लिंग महा पुराण
19- विष्णु प्रबोध
सूतजी बोले -
इस प्रकार ब्रह्मा तथा विष्णु के द्वारा स्तुति किए जाने पर प्रसन्न होकर महादेव जी उन दोनों से बोले - हे श्रेष्ठ देवों! सभी भय से छुड़ाने वाले मुझ महादेव को देखो। मैं तुम दोनों पर प्रसन्न हूँ। तुम दोनों पूर्वकाल में मेरे शरीर से ही उत्पन्न हुए हो। ये जो लोकों के पितामह ब्रह्मा जी हैं, वे मेरे दाहिने भाग हैं तथा हृदय से उत्पन्न विश्वात्मा विष्णु मेरे बायें भाग हैं। मैं तुम पर प्रसन्न हूँ जो इच्छा हो आप वरदान माँगिये। इस प्रकार उनके कहने पर विष्णु भगवान ने उन कृपा के सागर लिंग में स्थित तथा लिंग से जो रहित हैं उन नारायण रूप महेश्वर को हाथ से स्पर्श किया और बोले – हे प्रभो ! यदि आप हम पर प्रसन्न हैं तो कृपया आप हमें अपनी अव्यभचारिणी भक्ति प्रदान कीजिये तथा हे देव! हम दोनों में जो विवाद पैदा हो गया है, कृपया आप यहाँ उपस्थित हैं, हे नाथ! आप ही इस विवाद का शमन कीजिये।
उनके वचनों को सुनकर भगवान शिव विष्णु से कहने लगे – हे वत्स! हे विष्णु! हे हरे! तुम इस सृष्टि के - स्थिति, प्रलय और नाश करने वाले हो, परन्तु तुम इस चराचर जगत का पालन कीजिए। हे विष्णु ! मैं तो तुम ब्रह्मा, विष्णु, शिव नाम वाले देवों से सर्वथा भिन्न हूँ । सर्ग, स्थिति और प्रलय से परे हूँ। मैं तो परमेश्वर हूँ । हे विष्णु ! हे पितामह ! आगे जब पद्म नाम का कल्प होगा, तब तुम भी पद्म से उत्पन्न होकर मुझ महेश्वर को देखोगे। ऐसा कहकर भगवान स्वयं परमेश्वर वहाँ ही अन्तरध्यान हो गए। तब से लेकर इस संसार में लिंग पूजा की प्रतिष्ठा हुई। हे ऋषियो ! लिंगवेदी जो महादेवी हैं तथा जो लिंग हैं, वह साक्षात् परमेश्वर ही हैं। सभी देवताओं का लय हो जाने पर ही लिंग शब्द बना है (लयनात् लिंग)। जो कोई भी इस लिंग पुराण के आख्यान को पढ़ता है, वह लिंग (महेश्वर) के समीप जाता है तथा हे ब्राह्मणो! वह शिवत्व को प्राप्त हो जाता है, इसमें अन्यथा विचार नहीं करना चाहिए।