26- गायत्री जप विधान पूर्वक नित्य कर्म विधि में पंचयज्ञों का प्रतिपादन

नन्दीश्वर बोले-

वेद माता महेश्वरी गायत्री देवी का आह्वान करके पाद्य, अर्घ्य, आचमन आदि प्रदान करके प्राणायाम पूर्वक सुख से आसन पर बैठकर एक हजार पाँच सौ या १०८ बार प्रणव सहित गायत्री मन्त्र का जप करना चाहिए। फिर अर्घ्य देकर पूजा करके सिर से नमस्कार करे। 'उत्तमे शिखरे देवि' आदि मन्त्र बोलकर विसर्जन करे। पूर्व दिशा में तेजो रूप वेद माता गायत्री को हाथ जोड़कर सूर्य की प्रार्थना करे। उदुर्त्य चित्र देवनां तदुत्थं जात वेदसं' इत्यादि मन्त्र बोलकर उपस्थान करे। सूर्य और ब्रह्मा को अभिवादन करे। ऋक् यजु सामवेद के सूर्य सूक्तों से जप करे। पीछे अग्नि की तीन परिक्रमा करे। आत्मा, अंतरात्मा, परमात्मा, सूर्य, ब्रह्मा, अग्नि की वंदना करे। फिर मुनियों को आह्वान करे यथायोग्य पूर्व या उत्तर को मुख करके सब का तर्पण करना चाहिए।

देवताओं का पुष्प के जल से, ऋषियों का कुशा के जल से, पितरों का तिल के जल से, गन्ध युक्त तर्पण में यज्ञोपवीती ऋषियों के में निवीत्ती (कण्ठ जनेऊ) और पितरों के में प्राचीनावीती (अर्थात् उल्टा जनेऊ) धारण करे। देवों का अंगुली के अग्रभाग से तथा ऋषियों का कन्नी अंगुली की जड़ से और पितरों का दायें अंगूठे की जड़ से होकर जल छोड़ना चाहिए।

देव यज्ञ, मनुष्य यज्ञ, भूत यज्ञ, पितृ यज्ञ तथा ब्रह्म यज्ञ ये पाँच प्रकार के कर्म ब्राह्मण को अवश्य करने चाहिए। हे ब्राह्मणो! अपनी अपनी वेद शाखाओं का अध्ययन करना ही ब्रह्म यज्ञ कहा गया है। अग्नि में हवन करना देव यज्ञ है। बलि देना (बलिवैश्वदेव) करना भूत यज्ञ है, अत्यन्त आदर पूर्वक वेदपाठी ब्राह्मण को पत्नी सहित अन्न देना मनुष्य यज्ञ है, पित्रीश्वरों को उद्देश्य करके जो दिया जाए वह पितृ यज्ञ है। इन पंच महा यज्ञों को करने से सभी सिद्धि प्राप्त होती हैं। सभी यज्ञों में सर्वश्रेष्ठ ब्रह्म यज्ञ कहा गया है। ब्रह्म यज्ञ से सभी देवता, इन्द्र, ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव सभी प्रसन्न होते हैं। इसमें अन्यत्र विचार नहीं करना चाहिए।

इस प्रकार विधि पूर्वक ब्रह्मयज्ञ करके सूत्र सहित पवित्र होवे। हे ब्राह्मणो! इस प्रकार के पंच यज्ञों को न करके मनुष्य सूकर आदि की योनि को प्राप्त करता है । इसलिए सब प्रकार से कल्याण की इच्छा के लिए ब्रह्म यज्ञ आदि तथा स्नान करके विधिवत् तीर्थ का सेवन करना चाहिए। बाहर से हाथ पैर धोकर देह शुद्धि के लिए भस्म का स्नान करे, फिर प्रणव से अग्निहोत्र करे। 'ज्योति सूर्य' आदि मन्त्र बोलकर प्रातः काल हवन करे। 'ज्योतिः अग्नि' मन्त्र से सायं तथा प्रातः भली प्रकार हवन करना चाहिए । ईशान से शिरो देश को, मुख को तत्पुरुष से, हृदय को अघोर से, गुह्य स्थान को वामदेव से, पैरों को सह्य आदि से तथा सम्पूर्ण अंगों को ॐ से अभिषेक करना चाहिए। तब पैरों को तथा हाथों को प्रक्षालन करे और देव को स्मरण करके भस्म लगावे। तब 'आयोहिष्ठादू' आदि मन्त्र से स्नान करके ऋग् यजु सामवेद के शुभ मन्त्रों को स्नान के मध्य में ब्राह्मणों के हितार्थ बोले। इस प्रकार संक्षेप में स्नान की इस विधि को करने वाला मनुष्य परम पद को प्राप्त करता है।