लिंग महा पुराण
123- वज्रेश्वरी विद्या का वर्णन
ऋषि बोले-
हे भगवन्! आपने घोर निग्रह का वर्णन हमारे प्रति किया । अब वज्रवाहनिका नाम की विद्या को कहिये।
सूतजी बोले-
वज्रवाहनिका नाम की विद्या सब शत्रुओं को भयंकर है। इसके लिए राजा को वज्र का अभिषेक करना चाहिए। वज्र को विधान से बनाकर इस विद्या से अभिषेक करके वज्रधारी पुरुष घृतादि से हवन कुण्ड में हवन करे। उस वज्र को नित्य छिपाकर रखे। उस वज्र को लेकर शत्रु विजय के लिए चले तो संग्राम में अवश्य जीते। पूर्व में ब्रह्माजी ने इन्द्र के उपकार के लिए वज्रेश्वरी विद्या को कहा थ। इन्द्र के द्वारा हत पुत्र हुआ त्वष्टा नाम का देव कहने लगा- हे इन्द्र ! तैने मेरे पुत्र विश्वरूप को मारा है इसलिए मैं तेरा भाग प्राप्त नहीं होने दूँगा। ऐसा कहकर माया से सब आश्रम को उसने मोहित कर लिया। विश्वरूप को मारने वाला इन्द्र इसी विद्या के द्वारा माया को भेदन करके अपने गणों सहित सोम का दान करने लगा। फिर शेष को लेकर क्रोध में भरे हुए त्वष्टा (प्रजापति ) ने "इन्द्रस्य शत्रोवर्धस्य स्वाहा" इस मन्त्र से अग्नि में हवन किया। फिर कालाग्नि के सदृश वृत्रासुर उत्पन्न हुआ। उसे देखकर इन्द्र गणों सहित भाग गया। ब्रह्माजी ने इन्द्र से कहाकि इस वज्र को छोड़कर इसे मारो। वह देवेन्द्र तब निशंक होकर वज्र के प्रहार से उसका नाश करते गए। तब से यह वज्रेश्वरी विद्या शत्रुओं को भयंकर और नाश करने वाली है। सब पापों को नाश करने वाली इस विद्या को मैं तुमसे कहता हूँ।
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियोयोनः प्रचोदयात् ।
ॐ फट् जहि हुँ फट् छिन्धि भिन्धि जहि हन हन स्वाहा ॥
यह सब शत्रुओं को भयंकर वज्रेश्वरी विद्या है। हे मुनि श्रेष्ठो! इसी विद्या के द्वारा शम्भु सृष्टि का संहार करते हैं।