114- शिवार्चन विधि का वर्णन

शैलादि बोले-

अब मैं शिवार्चन की उत्तम विधि को कहूँगा। तीनों काल शिवार्चन और यथाशक्ति अग्निहोत्र करना चाहिए। तत्व विशुद्धि पूर्वक शिव स्नान करके पुष्प हाथ में लेकर पूजा स्थान में प्रवेश करे। तीन बार तीन प्राणायाम करे। अव्यक्त बुद्धि अहंकार तथा तन्मात्रा आदि से उत्पन्न शरीर को शिव रूपी अमृत से पवित्र करके हृदय रूपी कमल की कर्णिका में साक्षात् शिव का ध्यान करे। जो पाँच मुख, दस भुजा वाले हैं, सर्व आभरणों से भूषित हैं प्रत्येक में तीन-तीन नेत्र वाले हैं तथा चन्द्रमा की कला से सुशोभित मस्तक वाले हैं, पद्मासनासीन, शुद्ध स्फटिक मणि के सदृश, श्वेत वर्ण, ऊर्ध्व मुख शिव का पूर्व में ध्यान करना चाहिए। दक्षिण में नीलांजल के समान, पश्चिम गौ दूध के समान धवल तथा उत्तर में रक्त वर्ण वाले शिव का ध्यान करे। शूल, परशा, वज्र शक्ति दक्षिण हाथ में, वाम हाथ में पाश अंकुश घंटा, नाग, बाण, वरद तथा अभय हस्त वाले त्रिनेत्रधारी शिवजी का ब्रह्मांगों से पूजन करना चाहिए। ब्रह्मांग पाँच शिवाँग ही कहे हैं सो उन्हें भी तुमको बताता हूँ। ॐ ईशानः सर्व विद्यानां हृदयाय शक्ति बीजाय नमः। ॐ ईश्वरः सर्वभूतानं अमृताय शिरसे नमः। ॐ ब्रह्मादि पतये कालाग्निरूपाय शिखायै नमः। ॐ ब्रह्मणोधिपतये कालचण्ड मारुताय कवचाय नमः। ॐ ब्रह्मणे ब्रह्मणाय ज्ञानमूर्ते नेत्राय नमः। ॐ शिवाय सदा शिवाय पाशुपतास्त्राय अप्रतिहताय फट् फट्। ॐ सद्योजाताय भवेनानिभये। भवस्व मां भगेद्भवाय शिवमूर्तये नमः। ॐ हंस शिखाय विद्यादेहाय आत्मस्वरूपाय परा पराय शिवाय शिव तमाय नमः। शिवांग तथा मूर्तविद्या ब्रह्मांग मूर्तविद्या सहित मैंने तुमको कहीं। अब सूर्य सम्बन्धी वाष्कल आदि अंग जो सब वेदों के सारभूत हैं, सो कहूँगा। ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ मह ॐ जनः ॐ तपः ॐ सत्यं ॐ ऋतं ॐ ब्रह्मः यह नवाक्षर मय मन्त्र वाष्कल कहा है। इस लोक में जो नाश को नहीं प्राप्त हो उसे अक्षर कहते हैं। प्रणवादि से नमः तक के सभी अक्षर सत्य कहे हैं।

ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः तत्सवितुर्वर्णेण्यं भर्गोदेवस्य धीमहि धीयो योनः प्रचोदयात्। ॐ नमः सूर्याय खगोलकायनमः। महात्मा सूर्य का यह मूल मन्त्र है। नवाक्षर से दीप्त करके मूल से भास्कर का पूजन करना चाहिए। अब संक्षेप से अंग मन्त्रों को कहता हूँ।

ॐ भू ब्रह्मणे हृदयायनमः। ॐ भुवः विष्णवे शिरसे नमः। ॐ स्वः रुद्राय शिखाये नमः ॐ भूर्भुवः स्वः ज्वाला मालिन्यै देवाय नमः ॐ मह महेश्वराय कवचायनमः ॐ जनः शिवायः नेत्रेभ्यो नमः। ॐ तपस्यायनाम अस्त्राय नमः। इस प्रकार प्रसंग से मैंने सूर्य सम्बन्धी अंग कहे। अब संक्षेप से शिवांगों को कहूँगा। मन्त्र मय देव का हृदय कमल से पूजन करना चाहिए और नाभि कुण्ड में हवन करना चाहिए। शिव रूपी अग्नि में ईश्वर को ध्यान कर मन से सब कार्य करने चाहिये। पंच ब्रह्मांगों से उत्पन्न शिव मूर्ति शिव मूर्ति सदाशिव रूप ही है। रक्त पद्म पर विराजमान मूर्ति को मूल मन्त्र से ब्रह्मागाद्यै अंगों से संध्या और गायत्री करके चन्द्रस्थान से उत्पन्न पूर्णधारा का स्मरण करना चाहिए। पूर्णाहुति के विधान के द्वारा तेजोमय मुख गत शंकर भगवान का ध्यान करना चाहिए। ललाट में भौंहों के मध्य में पुनः पुनः महादेव का ध्यान करें। हृदय कमल में विधि के विस्तार को समाप्त कर देना चाहिए। शुद्ध दीपिका शिखा के आकार वाले, भव का नाश करने वाले शिव की लिंग में अथवा स्थल में भावना द्वारा पूजा करनी चाहिए।