लिंग महा पुराण
14- अघोर की उत्पत्ति का विवरण
सूतजी बोले –
उस पीतवर्ण कल्प के बीत जाने पर प्रवृत्त नाम का काले वर्ण वाला कल्प हुआ। उसमें देवताओं के हजार वर्ष के समय में जब समस्त ब्रह्माण्ड एक समुद्र से ही व्याप्त था और चारों ओर जल ही जल था, तब ब्रह्मा ने प्रजा रचने की इच्छा व्यक्त की। तब दुखी होकर ब्रह्मा ने पुत्र की कामना से चिन्ता करते हुए कृष्ण वर्ण वाले भगवान का ध्यान किया। इसके बाद एक महान तेजस्वी कुमार प्रकट हुआ जो काले रंग का, महावीर और अपने तेज से प्रकाशित था। वह काले वस्त्र पहने हुए काला सिर पर उष्णीश और काला जनेऊ धारण किये था। काली मालायें तथा मुकुट और काले रंग का लेप अपने अंगों पर लगाये हुए था। तब उस घोर पराक्रम वाले महात्मा अघोर रूप कुमार को देव देवेश जानकर ब्रह्मा जी ने उनकी वन्दना की। प्राणायाम में तत्पर होकर महेश्वर का हृदय में ध्यान करने पर भगवान महेश्वर प्रसन्न हुए और उन ब्रह्म स्वरूप अघोर जो घोर पराक्रम वाले हैं, ब्रह्मा के ध्यान करने पर दर्शन दिये और उनके पास से काले वर्ण वाले काले, चन्दन से लेप किये हुए चार महान तेजस्वी कुमारों का प्रादुर्भाव हुआ। वे सभी कृष्ण वर्ण के काली शिखा से युक्त और काले वस्त्र धारण किये हुए थे। इसके बाद हजारों वर्ष तक योग में तत्पर हुये उपासना की। योग में तत्पर हुये वे सभी मन के द्वारा योगेश्वर शिव में प्रवेश करके ईश्वर के निर्मल निर्गुण स्थान को प्राप्त हुए। इस प्रकार योग के द्वारा वे तथा दूसरे मनीषी लोग महादेव का ध्यान करके अविनाशी रुद्र भगवान को प्राप्त करते हैं।