50- भुवन कोष में स्थित अनेकों द्वीपों का वर्णन

सूतजी बोले-

सुशोभन महाकूट गिरि के बीच में देवकूट पर्वत है जो सोना, नीलम, गोमेद, वैदूर्य आदि की कान्ति वाला तथा अनेकों मणियों से निर्मित चंपक, अशोक पुन्नाग, बकुल आदि के वृक्षों से सुशोभित है। अनेक प्रकार के झरने, पुष्पों की वर्षा करने वाले अनेक प्रकार के वृक्षों से शोभायमान है। दस योजन विस्तार वाला नाना भूतगणों से युक्त यहाँ भूतवन है। उसमें महामणियों से स्थित शंकर भगवान का प्रकाश वाला स्थान है वह स्थान सोने के परकोटा वाला तथा मणियों से बन्दनवार वाला है। वही मणियों के सिंहासन पर नाना मणियों और वस्त्रों से युक्त, विचित्र मण्डपों, वाराह, शार्दूल आदि के चिह्न वाला, नन्दीश्वर गणों से सुशोभित, ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र के समान मूर्तियों से युक्त, देवताओं के प्रभु : शंकर जी का निवास है। देवता लोग उनकी सदा पूजा करते हैं। शंख झालर आदि का शब्द निरन्तर होता है। देवगण, सिद्ध आदि सदा शंकर की पूजा करते रहते हैं। यहाँ देवराज, कुबेर आदि का स्थान है, अन्य करोड़ों यक्षों का भी स्थान है। यहाँ गणों सहित हर की पूजा होती है। वहीं मन्दाकिनी नाम की नदी है, जिसके सुवर्ण और मणियों के सोपान हैं। यहाँ जम्बू नदी में पद्म गन्ध स्पर्श से युक्त नाना प्रकार के कमल खिले हैं। यक्ष, गन्धर्व, अप्सरा आदि इस नदी का सेवन करते हैं। देव, दानव, यक्ष, किन्नर, गन्धर्व इस पवित्र मन्दाकिनी के जल का सेवन करते हैं। उस नदी के उत्तर की ओर महादेव जी का सुन्दर स्थान है जो वैदूर्य मणि आदि से सम्पन्न है, उसमें शंकर जी विराजते हैं। वहाँ गणों सहित अम्बिका सहित शिवजी महाराज क्रीड़ा करते हैं। वहीं पर अनेकों महलों से युक्त रुद्रपुरी नाम का नगर है। वहाँ अपने स्वरूप को सैंकड़ों प्रकार का बनाकर शंकर जी अम्बिका और गणों के साथ क्रीड़ा करते हैं । ऐसे शंकर जी के हजारों स्थान हैं। जिन्हें शिवालय कहते हैं। हे मुनिश्रेष्ठ! प्रत्येक द्वीप में पर्वतों पर नदियों के किनारों पर तथा समुद्रों की सन्धियों पर अनेकों शिवजी के स्थान हैं।