122- अघोर मन्त्र के साधन से शत्रुनाश विधान वर्णन

ऋषि बोले –

शिव भगवान ने अपने अपराधियों का निग्रह कहा है। सो हे रोमहर्षणजी! आप हमसे कहिये। आपसे लौकिक वैदिक श्रोत स्मार्त कुछ भी अविदित नहीं है।

सूतजी बोले-

पूर्व में भृगु पुत्र शुक्राचार्य ने अपने शिष्य हिरण्याक्ष के लिए निग्रह का वर्णन किया है। उन्हीं के प्रसाद से हिरण्याक्ष देव असुर मनुष्य सब त्रिलोकी को जीतकर बड़ा प्रतापी हुआ। गणप, अन्धक, चारविक्रम आदि पुत्रों को पैदा कर लोक में शोभा को प्राप्त हुआ। वाराह भगवान ने उसे मार दिया था। वह स्त्री, बालक तथा गौ आदि को बाधा पहुँचाता था। वह दैत्य पृथ्वी को रसातल में ले गया। हजारों वर्षों में जाकर वाराह भगवान ने उसको मारा है। अघोर सिद्धि के लिए ब्राह्मणों को बाधा नहीं पहुँचाना चाहिए। स्त्री, बालकों को कष्ट नहीं देना चाहिए। यह परम गुह्य से गुह्य बात तुमसे कही। आततायियों के लिए यह विधि करनी चाहिए और अपने राष्ट्र के राजा के लिए नहीं करनी चाहिए तथा ब्राह्मण के लिए नहीं करे। अति कठिन समय में सेना का नाश होता है, इसमें सन्देह नहीं।

अघोर रूपी अघोर मन्त्र का एक लाख जप करे। दशाँश तिलों का विधि पूर्वक हवन करे। विधि पूर्वक एक लाख सफेद पुष्पों से शिव का पूजन करे। लिंग में तथा वह्नि में पूजन करे। इस प्रकार मन्त्र सिद्ध होता है। प्रेत स्थान में विशेष करके मन्त्र सिद्ध होता है। मातृ स्थान (देवी के स्थान) में वेदवेदांग भक्त मन्त्र सिद्ध को प्राप्त होता है। विद्वान इस विधि को राजा के लिए अथवा अपने लिए करे। आठ त्रिशूल पूर्व से ईशान तक रखे। सब का नाश करने वाले कालाग्नि के सदृश अघोर रूप भगवान का स्वदेह में भावना करे। वह शून्य, कपाल, पाश, दण्ड और धनुष बाण, डमरू, खड्ग आठों हाथों में धारण करने वाले नीलकण्ठ दिगम्बर, पाँच तत्व धारण किये हुए आधा चन्द्रमा मस्तिष्क पर धारण किए हुए, भयंकर दाढ़ के कारण कराल मुख वाले, रौद्र दृष्टि वाले, हुँ फट् शब्दों से अखिल दिशायें जिन्होंने शब्दायमान कर रखी हैं, त्रिनेत्र वाले, नाग पाश से मुकुट बाँधने वाले, प्रेत भस्म को धारण करने वाले, प्रेत, भूत, पिशाच, डाकिनी आदि से घिरे हुए, गज चर्म ओढ़े हुए, सर्पों का भूषण धारण करने वाले, बिच्छुओं के अलंकार धारण करने वाले, नील बादल के समान शब्द करने वाले, नील पर्वत के समान रूप वाले, बाघम्बर ओढ़ने वाले हैं। ऐसे भगवान अघोरेश शिव का ध्यान करना चाहिए। महामुद्राओं से युक्त सर्व कार्य करना चाहिए। अग्नि में तथा प्रेत भूमि में मन्त्र शीघ्र सिद्ध होता है। पूर्व में, दक्षिण में तथा उत्तर में शास्त्र के अनुसार विधि पूर्वक कुण्ड बनाने चाहिए। मध्य कुण्ड में आचारी को कुशाओं का परिस्परण करके शिष्यों सहित ३२ अक्षरों सहित अघोरेश का ध्यान करके हवन करना चाहिए। कुण्ड के नीचे ब्राह्मण ऊर्ध्व मुख होकर शत्रु का न्यास करके श्मशान से अग्नि लाकर फूंस के साथ उसे जलावे। मयूरास्त्र से नाभी को जलावे। फूंस से युक्त कपास के वस्त्रों से कंचुकी को जलावे । होम द्रव्यों से युक्त तिलों से हवन करावे। एक हजार आठ आहुति प्रदान करे। कृष्ण पक्ष की चौदस के दिन इस कार्य को आरम्भ करे। ऐसा करने पर राजा के शत्रु कुल सहित तथा सम्पूर्ण दुःखों के सहित यमलोक को प्राप्त हो जावेंगे। इसी मन्त्र से मनुष्य के कपाल में खं, केश अंगार कुश, कंचुक, वस्त्र धूली विषैले सर्प के दाँत, बैल के दाँत, गौ के दाँत, व्याग्र के नख या दाँत, काले मृग के दाँत, विडाल के दाँत, नकुल के दाँत, वाराह के दाँत इनको सिद्ध करे तथा १०८ बार अघोर मन्त्र का ही जप करे। उस कपाल को घर में खेत में प्रेत स्थान में राष्ट्र में मुर्दे के वस्त्र से लपेट कर शत्रु के राशि में आठवें सूर्य या चन्द्रमा होने पर पृथ्वी में गाढ़ दे। ऐसा करने पर उस स्थान का तथा शत्रु का नाश हो जाय अथवा राजा के शत्रु की मूर्ति भूतल में, दर्पण के ऊपर, वितान के ऊपर लिखकर दक्षिण पैर से उसके सिर पर लात मारे । इस प्रकार भी राजा के शत्रु का नाश हो जाता है। अपने राष्ट्रपति को लक्ष्य बनाकर जो इस क्रिया को करता है वह अपने कुल का नाश करके अपनी आत्मा का हनन करता है। इसलिए अपने राष्ट्रपति राजा की सदा रक्षा करनी चाहिए। मन्त्र और औषधि और क्रिया हर एक किसी को नहीं देनी चाहिए, इस रहस्य को मैंने तुमसे कहा है।