, शांत, ज्ञान के साक्षात् स्वरूप, लक्षण रहित, शुभ, निरालम्ब, अतर्क्य, नाश और उत्पत्ति से रहित कैवल्य, निर्वाण, निश्रेयस, अमृत, अक्षर, मोक्ष, अद्भुत महानन्द, परमानन्द, योगानन्द, हेय उपायों से रहित, सूक्ष्म से भी सूक्ष्म, शिव स्वयं जाना जाय ऐसे न जाने गये परम ज्ञान के स्वरूप अतीन्द्रिय, अनाभास, परात्पर तत्व, सब उपाधियों से अलग, विचार पूर्वक ज्ञान से ही जानने योग्य, अद्वैतरूप महादेव को हृदय रूपी कमल में चिन्तन करना चाहिए। नाभि में सदाशिव का सर्व देवताओं के ईश्वर के रूप में चिन्तन करे। देह के मध्य में शुद्ध ज्ञान मय शिव का ध्यान करे। क्रमशः छोटे, मध्यम तथा उत्तम मार्ग विद्वान पुरुष को कुम्भक के द्वारा अभ्यास करना चाहिये। बुद्धिमान पुरुष ३२ रेचक को हृदय और नाभि में समाहित करके कुम्भक के द्वारा देह के मध्य में शिव का स्मरण करे और इस प्रकार का एकीभाव पैदा करे कि जिससे रस (आनन्द) की उत्पत्ति होवे। रस की समान स्थिति में ही ब्रह्मवादी विद्वान आनन्द मानते हैं। द्वादश धारणा आदि के द्वारा समाधि में जब तक स्थित रहता है, तब तक आनन्द उत्पन्न होता है अथवा ज्ञानियों के सम्पर्क से पैदा होता है अथवा प्रयत्न से शीघ्र या देर में पुन: पुन: लगने से ज्ञान प्राप्त होता है। गुरु के द्वारा बताये जाने पर अभ्यास करते हुए भी नाश को प्राप्त होते हैं।