लिंग महा पुराण
53- अण्ड में ज्योतिषगणों के प्रचार का कथन
सूतजी बोले-
अब मैं ज्योतिषगणों का प्रचार तथा संक्षेप से ब्रह्माण्ड के विषय में कहता हूँ। मानस के ऊपर मेरु पर पूर्व की ओर महेन्द्री पुरी है। दक्षिण में वारुणी पुरी है। पश्चिम में अमरावती तथा उत्तर में संयमनी पुरी है। सूर्य जब दक्षिणायन होते हैं, तब शीघ्र गति होती है। उत्तरायण में मन्द गति होती है। जब आग्नेय में रहते हैं तब पराह्न समय और जब नैऋतु दिशा में रहते हैं तब
पूर्वाह्न समय होता है। वायव्य में रहने पर अपराह्न तथा ईशान में पूर्वरात्र होती है। रथ सहित चलते हुए सूर्य की देव मुनि, गन्धर्व, अप्सरा, सर्प, राक्षस आदि अग्रषष्ठ से स्तुति करते हुए चलते हैं।
सूर्य की गति से ही ३० घड़ी का दिन तथा ३० घड़ी की रात्रि विद्वान लोग कहते हैं। सूर्य ही अपनी किरणों से वायु के द्वारा जल खींचता है तथा पृथ्वी पर वर्षा करता है। जल ही जगत का प्राण है। जल शिव रूप है और अर्धनारी रूप वाले शिव ही सूर्य रूप से जल की वर्षा करते हैं। हे ब्राह्मणो! इन शिव के प्रसाद से ही नाना प्रकार से वृष्टि होती है।