लिंग महा पुराण
70- दैत्यों के तप से सन्तुष्ट हुए ब्रह्मा का त्रिपुर निर्माण के लिये वरदान देना
ऋषि बोले-
हे सूतजी! आपने सृष्टि की रचना को कहा और अब हमें कहो कि ब्रह्मादिक देवता सहज पशु कैसे कहलाये और कैसे तैयार हुए ? भय द्वारा निर्मित स्वर्णमय, रजतमय और लोहमय दुर्ग को महादेव ने कैसे भस्म किया। विष्णु के उत्पादित किए भूतों से त्रिपुर दाह क्यों नहीं हुआ ? सो हमारे प्रति कहो। ऐसे ऋषियों के वचन सुनकर सूतजी बोले - मन, वाणी, शरीर से उत्पन्न तीनों लोकों के शापों से स्कन्द द्वारा तारकासुर का वध हो जाने पर उसके पुत्र विद्युन्माली, कमलाक्ष, ताड़काक्ष ने ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के लिए घोर तप किया। ब्रह्मा जी वरदान देने के लिये प्रकट हुए। दैत्यों ने सब प्राणियों के द्वारा सब दैत्य अवध्य हों ऐसा वरदान माँगा। ब्रह्मा ने कहा- कि सब तो अमर नहीं हो सकते अन्य कोई वरदान माँगो। परस्पर सलाह करके दैत्यों ने तीन पुरों का वरदान माँगा। जिनमें रहकर हम हजारों वर्षों तक पृथ्वी पर विचरते रहें। एक ही बाण से जो तीनों पुरों का नाश करे उसी के द्वारा हमारा नाश हो। ब्रह्माजी तथास्तु कहकर चले गये। मय ने तपस्या द्वारा तीनों पुर रचे। स्वर्ण का पुर स्वर्ग में, चाँदी का अन्तरिक्ष में और लोहमय भूमि में पुर का निर्माण किया। एक एक सौ सौ योजन का विस्तार था। स्वर्णमय तारकाक्ष का, रजतमय कमलाक्ष का तथा लोहे का विद्युन्माली के दुर्ग हुए। बलवान मय दानव दैत्यों से पूजित हो तीनों पुरों में स्थान बनाकर रहने लगा। ये दैत्य तीनों पुरों में वास करके बलवान और अपराजित हो गये। कल्पद्रुम आदि से व्याप्त, अप्सराओं से व्याप्त सूर्य मण्डल आदि से व्याप्त, कूप तड़ाग वापी आदि से व्याप्त ये तीनों पुर बड़ी शोभा को प्राप्त हुये। इन्द्रादिक देवताओं को ये ऐसे जलाने लगे जैसे दावाग्नि वृक्षों को जलाती है। देवता दुखी होकर के विष्णु भगवान की शरण में आये। नारायण भगवान ने विचार किया कि देव कार्य के लिये क्या कार्य करना चाहिए उन्होंने यज्ञ मूर्ति भगवान का स्मरण किया और देवताओं से कहा कि यज्ञेश्वर भगवान का स्मरण करो इससे तीनों पुरों का नाश होगा और जगत की विभूति बढ़ेगी। फिर भगवान बोले सम्पूर्ण प्राणियों को मारकर, अन्याय से भोगकर, जलाकर यदि महादेव का पूजन कर दें तो वे इतने पापों का फल नहीं भोगता और निष्पाप हो जाता है। निष्पाप को नहीं मारना चाहिए, पापी का वध करना चाहिए इसमें सन्देह नहीं। लिंग की अर्चना करने के कारण ये पापी असुर वध नहीं किए जा रहे हैं। ऐसा कहकर विष्णु भगवान ने हजारों भूत गणों को उत्पन्न किया। तब विष्णु ने उनसे कहा कि हे भूतों ! इन तीनों पुरों को जलाकर भस्म करके फिर पृथ्वी तल पर तुम आओ।
वे भगवान को प्रणाम करके वहाँ गये और जैसे अग्नि में शलभ नष्ट हो जाते हैं वैसे ही भस्म हो गये। दैत्य बड़े प्रसन्न हुए और नृत्य करने लगे। इन्द्रादिक देवता दुखी हुये और भगवान की शरण में आये। भगवान ने पुनः विचार किया कि त्रिपुरवासी दैत्य महा पाप करके भी रुद्र का अर्चन करते हैं इससे ये निष्पाप हो जाते हैं। इनके कार्यों में विघ्न होना चाहिए तब इनका नाश होगा। ऐसा विचार कर मायामयी पुरुष और उसका शास्त्र भगवान ने उत्पन्न किया। उस मायावी पुरुष को तथा शोडष लक्षण वाले शास्त्र को देखकर सभी मोहित हो जाते हैं। वह वर्ण आश्रम आदि धर्म से रहित तथा श्रुतिस्मार्त से विवर्जित है। वह दैत्यों के पुर में गया। दैत्य उससे मोहित होकर श्रुतिस्मार्त को छोड़कर उसके शिष्य बन गए। महादेव शंकर को त्याग दिया। स्त्रियाँ पति को त्याग कर स्वच्छन्द विचरने लगीं। लक्ष्मी आदि जो तपस्या से प्राप्त की थीं वे त्याग कर बाहर चली गईं। स्त्री धर्म नष्ट हो जाने पर दुराचार फैल गया।
तब विष्णु भगवान देवताओं के साथ महादेव जी की स्तुति करने लगे- हे महेश्वर! हे देव! हे परमात्मने! आपको नमस्कार है। इस प्रकार प्रार्थना करके जल में स्थित भगवान रुद्र का जप करने लगे। देवता भी स्तुति करने लगे -
हे प्रभु! आप ही पुरुष हो। आप ही प्रकृति हो। योगियों के हृदय कमल में आप ही विराजमान हो। अणु से अणु तथा महत से महत आप ही हो। श्रुतियों के सार आप ही हो। तुम्हीं दैत्य सुर भूत, किन्नर, स्थावर, जङ्गम आदि की रक्षा करने वाले हो। स्थावर जङ्गम सब आपका ही रूप है। जैसे समुद्र में तरंग समूह परस्पर टकराकर वहीं नष्ट हो जाते हैं वैसे ही सम्पूर्ण जगत आप में ही उत्पन्न होकर आप में ही लय हो जाता है। सूतजी कहते हैं कि इस स्तोत्र को प्रातःकाल पवित्र होकर सुने या पढ़े उसकी सभी कामना पूर्ण हो जाती हैं।
तब स्तुति से प्रसन्न हो नन्दी पर हाथ रखे हुये शंकर जी प्रकट हुये और बोले - हे देवताओ! मैं त्रिपुर के दाह का उद्योग करूँगा। इसी अवसर पर देवी वृषध्वज शंकर से कहने लगीं- हे प्रभो! सूर्य की प्रभा के सदृश कांतिवान षड्मुख (स्कन्ध) को खेलते हुए देखिए। वह क्रीट, मुकुट, कुण्डल आदि से सुशोभित है। नूपुर किंकिणी आदि सभी स्वर्ण के आभूषणों से युक्त है। पुष्पों के हारों तथा आभूषणों से सुशोभित है। मुक्ताफल के हार से भी युक्त हैं। इसके मुखों के समूह को देखिए कितने सुन्दर हैं। अन्जन कितना सुन्दर लगा है। इस प्रकार के षडानन के मुखारविन्दों को देखकर महादेव जी तृप्त होते भये। स्कन्द का आलिंगन करके तथा चुम्बन करके शिवजी नाचने लगे। इन्हीं के साथ सब नाग, देवता और गण नाचने लगे तथा फूलों की वर्षा करने लगे। इसी अवसर पर कुम्भोदर नाम का असुर देवताओं को ताड़न करने लगा। देवता हाहाकार करके भागने लगे। मुनि योग "विधि बलवान है" ऐसा कहकर ॐ नमः शिवाय का उच्चारण करने लगे। तब नन्दीश्वर शूल हाथ में लेकर वृष पर चढ़े हुए वहाँ पहुँचे। नन्दी को देखकर कुम्भोदर और उसके गण सिर से प्रणाम कर प्रार्थना करने लगे। आकाश में नन्दी पर पुष्प वर्षा होने लगी। वृक्ष की पीठ पर फूलों से ढके इस प्रकार शोभा पा रहे हैं जैसे तारा गणों के बीच में चन्द्रमा। उन्हें देखकर इन्द्रादिक देवता स्तुति करने लगे―
रुद्र जप में तत्पर रुद्रभक्त हे नन्दी! आपको नमस्कार है। रुद्रभक्त के दुखों को दूर करने वाले आपको नमस्कार है। कूष्मांड गणों के नाथ, योगियों के पति आपको नमस्कार है। सर्वज्ञ, सबके दुखों को दूर करने वाले शरण्य, वेदज्ञ, वेदों से जानने योग्य आपको नमस्कार है। वज्र धारण करने वाले, वज्रों के से दाँत वाले, वज्र के समान देह वाले, रक्त वस्त्र धारण करने वाले, रुद्रलोक को देने वाले, रक्ताम्बर धारण करने वाले, सेवा के अधिपति, रुद्रों के पति, भूतों के और भुवनेश्वर के पति आपको नमस्कार है। रुद्र रूप को नमस्कार, भयंकर पापों को नाश करने वाले आपको नमस्कार, शिव स्वरूप, सौम्य रूप आपको नमस्कार है। हे शिलादि पुत्र! आपको नमस्कार है। इस प्रकार नन्दीश्वर स्तुति से प्रसन्न होकर देवताओं से बोले- शिवजी का धनुष, बाण, रथ, सारथी, यत्न से आप बनाओ और तीनों पुरों को नष्ट समझो तब वे ब्रह्मा को साथ लेकर विश्वकर्मा की सहायता से देव देव शिवजी का रथ आदि निर्माण करने में लगे।