95- देवताओं के द्वारा शंकर भगवान की स्तुति

ऋषियों ने कहा-

हे सूतजी! गजानन गणेश की उत्पत्ति कैसे हुई और उनका प्रभाव कैसा है, सो हमसे कहिये।

सूतजी कहने लगे -

जिस अवसर पर इन्द्र उपेन्द्रादि देवगण दैत्यों के धर्म कर्म विध्वंस करने लगे और दैत्य असुर दानव क्रूर कर्म करने वाले तमोगुण, रजोगुण स्वभाव वाले वे सभी भूमि पर अपने को निर्विघ्न की इच्छा वाले होकर यज्ञ दान तप से महेश्वर को, ब्रह्मा को, हरि को प्रसन्न करने लगे और उनसे वरदान प्राप्त करके हमारी सदा विजय हो यह चाहने लगे। उस समय दैत्यों के विघ्न के लिए और देवताओं के अविघ्न के लिए, नारियों को पुत्र प्राप्ति के लिए, नरों को कर्म सिद्धि के लिए शंकर भगवान ने गणेश जी की रचना की। ऐसा देखकर देवता परस्पर शिव की स्तुति करने लगे।

देवता बोले-

हे सबके आत्मस्वरूप! हे अनघ! आपको नमस्कार है। हे विरंचरूप! देवकार्य सिद्ध करने वाले प्रभो आपको नमस्कार है। हे कालरूप! अग्निरूप, रुद्ररूप आपको नमस्कार है। हे कालकण्ठ! अम्बिका के पति, स्वर्ण के रूप वाले, हे शूलधारी! हे कपाल ! दण्ड, पाश, खङ्ग, ढाल, अंकुश धारण करने वाले, पाँच मुख वाले, सर्पों का हार पहनने वाले, पंचाक्षर स्वरूप आपको नमस्कार है। 'क' आदि पाँच अक्षर और 'च' आदि पाँच अक्षर जिनके हाथ हैं। 'ट' आदि पाँच अक्षर और 'त' आदि पाँच अक्षर जिनके पैर हैं । 'प' आदि पाँच अक्षर जिनके लिंग हैं। सूर्य सोम अग्नि जिनके नेत्र हैं ऐसे आपको नमस्कार है। ऋक यजु सामवेद रूप आप हो आप ही ॐकार स्वरूप हो। आपको नमस्कार है। ॐकार में तीन रूपों से आप ही स्थित हो अर्थात् पीत रूप, शुक्ल रूप और रक्त रूप से ऐसे है शिव! आपको नमस्कार है। ब्रह्म रूप, विष्णु रूप और कुमार रूप आपको नमस्कार है। आप सूक्ष्म, स्थूल रूप से स्थित हो, सर्व संकल्पों से रहित हो। आदि मध्य अन्त से हीन हो। ऐसे आपको नमस्कार है। यम, अग्नि, वायु, रुद्र, जल, सोम इन्द्रादि देवों और निश्चरों द्वारा आप निशि दिन पूजित हो ऐसे हे प्रभो! आपको नमस्कार है। आप महेश्वर धीर हो, साक्षात् शिव हो। आपके लिए है, आदि-आदि। सूतजी कहते हैं कि हे ब्राह्मणो! इन्द्र, अग्नि, वरुण आदि देवों द्वारा किया गया यह स्तोत्र है जो भक्ति और श्रद्धा से इसे पढ़ेगा या सुनावेगा, वह परम गति को पायेगा।