101- अलक्ष्मी का वृत्तान्त

ऋषि बोले-

हे सूतजी! देवों ने, ब्रह्मा ने और कृष्ण ने भी पूर्व में पाशुपत व्रत किया। पतित ब्राह्मण धुन्धमूक के पुत्र ने उससे परम गति प्राप्त की। सो हे सूतजी ! वह पाशुपत व्रत कैसा है वह हम से कहिए। इसका हमें बड़ा कौतुहल है तथा शिवजी का नाम कैसे हुआ यह भी कहिए।

सूतजी बोले-

हे द्विजो! पूर्व के शाप से विमुक्त ब्रह्मपुत्र ऊँट की देह को त्याग कर रुद्र के प्रसाद से यहाँ शिलादि मुनि के पास आया और नमस्कार करके महेश्वर व्रत को पूछता भया और शिव के पशुपति होने का कारण पूछा। यही वृत्तान्त द्वैपायन व्यास से सुना। वही तुमसे कहता हूँ।

सनत्कुमार ने कहा-

पशुपति नाम देव शंकर का कैसे है ? पशु कौन है ? कौन पाश है जिससे पशु बंधे हैं ? और कैसे मुक्त हैं ?

शैलादि बोले-

हे सनत्कुमार! तुम रुद्र के भक्त हो सो तुम्हें यथार्थ रूप से कहता हूँ। ब्रह्मा से लेकर सम्पूर्ण जीव तृण तक पशु हैं क्योंकि वे संसार के वशीभूत हैं तथा उनका पति होने से रुद्र को पशुपति कहते हैं। आदि अन्त सहित भगवान विष्णु उन्हें माया के पाश से पशुवत् सबको बाँध लेता है। ज्ञान योग से सेवन किया हुआ वही सबका मोचक (छुड़ाने वाला) है। उनसे अलग अविद्यारूपी पाश से उन्हें कोई छुड़ा नहीं सकता। परमात्मा शंकर के बिना उनकी कोई गति नहीं है। २४ तत्व ही माया के पाश हैं। जीवों के द्वारा उपासना किया हुआ शिव ही उन्हें छुड़ाता है और २६ तत्वों से ही वह जीवों को माया के पाश में बाँध देता है। वह पाश इस प्रकार है। १०३ इन्द्रियाँ तथा चार (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार) अन्तःकरण, ५ भूत (पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश) पंच तन्मात्रा (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध) इन २४ तत्वों के पाशों से प्रभु सबको बाँधे रखता है। दृढ़ भक्ति योग से पशु (जीव) परमेश्वर की उपासना करे तो वह उन्हें शीघ्र ही उससे छुड़ा देता है। भजन को ही भक्ति कहते हैं। वह मन, वाणी, कार्य से तीन प्रकार का है। भक्ति पाप छेदन में बड़ी चतुर है। भगवान के रूप का चिन्तन करना मानस भजन है। जप वाचिक भजन या भक्ति है। प्राणायाम आदि को कायिक भजन कहते हैं। धर्म अधर्म मय पाशों के जीव इसमें बँधे हुए हैं। उन्हें परमेश्वर ही छुड़ाने वाला है। पाँच क्लेशमय पाशों से शंकर भगवान अज्ञानी जीवों को बाँधे है। पाँच क्लेश, अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश नाम के हैं। इन सबके भी अनेकों भेद कहे हैं। परमात्मा शंकर की जो शरण में प्राप्त हुए हैं उनके लिए पाप पुण्य कर्मों का कोई सम्बन्ध नहीं है। भगवान परमेश्वर चेतनाचेत सबमें व्याप्त प्रपंच से अलग हैं। उनका वाचक प्रणव (ॐकार) है। शिव रुद्र आदि शब्दों में भी प्रणव सबसे श्रेष्ठ है। प्रणव से जप करने पर सब सिद्धि स्वयं प्राप्त होती हैं। वह देह में स्थित शम्भु अति सूक्ष्म इन्द्रियों का नायक अति पवित्र अन्तःकरण में विराजमान रहता है। इसको देखो अन्यत्र वागजाल में क्यों भटकते हो। इसी प्रकार मुनियों के निमित्त शिवजी ने पाशुपत विधान का वर्णन किया है।