लिंग महा पुराण
47- जम्बूद्वीप में मेरु का वर्णन
सूतजी बोले-
इस द्वीप के मध्य में मेरु नाम का पर्वत नाना प्रकार का शिखर वाला स्थित है। चौरासी हजार योजन उसकी ऊँचाई है और १६ हजार योजन पृथ्वी में धँसा है। १६ हजार योजन तक वह पृथ्वी पर फैला हुआ।
महेश्वर के शुभ अंग से स्पर्श होने पर यह सुवर्णमय है। धतूरे के फूल के समान यह सभी देवताओं का शुभ स्थान है। यह देवताओं की क्रीड़ा भूमि है। पूर्व की ओर पद्मराग मणि की शोभा वाला है। दक्षिण में सोने के समान, पश्चिम में नील मणि के समान तथा उत्तर में विद्रुम के समान शोभा वाला है। अमरावती नाम की नगरी, इस पर नाना प्रकार के महलों से युक्त पूर्व भाग में स्थित है जो नाना प्रकार के देवगणों के सहित मणियों से शोभा सम्पन्न है। अनेकों प्रकार के बन्दनवारों से युक्त तथा अप्सराओं से गौरवशाली है। नाना प्रकार के फूल, बावड़ी, नदी, नालों से युक्त है जिसमें सुवर्ण और मणियों की सीढ़ी बनी है। अतः यह अमरावती सभी भोगों से युक्त है।
मेरु पर दक्षिण में यमराज की वैवस्वती पुरी दिव्य भवनों से युक्त है, नैरुत में कृष्ण वर्ण शुद्धवती, वायव्य में गन्धवती, उत्तर और ईशान में यशोमती पुरी है। यहाँ ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर के स्थान है। यक्ष गन्धर्व मुनिश्रेष्ठों के द्वारा यह सदा सेवित है। पर्वत के ऊपर शुद्ध स्फटिक मणि के समान विमान स्थित है। उसमें महाभुजा वाले सूर्य, चन्द्र, अग्नि के तीन नेत्र वाले, देवी तथा षड्मुख के साथ ऊँचे सिंहासन पर विराजते हैं। उससे नीचे विष्णु भगवान का विमान, उससे नीचे दक्षिण में ब्रह्मा जी का पद्मराग मणि का विमान है। फिर शक का, सोम का, वरुण का, पावक का, वायु का दिव्य विमान विराजमान है।
ईशान में ईश्वर क्षेत्र है जहाँ नित्य सिद्धेश्वरों के द्वारा रुद्र की पूजा होती है। वहाँ पर कहीं योग भूमि है। कहीं भोग भूमि है। बाल सूर्य के समान चमकता हुआ सूर्य स्थिर रहता है। पर्वत पर जम्बू नाम की नदी तथा दक्षिण भाग में जम्बू नाम का एक वृक्ष है, जो बहुत ही लम्बा चौड़ा है, जिस पर सभी कालों में फल लगे रहते हैं। मेरु के चारों तरफ अधिक विस्तार वाला इलावृत नाम का देश है। वहाँ के लोग जम्बू फल खाने वाले तथा कोई कोई अमृत पीने वाले लोग रहते हैं। यहाँ नाना प्रकार के रंग वाले भोगी सर्प भी रहते हैं। यहाँ नौ देश नदी नालों से सुशोभित हैं जो अति श्रेष्ठ हैं। अब मैं जम्बू द्वीप के नौ देशों का विस्तार से वर्णन करूँगा।