लिंग महा पुराण
44- पाताल वर्णन
ऋषि बोले-
हे सूत! रुद्र के सर्वात्मक रूप का वर्णन कीजिये ।
सूतजी बोले-
भूर्भुवःस्व, मह, जन, तप, सत्य तथा पाताल, नरक, समुद्र, तारे, ग्रह, सूर्य, चन्द्र, ध्रुव तथा सप्त ऋषि और देवता लोग जहाँ रहते हैं, वह सब समष्टी रूप से शिव का ही रूप है। मूढ़ पुरुष माया से मोहित होकर यह नहीं जानते। यह सब जगत रुद्र का ही स्वरूप है, सो उस शिव को प्रणाम करके मैं तुमको सब कहूँगा। पृथ्वी, आकाश, स्वर, मह, जन, तप, सत्य ये सब लोक ब्रह्माण्ड से ही उत्पन्न हैं। नीचे के सात पाताल (महातलादि) इनके नीचे नरक है। महातल सब रत्नों से शोभित, विचित्र महलों से युक्त अनन्त भगवान तथा मुचकन्द के सहित राजा बलि से सुशोभित हैं तथा शरकरा से बना है। सुतल पीले वर्ण का है। वितल मूँगा की सी कान्ति वाला है। अतल सफेद रंग का है, तल सफेद से भिन्न रंग का है। पृथ्वी का जितना विस्तार है वैसे ही नीचे इनका भी विस्तार है। सहस्त्र योजन व्योम का विस्तार है। रसातल वासुकि से युक्त है। विरोचन हिरण्याक्ष तथा नरक आदि से सेवित तलातल नाम का पाताल कहा गया है। कालनेमि आदि से युक्त सुतल कहा गया है। तार का अग्नि मुख आदि दानवों और नागों से असुर प्रह्लाद से युक्त वितल कहा है। महाकुम्भ, हयग्रीव आदि से सेवित तथा नाना प्रकारों के वीरों से युक्त तल कहा गया है। तलों में स्कन्द अम्बा नन्दी गणों से सहित शिव विराजमान हैं। सब तलों से ऊपर पृथ्वी के सात लोक तथा पृथ्वी का वर्णन भी मैं तुमसे करूँगा।