97- शिव तांडव वर्णन

ऋषि बोले-

हे सूतजी! स्कन्द के बड़े भ्राता गणेश की उत्पत्ति हमने सुनी। अब शिव के तांडव नृत्य का आरम्भ कैसे हुआ, सो कहिए।

सूतजी बोले -

दारुक नाम वाला एक असुर हुआ। जिसने तपस्या के द्वारा वरदान प्राप्त किया था वह उसके प्रभाव से देवों और ब्राह्मणों को प्रलय की अग्नि के समान दुःख देने लगा। दारुक के द्वारा पीड़ित हुए देवता, ब्रह्मा, ईशान, कुमार, यम, इन्द्र, विष्णु आदि की शरण में पहुँचे और कहा कि हे महाराज! यह दैत्य स्त्री के द्वारा वध करने योग्य है। तब ब्रह्मादिक सभी स्त्री बनकर उससे लड़ने गए परन्तु उन सबको उस दैत्य ने ताड़ित करके भगा दिया। देवता पुनः ब्रह्माजी के पास गए और स्तुति करने लगे। ब्रह्माजी तब देवेश शिवजी के पास पहुँचे और प्रणाम करके बोले- हे भगवन् ! स्त्री के द्वारा यह असुर वध होगा ऐसे इस दारुक से रक्षा कीजिए। यह सुनकर शिवजी हँसते हुए गिरिजा पार्वती से बोले- हे कल्याणी! जगत के हित के लिए और स्त्री के द्वारा वध योग्य इस दारुक को मारने के लिए तुमसे प्रार्थना करता हूँ। ऐसा सुनकर देवी पार्वती एक अंश से महेश्वर के शरीर में प्रवेश कर गईं। इस भेद को इन्द्रादिक देवताओं और ब्रह्मा ने नहीं समझा। देवी को शिव के पास पूर्ववत् बैठी देखा क्योंकि वे सब देवी की माया से मोहित हो गये। पार्वती ने शिव के शरीर में प्रवेश करके उनके कण्ठ में स्थित विष से अपना शरीर धारण किया जो काले वर्ण वाला हुआ। कामारि शिव ने तब हृदय में उनको ऐसा जान कर अपने तीसरे नेत्र से उन्हें बाहर उत्पन्न किया। उस समय दैत्यों के नाश के लिए और भवानी और भोलेश्वर की तुष्टि के लिए विष से काले कण्ठ वाली उस काली के दारुण रूप को देखकर डर के मारे देवता व सिद्ध लोग भागने लगे। उस काली के ललाट में तीसरा नेत्र है, ललाट में चन्द्र रेखा है। कण्ठ में कराल विष का चिह्न है, हाथ में भयंकर त्रिशूल है । नाना प्रकार के आभूषण हैं, दिव्य वस्त्र धारण किए हुए हैं। इसके बाद ऐसी देवी ने पार्वती की आज्ञा से देवताओं को दुःख देने वाले ब्रह्म दारुक असुर को मार दिया। परन्तु उसके क्रोध की ज्वाला से सम्पूर्ण लोक जलने लगा। उसके क्रोध शान्ति के लिए शिव ने श्मशान में बालक का छोटा रूप धारण किया और बच्चे के समान रोने लगे। भगवान की माया से मोहित हुई वह देवी उस बालक को उठाकर पुचकार अपने स्तनों से दूध पिलाने लगी। शिव रूपी बालक ने दूध के साथ ही उसके क्रोध का भी पान कर लिया। उसके उस क्रोध से आठ मूर्ति हुईं जो क्षेत्रपाल कहलाई। इस प्रकार बालक रूपी शिव ने उस देवी का क्रोध पी लिया तो वह मूर्छित हो गईं। तब उस देवी को होश में लाने के लिए ताण्डव नृत्य किया। सायंकाल के समय सब भूतों और प्रेतों के सहित त्रिशूल हाथ में लेकर शिव ने नृत्य किया। शम्भू के कण्ठ पर्यन्त नृत्य रूपी अमृत का पान कर वह भी नाचने लगी। तब उसको योगिनी कहा गया। उस समय ब्रह्मा, इन्द्र आदिक देवताओं ने उस देवी काली की तथा पार्वती की स्तुति करके प्रणाम किया। इस प्रकार त्रिशूल धारण करने वाले शिव का तांडव मैंने संक्षेप से कहा।