102- उमापति की महिमा का वर्णन

सनत्कुमार बोले-

हे नन्दीकेश्वर! उमापति भगवान की महिमा का वर्णन कीजिए।

शैलादि बोले -

हे सनत्कुमार! संक्षेप में महेश्वर की महिमा का वर्णन मैं तुमसे करता हूँ। सो सुनो! महेश्वर को न तो प्रकृति का बन्धन है, न अहंकार का बन्धन है और न श्रोत्र, नेत्र, जिह्वा, वाणी, पाद आदि का ही बन्धन है। वह सबसे ही रहित और मुक्त है। भूत तन्मात्रा के बन्धन से रहित नित्य शुद्ध, बुद्ध तथा नित्य मुक्त है ऐसा मुनीश्वर कहते हैं। इस परमेश्वर की आज्ञा से ही प्रकृति बुद्धि को जनती है। बुद्धि अहंकार को जनती है। तन्मात्रा महाभूतों को जनती है। शिव की आज्ञा से पंचभूत ब्रह्मादिक से लेकर तृण पर्यन्त सभी जीवों को जनते हैं। इस परमेश्वर की महिमा का कोई विस्तार नहीं। संसार के सुख दुख इनकी आज्ञा से ही आया जाया करते हैं। अतः लोभ, मोह तथा सुख-दुःख परमेश्वर को नहीं व्यापता। इनकी महिमा का गुणगान वेद तथा शास्त्र करते चले आए हैं। आप ही जल, थल, नभ को क्रिया रूप में परिणित करने वाले हैं। परमेश्वर ही प्रकृति के सृष्टा हैं। प्रकृति के जितने भी अवयव हैं परमेश्वर की शक्ति के अनुसार हैं। शिव की आज्ञा से कान शब्दों को सुनते हैं। वाणी शब्दों को बोलती है। शरीर के सभी अवयव शिव की आज्ञा से आदान और व्यापार करते हैं। उनकी आज्ञा से वायु बहती है। अति अग्नि देवों के द्रव्य को भक्षण करता है तथा पितरों को तृप्त करता है। शिव की आज्ञा से चराचर सब प्राणी अपने-अपने कार्य में प्रवृत्त होते हैं। उनकी आज्ञा से पीड़ा तथा मरे हुए जीवों को नरक की यातना प्राप्त होती है। वही असुरों का और अधार्मिक पुरुषों का नाश करता है। उन्हीं की आज्ञा से वरुण जल से लोकों को प्रसन्न करता है तथा उन्हीं की आज्ञा से जल में सबको डुबो देता है। आदित्य, अश्वनी कुमार, वरुण आदि सब शिव की आज्ञा में ही रहते हैं। ग्रह, समुद्र, नक्षत्र, तारा, यज्ञ, वेद, ऋषियों के गण सब शिव के शासन में रहते हैं। पित्रीश्वर, सात समुद्र, पर्वत, वन, सरोवर सब शिव की आज्ञा के पालक हैं। कल्प, काष्ठ, निमेष, मुहूर्त, दिन, रात, ऋतु, पक्ष, मास आदि सभी इन्हीं भगवान शिव की आज्ञा में ठहरे हुए हैं। चौदह लोकों में प्रजा परमेश्वर की आज्ञा में ही स्थित है। पाताल आदि सभी भुवन और ब्रह्माण्ड सभी वस्तु उनकी कृपा से ठहरे हुए हैं। वर्तमान सब ब्रह्माण्ड, बीता हुआ ब्रह्माण्ड तथा आने वाले ब्रह्माण्ड अपने आवर्णों सहित सभी शिव की आज्ञा में रहते हैं। अतः उन परमेश्वर की महिमा अपार है।