लिंग महा पुराण
12- श्री वामदेव जी की महिमा का वर्णन
सूतजी बोले –
तीसवाँ कल्प रक्त नाम का कल्प कहा जाता है। इस कल्प में महान तेजस्वी ब्रह्मा लाल रंग को धारण करते हैं। पुत्र की कामना से महान तेजस्वी ब्रह्मा जी ने परमेष्ठी शिव का ध्यान किया । तब एक महान तेजस्वी कुमार प्रगट हुए जो लाल रंग के आभूषण और लाल ही वस्त्र तथा माला पहने हुए थे। उनके लाल नेत्र थे तथा वे बड़े ही प्रतापवान थे। रक्त वस्त्र पहने हुए उन महान आत्मा कुमार को देखकर ध्यान के सहारे से ये देव ईश्वर हैं, ऐसा जान लिया और उनको ब्रह्मा जी ने प्रणाम किया। उन वामदेव भगवान की ब्रह्मा जी ने ब्रह्म मानकर स्तुति की। हृदय में प्रतीत हुए उन वामदेव ने ब्रह्मा जी से यह कहा कि हे पितामह ! आपने मुझे पुत्र की कामना से ध्यान किया है तथा ब्रह्म जानकर बड़ी भक्ति से मेरी स्तुति की है। इससे आप हर एक कल्प में ध्यान योग्य के बल को प्राप्त करके मुझ सभी लोकों के दाता ईश्वर को जान सकोगे। इसके बाद उस महान आत्मा के द्वारा विशुद्ध ब्रह्म तेज से युक्त महान चार कुमार प्रकट हुए। उनके नाम विरिजा, विवाहु, विशोक और विश्व भावना हैं। ये चारों बड़े भारी ब्रह्मण्य और ब्रह्म के समान ही वीर और अध्यवसायी हुए, जो रक्त वस्त्र और रक्त माला को धारण करने वाले तथा लाल चन्दन का लेपन करने वाले हैं। लाल कुमकुम तथा लाल भस्म को शरीर में लगाते हैं।
हजारों वर्षों के अन्त में ब्रह्म-वामदेव जी का गुणगान करते हुए, संसार के हित की कामना से, अपने शिष्यों को समस्त धर्म का उपदेश देकर पुनः वे अविनाशी रुद्र, महादेव जी में ही लीन हो जाते हैं। ये तथा दूसरे श्रेष्ठ द्विजाती लोग उस ईश्वर को जानकर तथा महादेव और उनके भक्तों में परायण होकर ध्यान से उन्हें देखते हैं वे सभी निर्मल और ब्रह्मचारी मनुष्य पापों से छूटकर रुद्र लोक को जाते हैं तथा संसार के आवागमन से भी मुक्त हो जाते हैं।