51- भुवन कोष का स्वभाव

सूतजी कहने लगे-

हे ब्राह्मणो! मैंने तुमसे बहुत सी जल वाली नदी और सरोवरों को कहा, जो असंख्य हैं। कोई पूर्व मुख वाली, कोई दक्षिण मुख वाली है, जो हर देश में कही है। आकाश रूपी समुद्र में जो सोम कहा है वह सम्पूर्ण भूतों का आधार है और देवताओं के लिए अमृत का भण्डार है। उससे निकली हुई आकाश की नदी अमृतोदका नाम वाली है, वह ज्योतिषमती है, करोड़ों तट और आकाश से युक्त है। जैसे सोम है वैसे ही वह दिनों दिन बदलती रहती है। वह चौरासी हजार योजन ऊँची है। वहाँ बहुत ऊँचा मेरु है। वहाँ श्री कंठ अम्बा के साथ क्रीड़ा करते हैं। वहीं पर मेरु की परिक्रमा करती हुई पुण्य जल वाली नदी आती है जो मेरु पर्वत के चारों शिखर पर गिरती हुई महादेव जी की आज्ञा से समुद्र में गिरती हैं। इससे निकली अनेक नदियाँ सब द्वीपों और पर्वतों में बह रही हैं। ऐसी नदियाँ अंख्य हैं। गंगा तो अम्बर से ही आई है। भद्राश्व देश में स्त्री और पुरुष सभी चन्द्रमा की सी शक्ल वाले हैं जो काले आम के रस का भोजन करने वाले हैं और शिवजी की कृपा से दस हजार वर्षों तक जीवित रहते हैं।

तथा रमणीक देश में जीव वट के फल का भोजन करते हैं। वे ग्यारह हजार पाँच सौ वर्ष तक जीवित रहकर शिव का ध्यान करते हैं । कुरु वर्ष (देश) में स्वर्ग से आये हुये सभी जीव मैथुन से उत्पन्न होते हैं तथा दूध का भोजन करते हैं। भारतवर्ष में मनुष्य कर्म के अनुसार आयु वाले, नाना वर्ण वाले छोटे कद के होते हैं जो सौ वर्ष की आयु वाले हैं, वे अनेकों देवों के पूजन में लगे रहते हैं तथा अनेकों प्रकार के कर्मों का फल भोगते हैं। वे सभी कमजोर तथा थोड़े भोगी होते हैं। नाग द्वीप, सौम्य द्वीप, वारुण द्वीपों में उत्पन्न होने वाले जीव कोई म्लेच्छ तथा कोई पुलिन्द होते हैं। भारतवर्ष के लोगों की प्रवृत्ति स्वर्ग और अपवर्ग में होती है। किंपुरुषदेश में रहने वाले पुरुष सोने के से रंग वाले तथा स्त्रियाँ अप्सराओं के तुल्य होती हैं। दस हजार वर्ष तक जीवित रहती हैं उन्हें रोग तथा शोक नहीं होता वे प्लक्ष का भोजन करते हैं। हर वर्ष देश के जीव देवलोक से आये हुए देवताओं के से आकार वाले होते हैं। चाँदी के से रंग वाले होते हैं। उन्हें मृत्यु की जरा भी बाधा नहीं है। ईख के रस का पान किया करते हैं। शंकर जी की भक्ति में तत्पर रहते हैं। इलावृत में रहने वाले दस हजार वर्ष तक जीवित रहते हैं। वहाँ न तो सूर्य तपता है न चन्द्र नक्षत्र चमकते हैं। शंकर के प्रभाव से वे कमल के समान सुन्दर आकार वाले होते हैं।

जम्बू द्वीप के रहने वाले जम्बू रस का पान करते हैं। उनको जरा तथा भूख बाधा नहीं पहुंचाती। उनको ग्लानि तथा मृत्यु भी नहीं सताती है। इस प्रकार नौ द्वीपों के रहने वालों के वर्ण, आयु आदि का मैंने संक्षेप से वर्णन किया है। पित्रीश्वरों का स्थान शृङ्गवान पर्वत कहा गया है। हिमवान भूतों का, यक्षों का तथा ईश्वर का भी स्थान कहलाता है। इसके अलावा सभी पर्वतों पर अम्बा के साथ और गणों के साथ भगवान नीललोहित वास करते हैं। ये सभी पर्वत राज जम्बू द्वीप में ही स्थित हैं।