लिंग महा पुराण
52- भुवन कोष की रचना का वर्णन
सूतजी बोले-
हे द्विजो! प्लक्षादि सात द्वीपों में सात सात देश व पर्वत स्थित हैं। प्लक्ष द्वीप में गो भेदक चान्द्र, नारद, दुन्दुभि, सोयक, सुमना, वैभ्राज, ये सात पर्वत हैं। ऐसे ही शाल्मली द्वीप में कुमुद, उत्तम, बलाहक, द्रोण, कंकमहिष, कुमुदमान नाम के सात पर्वत हैं। कुशद्वीप में भी विद्रभ, हेम, इत्यादि सात पर्वत हैं। इसी प्रकार से क्रौञ्चादि द्वीपों में भी सात-सात पर्वत हैं। ये सातों द्वीप सात समुद्रों से घिरे हैं। लोकालोक नामक पर्वत पर आधे भाग में सूर्य की किरणें पहुँचती हैं तथा आधे में अन्धकार ही रहता है। जनलोक, महलोक इत्यादि सात लोक पुण्य लोक कहे गये हैं। नीचे के सात लोक नरक लोक कहे गये हैं, जिनमें पापीजन अपने-अपने कर्मों का फल भोगते हैं। ब्रह्माण्ड के सभी लोकों में अष्ट मूर्ति भगवान व्याप्त हैं। एक बार यक्ष रूपी भगवान शिव को देखकर वायु, अग्नि आदि सब की शक्ति नष्ट हो गई। अग्नि एक छोटे से तिनके को भी नहीं जला सका। वायु उसे उड़ा नहीं सका। इत्यादि सभी देव शक्तिहीन हो गये। तब इंद्र ने यक्ष से पूछा- आप कौन हैं ? तब यक्ष अन्तर्ध्यान हो गये और अम्बिका प्रकट हुई।
तब इन्द्र आदिक सभी देवताओं ने पूछा-
हे ईश्वरी! हे देवि! यह यक्ष रूप में कौन थे।
देवी ने कहा-
ये साक्षात् परमब्रह्म शिव भगवान थे। तब तो सबने देवी को प्रणाम किया। देवी ने कहा मैं ही पूर्व में प्रकृति रूप हूँ और पुरुष रूप शिव हैं इन्हीं शिव की आज्ञा से प्रकृति रूप में सकल ब्रह्माण्ड की रचना करती हूँ। हे ब्राह्मणो! यह ज्योतिषगणों सहित सब जगत अजा (प्रकृति) स्वरूप ही है, ऐसा तुम्हें जानना चाहिए।