लिंग महा पुराण
120- गायत्री के भेदों का वर्णन
सूतजी बोले-
सभी देवताओं की प्रतिष्ठा को अपने अपने मन्त्रों द्वारा तथा याज्ञिक कुण्डों का विन्यास अब विस्तार पूर्वक कहूँगा। उत्सव करके विधान पूर्वक पूजा करके मूर्ति की स्थापना करनी चाहिए। सूर्य की पंचाग्नि कार्य से अथवा द्वादशाग्नि के क्रम से पूजा करे। सब कुण्डों की वृत्ताकार अथवा पद्माकार आकृति होनी चाहिए। अम्बिका की पूजा में योनि कुण्ड बनावे। शक्तियों के सब कार्य में योनि कुण्ड बनावे । शक्तियों के सब कार्य में योनि कुण्ड का विधान है। सब गायत्रियों की उत्पत्ति शम्भु के ही द्वारा है, सब ही रुद्र के अंश से उत्पन्न हैं, यह सब संक्षेप से कहता हूँ। गायत्री के भेद निम्न प्रकार हैं।
अथ गायत्री भेदाः
तत्पुरुषाय विद्महे वाग्विशुद्धाय धीमहि
तत्रः शिव: प्रचोदयात् ॥ १ ॥
गणाम्भिकायै विद्महे कर्म सिद्धै च धीमहि
तन्नो गौरी प्रचोदयात् ॥ २ ॥
तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि
तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् ॥ ३ ॥
तत्पुरुषाय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि
तन्नो दत्तिः प्रचोदयात् ॥ ४ ॥
महासेनाय विद्महे वाग्विशुद्धाय धीमहि
तन्नः स्कन्दः प्रचोदयात् ॥ ५ ॥
तीक्ष्ण शृङ्गाय विद्महे वेदपादाय धीमहि
तन्नो वृषः प्रचोदयात् ॥ ६ ॥
हरिवक्त्राय विद्महे रुद्रवक्त्राय धीमहि
तन्नो नन्दी प्रचोदयात् ॥ ७॥
नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि
तन्नो विष्णु प्रचोदयात् ॥ ८ ॥
महाम्भिकायै विद्महे कर्म्मसिद्धै च धीमहि
तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात् ॥ ९ ॥
समुद्धृतायै विद्महे विष्णुनैकेन धीमहि
तन्नो राधा प्रचोदयात् ॥ १० ॥
वैनतेयाय विद्महे सुवर्णपक्षाय धीमहि
तन्नो गरुड़: प्रचोदयात् ॥ ११ ॥
शिवास्यजायै विद्महे देवरूपायै धीमहि
तन्नो वाचा प्रचोदयात् ॥ १२ ॥
पद्मोद्रभवाय विद्महे वेदवक्त्राय धीमहि
तन्नो सृष्टा प्रचोदयात् ॥ १३ ॥
शिवास्यजायै विद्महे देवरूपायै धीमहि
तन्नो वाचा प्रचोदयात् ॥ १४ ॥
देवराजाय विद्महे वज्रहस्ताय धीमहि
तन्नः शक्रः प्रचोदयात् ॥ १५ ॥
रुद्रनेत्राय विद्महे शक्ति हस्ताय धीमहि
तन्नो वह्नि प्रचोदयात् ॥ १६ ॥
वैवस्वताय विद्महे दण्ड हस्ताय धीमहि
तन्नो यमः प्रचोदयात् ॥ १७ ॥
निशाचराय विद्महे खड्गहस्ताय धीमहि
तन्नो निऋतिः प्रचोदयात् ॥ १८ ॥
शुद्धहस्ताय विद्महे पाशहस्ताय धीमहि
तन्त्रो वरुणः प्रचोदयात् ॥ १९ ॥
सर्वप्राणाय विद्महे यष्टि हस्ताय धीमहि
तन्नो वायुः प्रचोदयात् ॥ २० ॥
यक्षेश्वराय विद्महे गदाहस्ताय धीमहि
तन्नो यक्षः प्रचोदयात् ॥ २१ ॥
कात्यायन्यै विद्महे कन्य (न्या) कुर्भाय धीमहि
तन्नो दुर्गा प्रचोदयात् ॥ २२ ॥
इस प्रकार से तत् तत् देव के अनुरूप भिन्न भिन्न गायत्री से देवताओं की पूजा और स्थापना करनी चाहिए अथवा अतुल विष्णु भगवान को पुरुष सूक्त से या देव गायत्री से स्थापना करनी चाहिए। वासुदेव प्रधान है, फिर वे शंकरषण हैं, फिर प्रद्युम्न हैं, ये उनके मूर्ति के भेद हैं। बहुत प्रकार की भगवान की शाप उत्पन्न मूर्ति जगत के हित के लिए हैं जैसे मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिंह, वामन, राम, कृष्ण, बौद्ध, कल्कि तथा अन्य भी भगवान की शाप से उत्पन्न मूर्तियों को उनकी गायत्री से स्थापना करनी चाहिए।'ॐ नमो नारायणाय' यह अष्टाक्षर मन्त्र परम शोभन है अथवा ॐ नमो वासुदेवाय नमः शंकर्षणावच प्रद्युम्नाय प्रधानाय अनिरुद्धाय वै नमः ॥ इस मन्त्र से भगवान की स्थापना करे। अचल मूर्ति में सब कार्य करते तथा चल में भी सब विधान से नेत्रोन्मीलन नेत्र मन्त्र से करना चाहिए। खेत की, बगीचा की, नगर की परिक्रमा तथा जलाधि वास पूर्ववत् ही करना चाहिए। कुण्ड और मण्डप का निर्माण तथा शयन पूर्ववत् ही करना चाहिए। नवाग्नि भाग से नौ कुण्डों में हवन करना चाहिए अथवा पाँच कुण्डों के अथवा एक ही कुण्ड में हवन करे। यह परम्परा से चला आया हुआ दिव्य प्रतिष्ठा का वर्णन मैंने तुमसे कहा। शिला से उत्पन्न मूर्ति, बिम्ब द्वारा या चित्र द्वारा बनी मूर्ति आदि सबकी प्रतिष्ठा को इसी प्रकार जानो, जो मैंने कही है। प्रासाद (मन्दिर या महल) की प्रतिष्ठा भी ऐसे ही कही गई है क्योंकि प्रासाद भी इसका अंग है जैसे शरीर के अंग होते हैं। वृष, अग्नि, मातृ, विघ्नेश कुमार, दुर्गा, चण्डी आदि का भी गायत्री द्वारा विन्यास करे। लोकपाल गणेश आदि का भी विन्यास करे तथा क्रम से स्थापना करे। उमा, चण्डी, नन्दी, महाकाल, महामुनि, विघ्नेश्वर, महाभृङ्गी, स्कन्द की स्थापना करे। इन्द्रादिक देवताओं की, ब्रह्मा की, जनार्दन विष्णु की भी यत्न से स्थापना करे। अनंत आदि देवताओं की स्थापना प्रणव के द्वारा सिंहासन पर करे। कमल के ऊपर उनके गुह्य अंग की स्थापना करे।