24- शिव तत्व से साक्षात्कार करने के लिए उनका आविर्भाव तथा उनकी शिष्य परम्परा का कथन

सूतजी बोले-

ब्रह्मा जी ने रुद्र भगवान से इस प्रकार - की बात सुनने पर उनको पुनः प्रणाम किया तथा वह प्रजापति ब्रह्मा रुद्र से कहने लगे- हे भगवन! हे महादेव! हे महेश्वर ! आपके ये शरीर जो संसार के द्वारा पूज्य हैं, कब किस काल में अथवा युग में ब्राह्मणों के द्वारा जाने जाते हैं ? अथवा इन्हें किस तरह से, तप से, ज्ञान से या ध्यान से जाना जाता है ? इस प्रकार के वचनों को सुनकर भगवान रुद्र ब्रह्मा जी से कहने लगे—

श्री भगवान शंकर जी बोले-

मैं तप, व्रत, दान, धर्म, तीर्थ से, वेदाध्ययन से, धन से, जाना नहीं जा सकता, केवल ध्यान से ही जाना जा सकता हूँ। सातवें वाराह कल्प में जब स्वयं वैवस्वत मनु कल्पेश्वर होंगे जो हे ब्रह्मा जी! आपके नाती होंगे, तब चतुर्युग की अवस्था में युगों के अन्त में लोकों में अनुग्रह करने के लिए मैं भी उत्पन्न होऊँगा। उस प्रथम युग के प्रथम द्वापर में स्वयं प्रभु ही व्याप्त होंगे और ब्राह्मणों के हित के लिए उस युग के अन्त में मैं भी श्वेत महामुनि नाम से उत्पन्न होऊँगा। शिखा सूत्र से युक्त हिमालय के छागल नाम के सुन्दर शिखर पर वास करूंगा। सभी मेरे चार शिष्य वेद पारंगत शिक्षा से युक्त मेरे पास ही पैदा होंगे, वे सभी श्वेत शिखा से उत्पन्न होंगे। वे सभी योग में परायण हुए मेरे समीप ही चले जायेंगे।

पुनः दूसरे द्वापर में जब सद्योजात प्रजापति व्यास होंगे तब मैं भी लोक कल्याण के लिए पैदा हूँगा, तब मेरा नाम सुतार होगा। तब मेरे ये चारों पुत्र दुन्दुभि शतरूप, ऋचीक और केलुमा नाम से उत्पन्न होंगे तथा ये चारों ही साथ-साथ ध्यान और योग में परायण होकर रुद्रलोक को चले जायेंगे। तीसरे द्वापर में जब भार्गव व्यास होंगे, तब मैं युग के अन्त में दमन नाम से प्रकट हूँगा। तब भी ये मेरे चारों पुत्र उत्पन्न होंगे। इनका नाम विकोश, विकेश, विपाश और पापनाशक होगा। तब भी ये चारों योग मार्ग के द्वारा आवागमन से छूटकर रुद्र लोक को चले जायेंगे। चौथे द्वापर में अङ्गिरा नाम के ऋषि व्यास कहलायेंगे, तब मैं सुहोत्र नाम से पैदा हूँगा और मेरे पुत्र भी सुमुख, दुर्मुख, दुर्धर और दुरातिक्रम नाम वाले होकर योग मार्ग से रुद्र लोक को जायेंगे।

पाँचवें द्वापर में सविता नाम के व्यास होंगे, मैं तब कंक नाम से महातपस्वी के रूप में प्रकट हूँगा । उस समय चारों महाभाग मेरे पुत्र सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार महान दृढ़ व्रती उत्पन्न होंगे तथा मेरे समीप आकर आवागमन से छूट कर दुर्लभ मोक्ष को प्राप्त करेंगे।

छठवें द्वार के काल में मृत्यु व्यास बनेंगे, तब मैं 'लौगाक्षि' नाम से विख्यात हूँगा और योगात्मा दृढव्रती चारों शिष्य क्रमशः सुधामा, विरजा, शंख, पाद्रज नाम से उत्पन्न होंगे। तब भी वे ध्यान योग में तत्पर हुए मेरी परम दुर्लभ समीपता को प्राप्त होंगे। सातवें द्वार में शतऋतु व्यास होंगे, तब मैं भी युग के अन्त में कलयुग में विभु' नाम से प्रकट होऊँगा। तब मुझे जैगीषव्य नाम का विभु सब कहेंगे। मेरे चारों पुत्र सारस्वत, मेघ, मेघवाह, सुवाहन नाम से होंगे। ये सभी उसी योग मार्ग के द्वारा रुद्र लोक को चले जायेंगे। आठवें व्यास वशिष्ठ होंगे। तब मैं 'दधि वाहन' नाम वाला हूँगा। मेरे पुत्र कपिल, आसुरि, पंच शिखोमुनि तथा महायोगी वाष्कल होकर योग के द्वारा मुझ महेश्वर को प्राप्त करेंगे।

नौवें व्यास सारस्वत होंगे, तब मेरा नाम ऋषभ होगा और मेरे उन पुत्रों का नाम पाराशर, गर्ग, भार्गव, आङ्गिरस होगा, जो वेद पारंगत विद्वान ब्राह्मण होंगे और ये सभी तपस्वी योग के द्वारा दुबारा न लौटने वाली मोक्ष को प्राप्त हो रुद्र लोक को जायेंगे। दसवें द्वार में 'त्रिपाद्वै' व्यास होंगे। तब मैं भी सुन्दर भृगुतङ्ग नाम के श्रेष्ठ पर्वत पर 'भविता मुनि' नाम से प्रकट होकर रहूँगा। मेरे पुत्र भी बल, बन्धु, निरामित्र, केतु, भृङ्ग नाम से उत्पन्न होंगे और योग मार्ग का अनुसरण करके रुद्र लोक को प्राप्त करेंगे। ग्यारहवें द्वापर में 'त्रिव्रत' नाम के व्यास होंगे। तब मैं भी उग्र नाम वाला महातेजस्वी गङ्गा द्वार (हरिद्वार) में उत्पन्न हूँगा। तभी मेरे ये पुत्र लम्बोदर, लम्बाक्ष, लम्बकेश भी उत्पन्न होकर योग द्वारा रुद्र लोक को जायेंगे। बारहवें द्वापर में कवियों में श्रेष्ठ शततेज नाम के मुनि व्यास होंगे। तब मैं अत्रि नाम से प्रसिद्ध हूँगा और ये मेरे पुत्र भस्म, स्नान आदि से लेपित सर्वज्ञ, समबुद्धि, साध्य और सर्व नाम से महेश्वर के रुद्र लोक को जायेंगे। तेरहवें द्वापर में 'धर्म' नाम के व्यास होंगे। तब मैं बालि नाम का महामुनि होऊँगा और बालखिल्य के आश्रम गन्धमादन पर्वत पर रहूँगा। तब उन मेरे पुत्रों के नाम सुधामा, काश्यप, वशिष्ठ और विरजा होंगे। तब ये सभी महायोग में तत्पर होकर रुद्र लोक को जायेंगे। पुनः चौदहवें द्वापर में जाकर तरक्षु नाम के व्यास होंगे। तब मैं श्रेष्ठ अङ्गरिस वंश में गौतम नाम वाला उत्पन्न हूँगा और मेरे उन पुत्रों के नाम अत्रि, देवरुद्र, श्रवण, श्रविष्ठक होंगे, जो सभी कलियुग में उत्पन्न होकर योग मार्ग से रुद्र लोक को प्राप्त करेंगे। इसके बाद क्रम से आये हुए द्वापर के पंद्रहवें युग में 'त्रैय्यारुणि' नाम के व्यास होंगे। तब मैं वेदशिरा नाम का ब्राह्मण होऊँगा। तब मैं वेदशिरा अस्त्र को महेश्वर से प्राप्त कर महावीर्य तथा वेदशीर्ष होकर हिमालय के पृष्ठ पर जाकर सरस्वती के तट पर रहूँगा। मेरे ये पुत्र कुणि, कुणिबाहु, कुशरीर, कुनेत्रक नाम से होकर योग के द्वारा रुद्र लोक को चले जायेंगे।

पुनः सोलहवें व्यास देव नाम से होंगे। तब मैं भक्ति और योग देने के लिए अवतरित हूँगा। मेरा नाम उस समय गोकर्ण होगा। मेरे पुत्र भी कश्यप, उशना (शुक्राचार्य) च्यवन और वृहस्पति नाम वाले होंगे। वे उसी मार्ग से अर्थात् योग साधन द्वारा रुद्रत्व को प्राप्त होंगे।

इसी प्रकार सत्रहवें व्यास काल क्रम से कृतंजय नाम के होंगे। उस समय मैं भी हिमालय के उत्तम शिखर पर जो महालय है, उसकी गुफा में रहूँगा। मेरा नाम भी गुहवासी होगा। मेरे पुत्र भी ब्रह्मज्ञानी योगी होकर उत्पन्न होंगे। उनका नाम उतथ्य, वामदेव, महायोग तथा महाबल होगा। उनके भी सौ हजार शिष्य होंगे जो सभी योगाभ्यास में निरत रह कर अति दुर्लभ महेश्वर पद को प्राप्त करेंगे। हे ब्रह्मन्! अठरहवें द्वापर में काल क्रमागत से 'ऋतंजय' व्यास होंगे। तब मैं 'शिखण्डी' नाम से प्रकट हूँगा । सिद्दा नेत्र हिमालय की शिखण्डी नाम की चोटी पर निवास करूँगा। तब मेरे तपस्वी पुत्र भी वाचश्रवा, ऋचीक, श्यावश्व, यतीश्वर नाम से होकर अन्त में योग मार्ग द्वारा रुद्र लोक को जायेंगे। उन्नीसवें व्यास का नाम भारद्वाज महामुनि होगा। मैं भी तब जटामाली नाम से उत्पन्न होऊँगा। तब मेरे ये चार महातेज वाले पुत्र भी उत्पन्न होंगे। उनके नाम हिरण्यनाभ, कौशल, लोंगाक्षी, कुथुमि होंगे। ये सभी योग मार्ग द्वारा महेश्वर को प्राप्त कर रुद्रलोक में निवास करेंगे। तब बीसवें द्वापर के गौतम नाम के महामुनि व्यास बनेंगे और मैं भी अट्टहास नाम से उत्पन्न हूँगा। हिमालय की अट्टहास शिक्षा पर रहूँगा तभी मेरे ये पुत्र भी महान योगी और व्रती होकर उत्पन्न होंगे। उनके नाम सुमन्तु, वर्वरी, कवन्ध और कुशिकन्थर होंगे। ये भी योग मार्ग से रुद्र लोक को जायेंगे। इसके बाद इक्कीसवें द्वापर के 'वाचवा' नाम के व्यास होंगे। तब मैं 'दारुको' नाम से उत्पन्न हूँगा। मेरे महोजस्वी पुत्र ल्पक्षोदा, भायणि, केतुमान तथा गौतम नाम के होंगे। ये सभी योग में निरत होकर नैष्ठिक व्रत को धारण करके रुद्र लोक को जायेंगे।

बाइसवें व्यास का नाम 'शुष्मायण' होगा। तब मेरा नाम लाङ्गली भीम नाम से उत्पन्न होऊँगा। तब इन्द्र सहित सभी देवता मुझे हलायुध सहित देखेंगे। मेरे पुत्र भी धार्मिक, महायोगी, भल्लवी, मधुपिङ्ग, श्वेत, केतु तथा कुश नाम वाले होंगे। ये विमल ब्रह्म भूमिष्ठ होकर रुद्र लोक को जायेंगे।

तेईसवें द्वापर के तृणविन्दु नाम के मुनि व्यास कार्य करेंगे। तब मैं भी श्वेत नाम के महामुनि का पुत्र होकर उत्तम पर्वत पर काल को जीर्ण कर दूंगा। तब तो उस पर्वत का नाम कालंजर होगा। महा तपस्वी मेरे वे पुत्र भी उशिक, वृहदश्व, देवल, कविरेवच नाम के होंगे तथा वे सभी महेश्वर योग के साधन से रुद्र लोक को जायेंगे।

आगे के युग में ऋक्ष नाम के मुनि व्यास बनेंगे। मैं शूली नाम से विख्यात हूँगा। मेरे सभी शिष्य भी शालिहोत्र, अग्निवेश, युनाश्व, शरद्वसु होंगे जो योग करके रुद्र लोक को जायेंगे। पच्चीसवें व्यास का नाम शक्ति होगा। तब मैं भी दंडी मुण्डीश्वर नाम से प्रकट हूँगा । छागल, कुण्डक, कुम्भाण्ड, प्रवाहज नाम से मेरे पुत्र भी उत्पन्न होकर अन्त में योग मार्ग से शिवत्व को प्राप्त करेंगे।

छब्बीसवें व्यास का काम पराशर महामुनि करेंगे। तब मैं भी सहष्णु नाम से उत्पन्न हूँगा। भद्रवट नाम के पुर में निवास करूँगा। मेरे पुत्र परम धार्मिक उलूक, विद्युत, शम्बूक तथा आश्वलायन नाम वाले होंगे और महेश्वर पद को प्राप्त करेंगे।

सत्ताईसवें द्वापर में 'जातुकर्ण्य' नाम के व्यास होंगे। उस काल में मैं भी कलयुग के अन्त में सोमशर्मा नाम का ब्राह्मण हूँगा। प्रभास क्षेत्र में रहकर मैं योग में उत्पन्न होऊँगा। मेरे ये तपस्वी शिष्य भी अक्षपाद, कुमार, उलूक तथा वत्स नाम से प्रसिद्ध होंगे। तब वे यह विमल विशुद्ध होकर योग का अनुसरण करके रुद्र लोक को प्राप्त होंगे। काल क्रम से अट्ठाइसवें द्वापर में पराशर मुनि के पुत्र विष्णु स्वरूप श्रीमान् द्वैपायन नाम के व्यास होंगे। उसी काल में वासुदेव श्रीकृष्ण भी छठवें अंश से उत्पन्न होंगे। तब मैं भी मेरु पर्वत की पवित्र गुफा में आपके तथा विष्णु के साथ निवास करूंगा। योग में तत्पर तब मेरा नाम लकुली होगा। वह सिद्ध क्षेत्र होगा। तब मेरे पुत्र भी कुशिक, गर्ग, मित्र, कौरुष्य नाम से उत्पन्न होंगे और योग मार्ग के द्वारा दुर्लभ रुद्रलोक को जायेंगे। ये सभी पाशुपत धर्म के मानने वाले तथा भस्मीभूत होंगे। शंकर के लिंग की अर्चना में निरत रहेंगे। मैं भी न तो सांख्य से, न पंचरात्र से और न ध्यान से प्रसन्न होता हूँ। जितना मैं पाशुपत धर्म से प्रसन्न होता हूँ और मनुष्य भी पाशुपत योग द्वारा परम गति को प्राप्त होते हैं।

हे ब्रह्मा जी! यह मैंने अपने अवतारों के लक्षण तुम्हें बताए तथा २८ मन्वन्तरों के क्रम से व्यासों के नाम भी कहे हैं। कृष्ण द्वैपायन मुनि अट्ठाइसवें द्वापर में व्यास होकर वेदों का विभाग करके धर्म के लक्षणों को कहेंगे।

सूतजी बोले-

भगवान के द्वारा रुद्रावतारों को सुन - कर प्रसन्न हुए। ब्रह्मा जी पुनः शंकर जी से पूछने लगे

ब्रह्मा जी बोले-

हे भगवन! सभी देवता एवं गण सब कुछ विष्णु रूप हैं। वेद भी ऐसा ही गान करते हैं। परन्तु वे भी आपके लिंग की अर्चना में तत्पर रहते हैं तथा आपको निरन्तर प्रणाम करते हैं। इसका भेद क्या है? सूतजी, ब्रह्मा के ऐसे वचन सुनकर महादेव जी प्रेम पूर्वक कहने लगे कि साक्षात् नारायण, इन्द्र तथा सभी देव और मुनि की लिंग की पूजा में जो तत्पर रहते हैं उसका कारण यह है कि लिंगार्चन के बिना निष्ठा नहीं होती। ऐसा कहकर महादेव अन्तर्ध्यान हो गए। तब ब्रह्मा भी हाथ जोड़कर शिव को नमस्कार करके शेष सृष्टि की रचना करने लगे।