5- सृष्टि की प्रथम उत्पत्ति का वर्णन

सूतजी कहते हैं -

हे ब्राह्मणो! ब्रह्मा ने सर्वप्रथम जो सृष्टि को रचने की मति की वह अबुद्धि पूर्वक की अर्थात् ब्रह्माजी ने सबसे पहले सृष्टि बिना विचारे की । उससे ब्रह्माजी ने तम, मोह, महामोह, तामिस्त्र, अंध नामवाली पांच प्रकार की सृष्टि रची। इसलिए इस रचना को अविद्या पूर्वक बनी हुई कहते हैं। प्रजापति ब्रह्मा की यह मुख्य रचना असाधक कहलाती है। उससे नग ( वृक्ष पर्वतादि) की उत्पत्ति हुई। सत, रज, तम गुणों की सृष्टि रचना करने के कारण उस ब्रह्म (शिव) का कण्ठ तीन रेखा वाला पड़ गया। जिसका आप सभी लोग ध्यान करते हो । उस महात्मा ब्रह्मा ने सर्व प्रथम पशु पक्षी आदि तिर्यक योनि के जीवों की उत्पत्ति की। फिर सात्विक बुद्धि से उर्ध्व स्रोत ( ऊपर की ओर जाने वाले ) जीवों की रचना की। इसके बाद भूत (पंच- भूतों) की रचना की। इसके बाद ब्रह्माजी ने महत् तत्व से दूसरी भौतिक सृष्टि रची, तीसरी इन्द्रियों सम्बन्धी रची तथा चौथी जो सृष्टि रची, उसको मुख्य कहा गया है। पांचवी को तिर्य्यक योनि तथा छठवीं को दैविक कहा गया है। हे ब्राह्मणो! सातवीं को मानुषी सृष्टि तथा आठवीं को अनुग्रह पूर्वक रची हुई कहा गया है। नवमी को कोमार कहते हैं। यह रचना प्राकृत (माया से बनी) तथा वैकृत (विचारों से युक्त ) कही गई है। हे मुनियो ! पहले ब्रह्मा ने फल की इच्छा न रखने वाले सनक, सनन्दन को उत्पन्न किया। फिर मरीचि, भृगु, अंगिरस, पुलस्त्य, पुलह, ऋतु, दक्ष, अत्रि, वशिष्ठ को अपनी योग विद्या से उत्पन्न किया। ये नौ ब्रह्मा के पुत्र हैं। अतः ब्रह्मा के ही समान इन्हें मानना चाहिए। ब्राह्मणों में उत्तम और ब्रह्मा को जानने वाले ब्रह्मवादी ये सभी ब्रह्मा के ही समान हैं । इसके पश्चात् ब्रह्माजी ने बारह प्रजापति पैदा किए। ऋभु, सनत्कुमार और सनातन आदि बनाए। ये कुमार ऊर्ध्वगामी, दिव्य, ब्रह्मवादी सर्व प्रथम पैदा हुए। ये ब्रह्मा के समान ही सर्वज्ञ और सब भावों वाले हैं। हे श्रेष्ठ मुनियो ! अब मैं प्रथम पैदा हुए मुनियों की पत्नियों का वर्णन करता हूँ तथा संक्षेप में उनके द्वारा उत्पन्न उनकी सन्तान को भी कहता हूँ । शतरूपा रानी ने विराट को उत्पन्न किया। अयोनिजा शतरूपा रानी ने स्वायंभुवमनु के द्वारा पुत्र तथा दो कन्यायें पैदा कीं । उनमें उत्तानपाद छोटा तथा बुद्धिमान प्रियव्रत बड़ा पुत्र हुआ। उनकी अति सुन्दर और बड़ी आकूति नाम की तथा छोटी प्रसूति नाम की दो कन्यायें हुईं। श्रीमद्भागवत में देवहूति नाम की तीसरी कन्या भी बतलाई गई है।

आकूति नाम की पुत्री का रुचि नाम के प्रजापति के साथ विवाह हुआ और प्रसूति दक्ष नाम के प्रजापति की पत्नी हुई। जो संसार की माता और योगिनी कहलाई । आकूति ने दक्षिणा नाम की पुत्री और यज्ञ नाम का पुत्र पैदा किया। दक्षिणा ने सुन्दर बारह पुत्रों को उत्पन्न किया। हे ब्राह्मणो! प्रसूति ने दक्ष के द्वारा चौबीस पुत्रियां उत्पन्न कीं, जिनके नाम इस प्रकार हैं- श्रद्धा, लक्ष्मी, धृति, तुष्टि, पुष्टि, मेधा, क्रिया, बुद्धि, लज्जा, वपु, सिद्धि, कीर्ति, ख्याति, सम्भूति, स्मृति, प्रीति, क्षमा, सन्नति, अनुसूया, ऊर्जा, स्वाहा, सुरा, अरणी, स्वधा । श्रद्धा से लेकर कीर्ति तक तेरह जो कन्यायें हैं उन्होंने धर्म नामक परम दुर्लभ प्रजापति को अपना पति बनाया और परम बुद्धिमान भृगु से ख्याति नाम की कन्या का विवाह हुआ। भार्गव को अरणि, मरीचि को सम्भूति, अंगिरा को स्मृति, पुलस्त्य को प्रीति, पुलह नाम के मुनि को क्षमा, ऋतु को सन्नति, बुद्धिमान अत्रि को अनुसूया और भगवान वशिष्ठ को कमल के से नेत्र वाली ऊर्जा ब्याही गईं। विभावसु को स्वाहा और पित्रीश्वरों को स्वधा नाम की कन्यायें ब्याही गईं। भगवान शिव के द्वारा प्रकट की हुई अपनी मानसी पुत्री सती को दक्ष प्रजापति ने संसार की धाय मानकर भगवान रुद्र को समर्पित कर दिया। उन भगवान रुद्र ने प्रारम्भ में कहा कि "मेरे शरीर का आधा विभाजन करो" ऐसे आदि सर्ग में ब्रह्मा के भी कर्त्ता अर्धनारीश्वर शिव को देखकर दक्ष ने सती जी को उन्हें सौंप दिया। तीनों लोकों की सभी स्त्रियां सती जी की वंशज हैं तथा ग्यारह रुद्र भी उन्हीं के अंश से उत्पन्न हैं। जितनी सृष्टि है उसमें जितना स्त्री लिंग है वह सब सती का अंश है तथा समस्त पुल्लिंग भगवान रुद्र का ही अंश है। यह देखकर ब्रह्माजी ने दक्ष से कहा था कि "यह सती संसार की जननी है इसकी सेवा करो। यह मेरी भी तथा तुम्हारी भी माता है। पुंनाम के नरक से रक्षा करने के कारण ही इसे पुत्री कहा गया है।" ब्रह्माजी के द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर दक्ष प्रजापति ने उस सती नाम की पुत्री को अत्यन्त आदर पूर्वक रुद्र के लिए अर्पित कर दिया। हे ब्राह्मणो! श्रद्धा से लेकर कीर्ति तक जो तेरह धर्म की पत्नियां हैं उनसे यथा क्रम उत्पन्न होने वाली सन्तान को कहता हूँ। उनसे काम, दर्प, नियम, सन्तोष, अलोभ, श्रुत, दण्ड, समय, बोध, महाधुति, अप्रमाद, विनय, व्यवसाय, क्षेम, सुख, यश नाम के पुत्र उत्पन्न हुए। धर्म के क्रिया नाम की भार्या से दण्ड और समय दो पुत्र उत्पन्न हुए तथा बुद्धि नाम की भार्या से अप्रमाद तथा बोध नाम के दो पुत्र हुए हैं। इस प्रकार धर्म के १५ आत्मज पुत्र हुए। भृगु की पत्नी ख्याति के गर्भ से विष्णु भगवान की प्रिया श्री उत्पन्न हुई तथा धाता और विधाता नाम के दो पुत्र उत्पन्न हुए। जो मेरु नाम के प्रजापति जामाता हुए। मरीचि नाम के ऋषि के प्रभूति नाम की पत्नी से दो पुत्र उत्पन्न हुए - पूर्णमा और मारीच तथा चार कन्यायें भी हुईं। सबसे बड़ी तुष्टि तथा इसके बाद दृष्टि, कृषि तथा अपचि।

हे मुनियो! क्षमा ने पुलह नाम के ऋषि से बहुत से पुत्र तथा पुत्री पैदा कीं। मुख्यतः कर्दम तथा सहिष्णु पुत्र तथा स्वर्ण के से रंग वाली पृथ्वी के समान क्षमा शील पीवरी नाम की कन्या हुई । इसके बाद प्रीति नाम की पुलस्त्य ऋषि की भार्या से दत्तर्णव और दवाहु पुत्र तथा द्वषद्वती पुत्री उत्पन्न हुई। क्रतु की भार्या सन्नति से छः हजार पुत्र पैदा हुए जो सभी बालखिल्य मुनि कहलाए । अङ्गिरस की पत्नी स्मृति से सिनी, वाली, कुहू, राका तथा अनुमति आदि कन्यायें पैदा हुईं।

अत्रि की पत्नी अनुसूया से छः सन्तानें हुईं । एक श्रुति नाम की कन्या हुई । सत्यनेत्र, भव्यमुनि, मूर्तिराय, शनैश्चर तथा सोम पांच लड़के तथा छठी श्रुति नाम की कन्या हुई । वशिष्ठ मुनि की पत्नी ऊर्जा से भी पुत्र उत्पन्न हुए। ज्यायजी, पुण्डरीकाक्ष, रज, सुहोत्र, बाहु, निष्पाप, स्त्रवन, तपस्वी, शुक्र आदि सात पुत्र हुए। भगवान शिव की आत्मा रूप पितामह अग्नि के स्वाहा नाम की पत्नी से संसार की भलाई के लिए तीन पुत्र पैदा हुए, जिनका वर्णन आगे के अध्याय में किया गया है।