111- दीक्षा की विधि का वर्णन

सूतजी बोले -

रंग, रस, गन्ध आदि से भूमि को शुद्ध करके तथा चाँदनी आदि से अलंकृत करके उसे ईश्वर के आवाहन योग्य बनावे। एक हाथ के प्रमाण से वेदी बनाये। उसके मध्य में पंच रत्नों से युक्त कमल को लिखे। चूर्ण से आठ दल का सफेद या रक्त वृत्त शोभामय बनावे। परम कारण शिव का कर्णिका में आवाहन करे। वैभव के अनुसार विस्तार से पूजा करे। कर्णिका के दलों में सिद्धियाँ कही हैं। वामा, जेष्ठा, रौद्री, काली, विकर्णी, बल विकर्णी, बल प्रमथनी, सर्वभूत दमनी, मनोन्मनी, महामाया, वामदेव के साथ इन सब सिद्धियों का विन्यास करना चाहिये। प्रणवाख्य शिव स्वरूप का पूर्व पत्र में विन्यास करे। दक्षिण पत्र में अघोट का करे जो नील पर्वत के समान कान्तिवान है। उत्तर पत्र में वामदेव को विन्यास करे जो जवा के फूल के सदृश है। गौ के दूध के समान सफेद सद्योजात भगवान का तथा शुद्ध स्फटिक मणि के समान वाले आभा वाले प्रभु का 'हृदयाय नमः' मन्त्र से आग्नेय में, शिखायै नमः मन्त्र से नैऋतु में, कवचाय अंजनामाय मन्त्र से वायव्य में, अस्त्रायफट मन्त्र से अग्नि की शिखा के सदृश सब दिशाओं में न्यास करे। सदाशिव महादेव, रुद्र, विष्णु, ब्रह्मा का सृष्टि के अनुसार न्यास करना चाहिए। फिर शान्त स्वरूप शिव का ध्यान करे। जो भगवान विद्या स्वरूप है, विद्या को धारण करने वाले हैं, अग्नि के समान तेज वाले हैं, तारकासुर का नाश करने वाले हैं, जो ईशान देव हैं, जो महेश्वर हैं, सद्यमूर्ति हैं, स्थूल सूक्ष्म सबके कारण हैं, पंच मुख वाले, दस भुजा वाले, ३८ कलाओं से युक्त ॐकार का स्वरूप, आ ई उ ए के द्वारा अम्बिका के स्वरूप से जो स्थित हैं, छोटे से छोटे तथा महत से महत हैं। सहस्र सिर वाले, सहस्त्र चरण वाले, सहस्र हाथ वाले, चन्द्ररेखा को धारण किये हुए, करोड़ों विद्युत के समान प्रकाश वाले, श्याम रक्त स्वरूप, तीन शक्तियों और तीन-तीन तत्वों से युक्त महादेव का स्मरण करे। विधि पूर्वक चरु बनाकर शिव को निवेदन करे। आधा शिव को अर्पण करे तथा आधे से हवन करे। जल के द्वारा आचमन करके पवित्र होवे। पंचगव्य का प्राशन करे। 'वामदेव' मन्त्र को बोलकर भस्म लगावे। रुद्र देवता गायत्री का कानों में जप करे। सूत्र सहित दो वस्त्रों से युक्त होकर पंच कलश पंच ब्राह्मणों के द्वारा स्थापन कराकर चरु से हवन करे। मण्डल के दक्षिण में भक्त शिष्य को बैठाये जो दर्भ के आसन पर बैठ शिव भक्ति में परायण हो। अघोर मन्त्र से घृत के द्वारा १०८ बार आहुति प्रदान करे इस प्रकार उपवास किये हुए भक्त शिष्य को वस्त्र और पगड़ी आदि धारण कराकर नेत्रों को बाँधकर प्रवेश करावे। तीन परिक्रमा करे। रुद्राध्याय या प्रणव से परिक्रमा करनी चाहिए। शिव ध्यान में परायण होकर देव देव के ऊपर पुष्प चढ़ावे। जिस मन्त्र के कहने पर शिव पर पुष्प गिरे वह मन्त्र उसे सिद्धि हो जाता है। शिव के जल से स्पर्श करके अघोर मन्त्र से भस्म लगावे। शिष्य की मूर्धा पर गन्ध का लेप न करे। प्रवेश करने के लिए पश्चिम का द्वार सर्व प्रकार श्रेष्ठ है और क्षत्रियों के लिए तो विशेष श्रेष्ठ है। प्रवेश कराने पर शिष्य के नेत्रों का आवरण खोलकर मण्डल का दर्शन करावे। तब उसे कुशा के आसन पर बैठाकर तत्व शुद्धि करे।

इसके बाद दक्षिण मूर्ति शिव की प्रतिष्ठा करके 'अंग' मन्त्र से हवन करे। शान्त्यातीत भगवान ईशान का १०८ बार मन्त्र से हवन करना चाहिए। हवन के बाद में सोने, चाँदी या ताँबे के पात्रों में तीर्थ जल भर करके रुद्र का धार्मिक रीति से संहिता मन्त्र से या रुद्राध्याय से शिष्य का अभिषेक करे। वह शिष्य भी शिव के आगे अथवा गुरु के आगे या अग्नि के आगे दीक्षा को प्राप्त हुआ निम्न प्रकार प्रतिज्ञा करे कि प्राणों का परित्याग श्रेष्ठ है परन्तु शिव का पूजन किए बिना भोजन नहीं करूँगा इस प्रकार दीक्षा करनी चाहिए। यथायोग्य तीनों समय अथवा एक समय भगवान परमेश्वर शिव की पूजा नित्य करनी चाहिए। अग्निहोत्र करना, वेद पढ़ना, बहुत सी दक्षिणा वाला यज्ञ करना आदि कार्य शिवलिंग की अर्चना की सोलहवीं कला के बराबर भी नहीं हो सकते। अतः लिंगार्चन अवश्य करना चाहिए। जो सदा दान करते हैं, यथा वायु भक्षण करके रह जाते हैं उनको इतना फल एक बार भी शिव पूजा करने पर मिल जाता है। एक काल या दो काल अथवा एक काल भी जो रुद्र की पूजा करते हैं वे भी रुद्र के स्वरूप हैं इसमें कोई संशय नहीं। अरुद्र रूप से रुद्र का स्पर्शन करे तथा अरुद्र रूप से रुद्र का पूजन कीर्तन आदि भी न करके, क्योंकि अरुद्र रूप से रुद्र को प्राप्त भी नहीं कर सकता है। इस प्रकार अधिकारी के लिए दीक्षा विधि मैंने तुम्हें संक्षेप से कही, जो धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को देने वाली है।