81- विपोहन नाम का स्तोत्र

सूतजी बोले-

हे ऋषियो! अब मैं विहोपन स्तवन को आप लोगों को कहता हूँ जो सर्व सिद्धि को देने वाला है। नन्दी के मुख से कुमार ने सुनकर व्यास जी को सुनाया तथा व्यास जी से मैंने सुना था। सो कहता हूँ―

शुद्ध, निर्मल, यशस्वी काल को देखने वाले परमात्मा भव के लिये नमस्कार है। वे पाँच मुख वाले, दश भुजा वाले, पन्द्रह नेत्रों से युक्त, स्फटिक मणि के समान, सम्पूर्ण आभूषणों से भूषित, सर्वज्ञ शान्त, सर्वोपरि स्थित हैं। पद्मासन में बैठे हुये सौमेश हमारे सभी पापों को दूर करें। ईशान, पुरुष, अघोर, वामदेव भगवान पापों को शीघ्र नाश करें। अनन्त, सर्व विद्याओं के ईश्वर, सर्वज्ञ, सब देने वाले, ध्याननिष्ठ शिवजी मेरे पापों को दूर करें। सूक्ष्म, सुर और असुरों के ईश्वर, विश्वेश, ध्यान में सम्पन्न शिवजी मेरे पापों को दूर करें। शिवोत्तम, महापूज्य, ध्यान परायण, सर्वज्ञ, सर्वद और शान्त मेरे पापों को दूर करें। एकाक्ष, ईश, शिवार्चन, परायण, करें। शिव ध्यान सम्पन्न महाराज मेरे पापों को दूर करें।

त्रिमूर्ति, ईश, शिव भक्त प्रबोधक, शिव ध्यान सम्पन्न मेरे पापों को दूर करें इत्यादि। इस विपोहन स्तोत्र को जो भक्ति पूर्वक जपता है अथवा सुनता है वह सब पापों को त्याग कर रुद्र लोक को प्राप्त होता है। कन्या की कामना करने वाला कन्या को प्राप्त करता है। विद्यार्थी विद्या प्राप्त करता है। धन की कामना करने वाला धन प्राप्त करता है। इसको सुनने वाले को वात, पित्त, कफ की बीमारी नहीं होती। इस स्तोत्र को जपने से सब तीर्थों और दानों का जो फल है वह प्राप्त हो जाता है। गौ घाती, ब्रह्म हत्यारा, शरणागत घाती, मित्र द्रोही, माता पिता का हत्यारा भी सब पापों को त्याग कर शिव लोक में पूज्यनीय होता है।