91- अन्धक राक्षस के गणपति बनाने की कथा

ऋषि बोले –

हे सूतजी ! मन्दराचल पर अन्धक दैत्य किस प्रकार दमन किया गया तथा शिव ने किस प्रकार अपना गणपति बनाया सो हमसे कहो।

सूतजी बोले -

हे ऋषियो! अन्धक पर कृपा और बल प्रदान संक्षेप से कहता हूँ। हिरण्याक्ष का पुत्र पूर्व में अन्धक नाम से प्रसिद्ध था। उसके सोने के से नेत्र थे। उसने तपस्या द्वारा ब्रह्माजी से अवध्य होने का वरदान प्राप्त कर लिया। त्रिलोकी को जीतकर भोगने लगा। इन्द्रादि देवताओं को पीड़ा देने लगा। देवताओं को अनेक प्रकार से ताड़ना देने लगा जिससे वे डरकर मन्दराचल में आकर रहने लगे। फिर इन्द्रादि सब सिद्ध और ऋषियों के साथ महेश शिवजी के पास आकर बोले- हे. महाराज! अन्धक के शस्त्रों से छिन्न भिन्न हुए हम बड़े दुखी हैं। ऐसा सब वृत्तान्त सुनकर भगवान शंकर अपने गणों के साथ अन्धकासुर के पास आये। उस समय इन्द्र, ब्रह्मा, विष्णु सब सुरेश्वर, देवेश्वर तथा मुनिश्वर भगवान शिव की जय हो, जय हो, ऐसे वचन बोलने लगे।

अन्धक अपने बाणों से सब देवताओं को छिन्न भिन्न करने लगा। यह देखकर भगवान शिव ने उसे अपने शूल से बेधकर ऊपर को टाँग लिया। भगवान के दर्शन से पाप रूपी कवच उसका दूर हो गया। यह देख ब्रह्मा जी शंकर को प्रणाम कर बड़े जोर से नाद करने लगे। देवता भी प्रसन्न होकर जोर से शब्द करके प्रशंसा करने लगे और पुष्पों की वर्षा भगवान पर करने लगे। तीनों लोकों में आनन्द और हर्ष होने लगा। शूल से जिसके पाप दग्ध हो गये हैं; वह दैत्य सात्विक भाव से विचार करने लगा जन्मान्तर में भी देव देव शंकर ने मुझ दग्ध किया था और शंकर की आराधना मैंने की थी। प्राणान्त समय में जो शंकर का स्मरण करता है वह शिव सायुज्य को प्राप्त होता है। बहुत स्मरण करने वाले की तो बात ही क्या है। ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्रादिक सभी देवता इनकी शरण में रहते हैं। अतः शिव की शरण में ही मुझे जाना चाहिए। ऐसा विचार करके वह अन्धक शिवजी की गणों सहित स्तुति करने लगा।

शिवजी उसकी स्तुति से प्रसन्न हो हिरण्याक्ष के पुत्र जो सूर्य के मध्य में शूल पर टंगा है, उससे बोले - वरदान माँग मैं तेरे से प्रसन्न हूँ । शिव की ऐसी वाणी सुनकर वह दैत्य हर्ष से गद्-गद् हो महेश्वर से बोला हे देव देवेश! भक्तों के दुःख दूर करने वाले शंकर, मुझसे प्रसन्न होइये और भक्ति रूप वरदान मुझे दीजिए। ऐसे अन्धक के वचन सुनकर भगवन ने दुर्लभ और शुद्ध बुद्धि दी तथा शूल से उतार कर उसे गणपति पद पर अधिष्ठित किया। तब तो गणपति पद पर उसको अधिष्ठित जानकर सभी देवताओं ने उसे प्रणाम किया।