लिंग महा पुराण
63- वशिष्ठ के वंश वर्णन में पाराशर के लिए पुलस्त्य द्वारा पुराण रचना का वरदान
ऋषि बोले-
हे सूतजी! रुधिर राक्षस ने छोटे भाइयों के साथ शक्ति ऋषि को कैसे खा लिया ? यह कथा हमें कहिए।
सूतजी बोले-
रुधिर नाम का राक्षस वशिष्ठ के पुत्र शक्ति को अनुजों सहित भक्षण कर गया। वशिष्ठ जी कल्माषपाद राजा के यहाँ यज्ञ करा रहे थे। विश्वामित्र से प्रेरित वह राक्षस भाइयों सहित शक्ति को भक्षण कर गया। वशिष्ठ ने जब यह सुना तो हा पुत्र! हा पुत्र! कहते हुए अरुन्धती के सहित शोक से युक्त होकर पृथ्वी पर गिर पड़े।
पुत्र के बिना अब हम जीवित नहीं रहेंगे ऐसा निश्चय करके पर्वत की चोटी से पृथ्वी पर गिर पड़े। उनको इस प्रकार गिरता हुआ देखकर वशिष्ठ की पुत्रवधू शक्ति की स्त्री इनको समझाने लगी कि हे ब्राह्मण श्रेष्ठ ! इस शरीर की रक्षा करो। मेरे गर्भ में आपका पौत्र स्थित है उसे आप शीघ्र ही देखोगे। ऐसे समझाकर उन्हें जल से मुँह धुलाकर आश्रम में ले गई। पुत्रवधू के वचनों को सुनकर वशिष्ठ को कुछ होश आया। परन्तु पुनः दोनों ही वशिष्ठ और अरुन्धती विलाप करने लगे। जैसे विष्णु की नाभि में विराजमान ब्रह्मा हो वैसे ही गर्भ में स्थित उस कुमार ने वेद की एक ऋचा बोली। उसे सुनकर भगवान वशिष्ठ बड़े अचम्भे में पड़ गए कि यह किसकी बोली है। तब आकाश में स्थित कमल नयन विष्णु भगवान ने वशिष्ठ से कहा- हे पुत्र प्रेमी वशिष्ठ जी! तुम्हारे पौत्र के मुख से ही यह ऋचा निकली है। शक्ति का पुत्र और तुम्हारा नाती यह बालक मेरे ही समान है। अतः तुम शोक को छोड़ दो। तुम्हारा यह नाती रुद्र की पूजा में परायण तथा रुद्र के प्रभाव से अपने कुल को तारेगा। इस प्रकार कहकर विष्णु भगवान अन्तर्ध्यान हो गए। विष्णु भगवान को प्रणाम करके हे पुत्र! तेरे पुत्र का दर्शन करके तेरी माता के साथ तेरे ही पास आऊँगा, ऐसा कहने लगे।
अदृश्यन्ती भी अपने पेट को ताड़न करती हुई पृथ्वी पर गिर पड़ी तब पति शोकाकुल उस अदृश्यन्ती को अरुन्धती और वशिष्ठ ने उठाकर समझाया कि हे विचार वाली! तेरे गर्भ में स्थित शक्ति के पुत्र का मुख रूपी अमृत पान करने को हम जीवित हैं। तू इस देह की रक्षा कर।
अदृश्यन्ती बोली-
हे मुनि श्रेष्ठ! अशुभ हो या शुभ हो इस शरीर का मैं पालन करूँगी। भर्त्ता के बिना मैं दीन नारी दुखी हूँ। माता, पिता, पुत्र, पौत्र, ससुर ये सब बान्धव हैं परन्तु स्त्रियों की परागति तो पति ही है। मेरे हृदय की कठोरता देखो कि प्राण समान पति को त्याग कर अभी जीवित हूँ ऐसे पुत्रवधू के वचन सुनकर वशिष्ठ जी उसे समझाकर अरुन्धती के साथ आश्रम में ले गए। वह गर्भ का पालन करती हुई दसवें मास में पुत्र उत्पन्न करती हुई जिस प्रकार अदिति ने विष्णु को उत्पन्न किया था। शक्ति के पुत्र उत्पन्न होने पर पित्रीश्वर बड़े प्रसन्न हुए। देवता पुष्पों की वर्षा करने लगे, आश्रम के मुनि लोग भी हर्षित हुए। जैसे मेघ जल से सूर्य प्रकट होता है, वैसे ही यह पुत्र भी अदृश्यन्ती के उत्पन्न हुआ था। शक्ति के पुत्र को देखकर वशिष्ठ जी प्रसन्न होकर उसे समझाने लगे कि अब तुम रोओ मत। इस पुत्र का पालन कर।
शनि पुत्र ने अपनी माता से कहा- हे अम्ब! मंगलमय भूषणों के बिना तेरा शरीर शोभा को नहीं प्राप्त हो रहा है जिस प्रकार चन्द्रमा के बिना रात शोभा वाली नहीं होती है। सो हे माता! तैने आभूषण क्यों त्याग दिये हैं ? वह मुझे बता। अदृश्यन्ती पुत्र के वचन सुनकर कुछ भी नहीं बोली। तब पुत्र ने पूछा कि हे माता! महा तेजस्वी मेरे पिता कहाँ हैं वह मुझसे कह। ऐसे पुत्र के वचन सुनकर बोली- हे तात् ! तेरा पिता राक्षसों ने भक्षण कर लिया ऐसा कहकर पृथ्वी पर गिर पड़ी। पौत्र के ऐसे वचन सुनकर वशिष्ठ तथा आश्रम वासी सभी दुखी हुए। माता के वचन सुनकर कि पिताजी को राक्षसों ने खा लिया तब तो वह पाराशर नामक पुत्र बोला – हे माता! चराचर सहित तीनों लोक रुद्र का स्वरूप है। सो मैं उनका पूजन करके क्षण मात्र में अपने पिता के आपको दर्शन कराऊँगा। पुत्र के ऐसे वचन सुनकर माता बोली- तेरा यह वचन सत्य हो तू शिव का पूजन कर।
वशिष्ठ ने कहा-
कि हे पुत्र! तेरा संकल्प - ठीक है। राक्षसों के नाश के लिए सर्वेश्वर शिव का पूजन कर। वशिष्ठ को अरुन्धती को और अपनी माता को प्रणाम करके क्षण मात्र में वह पाँशु (धूली) की एक लिंग- शिव मूर्ति बनाकर शिव सूक्त और त्रयम्बक सूक्त से पूजन करके तथा 'शिव संकल्प' मन्त्र द्वारा पूजन करके यथा विधि अर्घ देकर पाराशर बोला- हे - भगवान रुद्र! रुधिर राक्षस ने महा तेजस्वी मेरे पिता को मैं भाइयों सहित देखना चाहता हूँ। इस प्रकार शिवलिंग को प्रणाम करके हा रुद्र! हा रुद्र! कहकर रोने लगा और गिर पड़ा। उसको दुखी देखकर शंकर जी प्रार्थना से बोले- कि हे महाभागे! मुझ में आसक्त रोते हुए उस ब्राह्मण को देखो। वह महादेवी रुद्र में आसक्त तथा लिंगार्चन में तत्पर उसको देखकर रुद्र भगवान से बोलीं- हे परमेश्वर ! इसको वांछित वरदान दो। शंकर जी ने कहा- हे पार्वती ! मैं इस ब्राह्मण की रक्षा करूँगा। मेरे दर्शन करने योग्य दृष्टि मैं इसको देता हूँ। यह कहकर दिव्य दृष्टि उसको दी जिसको प्राप्त कर वह ब्रह्मा विष्णु आदि से सेवित भगवान नीललोहित का दर्शन करने लगा, तब तो वह उनके चरणों में गिर पड़ा। भवानी और नन्दी को प्रणाम करके कहने लगा कि मेरे समान देवता दानव आदि कोई भी नहीं है, आज मेरा जीवन सफल है। जो मेरी रक्षा के लिए बाल चन्द्रमा धारण करने वाले शिवजी प्रकट हुए हैं। उसी समय आकाश में स्थित भाइयों के सहित पाराशर के पिता का दर्शन किया। सूर्य मण्डल के समान विमान में बैठे भाइयों के सहित पिता का दर्शन कर प्रणाम किया और बड़ा प्रसन्न हुआ। तब वृषभध्वज शंकर ने वशिष्ठ पुत्र शक्ति से कहा- हे शक्ति! तुम आनन्द के - अश्रुओं से युक्त नेत्र से अपने पुत्र को देखा। अरुन्धती कल्याणी माता को, भार्या को तथा पिता वशिष्ठ को देखो तथा माता पिता को नमस्कार करो। शंकर की आज्ञा से शक्ति ने माता पिता को प्रणाम किया। शक्ति बोले – हे वत्स! हे पुत्र पाराशर ! तुमने गर्भ में स्थित मेरी रक्षा की है। मैंने अणुमादिक ऐश्वर्य तेरे मुख को देखकर सब प्राप्त कर लिये। अदृश्यन्ती अरुन्धती तथा पिता वशिष्ठ इन सबकी रक्षा करो। हे पुत्र! हमारे सब वंश को तुमने तारण कर दिया। पुत्र से लोक को जीतने वाली श्रुति को तुमने चरितार्थ कर दिया। अब तुम शंकर जी से इच्छित वरदान माँगो। मैं भी भाइयों सहित पिता को प्रणाम करके भार्या को देखकर तथा शंकर को प्रणाम करता हूँ और ऐसा कहकर प्रणाम कर शक्ति पितृलोक को चले गए। तब महादेव जी भी पाराशर पर अनुग्रह करके अन्तर्ध्यान हो गए। शिव के चले जाने पर महेश्वर को प्रणाम करके मन्त्रों के द्वारा राक्षसों को वह पाराशर जलाने लगा। मुनियों सहित वशिष्ठ जी ने कहा- हे तात् ! क्रोध मत करो। राक्षसों ने तुम्हारे पिता का कुछ अपराध नहीं किया, क्रोध मूर्खों को होता है। बुद्धिमान लोग क्रोध नहीं करते। हे तात्! कौन किसको मारता है। यश और तप का क्रोध नाश करता है। इससे अनपराधी राक्षसों को नाश मत करो। इनको छोड़ो। क्योंकि साधु क्षमा के समान होते हैं। वशिष्ठ के वाक्य से पाराशर ने राक्षसों के मारने वाले यज्ञ को समाप्त किया। वशिष्ठ जी इससे प्रसन्न हुए।
इस यज्ञ में ब्रह्मा के पुत्र पुलस्त्य जी भी पधारे। वशिष्ठ जी ने इनको अर्घ पाद्य से पूजन कर आसन पर बैठाया। प्रणाम करते को देख मुनि बोले- कि हे पाराशर! वशिष्ठ के वाक्य से यज्ञ समाप्त कह क्षमा को तुमने धारण किया है। इससे तुम सर्व शास्त्रों को जान जाओगे। हे महाभाग ! दूसरा वर यह भी मैं देता हूँ कि तुम पुराण संहिता को रचने वाले होगे। प्रवृत्ति और निवृत्ति के कर्म में तुम्हारी बुद्धि निर्मल रहेगी। मेरी कृपा से तुम असन्दिग्ध रहोगे। फिर भगवान वशिष्ठ बोले- हे तात् ! महात्मा पुलस्त्य ने जो कहा है वह सब सत्य हो। तब पुलस्त्य और वशिष्ठ के प्रसाद से पराशर ने वैष्णव (विष्णु) पुराण की रचना की। छः प्रकार का समस्त अर्थ शास्त्र और ज्ञान का संचय इसमें भरा है। छः हजार मन्त्रों के वेदार्थ से मुक्त पुराण संहिता में चौथा पुराण है। यह मैंने वशिष्ठ के वंश का वर्णन संक्षेप से और शक्ति पुत्र पराशर का प्रभाव तथा वर्णन आप लोगों को सुनाया।