लिंग महा पुराण
121- अघोरेश प्रतिष्ठा विधान वर्णन
ऋषि बोले-
हे सूतजी! आपने पहले अघोरेश प्रभु का महात्म्य कहा है। अतः उनकी पूजा प्रतिष्ठा को भी कहिये।
सूतजी बोले-
अघोर मन्त्र से युक्त लिंग विधि के अनुसार ही प्रतिष्ठा करनी चाहिए। अग्नि की पूजा करनी चाहिए। एक हजार अथवा पाँच सौ या १०८ बार दधि, मधु और घृत से युक्त तिलों द्वारा हवन करना चाहिए। घी, मधु और सत्तू से सर्व दुःखों का नाश होता है। तिल आदि का होम कल्याण देने वाला और व्याधियों का नाश करने वाला है। सहस्त्र बार की संख्या में हवन करने पर महा ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है और १०० (वार) से व्याधियों का नाश होता है तथा जप करने से सब दुःखों की निवृत्ति होती है। १०८ बार तीनों काल में जप करना चाहिए। जो १०८ बार छ: मास तक जप करता है उसे सब सिद्धि प्राप्त होती हैं, इसमें संदेह नहीं। एक हजार बार दूध से हवन करता है उसका ज्वर समाप्त हो जाता है। तीनों काल एक मास तक एक हजार बार होम करता है उसको महा सौभाग्य की प्राप्ति होती है। दही, शहद, घी से युक्त जो एक वर्ष तक हवन करता है उसको सिद्धियाँ प्राप्त होती है। जौ, क्षीर, दूध, घी, जाति, पुष्प तथा चावल के हवन से अघोर परमेश्वर शीघ्र प्रसन्न होते हैं। राजाओं को दधि के हवन से पुष्टि और दधि के हवन से शान्ति प्राप्त होती है। छः मास तक घी का हवन करने से सम्पूर्ण व्याधियों का नाश होता है। एक वर्ष तक तिलों का हवन करने से राजयक्षमा नष्ट होती है। घी के हवन से जय तथा जौ के हवन से आयु प्राप्त होती है। सर्व प्रकार के कुष्ठ के लिए शहद से भिगोकर चावलों का दस हजार संख्या काछः महीना तक हवन करे। घी, दूध, शहद ये तीनों मधु कहाते हैं। इन तीनों से भगवान तुष्ट होते हैं और भगन्दर को नाश करते हैं। केवल घी के होम से सब रोगों का नाश होता है। सम्पूर्ण व्याधियों का नाश करने वाला भगवान का ध्यान स्थापन तथा विधि पूर्वक पूजन है। इस प्रकार अघोर परमात्मा का संक्षेप से प्रतिष्ठा योजन कहा। यही पहले नन्दी ने ब्रह्मपुत्र सनत्कुमार अपने शिष्य को कहा था और उन्होंने व्यासजी से कहा था।