61- भुवन कोश में ध्रुव की स्थिति का कथन

ऋषि बोले-

विष्णु भगवान की कृपा से सब ग्रहों का मेढ़ीभूत (मध्य) किस प्रकार रहे, सो हमारे प्रति कहने की कृपा करो। सूतजी बोले इसी प्रकार मैंने मार्कण्डेय ऋषि से पूछा था और जो उन्होंने मुझे बताया, वह तुम्हारे प्रति वर्णन करता हूँ ।

मार्कण्डेय बोले –

सब शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ - चक्रवर्ती राजा उत्तानपाद नाम वाला इस पृथ्वी पर राज्य करता था। उनके सुनीति और सुरुचि नामक दो स्त्रियाँ थीं। बड़ी रानी सुनीति थी जिसका पुत्र कुल का दीपक ध्रुव था। जब यह सात वर्ष का हुआ तब पिता की गोद में बैठा हुआ था। सुरुचि ने इसका तिरस्कार करके इसको गोदी में से हटाकर अपने पुत्र को बिठा दिया। तब यह रोता हुआ अपनी माता के पास आया।

तब इसकी माता बोली –

हे पुत्र! तू ध्रुव स्थान को प्राप्त कर जो कभी चलायमान ही नहीं होता है। माता के वचन सुनकर वह वन को चला गया वहाँ इसको विश्वामित्र ऋषि मिले। उन्हें प्रणाम करके सब वृत्तान्त सुनाया। मुनि बोले- तू क्लेशों के नाश करने वाले केशव भाग्वान का ध्यान कर जो भगवान शंकर के दाहिने अंग से उत्पन्न हुए हैं। “ॐ नमो वासुदेवाय” मन्त्र का तू जप कर। तब ध्रुव ने इस मन्त्र का बड़ी निष्ठा से सहस्त्रों वर्षों तक जप किया। तब काले मेघ के समान कान्ति वाले विष्णु भगवान गरुड़ पर चढ़कर प्रकट हुए। शंख के भाग से गोविन्द ने ध्रुव के मुख का स्पर्श किया। जिसके प्रभाव से वह परम ज्ञान को प्राप्त कर भगवान की स्तुति करने लगा।

भगवान ने कहा-

 सबसे ऊपर जो ध्रुव नाम का स्थान है उसे तू अपनी माता के साथ प्राप्त कर। देवता, 'तू गन्धर्व, सिद्ध ऋषि उस स्थान की परिक्रमा करते रहते हैं। विष्णु भगवान की आज्ञा से ध्रुव ने ज्योतिष चक्र के उत्तम स्थान को प्राप्त किया। महान तेज वाले ध्रुव द्वादश अक्षर मन्त्र विद्या (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय) से इस बड़ी भारी सिद्धि को प्राप्त हुए। हे ऋषियो! यह मैंने तुम्हें संक्षेप से कहा। जो वासुदेव भगवान को प्रणाम करता है, वह ध्रुव लोक को प्राप्त कर ध्रुव सालोक्य को प्राप्त करता है।