36- क्षुप दधीचि संवाद वर्णन

नन्दीश्वर बोले -

राजा क्षुप की पूजा से सन्तुष्ट भगवान विष्णु शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण किये हुए प्रकट हुए। पीताम्बरधारी भगवान का दर्शन करके स्तुति करने लगे- तुम आदि देव हो, अनादि हो, प्रकृति भी तुम हो, तुम्हारे द्वारा ही ब्रह्मा और रुद्र प्रकट होते हैं, तुम्ही साक्षात् विष्णु हो। सतत् तत्व, तन्मात्रा आदि आप में ही स्थित हैं। हे विष्णु जी! आपको नमस्कार है। सात पाताल आपके पैर हैं, धरा जाँघ है, सात सागर वस्त्र हैं, दिशायें भुजायें हैं, नाभि आकाश है, वायु नाक है, सूर्य, चन्द्र नेत्र हैं। नक्षत्रादि आपके गले के आभूषण हैं। हे पुरुषोत्तम! मैं कैसे आपकी स्तुति करूँ।

शैलादि बोले-

इस प्रकार सब पापों के नाश करने वाले विष्णु के इस स्तोत्र को जो श्रद्धा भक्ति से सुनता है, वह विष्णु लोक को जाता है। राजा क्षुप बोला धर्मवेत्ता दधीचि नाम का प्रसिद्ध ब्राह्मण मेरा मित्र था। वह शंकर के अर्चन में तत्पर है इससे सबका अवध्य है। उसने वाम पैर से मेरी मूर्धा में अपमान सहित मारा है और मद से कहता है कि मैं किसी से नहीं डरता हूँ। अब जैसा मेरा हित हो सो करो मैं उसे जीतना चाहता हूँ।

शैलादि बोले-

विष्णु, शिव के प्रभाव से दधीचि को अवश्य समझ कर बोले- कि ब्राह्मणों को मुझसे भय नहीं है विशेष करके रुद्र के भक्त तो सर्वदा अभय हैं, चाहे वे नीच ही हों। दधीचि की तो बात ही क्या है । इससे हे राजा! तेरी विजय नहीं हो सकती। हे राजेन्द्रव! देवताओं के साथ दक्ष के यज्ञ में मेरा विनाश होगा, देवताओं के साथ में पुनः उत्थान भी होगा। सो हे राजन! मैं दधीचि से विजय का प्रयत्न करूँगा।

शैलादि बोले-

क्षुप भगवान की बात सुनकर 'अच्छा ऐसा ही हो' कहने लगा। भगवान, दधीचि की कुटिया में पहुँचे। ब्राह्मण का रूप धारण करके दधीचि से बोले- हे ब्रह्मर्षि दधीचि! शिव भक्ति में तत्पर हो मैं - आपसे वरदान माँगता हूँ। आप देने के योग्य है।

तब दधीचि बोले-

तुम्हारी इच्छा मैं जान गया तो भी मैं भय नहीं करता। आप विप्र के रूप में जनार्दन हो। भूत, भविष्यत, वर्तमान रुद्र की कृपा से सब जानता हूँ। आप ब्राह्मणपने को छोड़ दो। क्षुप ने तुम्हें पुकारा है। तुम्हारी भक्त वत्सलता को मैं जानता हूँ। शिव की अर्चना से मुझे कहीं भय नहीं है। यदि है, तो आप बताइये।

नन्दीश्वर बोला –

ऐसा सुनकर विष्णु भगवान रूप छोड़कर हँसने लगे।

भगवान बोले-

हे दधीचि ! तुम्हें - भय नहीं है, तुम शिव के अर्चन में तत्पर हो। इसी से तुम सर्वज्ञ हो। परन्तु एक बार यह कह दो कि 'मैं' डरता हूँ, ऐसी मेरी आज्ञा मान लीजिये। विष्णु के कहने पर भी दधीचि ने फिर भी यही कहा कि मैं नहीं डरता। मुनि के यह वचन सुनकर विष्णु को क्रोध आ गया। चक्र को उठाकर भस्म करने के लिये मारने को तैयार हुये परन्तु विष्णु का वह चक्र कुण्ठित हो गया।

तब दधीचि हँसकर बोले -

हे भगवन् ! अतीव दारुण यह सुदर्शन चक्र जो आपको प्रयत्न से प्राप्त हुआ है, वह शिव का ही है, इसलिए मुझे नहीं मार सकता। ब्रह्मास्त्र आदि से मारने का प्रयत्न करो।

शैलादि बोले –

उसकी बातों को सुनकर विष्णु ने सब प्रकार के अस्त्र उस पर चलाये तथा सभी देवता विष्णु की सहायता करते रहे। दधीचि कुशाओं की मुष्ठि लेकर शंकर जी का स्मरण कर सब देवों पर कुशा फेंकने लगे। उनके सब अस्त्र व्यर्थ हो गए। देवता सब भाग गए। विष्णु ने अपने शरीर से लाखों दिव्य गण उत्पन्न किए। परन्तु मुनीश्वर उन्हें दग्ध कर देता था। तब विष्णु भगवान में, करोड़ों देवता, करोड़ों रुद्र, करोड़ों ब्राह्मण, आदि मुनीश्वर ने देखे। उन्हें देखकर दधीचि बड़े विस्मय को प्राप्त हुआ और तब दधीचि उनको इस प्रकार देखकर बोले- कि हे प्रभो! इस माया को छोड़ दो। आप मेरे शरीर में भी अपने सहित समस्त ब्राह्मण्ड को देखो। मैं तुम्हें दिव्य चक्षु देता हूँ। परन्तु इस माया से क्या, इसको छोड़ो प्रयत्न पूर्वक मुझसे युद्ध करो।

उसके ऐसे वचन सुनकर और अद्भुत महात्म्य को देखकर देवता सब भाग गये। नारायण को इस प्रकार निश्चेष्ट देखकर पद्मयोनि ब्रह्मा निराकरण करने लगे। तब विष्णु मुनीश्वर को प्रणाम करके वहाँ से चले गए।

क्षुप दुखातुर होकर दधीचि की पूजा करने लगा। हे दधीचि ! मैंने तथा विष्णु भगवान और देवताओं ने जो अज्ञान से आपका तिरस्कार या अपमान किया उसको क्षमा कर प्रसन्न होइये। दधीचि यह सुन करके राजा को तथा देवताओं को श्राप देने लगे कि हे राजा! आप सभी देवता विष्णु सहित दक्ष के पुण्य यज्ञ में रुद्र के क्रोध से भस्म हो जायें। फिर राजा को देखकर दधीचि बोले- हे राजेन्द्र ! विविध देवताओं के द्वारा पूज्य तथा राजाओं के द्वारा पूज्य ब्राह्मण बली और समर्थ हैं। ऐसा कहकर दधीचि अपनी कुटिया में चले गए और राजा भी प्रणाम करके लौट गया। तभी से यह तीर्थ स्थानेश्वर के नाम से प्रसिद्ध है। जो इस तीर्थ को प्राप्त होंगे वे शिव सायुज्य को प्राप्त होंगे। यही मैंने दधीचि और शिव का प्रभाव भी वर्णन किया। जो इस क्षुप राजा और दधीचि के आख्यान को सुनेंगे वह मृत्यु को जीतकर ब्रह्म लोक को प्राप्त होंगे। युद्ध में जो इसका कीर्तन करेंगें वह विजयी होंगे तथा मृत्यु का भय नहीं होगा।