6- पित्रीश्वर तथा देवताओं आदि का वर्णन तथा शंकरजी का महात्म्य

सूतजी कहने लगे-

अग्नि के पवमान, पावक और शुचि नाम के तीन पुत्र हुए। पवमान निर्मथ्य (प्रकृत) कहलाया, पावक वैद्युत ( बिजली सम्बन्धी) तथा शुचि सौर (सूर्य सम्बन्धी) अग्नि देने वाले कहलाये। इस प्रकार स्वाहा के ये तीन पुत्र बड़े ही तेजस्वी हुए। इनके पुत्र पौत्र तो बहुत ही तेजस्वी हुए हैं किन्तु यहां संक्षेप में उनकी संख्या बताते हैं। विसृज्य, सप्तक आदि ४९ हैं तथा व्रत का पालन करने वाले हैं। ये सभी प्रजापति हैं और भगवान रुद्र की आत्मा हैं। मैना नाम की एक मानसी पुत्री स्वधा से उत्पन्न हुई। वह संसार में बहुत ही प्रसिद्ध हुई। मैना के दो पुत्र मैनाक और क्रौंच तथा एक उमा नाम की कन्या हुई। गङ्गा और हेमवती को भी पैदा किया जो शिव के शरीर का स्पर्श पाकर परम पवित्र हुईं। यज्ञों की जननी धरती को पैदा किया जो उनकी मानसी पुत्री हैं। कमल के से नेत्र वाली स्वधा मेरु राजा की पुत्री हुई। अब अमृत पान करने वाले पितरों का वर्णन करता हूँ तथा सभी ऋषियों के कुलों का भी विस्तार से वर्णन करता हूँ, उसे आप सभी ध्यान पूर्वक सुनें। दक्ष की पुत्री जो सती है उन्होंने भगवान शिव की समीपता प्राप्त की। पीछे उन्होंने अपने पिता दक्ष की निन्दा करके नीललोहित भगवान शम्भु का ध्यान करते हुए पार्वतीजी का रूप प्राप्त किया और शिवजी को पुनः पति रूप में प्राप्त किया। उन निर्मल नीललोहित सभी रुद्रों के स्वरूप, जिनसे ये सभी १४ लोक आच्छादित हैं तथा जो जरा और मरण से रहित हैं उन रुद्र भगवान से ब्रह्मा जी बोले- हे महादेव, हे तीन नेत्र वाले! हे नीललोहित आपको नमस्कार है। आप सर्वज्ञ हो, सबकी गति हो, दीर्घ ह्रस्व तथा वामन भी आप ही हो। आप शुभ हो तथा आप नित्य हो, निर्मल हो, वीतराग हो, आप सभी संसार की आत्मा हो। इस प्रकार कनकाण्डज ब्रह्माजी ने रुद्र भगवान की सतुति करके परिक्रमा की और पुनः बोले आप मृत्यु से रहित सृष्टि को बनाओ। तब शिवजी ने कहा कि यह तो असम्भव है। हे ब्रह्माजी! आप ही जरा मरण से युक्त जैसी चाहो वैसी सृष्टि बना लीजिए। तब ब्रह्मा ने शंकर भगवान के आदेशानुसार जरा और मरण से युक्त इस चराचर जगत की रचना की। भगवान तो निवृत्त होकर ही स्थित रहे। हे ब्राह्मणो! उस समय शंकर जी स्थाणु (निश्चल ठूंठ के समान ) बन गये। शिवजी तो आत्मभाव से निष्कल हैं, वे तो अपनी इच्छा से ही शरीर धारण करते हैं। अपनी दयालुता से सभी का कल्याण करते हैं। शंकर जी अपनी योग विद्या से बिना ही प्रयत्न के योग में स्थित रहते हैं, विरक्त के लिए वे मुक्ति हैं, वे सूक्ष्म से भी सूक्ष्म हैं। मनुष्य संसार के भय से विषयों का त्याग करके वैराग्य द्वारा विराग को प्राप्त करते हैं। यह उनके दर्शनों की कृपा है। धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य शंकर जी से ही प्राप्त होते हैं। वे पिनाकी नीललोहित ही साक्षात् शंकर भगवान हैं। जो मनुष्य शंकर जी के आश्रित रहते हैं वे सभी बन्धनों से मुक्त हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं है। अत्यन्त पापी लोग भी शंकर जी की कृपा से दारुण नरक में नहीं जाते हैं। वे शंकर जी के आश्रित हो जाने से अमरता को प्राप्त हो जाता है।

ऋषि बोले-

घोर आदि अट्ठाईस प्रकार की माया युक्त पापीजन करोड़ों प्रकार के नरकों में पकाये से जाते हैं। क्योंकि वे पापीजन नीललोहित शंकर भगवान के आश्रित नहीं होते हैं। भगवान शिव सभी प्राणियों के आश्रय हैं, अव्यय हैं, संसार के स्वामी हैं, पुरुष हैं, परमात्मा हैं। तमोगुण से वे कालरुद्र हैं, रजोगुण से ब्रह्मा हैं और सतोगुण से वे सर्व प्रकार जाने गये विष्णु भगवान हैं, निर्गुण रूप से वे महेश्वर हैं। हे महामते सूतजी! अब आप कृपा कर यह बतलाइये कि मनुष्य किस कर्म या अकर्म से किस नरक में जाते हैं, यह सुनने का हमें बड़ा कौतूहल है ?