लिंग महा पुराण
98- उपमन्यु का चरित्र
ऋषि बोले-
हे सूतजी ! पूर्वकाल में उपमन्यु में ने महेश्वर से गाणपत्य पद और दूध का समुद्र कैसे प्राप्त किया सो हमारे प्रति वर्णन कीजिए।
सूतजी बोले-
उपमन्यु नाम वाले मुनि अति तेजस्वी बालक थे। उन्होंने मामा के घर जाकर थोड़ा सा दूध पिया था। मामा के पुत्र ने ईर्ष्या के कारण उसे दूध नहीं पीने दिया और सब दूध को स्वयं पी गया। उपमन्यु ने अपनी माता से गरम-गरम उत्तम दूध और माँगा। माता ने पुत्र को आलिंगन करके बहुत समझाया। परन्तु उपमन्यु "दूध और दो दूध और दो" ऐसी बातें कहता हुआ जोर-जोर से रोने लगा। सिले को बीनकर कुछ अन्नों के दाने पीसकर और जल में घोलकर माता ने दुखी होकर पुत्र को दिया। उस बनावटी दूध को पीकर बालक ने कहा कि हे माता यह दूध नहीं है। माता ने चुम्बन करके और उसके नेत्रों को पौंछकर कहा- हे पुत्र! रत्नपूर्ण नदी स्वर्ग से पाताल तक बह रही है। परन्तु भाग्यहीन और शिव की भक्ति से हीन मनुष्य उसे नहीं देख पाते हैं। राज्य, स्वर्ग, मोक्ष, दूध से बने उत्तम भोजन तथा और भी उत्तम वस्तु उनको नहीं मिल पाती जिन पर शिव प्रसन्न नहीं हैं। यह सब भगवान शिव की कृपा से मिलते हैं। दूध हमें कहाँ मिलेगा, पूर्व जन्म में हमने न तो शिव का पूजन किया और शिव का लक्ष जप भी नहीं किया। यह सुनकर बालक माता को प्रणाम करके बोला हे माता! तू शोक को त्याग। हे माता! यदि महादेव कहीं पर हैं तो चिरकाल में अथवा शीघ्र ही दूध का समुद्र उनको प्रसन्न करके प्राप्त करूंगा। इस प्रकार माता को प्रणाम करके बालक उपमन्यु तपस्या को चल दिया और माता ने उसे आशीर्वाद दिया। वह हिमालय पर जाकर तपस्या करने लगा और केवल वायु पीकर रहने लगा। उसकी तपस्या से जगत जलने लगा। देवता सभी घबड़ाकर विष्णु भगवान के पास पहुँचे। विष्णु भगवान सब कारण जानकर देवताओं को साथ लेकर महेश्वर के पास पहुँचे और हाथ जोड़कर प्रणाम करके उनसे बोले - हे भगवन् ! यह उपमन्यु नामक बालक दूध के लिए तपस्या द्वारा जगत को जलाये डाल रहा है, इसको रोकिये। ऐसा सुनकर पिनाकी महेश्वर इन्द्र का रूप धारण करके उसके आश्रम में गए। उसे देखकर रूपधारी शिव बोले- हे बालक! तू वर माँग, तुझे मैं वर दूँगा, तेरे तप से मैं प्रसन्न हूँ। मुनि उपमन्यु ने कहा कि मैं शिव में भक्ति चाहता हूँ। यह सुनकर कुछ कुपित से होकर शिव ने कहा – हे मुनि! तीनों लोकों के द्वारा नमस्कृत सब देवों का स्वामी देवराज इन्द्र मुझको जान। मेरी भक्ति कर, सब प्रकार का कल्याण तुझे दूँगा । निर्गुण शिव का आग्रह त्याग। कानों को विदीर्ण करने वाले ऐसे उस इन्द्र के वचन सुनकर ब्राह्मण उपमन्यु बोला कि तुम कोई अधम दैत्य हो और मेरा धर्म बिगाड़ने आए हो, जो शिव की निन्दा कर रहे हो। मेरा अनुमान है कि पूर्व जन्म का मेरा कोई पाप था जो शिव की निन्दा आज सुनी। शिव की निन्दा सुनकर तुरन्त देह का त्याग कर देना चाहिए अथवा निन्दक का वध कर देना चाहिए। ऐसा करने वाला शिव के लोक को पाता है। पहले माता ने ठीक ही कहा था कि पूर्व में हमने शिव की पूजा नहीं की थी। शिव की निन्दा करने वाले की जीभ को जो काट देता है वह अपने इक्कीस कुलों का उद्धार करके शिव लोक को जाता है। ऐसा कहकर अथर्वास्त्र से इन्द्र रूपी शिव को मारने की इच्छा की। भस्म की मुट्ठी भरकर उसने इन्द्र पर फेंकी और अपनी देह को दग्ध करने के लिए आग्नेय मन्त्र का ध्यान किया। भगवान शंकर ने तब चन्द्रकास्त्रसे उस अस्त्र का 'निवारण किया और बालेन्दु रूप से अपना स्वरूप ब्राह्मण को दिखाया। हजारों दूध की धारायें, दूध का समुद्र, दही आदि का समुद्र, बालकों को भक्ष्य भोज्य पदार्थों का समुद्र, पूजाओं का पर्वत सामने दिखाते हुए शिवजी उससे बोले- हे ब्राह्मण! भाई बन्धुओं सहित इस सबका उपभोग कीजिए। पुनः गिरिजा की तरफ देखते हुए हँसकर कहा कि दे देवि! मैंने इसे पुत्र रूप में स्वीकार कर लिया है, और हे मुने! अब तेरा पिता महादेव और तेरी माता जगन्माता पार्वती हैं। मैं तुझे अमर बना और अपना गाणपत्य पद देता हूँ जो भी और कुछ माँगना हो वह मुझसे कहो। ऐसा कहकर महादेव ने दोनों हाथों से उठाकर उसके मूर्धा में चुम्बन किया और देवी को दिया। देवी ने प्रसन्न होकर उसको योग, ऐश्वर्य, ब्रह्म, विद्या तथा सदा कुमारत्व इत्यादि वरदान दिये। वह बालक हाथ जोड़कर गद्गद् वाणी से शंकर और भवानी की स्तुति करता हुआ बोला- हे देव देवेश! मुझ पर प्रसन्न होइये और आपकी अव्यभिचारिणी भक्ति बनी रहे तथा आपकी हमेशा निकटता बनी रहे। इस प्रकार मुनि के कहने पर भगवान शिव उसे अभीप्सित वरदान देकर अन्तर्ध्यान हो गए।