लिंग महा पुराण
62- देवादिकों की सृष्टि का वर्णन
ऋषि बोले -
देवताओं की, दानवों की, गन्धर्वो की उत्पत्ति भी हे सूतजी! हमसे कहिये।
सूतजी बोले-
पूर्व की सृष्टि संकल्प मात्र से, दर्शन से तथा स्पर्श से ही हुई। दक्ष के बाद सृष्टि मैथुन के द्वारा उत्पन्न होने लगी। जब देव ऋषि पन्नगों की सृष्टि का विस्तार नहीं हुआ तब मैथुन से सृष्टि उत्पन्न हुई। दक्ष ने पंचसूती स्त्री में दस हजार पुत्र पैदा किये। उनको देखकर प्रजा की रचना के लिए दक्ष ने कहा। नारद जी उन दक्षों के पुत्रों से बोले कि तुम पृथ्वी का प्रमाण जानकर पीछे से सृष्टि करना। वे नारद के वचन सुनकर तपस्या के लिए चले गए और लौटकर नहीं आये। इसके बाद दक्ष ने पुन: अपनी स्त्री से दस हजार पुत्र पैदा किये जो शवल नाम वाले थे। नारद ने उनके पास जाकर भी यही कहा कि पहले तुम भू के प्रमाण को जानो तथा अपने भाइयों की गति को प्राप्त करो तब सृष्टि रचना करना। वह भी नारद के वचन से तपस्या करके अपने भाइयों की गति को प्राप्त हुए और लौटकर नहीं आए। तब दक्ष प्रजापति ने वैरिणी नाम की स्त्री में साठ कन्या पैदा कीं। उनमें से दस धर्म को प्रदान कीं। तेरह कश्यप के लिए और २७ सोम के लिए तथा ४ अरिष्ट नेमि के लिए दो भृगु पुत्र के लिए, दो कृशाश्व के लिए, दो अङ्गिरा के लिए प्रदान कीं। अब मैं हे मुनीश्वरो! इन देवताओं के नाम विस्तार पूर्वक कहता हूँ, सो सुना मरुतवती, वसु, अर्यमा, लम्बा, भानु, अरुन्धती, संकल्पा, महूर्ता, साध्या, विश्वभामिनी ये धर्म की पत्नी थीं। इनके पुत्र ये हैं―
विश्वभामिनी से विश्वेदेवा पैदा हुए, साध्या से साध्य, मरुतवती में वरुत्वान, वसु से बसव, भानु से भानव, महूर्ता से महूर्तिक, लम्बा से घोष, संकल्पा से संकल्प इत्यादि पुत्र हुए। वसु से आठ वसु पैदा हुए जिनके नाम अजैकपाल, अहरब्रह्म इत्यादि हैं।
कश्यप की पत्नी के जो पुत्र पैदा हुए उन्हें कहता हूँ। कश्यप की स्त्री, अदिति, दिति, अरिष्टा, सुरसा, मुनि, सुरभि, विनता, ताम्रा, क्रोध, वशा, इला, कद्रू, त्विषाद, अङ्ग इत्यादिक थीं जिनके पुत्रों को भी कहता हूँ―
चाक्षुष मन्वन्तर में तवशित नाम के देवता हैं। वह वैवस्वत मन्वन्तर में १२ आदित्य हुए। जिनके नाम हैं इन्द्र, धाता, भग, त्वष्टा, मित्र, वरुण, अर्यमा, विवस्वान, सविता, पूषा, अंशमान, विष्णु, ये हजारों किरणों वाले १२ आदित्य हैं। कश्यप के दिति से दो पुत्र हुए जिनका नाम हिरण्य, कश्यपु और हिरण्याक्ष है। दनु में कश्यप से १०० पुत्र पैदा हुए जिनमें विप्रचित्त प्रधान था। ताम्रा ने ६ कन्यायें जनीं। वे शुकी, श्वेनी, सुग्रीवी, गृधिका, भासी, शुनि नाम वाली थीं। शुकी ने शुक और उलूकों को पैदा किया, श्येनी ने श्येनों (बाजों) को, भासी ने कुरङ्गों को पैदा किया। गृधिका से गृद्ध तथा कपोत पारावत, हंस, सारस, कारन्ड, प्लव, पक्षियों को शुचि ने उत्पन्न किया। सुग्रीवी ने अज, मेष, खट, ऊँट आदि जने। विनता ने गरुड़, अरुण जने। कद्रू ने हजार सिर वाले हजारों नागों को उत्पन्न किया, जिनमें २६ प्रधान कहे हैं। शेष, वासुकी, कर्कोटक, शंख, ऐरावत, कम्बल, धनञ्जय, महानील, पद्माश्वतर, तक्षक आदि कहे हैं। क्रोधवंशा रक्षोगणों को उत्पन्न करती हुई किन्नर, गन्धर्वों को अरिष्टि ने पैदा किया। त्वष्टा ने यक्ष और राक्षसों को उत्पन्न किया। ये कश्यप ऋषि की सन्तान संक्षेप में कही। इनका पुत्र और पौत्रों का वंश तो बहुत सा है। कश्यप ने गोत्र की कामना से फिर तप किया कि गोत्र को चलाने वाला पुत्र मुझे प्राप्त हो। तब उनके ब्रह्मवादी दो पुत्र हुए। इनका नाम वत्सर और असित हुआ। वत्सर ने नैबुध और रैम्भ दो पुत्र हुए। असित से एकपर्णा नामक स्त्री में ब्रह्मिष्ठ पैदा हुआ।
वशिष्ठ ने अरुन्धती नामक पत्नी से सौ पुत्र उत्पन्न हुए जिनमें सबसे बड़ा शक्ति था। शक्ति की स्त्री अदृश्यन्ती में पाराशर उत्पन्न हुए। शक्ति को रुधिर नाम के एक राक्षस ने भक्षण कर लिया। पाराशर से काली ने द्वैपायन पुत्र उत्पन्न किया। द्वैपायन ने अरुणी में शुक नामक पुत्र उत्पन्न किया। पितरों की पुत्री पीवरी से शुक के भूरिश्रवा, उपमन्यु, प्रभु, शम्भु, कृष्ण आदि पाँच पुत्र हुए। एक कार्तिमती नाम की कन्या भी हुई। पाराशरों के 8 पक्ष कहे हैं। वशिष्ठ से घृताची में कपिञ्जल पैदा हुआ जो त्रिमूर्ति कहा जाता है। उपमन्यु की सन्तान बहुत हैं वशिष्ठ के भी १० पक्ष हैं। ये सब ब्रह्मा के मानसिक पुत्रों का वर्णन किया गया है जिनके कि भूमि पर अनेक वंश प्रचलित हैं। इस प्रकार ये देव ऋषि कुल में उत्पन्न पुत्र और पौत्र हजारों की संख्या वाले हैं। ये त्रिलोकी को धारण करने में समर्थ हैं। इनसे तीनों लोक इस प्रकार व्याप्त हैं जिस प्रकार संसार की किरणों से व्याप्त हैं।