लिंग महा पुराण
58- सूर्य की किरणों का वर्णन
सूतजी बोले-
संशय में युक्त मुनि लोगों ने पूछा कि हे सूतजी! ज्योति का निर्णय विस्तार से कहिए। हे मुनियो! सूर्य चन्द्र आदि की गतियों को पितामह ब्रह्मा ने इस लोक में अग्नि का विभाग किया है, सो पार्थिव दिव्य आदि भेद से अनेक प्रकार के हैं। वैदिक, जाठर, सौर ये तीनों अग्नि, जल, गर्भ वाली हैं। इससे सूर्य अपनी किरणों से जल पीता हुआ चमकता है। जल से पैदा हुई अग्नि जल से नहीं शान्त होती। मनुष्यों के उदर में जो अग्नि है वह भी शान्त नहीं होती, सूर्य उदय होता है और जल में शान्त होता है। इसी को दिन और रात का विभाग कहते हैं। चन्द्रमा भी मनुष्य, पितृ तथा देवताओं को तृप्त करता है। मनुष्यों को औषधियों से, सुधा से पितृयों को तथा अमृत से देवताओं को तृप्त करता है। हेमन्त में तथा शिशिर ऋतु में बर्फ को उत्पन्न करता है। माघ मास में सूर्य वरुण नाम से, फाल्गुन में सूर्य नाम से, चैत मास में अंशु नाम से, वैशाख में तापन नाम से, जेठ में इन्द्र नाम से, अषाढ़ में अर्यमा नाम से, सावन में विवस्वान नाम से, भाद्रपद में भग नाम से, क्वार में पर्जन्य नाम वाला, कार्तिक में तृष्टा, मार्ग शीर्ष में मित्र और पौष में सनातन विष्णु नाम से कहा गया है।
वसन्त ऋतु में सूर्य कपिल रंग का, ग्रीष्म में काँचन वर्ण का, वर्षा में श्वेत वर्ण का, शरद ऋतु में पांडु रंग का, हेमन्त में ताम्र वर्ण का तथा शिशिर में लोहित वर्ण का होता है। सूर्य भी औषधियों को बल देता है तथा सुधा से पितरों को तृप्त करता है और अमृत से देवों को तृप्त करता है। इस प्रकार लोकों में कार्य सिद्ध करने वाली हजारों रश्मियाँ सूर्य की कही गई हैं, जो लोकों में प्राप्त होकर ठण्डी गरम आदि हो जाती हैं। सूर्य नाम वाला भास्कर का मण्डल शुक्ल वर्ण का है। नक्षत्र, ग्रह आदि की स्थिति इसी में है और यही सबकी योनि है। चन्द्र, नक्षत्र, ग्रह सब सूर्य से ही उत्पन्न हैं। नक्षत्रों का स्वामी शिवजी का बायां नेत्र है। भास्कर शिव का दायां नेत्र है।