लिंग महा पुराण
20- ब्रह्मा के प्रबोध का वर्णन
ऋषि लोग पूछने लगे-
हे सूतजी! प्राचीनकाल के पद्म कल्प में ब्रह्मा जी पद्म से किस प्रकार उत्पन्न हुए और उन्होंने किस प्रकार शंकर जी के दर्शन प्राप्त किए ? इस सबको कृपया विस्तार से हमें कहिये, उसके लिए आप सर्वथा योग्य हैं ।
सूतजी बोले-
हे ऋषियो! जब प्रलय काल में एक ही घोर अविभाजित अन्धकारमय समुद्र था तब उस एकान्त अकेले महा समुद्र में शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण करने वाले श्री पति विष्णु जो पुरुषोत्तम नारायण हैं, आठ जिनकी भुजा हैं तथा सभी लोकों का उत्पत्ति स्थान हैं, वे शेषनाग की शैय्या पर योग में स्थित होकर शयन करने लगे। तब महान सर्प की शैय्या पर योग में स्थित होकर शयन करते हुए उस महान समुद्र के मध्य ही महान आत्माराम विष्णु नाम वाले उन प्रभु ने क्रीड़ा के लिए महान तरुण सूर्य के समान कान्तिवाला एक सौ योजन लम्बा कमल का वज्रदण्ड अपनी नाभि से उत्पन्न किया। तब उस कमल दण्ड के समीप में ही सोने के अण्डे से उत्पन्न होने वाले इन्द्री विजयी चार मुख वाले, विशाल नेत्र वाले, दिव्य सुगन्धि से युक्त ब्रह्मा जी भी प्रकट होकर पद्म से क्रीड़ा करते हुए उन विष्णु भगवान को देखकर विस्मय पूर्वक बोले- आप इस जल के मध्य में कौन शयन कर रहे हो ?
इसके बाद ब्रह्मा के ऐसे शुभ वचन सुनकर खिले हुए कमल के से नेत्र वाले भगवान अपनी शैव्या से उठकर उनसे बोले तुम कौन हो और कहाँ से आए हो ? कहाँ जाना है ? यहाँ मेरे पास तक क्यों आए हो ? भगवान के ऐसा कहने पर बैकुण्ठाधिपति से ब्रह्मा जी ने कहा - -आप भगवान शम्भो की माया से मोहित हैं जिसे आप अपने को आदि कर्त्ता मान रहे हो। तब भगवान विष्णु ब्रह्मा के ऐसे वचनों को सुनकर योग के द्वारा ब्रह्मा जी के मुख में होकर पेट में चले गए और १८ द्वीप सभी समुद्र सभी पर्वत तथा ब्रह्मा के स्तम्भ पर्यन्त सातों लोकों को ब्रह्मा के उदर में ही विष्णु ने देख लिया । तब विष्णु ने विस्मय पूर्वक इस तपस्वी महा बलशाली को देखने की इच्छा से हजारों वर्षों तक उनके पेट में अनेकों लोकों में घूमकर थक गए, परन्तु उनका अन्त ही नहीं पाया।
इसके बाद जगत के कर्त्ता नारायण भगवान उनके मुख से निकल आये तो पुनः ब्रह्मा जी से कहने लगे - आप आदि अन्त से रहित हैं तथा मध्य भी नहीं हैं, न कोई दिशा हैं। मैंने आपके उदर में आपका अन्त ही नहीं देखा। ऐसा कहकर पुनः भगवान हरि ब्रह्मा से कहने लगे - हे निष्पाप ब्रह्मा जी! ऐसा ही आदि अन्त से रहित शाश्वत मेरा भी उदर है उसमें भी प्रवेश करके आप सभी चीजों को देखेंगे। तब उनकी विस्मय की आनन्दमयी वाणी को सुनकर ब्रह्माजी उन श्रीपते हरि के उदर में प्रवेश कर गए। उनके पेट में अनेकों वर्षों तक घूमते रहे, परन्तु उनका अन्त नहीं देखा। तब भगवान विष्णु ने ब्रह्मा जी की गति पहचान कर अपने शरीर के सभी द्वार बन्द कर लिए, यहाँ तक कि सूक्ष्म से सूक्ष्म छिद्र भी बन्द कर दिए। सभी द्वारों को बन्द जान कर अपने शरीर को सूक्ष्म करके कमल की नली के द्वारा ब्रह्मा जी बाहर आये। तब दोनों में उस समुद्र के बीच में ही संघर्ष होने लगा। उसी अवसर पर शूलपाणी महादेव जी वहाँ आए। शीघ्रता से चलते हुए उनके पैरों से पीड़ित जल की बड़ी बड़ी बूंदें शीघ्र ही आकाश में उठ गईं और अति गर्म और अति शीतल वायु चलने लगी।
इस प्रकार का आश्चर्य देखकर ब्रह्मा जी विष्णु से बोले-जल की गर्म और ठण्डी बूंद और वायु कमल को भी कम्पायमान कर रही हैं, सो आप कहो कि आपसे अन्य यह और कौन है तथा आप क्या करने की इच्छा कर रहे हो। ब्रह्मा जी के द्वारा मुख से ऐसा कहने पर भगवान बोले कि कमल पर स्थित तुम को क्यों ऐसा संशन हो रहा है।
इस पर वेद निधि ब्रह्मा जी बोले कि मैं पूर्व तुम्हारे जानने की इच्छा से उदर में घुसा था। मेरे उदर में जैसे लोक हैं, हे प्रभो! वैसे ही मैंने आपके भी उदर में देखे। तुमको वश में करने की इच्छा से हजार वर्ष तक घूमा तब हे महाभाग ! आपके शरीर के सब द्वारा बन्द हो गए। तब तो विचारपूर्वक अपने तेज से नाभि प्रदेश कमल सूत्र से निकल कर बाहर आया। हे प्रभो! अब आपको कुछ भी खेद नहीं होना चाहिए। अब मेरे लिए क्या आज्ञा है ? मैं क्या करूँ ?
ब्रह्मा की इस श्रेष्ठ प्रिय वाणी को सुनकर विष्णु भगवान बोले- मैंने तुमको बोध कराने की इच्छा से क्रीड़ा पूर्वक अपने शरीर के द्वारा बन्द कर लिए थे अन्य भाव नहीं था। आप मेरे मान्य और पूज्य हो, जो आपका उपकार हुआ है उसे हे कल्याण ! सहन कर लो । मेरे धारण किये इस कमल से उतरो मैं तेज रूप तुम्हें धारण करने में असमर्थ हूँ।
ब्रह्मा बोले-
वर माँगो।
भगवान ने कहा-
कमल से उतरो मेरे पुत्र हो तुम सब प्रकार आनन्द पाओगे। और आज से आप श्वेत पगड़ी से सुशोभित पद्मयोनि नाम से प्रसिद्ध होंगे। हे ब्रह्मन्! तुम मेरे पुत्र हो । सातों लोकों के अधपति हो ऐसा कहकर भगवान वरदान देकर प्रसन्न हुए। उस समय समीप आते हुए सूर्य के समान तेज वाले दीर्घ मुख वाले अद्भुत रूप शिवजी को देखकर ब्रह्मा नारायण से बोले यह अप्रमेय शरीर वाला बड़े मुख और बड़े दाँतों वाला जिसके सिर के बाल बिखरे हुए हैं, दश भुजा वाले, मूँज की मेखला वाले भयंकर शब्द करने वाले महान कान्ति से युक्त यह कौन है जो आकार से और ज्यादा व्याप्त हो रहे हैं? यह कौन आ रहे हैं? ब्रह्मा के पूछने पर नारायण बोले - जिनके द्वारा वेग पूर्वक चलने से समुद्र का जल इनके पैर के तलों से उठकर आकाश में जलाशय हो गए हैं। ऐसा मालूम हो रहा है कि ये भवानी पति महादेव जी आ रहे हैं। जिस जल की मोटी मोटी जलधारा से तुम भीगे जा रहे हो तथा जिनकी श्वास की वायु से मेरी नाभि में स्थित कमल भी काँप रहा है। अतः ये प्रलय करने वाले श्री महादेव जी ही आ रहे हैं। आओ हम तुम दोनों वृषध्वज महादेव जी की स्तुति करें।
यह सुनकर ब्रह्मा क्रुद्ध होकर विष्णु से बोले कि आप अपने को लोक का स्वामी जानते हो और मुझको लोकों का रचने वाला ब्रह्मा जानते हो, हम दोनों के अतिरिक्त यह शंकर नाम वाला और कौन है ? ऐसे क्रोध के वचन ब्रह्मा के द्वारा सुनकर श्री विष्णु भगवान बोले ऐसा कहकर महात्मा शंकर की निन्दा मत करो। महा योगेश्वर दुराधर्ष वरप्रद इस जगत के कारण पुरुष बीजी ज्याति स्वरूप शंकर हैं, बालकों के खिलौने की तरह वह क्रीड़ा करते हैं। उसे ही प्रधान, अव्यक्त, योनी, अविनाशी, अव्यय कहते हैं, वह शिव ही है।
ब्रह्मा जी ने पूछा-
हे भगवान! आप योनि हो, मैं बीज हूँ। महेश्वर कैसे बीजी हैं ?
भगवान बोले-
कि शिव से अधिक और कोई गुह्य वस्तु नहीं है। महत् का भी परम तत्व शिव ही हैं। जो आत्मज्ञानियों का परम धाम है। यह शिव अपने स्वरूप को दो भागों में बाँट देते हैं। एक निष्कल, अव्यक्त और दूसरा सकल सगुण के समागम से वह समुद्र में हिरण्य अण्ड होता है। हजारों वर्ष तक वह अण्ड जल में तैरता रहता है। अन्त में वायु से उसके दो टुकड़े होते हैं। एक कपाल (टुकड़े) से ऊपर के लोक एक से नीचे के पृथ्वी आदि लोक उत्पन्न होते हैं। उसी में पंचदेव भगवान चतुर्मुख उत्पन्न होता है। शून्य आकाश में तारा नक्षत्र सूर्य चन्द्रमा देखकर मैं कौन हूँ ऐसा ध्यान करने पर कुमार होते हैं। कुमार अग्नि के सदृश तेज वाले श्रीमान सनत्कुमार तथा ऋभु नैष्ठिक ब्रह्मचारी होते हैं। फिर सनक सनातन सनन्दन संसार की स्थिति के लिए पैदा होते हैं। तीनों प्रकार के तापों से रहित ये कर्म को आरम्भ नहीं करते, क्योंकि कर्म करने से जीवन में जरा आदिक के बहुत से क्लेश हैं। स्वर्ग का सुख अल्प है, नरक अधिक दुःख है। ऋभु सनत कुमार को अपने वशीभूत जानकर और सनकादि तीन पुत्रों को तीनों गुणों से अतीत, अति तेजस्वी, ज्ञान की बुद्धि द्वारा प्रवृत्त हुए देखकर तुम शंकर की माया से मोहित होकर वैवर्त्त कल्प में सूक्ष्म भूत और पार्थिव जो होंगे, उनको ईश्वरी माया व्याप्त होगी। जैसे सुमेरू पर्वत को देवलोक कहा है। इसके महात्म्य को श्रेष्ठ देवता का महात्म्य जानो। इस प्रकार महादेव के सद्भाव को जानकर प्रणव द्वारा अथवा सामवेद द्वारा स्तुति करने योग्य, भूतों के प्रभु वरदान देने वाले महेश्वर को और मुझको स्तुति करो ? क्रुद्ध हुए शंकर भगवान तुम्हें और मुझे श्वास से भस्म कर सकते हैं। ऐसा जानकर हे ब्रह्मन्! तुम स्थित हो जाओ। मैं तुम्हें आगे लेकर प्रभु की स्तुति करूँगा।