लिंग महा पुराण
94- विष्णु भगवान द्वारा शिवजी की सहस्र नामों से स्तुति करना
ऋषियों ने पूछा-
हे सूतजी! देव देव महेश्वर से विष्णु भगवान ने सुदर्शन चक्र किस प्रकार प्राप्त किया। सो हमारे प्रति वर्णन कीजिए।
सूतजी बोले-
हे मुनियो! एक बार देवता और असुरों में घोर संग्राम हुआ। देवता असुरों के अनेकानेक शस्त्र अस्त्रों से पीड़ित हुये भाग कर विष्णु भगवान के पास आये। प्रणाम करने पर भयभीत हुये देवों को देखकर हरि ने पूछा- हे देवताओं! क्या आपत्ति है जिससे सन्ताप युक्त दौड़कर आये हो।
देवता बोले-
हे विष्णो! हम लोग दैत्यों से पराजित हुए आपकी शरण में आये हैं। तुम ही जगत के कर्ता और हर्ता हो। हमारी रक्षा करो। वे दैत्य, देव वरदान के कारण वैष्णव रौद्र सौर, वायव्य आदि शस्त्रों से अवध्य हैं। आपका चक्र जो सूर्य मण्डल से उत्पन्न है कुण्ठित है। दण्ड, शार्ङ्ग और सब शस्त्र दैत्यों ने प्राप्त कर लिए हैं। पूर्व में त्रिपुरारी शिव ने जलन्धर को मारने के लिए जो तीक्ष्ण चक्र निर्माण किया था। उससे मार सकोगे अन्य शस्त्रों से नहीं।
विष्णु बोले-
हे देवो! त्रिपुरारी ने जो चक्र जलन्धर के वध के लिए बनाया है उसी से सब दैत्यों को बन्धु बान्धवों सहित मार कर तुम्हारे सन्ताप को दूर करूँगा। ऐसा कहकर विष्णु ने हिमालय शिखर पर महादेव के लिंग की स्थापना करी जो कि मेरु पर्वत के समान विश्वकर्मा ने निर्माण किया। शिव सहस्त्र नाम से विष्णु भगवान ने पूजन किया और स्तुति की। सहस्र नाम से पूजन करते हुए प्रत्येक नाम पर कमल पुष्प से पूजन करने लगे और समिधा स्थापित कर अग्नि में सहस्र नाम से आहुति की। श्री विष्णु ने शिव के सहस्र नाम का पाठ किया। हे भव, शिव, हर, रुद्र, नीललोहित, पद्मलोचन, अष्टमूर्ति, विश्वमूर्ति, वामदेव, महादेव इत्यादि सहस्र नाम से स्तुति की। हे ऋषियो! इस प्रकार हरि सहस्त्र नाम से स्तुति करते हुए प्रत्येक नाम पर कमल अर्पण करते रहे। शिव ने हरि की परीक्षार्थ हजार कमलों में से एक कमल छिपा दिया। हरि विचार करने लगे क्या किया जाय। एक कमल कम हो गया सो अपने नेत्र रूपी कमल को निकाल कर शिव को अर्पण कर दिया। इस भाव से प्रसन्न हुए शिवजी अग्नि मण्डल से प्रकट हुए। उस समय उनका हजारों सूर्य मण्डल के सदृश तेज था। वे जटा मुकुट से शोभित शूल, टंक, गदा, चक्र, पाश आदि धारण किए हुए थे। ऐसे उग्र रूप को देखकर हरि भगवान ने शम्भु को नमस्कार किया। देवता भय से भागने लगे। ब्रह्मलीक चलायमान हो गया। वसुन्धरा काँपने लगी। शिव का तेज सौ योजन तक जलाने लगा। ऊपर नीचे के सभी लोकों में हाहाकार मच गया। उस समय शंकर हँसते हुए विष्णु से बोले- हे जनार्दन! मैंने तुम्हारे देव कार्य को जान लिया है। यह सुदर्शन चक्र तुम्हारे लिये देता हूँ। ऐसा कहकर हजारों सूर्य के समान तेज वाला चक्र और ब्रह्म पद्म के सदृश हरि को दे दिया और तब से हरि का नाम पद्माक्ष पड़ा। शिव ने कहा – हे पुरुषोत्तम! मैं तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न हूँ। तुम वरदान माँगो।
तब विष्णु बोले-
हे देव! आपकी भक्ति बनी रहे और आप प्रसन्न रहिये, यह वरदान माँगता हूँ और कुछ नहीं। यह सुनकर शिव बोले- तुम्हारी मेरे में भक्ति बनी रहेगी और तुम सब देवों के पूज्य और वन्दनीय बने रहोगे। जब दक्ष की पुत्री सती पिता के अपमान से भस्म होगी और फिर दिव्य रूप से हिमाचल की पुत्री उमा होगी, उस समय तुम ही अवतार लेकर ब्रह्मा की आज्ञा से उमा को मेरे लिए प्रदान करोगे। तब मेरे सम्बन्धी तुम लोकों में पूज्य होगे। ऐसा कहकर नीललोहित भगवान अन्तर्ध्यान हो गये। जनार्दन भगवान ने सब युक्तियों से ब्रह्मा के समीप यह कि मेरे द्वारा पठित जो यह स्तोत्र है इसको जो पढ़े या सुने उसको प्रति नाम पर स्वर्ण दान का फल मिलेगा और हजार अश्वमेघ यज्ञ का फल प्राप्त होगा। जो इस सहस्त्र नाम द्वारा घृत अथवा जल से शंकर भगवान को स्नान करायेगा उसे भी सहस्त्र यज्ञ का फल प्राप्त होगा और रुद्र का प्यारा होगा। तब ब्रह्माजी भी हरि भगवान से तथास्तु कह अपने लोक को चले गये।
सूतजी कहते हैं कि हे द्विजो ! जो इस सहस्र नाम से शिव की पूजा करेगा या इसका जप करेगा, वह परम गति को प्राप्त होगा।